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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 164

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णाणं परप्पयासं ववहारणयेण दंसणं तम्हा।

अप्पा परप्पयासो ववहारणयेण दंसणं तम्हा।।164।। व्यवहारनय से परप्रकाशकता का समर्थन—इस प्रकरण में अब तक यह सिद्ध किया गया है कि ज्ञान स्वपरप्रकाशक है, दर्शन स्वपरप्रकाशक है और आत्मा स्वपरप्रकाशक है और इस स्वपरप्रकाशकता के बारे में यह भी प्रसिद्ध कर दिया गया कि व्यवहारनय से तो इन तीनों में परप्रकाशकता है और निश्चयनय से इन तीनों में स्वप्रकाशकता है। आत्मा धर्म है, ज्ञान और दर्शन धर्म है। ये तीनों कोई स्वतंत्र सत् नहीं हैं, किंतु प्रतिपादन के संबंध में भेद किये जाने पर इस बात की विशेषता बतायी गयी है। व्यवहारनय से जो कहा गया है उसके समर्थनरूप में व्यवहारनय की सफलता का उद्योत इस गाथा में करते हैं। व्यवहारनय से ज्ञान परप्रकाशक है और इसी कारण दर्शन भी व्यवहारनय से परप्रकाशक है और आत्मा भी व्यवहारनय से परप्रकाशक है। व्यवहारनय से निश्चयनय का दिग्दर्शन—व्यवहारनय उसे कहते हैं जिससे पराश्रित प्रतिपादन या बोध किया जाय और निश्चयनय उसे कहते हैं जिससे स्वाश्रित प्रतिपादन और बोध किया जाय। जिस पदार्थ का वर्णन करना है उस पदार्थ का ही उस पदार्थ में सब कुछ दिखाया जाय, इसको तो कहते हैं निश्चयनय और दूसरे किसी पदार्थ का नाम लेकर फिर कुछ बताया जाय, यह है व्यवहारनय। आत्मा अपने रागपरिणमन से रागी होता है, अपनी योग्यता से अपने ही गुणों के विकाररूप से परिणत होकर रागी होता है यह बात भी सत्य है और ऐसा कहना यह निश्चयनय का कथन है। आत्मा अपने आप अपने ही सत्त्व के कारण रागी नहीं होता है, किंतु कर्मों के उदय का निमित्त पाकर ही रागी होता है। यह राग कर्मों के उदय से होता है यह बात भी सत्य है और इस पराश्रित प्रतिपादन का नाम है व्यवहारनय। परमार्थपरिचय से व्यवहारनय की कार्यकारिता—व्यवहारनय में परमार्थमर्म की दृष्टि न हो तो वह व्यवहाराभास कहलाने लगता है व्यवहारनय नहीं रहता है। जिस कर्म के उदय से राग हुआ है ऐसा वर्णन सुनकर यदि यह ही दृष्टि बना ली जाय कि कर्मों के उदय से राग की किरण निकलती है, कर्मों से राग पैदा होता है, कर्मों का परिणमन है, वह व्यवहाराभास हो गया। वह असत्य कथन हो गया। व्यवहार के प्रतिपादन में किस ओर दृष्टि दिलायी गयी है? उसका परिग्रहण होना चाहिए। अपने कल्याण के लिए निश्चय का प्रतिपादन भी कार्यकारी है और व्यवहारनय का प्रतिपादन भी कार्यकारी है। नयों के एकांत से अलाभ—यथार्थ स्वरूप से अपरिचित होकर निश्चय को एकांत बनाने पर भी काम बिगड़ता है। जैसे आत्मा अपने ही गुणों से रागी होता है उसको सर्वथा एकांत मान लिया जाय कि आत्मा से ही राग चला करते हैं तो यह स्वभाव बन बैठेगा। व्यवहार की अपेक्षा छोड़कर निरपेक्ष, परिपूर्ण सर्वथा मान लिया जाय तो यह राग करना जीव का स्वभाव हो जायेगा और यह फिर कभी मिट न सकेगा। यदि जीव में ऐसा स्वभाव मानते हो कि कभी राग होता है तो उसमें भी यह अटपट बात बन जायेगी कि कभी मिट गया तो फिर हो जायेगा, क्योंकि वह राग जीव के स्वभाव से