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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 155

From जैनकोष



जिणकहियपरमसुत्ते पडिकमणादिय परीक्खऊण पुडं।

मोणव्बयेण जोई णियकज्जं साहये णिच्चं।।155।।

मौनव्रतसहित प्रतिक्रमणादिकी साधना का संदेश―जो पुरुष साक्षात् अंतर्मुख हैं अथवा साक्षात् अंतर्मुख होने का विशिष्ट प्रयत्न कर रहे हैं, ऐसे परमयोगीश्वरों को कुंदकुंदाचार्यदेव यह शिक्षण दे रहे हैं कि जिनेंद्र भगवान की दिव्यध्वनि से प्रणीत परमसूत्र में जैसा कि प्रतिक्रमण आदिक का प्रतिपादन किया है उसको अपने आपके अनुभव से परीक्षित करके मौन व्रत के साथ-साथ अपने व्रत की साधना करनी चाहिए। जो कुछ भी आत्मा के हित के लिए प्रतिक्रमण आदिक बताए गए हैं जिससे आत्मा को सुध होती है उन प्रतिक्रमणों को मौन व्रत सहित अथवा गुप्त ही गुप्त अपने आपमें धीरे से उतार-उतार कर आत्मसाधना करनी चाहिए। आत्मा को आनंदमय बनाने में ये प्रतिक्रमण आदिक अमोघ साधन हैं। आत्मा भावात्मक है, स्वत: सहज यह ज्ञानस्वरूप है, केवल जाननहार रहे यह ही इसका परमार्थस्वरूप है, यह भाव स्वयं ज्ञानमात्र होने के कारण निर्दोष है। इसमें रागद्वेष,मोह आदिक संकल्पविकल्प कुछ भी नहीं है। शुद्ध होना है, इसका अर्थ यह है कि रागद्वेषादिक विकल्पों से दूर होना है।

उपादान निमित्त की विपरीत खैंच में असिद्धि―यदि कोई यह श्रद्धा रक्खे एकांतत: कि मुझमें रागद्वेष विकल्प हैं ही नहीं तो वह शुद्ध होने का क्या प्रयत्न करेगा? रागद्वेष आदिक तो मुझमें हैं ही नहीं, इस एकांत आशय में भी कल्याण का उपाय नहीं है।कोर्इ यह माने कि रागद्वेष करने का तो मेरा काम ही है, स्वभाव ही है, उस पुरुष का भी रागद्वेष से हटने का अवसर नहीं है, किंतु इस अनेकांतवाद में कि रागद्वेष मेरा स्वभाव नहीं है, लेकिन उपाधि का निमित्त पाकर मेरे हीश्रद्धा और चारित्र गुण के परिणमन ये मोहरागद्वेष होते हैं, मुझमें जब रागद्वेषमोहपरिणामों की व्यक्ति है तो शुद्ध पर्याय,जो सम्यक्त्व और चारित्र है,इसको व्यक्ति नहीं हो सकती है। रागद्वेषमोह परिणाम ने सम्यक्त्व और चारित्र का घात किया है, ये औपाधिक हैं, ये मिट सकेंगे। मैं स्वभावत: रागद्वेषमोह रहित हूँ। तो जैसा यह मैं स्वभावत: अपने आप ज्ञानप्रकाशमात्र हूँ वैसा ही अपने को तकूँ, प्रत्यय में लूँ, ऐसा ही उपयोग बनाऊँ तो ये रागद्वेषमोह नियम से दूर होंगे। कोई ऐसी बाधक शक्ति नहीं है जो मैं वीतराग होने का उद्यम करूँ और कोई बाधा डाले। मैं ही खुद विकल्प बनाकर पर को आश्रयभूत करके बाधक बन रहा हूँ और निर्विकल्प स्वभाव का आश्रय करके खुद ही खुद का साधक हो सकूँगा।