ही उत्पन्न हुआ करता है। आज नहीं है राग, फिर कभी हो बैठेगा। तब निश्चय को ऐसा ही एकांत मान लेने पर, अपने व्यवहारनय की अपेक्षा छोड़ देने पर यहाँ भी हित का मार्ग रुद्ध हो गया? कोई व्यवहार को ही एकांत मान ले, अजी, कर्मों के उदय से ही राग होता है, जीव क्या करेगा? तो कर्मों के उदय से होता है तो साहब अब कर्मों का उदय ही प्रभु कहलायेगा। उसकी मर्जी होगी तो राग बनेगा, उसकी मर्जी न हो तो राग न मिटेगा। राग के होने न होने की स्वतंत्रता कर्मों की है तो फिर जो करे सो भोगे। कर्मों ने ही राग किया है तो हमारी बला से। कर्म राग करते हैं तो कर्म भोगेंगे, मेरा क्या बिगड़ता है उसमें? यों इस एकांत में भी हित न मिल पायेगा। प्रज्ञ पुरुष की तत्त्वनिपुणता—जैसे कोई बालक खेल में अत्यंत निपुण हो तो उसके लिए वह खेल खेलना आसान है। चलकर, बैठकर, मुड़कर उस खेल को वह खेला करता है। इसही प्रकार वस्तुस्वरूप के यथार्थ परिचय की कला में निपुण ज्ञानी पुरुष प्रत्येक दृष्टि से अपनी कला देखता रहता है। वह व्यवहारनय के प्रतिपादन से भी हित निकालता है और निश्चयनय के प्रतिपादन से भी हित निकालता है। अहित तो दुराशय है, नयों के प्रयोग से अहित नहीं है। सदाशय में व्यवहारनय से भी लाभ की प्रस्तावना—भैया ! कहो व्यवहारनय का प्रतिपादन इसकी शुद्ध दृष्टि का बहुत अधिक भी साधक बन जाय। जैसे कि समयसार में जीवजीवाधिकार है, वहाँ यह बताया गया है कि जीव में राग नहीं, द्वेष नहीं, कर्म नहीं, देह नहीं, ये सब परभाव हैं, पुद्गलद्रव्य से उत्पन्न हुए हैं और इस ही प्रसंग में, इस ही संदर्भ में यह कह दिया कि शुद्ध निश्चयनय से ये रागादिक पौद्गलिक हैं, पर यथार्थज्ञान का, मर्म का परिचयी पुरुष कहीं भी भ्रम में नहीं पड सकता है और इस दिशा में जहाँ यह बताया है कि शुद्ध निश्चय से रागभाव पौद्गलिक है, वहाँ प्रयोजन यह है कि वह द्रष्टा पुरुष अपने आपको शुद्ध चैतन्यमात्र समझ लेवे। इस निश्चयनय का नाम है विवक्षित एक देश शुद्ध निश्चयनय। सदाशय में व्यवहारनय और निश्चयनय की एक मंजिल—विवक्षित एकदेश शुद्धनिश्चयनय में कितनी उत्तम अंतरंग की तैयारी है कि ये रागादिक भाव हैं, ये जीव के स्वरूप नहीं हैं। जीव तो शुद्ध चैतन्यस्वरूपमात्र है और फिर ये रागादिक, ये हो कैसे गये? ये रागादिक क्या जीव के निजभाव नहीं हैं, हाँ, स्वभाव नहीं हैं, सहजभाव नहीं हैं? हाँ हाँ नहीं हैं। तो क्या परभाव हैं? इसका मतलब रागादिक परभाव है, इसका मतलब यह है कि यह परपदार्थों के साथ अन्वयव्यतिरेक इन रागादिक भावों का पुण्यकर्मोदय के साथ है। इससे पुद्गल कर्मों के उदय के निमित्त से उत्पन्न हुए भाव हैं, ये परभाव हैं। तब फिर ये रागादिक किसके क्या हो गए, किसके बन गए? हम इन रागादिकों को किसके निकट पहुंचाएँ, इन रागादिकों की रक्षा का भार किसके जिम्मे, सौंपोगे? पुद्गल के जिम्मे, क्योंकि मैं शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ, मैं अपने आपको शुद्ध चैतन्यस्वरूप ही निरखना चाहता हूँ, ऐसे शुद्धस्वरूप की दृष्टि का आश्रय होने पर इन रागादिक भावों को जो कि आत्मा के ही निजभाव हैं, औदयिक परिणमन हैं फिर भी इसे पौद्गलिक बता देना इसकी प्रशंसा की गई