निर्दोष अंतस्तत्त्व की आराधना में सिद्धि-निर्दोष आत्मतत्त्व की साधना में भावी काल में भी दोष न आयेगा, यह है प्रत्याख्यान। निर्दोष आत्मस्वरूप की भावना में वर्तमान में भी आनंद बरस रहा है और दोषरहित हो रहा है, यह है परमआलोचना। निर्दोष आत्मतत्त्व की भावना करके रागद्वेषादिक विकार भावों को हटाने का जो अंत:पुरुषार्थ और प्रयास चल रहा है,यही है शुद्ध प्रायश्चित्त। इस निश्चय परम आवश्यक सत् क्रियावों से ही निर्वाण प्राप्त होता है।

अंत:भान बिना द्रव्यभजन से अलाभ―हम प्रभुमूर्ति के समक्ष प्रभु का भजन तो करते हैं, पर प्रभु क्या थे, उन्होंने क्या किया, अब क्या बने हैं, कुछ भी भान न करें, और केवल मातापिता का नाम लिया जाय, शरीर की लंबाई, रंग जो कुछ तीर्थंकर के भव में भी था वैसा वर्णन करता जाय तो भी प्रभु का भजन तो ऊपर-ऊपर में किया, पर मर्म नहीं पाया। समय तो व्यतीत कर डाला प्रभु भजन में, पर स्वाद नहीं आ पाया। जैसे एक बात प्रसिद्ध है लोक में रावण के युद्ध के समय वानर सेना ने समुद्र को लांघ डाला, लेकिन उन वानरों ने समुद्र के रत्नों का परिचय तो नहीं पाया, ऐसे ही भगवान के भजनभक्ति में अपना समय तो निकाल देते हैं पर स्वाद नहीं आता।

प्रभुभक्ति की पद्धति―भैया ! प्रभु की भक्ति हम इसलिए करते हैं कि हमारी प्रभु की निकटता है, जो स्वरूप है वह मेरा स्वरूप है, प्रभु मेरे ही समान पूर्वकाल में ऐसी ही संसारपर्यायों को धारण करके लीला कर रहे थे। जैसे कि यह मैं प्रभु लीला कर रहा हूँ,क्लेश पा रहा हूँ। उन्होंने वस्तुस्वरूप का ज्ञान किया। ज्ञान का काम ही जानना है, उल्टा जानना बनावट से होता है। सीधा जानने से तो कष्ट भी नहीं है। प्रभु के शुद्ध ज्ञान प्रकट हुआ, निज को निज पर को पर जाना, परद्रव्यों से उपेक्षा हुई, ज्ञानानंदस्वरूप निर्दोष इस आत्मतत्त्व में वे जुड़े। उन्होंने उपयोग को जोड़ा, उसके फल में ये रागद्वेष आदिक दोष दूर हटे और भव-भव के संचित कर्मबंधन भी अपने आप टले और अंत में देह से भी विमुख हो गए, यह है स्थिति प्रभु की, जिसका हम भजन पूजन करते हैं। उनके स्वरूप का स्मरण करके अपने आपमें भी उत्सुकता जगायें कि मैं क्या गीदड़ों की भांति मोहीजनों के संग में रहकर अपने को कायर बना रहा हूँ। अरे ! मेरा स्वरूप तो प्रभुवत् है, अनंत ज्ञान का निधान है, उत्साह तो जगायें,इस व्यर्थ मोहकीचड़ को हटायें, अंतरंग में भीतर श्रद्धा बनाएँ। मेरा मात्र में ही हूँ,ऐसे इस अंतस्तत्त्व के भान सहित जो उपयोग को भीतर-भीतर लगाया जा रहा है वह है मोक्षपथ का गमन।

जैनेंद्र परमागम―भगवान अरहंत देव ही इस समस्त आगम के मूल प्रणेता हैं। भगवान ही वास्तव में श्रीमान्हैं। श्री उसे कहते हैं जो अपने आपकाआश्रय ले। अपने आपके आत्मा का आश्रय अपना स्वरूप ही ले रहा है। अन्य पदार्थ तो सब मुझसे भिन्न हैं, ऐसे स्वरूप का विकास हुआ है श्रीमान्, अर्थात् अंतरंग ज्ञानलक्ष्मी से शोभायमान्।ऐसे परम श्रीमान् अरहंतदेव की दिव्यध्वनि से जो उपदेश निकले हैं, जिनमें समस्त पदार्थों का यथार्थस्वरूप निहित है उस दिव्यध्वनि को सुनकर गणधरदेव ने सब उपदेशों का प्रकरण बनाकर द्रव्यश्रुत की रचना की है। वह है द्वादशांग। यह परमागम चतुरंग है। प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग―ये चार इसके अंग हैं और यह परमागम द्वादशांग भी है। आचारादिक 12 अंग हैं। द्वादशांग भुजा वाला श्रुतदेवता यही है और चार हाथ वाली सरस्वती भी यही है।

सरस्वती का स्वरूप―लोग सरस्वती का स्वरूप बनाते हैं। एक विशाल तालाब के भीतर कमल पर विराजमान् सरस्वती देवी है जिसके निकट स्वच्छ हंस भक्ति करता हुआ बैठा है। इस सरस्वती के चार हाथ हैं, किसी हाथ में वीणा, किसी हाथ में माला, किसी हाथ में पुस्तक, किसी हाथ में शंख है। यह सब रूपक इस श्रुतदेवता का है। सरस्वती का अर्थ है ‘सर: प्रसरणं यस्स सा सरस्वती’। सर: कहते हैं फैलाव को। तालाब भी भरा हुआ रहता है ना, इस कारण इसका भी नाम सर: बोला जाता है। जिसका बड़ा फैलाव हो उसे सरस्वती कहते हैं।फैलाव है विद्या का और इसके प्रथमानुयोग आदि 4 हाथ हैं। अध्ययन,भक्ति, संगीत, अनहद ध्वनि―इन चार उपायों के प्रतीक वे चार पदार्थ हैं।

ज्ञान का प्रसार―बतावो अच्छा,दुनिया में सबसे अधिक व्यापक पदार्थ कौन है? जो चीज सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हो वह अधिक बड़ी होती है। जो मोटी चीज हो वह बड़ी नहीं हो सकती है। ये मिट्टी,पत्थर,ढेला आदि स्थूल हैं और पानी इससे सूक्ष्म पदार्थ है। सो देख भी लो, इस पृथ्वी से भी पानी ज्यादा है। आज के भूगोल विज्ञानी भी मानते हैं कि दुनिया छोटी है, पानी का भाग ज्यादा है और सिद्धांत से भी देख लो―जितना बड़ा स्वयंभूरमण समुद्र है उतना बड़ा असंख्याते अन्य द्वीप समुद्र मिलकर भी नहीं है। जो बचे हुए द्वीप समुद्र हैं उनमें भी आधा जल काअंग है, आधा पृथ्वी का अंग है। तब पानी तीनचौथाई से भी ज्यादा हो गया और पानी से पतली हवा है, तो पानी से भी अधिक दूर तक फैली हुई हवा है और हवा से भी सूक्ष्म आकाश है तो हवा तो तीन लोक में ही है पर आकाश इस लोकाकाश के बाहर भी है। जो चीज सूक्ष्म होती है उसका विस्तार बड़ा होता है।आकाश से सूक्ष्म ज्ञान है। यह एक भावात्मक चीज है, तो यह लोकाकाश और अलोकाकाश ये सब इसमें समाया हुआ है और फिर भी ज्ञान की महिमा, ज्ञान का विस्तार, योग्यता इतनी बड़ी है कि ऐसे-ऐसे असंख्यात भी लोक और अलोक हों तो उनको भी जान जाय।

अपनी भूल से अपना घात―अहो ! अनंतज्ञान की कितनी अतुल निधि है हमारे आपके पास और इसको जलाये जा रहे हैं विषय और कषायों की ज्वाला में। न कुछ थोड़ासा द्रव्य पाया, हजारोंलाखों की पूंजी पायी तो उसे अपना रहे हैं कि यह मेरा है, उसको ही दिल में रक्खे हैं। इससे हो रहे हैं कितने बड़े विकल्प? जिससे अतुल अनंतज्ञान और अतुल आनंद का घात हो रहा है, इसको यह मोही जीव नहीं देखता है।

अज्ञान में बहक―जैसे किसी पुरुष ने बहका दिया बच्चे को कि तेरा कान यह कौवा लिये जा रहा है तो बच्चा कौवेके पीछे बेहतासा दौड़ता है। लोग समझाते हैं कि अरे बच्चे ! कहाँ दौड़ रहा है? बच्चा कहता है कि ठहरो-ठहरो, अभी फुरसत नहीं है, मेरा कान कौवा लिए जा रहा है। अरे ! नहीं लिए जा रहा है, बेटा भाई कहना मानो।... नहीं बाबा हमसे तो बड़ेबड़े लोगों ने कहा है।... अरे !कहा होगा। जरा अपने कान टटोलकर तो देख लो। कान पर हाथ रक्खा तो देखा कि कान तो यहीं है, कौवा नहीं लिए जा रहा है। ऐसे ही यह जीव मोह की बहक में बहक गया है, मेरा सुख परपदार्थों में है। ये परपदार्थ मिटेंगे तो मेरा सुख भी मिटेगा। परपदार्थों के पीछे बेहतासा भागे जा रहा है।.... अरे ! कहाँ दौड़े जा रहे हो? यह उपयोग कहता है। तुम्हारी बात सुनने की हमें फुरसत नहीं है। मेरा सुख इन परपदार्थों में है, कहीं ऐसा न हो कि ये पदार्थ मेरे पास न रहें तो मेरा सुख नष्ट हो जायेगा। ज्ञानी समझाता है―अरे ! तेरा सुख परपदार्थों में नहीं है, क्यों बेहतासा भगे जा रहे हो? यह नहीं मानता है, अरे ! तो प्रयोग करके देख, सब परपदार्थों की आशा विकल्प तजकर, अपने में विश्राम पाकर तो अनुभव कर। इसने कुछ इंद्रिय को संयत किया तो भीतर में ज्ञानानंद निधि का दर्शन होने से समझ में आया कि ओह ! मेरा सुख किसी परपदार्थ में नहीं है, मैं ही सुखस्वरूप हूँ।

साधना से सिद्धि― परमशरण सहज शुद्ध आत्मस्वरूप का प्रतिपादन जिस परमागम में है उस परमागम में इस शुद्ध होने की विधि का वर्णन है, जरा शुद्धनिश्चयात्मक परमात्मतत्त्व का ध्यान तो कर, फिर देखो आत्मा का शुद्धविकास कैसे नहीं होगा? केवल अपने ही सत्त्व के कारण जो इस आत्मा का सहजस्वरूप है उसका ध्यान करो, यही है प्रतिक्रमण आदिक समस्त सत्कर्म। उनको जानकर फिर केवल इस ही निज महान् कार्य में निरत बनकर हे योगी पुरुषों ! अपने अभीष्ट शुद्ध आनंद की साधना करो। जब तक शुभ,अशुभ समस्त वचन रचना का परित्याग न होगा, जब तक समस्त व्यासंग परिग्रह का परित्याग न होगा, तब तक इस अपने आपमें बसे हुए मूल्यवान् रत्न का परिचय न पा सकेंगे और फिर तुच्छ असार इन जड़ पदार्थों की आशा ही आशा बनाकर भिखारी ही रहेगा। समस्त परिग्रहों के व्यासंग को तजकर अपने आपको केवल अकेला अकिंचन ज्ञानप्रकाशमात्र अनुभव करके मौन व्रतसहित होकर मन, वचन, काय की चेष्टा न करके एक इस निर्वाण की साधना करो, आत्मतत्त्व की साधना करो।

निंदा की उपेक्षा के बिना बाधा―देखो,कुछ मोही लोग बहकायेंगे तुझे, ये अज्ञानी जन तेरी निंदा भी करेंगे, कायर हो गया है, कुछ दिमाग क्रैक मालूम होता है, घर को छोड़कर यों चल दिया। छोटे बच्चों की भी सुध न रक्खी। क्या कर रहा है यह, यह अकेला जंगल में ठूठसा बैठा है, अज्ञानी जन निंदा भी करेंगे, तेरे इन सत्कार्यों के प्रति पर तू बहकावे में मत आ जाना। यदि तूने मोही जीवों की रागद्वेषभरी वाणियों पर कुछ ध्यान दिया तो तू चिग जायेगाऔर पवित्रमार्ग से गिर जायेगा।

मतिनाशकों के प्रसंग का भाव―एक आदमी बहुत बुढ़िया बकरी लिए जा रहा था। वह बड़ी पुष्ट बकरी थी दूध देने वाली। चार ठगों ने देखा कि यह बकरी बहुत पुष्ट है, दूध देने वाली है, कोई उपाय एक बनावो कि इसकी बकरी ले ली जाय। उन्होंने सलाह कर ली और अपनी सलाह के माफिक वे चार ठग आगे जाकर एक-एक मील की दूरी पर खड़े हो गए। बकरी लिए जारहा है यह। पहिला ठग बोला―अरे भाई ! यह कुत्ता कहाँ से लाये हो। उसकी बात को उसने अनसुनी कर दी। एक मील बाद दूसरे ठग ने कहा―भाई ! तुम्हारा कुत्ता तो बड़ा अच्छा है तो उसे कुछ ध्यान में आया कि शायद यह कुत्ता ही हो। एक मील बाद तीसरा ठग मिला―वाह ! कुत्ता तो बहुत सुंदर ले आये हो। तो अब उसे ख्याल हुआ कि यह कुत्ता ही हम लिए जा रहे हैं। एक मील बाद चौथा ठग मिला तो उसने कहा―अरे ! यह कुत्ता क्यों लिए जा रहे हो? उसको यह निर्णय हो गया कि यह कुत्ता ही है। बस उसे वहीं छोड़कर चला गया। वे तो यही चाहते ही थे, बकरी लेकर घर चले आए। तो अनेक कुबुद्धियों के बहकाने से भी सीधी बात उल्टी बन जाती है।

प्रसंग के अनुसार बुद्धि की गति―भैया! हम यहाँ सोचा करते हैं कि चित्त धर्म में क्यों नहीं लगता, ज्ञान में,ध्यान में यह मन क्यों नहीं जमता? अरे ! ज्ञानध्यान के साधकों में प्रीति हो, उनका सत्संग विशेष हो तो वहाँ भी मन चलेगा। रातदिन मोहियोंरागियों के संग में ही तो बसना पड रहा है। तो असर उन विकल्पों का होगा, ज्ञानध्यान की ओरकहाँ दृष्टि जायेगी? अज्ञानीजन निंदा भी करें तो भी तू अपनी ही धुन में रहा कर, निर्वाण के सुख की साधना कर। ज्ञानी पुरुष मोक्ष की इच्छा रखने वाले कल्याणार्थी जन अज्ञानीजनों के द्वारा किए गए लोकभय से घबराते नहीं हैं। वे समस्त जगजाल से दूर होकर धनपरिजन संबंधी मोह को तजकर सदा मुक्त केवल निज आत्मतत्त्व की सर्वप्रकार सिद्धि कर लेते हैं।

परमात्मतत्त्व के आलंबन की शिक्षा―जो पुरुष अध्यात्मवाद में कुशल है, परमात्मतत्त्व के रहस्य का जानकार है वह मनुष्यों के द्वारा किए हुए भय से न घबराकर समस्त कल्पना,विकल्पजालों को तजकर इस ही एक आत्मपद को प्राप्त करता है, जो नित्य ही आनंद देने वाला है। आत्मा का शाश्वत आनंद एक इस आत्माश्रय से ही प्रकट होता है। जैसे मिश्री भीतर बाहर सभी ओरमीठी है, ऐसे ही इस आत्मप्रदेश के जितने भी विस्तार हैं, सर्वप्रदेशों में ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण घन स्थित है। केवलज्ञानमात्र अपने को अनुभव करने से अपना ज्ञानमात्र अनुभव बनता है और जब केवल ज्ञानमात्र ही अनुभव रहा तो वहाँ शुद्ध आनंद प्रकट होता है। अपने कल्याण के लिए मोह को दूर करके इस निर्मोह शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप के जानने का भी पुरुषार्थ करना चाहिए।


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