है। भूल कहाँ है? नय सब पथप्रदर्शक होते हैं। नय का अर्थ यह भी है जो इस जीव को हित की ओर ले जाय वह नय है। नय का अर्थ यह भी है कि जो इस जीव को यथार्थ परिज्ञान की ओर ले जाय, प्रमाणपरिगृहीत अर्थ के एकदेश के ज्ञान में ले जाय उसका नाम नय है। यह नय जब निरपेक्ष होता है तब मिथ्या होता है और जब सापेक्ष होता है तब ये सम्यक् कहलाता है। व्यवहारनय से परप्रकाशकता के प्रतिपादन में अंतरंग आशय—इस प्रसंग में व्यवहार की सफलता का प्रतिपादन किया गया है। समस्त जो कर्म ज्ञानावरणादिक होते हैं उनके क्षय से उत्पन्न होने वाला जो निर्मल केवलज्ञान है वह मूर्त, अमूर्त, चेतन, अचेतन समस्त परपदार्थों के गुण और पर्यायों के समूह का प्रकाशक है, ज्ञान सबको जानता है। यह बात व्यवहारनय से समझनी है। कहीं उसका कोई यह अर्थ न लगा ले कि यह ज्ञान परपदार्थों में प्रवेश कर-करके उन परपदार्थों को आधार बना-बनाकर जानता है। ऐसा कोई न समझ ले, इसके लिए यह व्यवहारनय का कथानक है, यह बात समझायी गयी है। ज्ञान शक्ति है और शक्ति शक्तिमान में रहती है। शक्ति और शक्तिमान का कोई भेद नहीं है। यह ज्ञान अपने आत्मप्रदेश में रहते हुए ही यहाँ ही जाननरूप व्यवस्था से समस्त पदार्थों का परिज्ञान कर रहा है। किसी भी परपदार्थ में यह जाता नहीं है। अपना ज्ञान और दर्शन—भैया ! अपन आँखों से किन्हीं चीजों को निरखते हैं, यह एक ज्ञान हुआ, इसे दर्शन नहीं कहा करते। आँखों से देखने का नाम दर्शन नहीं है। इसे भी ज्ञान कहते हैं। समस्त इंद्रियों से ज्ञान ही होता है, दर्शन नहीं होता है। जैसे स्पर्शन इंद्रिय द्वारा कोई ठंडा, गर्म, रूखा, चिकना आदि परिज्ञान हुआ तो उसे दर्शन नहीं कहा, उसे ज्ञान कहा है, ऐसे ही रसनाइंद्रिय के द्वारा जो खट्टा, मीठा आदि रसों का परिज्ञान हुआ उसे दर्शन नहीं कहते हैं, वह ज्ञान है। ऐसे ही घ्राण इंद्रिय द्वारा जो गंध का परिज्ञान होता है यह भी दर्शन नहीं है, ज्ञान है। इस ही प्रकार नेत्रेंद्रिय द्वारा जो हमने रूप का परिचय कर लिया है, यह काला है, पीला है, नीला है, यह भी दर्शन नहीं है, यह भी ज्ञान है और कर्णेंद्रिय के द्वारा जो कुछ भी हमें शब्दों का परिचय मिलता है वह भी दर्शन नहीं है, ज्ञान है। दर्शन तो इन सब पदार्थों को जानने की शक्ति से संपन्न आत्मा को प्रतिभासना सो दर्शन है। दृष्टांतपूर्वक प्रतिभास में निश्चय व व्यवहार के अंश का समर्थन—चूँकि हमने ऐसे जाननहार आत्मा को देखा तो हमने फिर सबको देख लिया, यों व्यवहारनय से कहा जायेगा। जैसे हम दर्पण को तो देख रहे हैं और पीठ पीछे खड़े हुए दो चार व्यक्तियों की हरकतें उस दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही हैं, हम दर्पण को देख रहे हैं, इसमें ही यह बात आ गयी कि हम उन तीन चार व्यक्तियों की हरकत को भी देख रहे हैं, पर हम उनकी हरकत को कहाँ देखते हैं? हम तो दर्पण को ही देख रहे हैं। ऐसे ही ज्ञान द्वारा समस्त पदार्थों का परिज्ञान हुआ और ऐसे परिज्ञान करने वाले या परिज्ञान की परिणति रखने वाले आत्मा को हमने एक झलक में देख लिया, इसका अर्थ यह हो गया कि मैंने आत्मा को देख लिया और सबको देख लिया। यों सबको देख लेना, इतना अंश तो है व्यवहारनय का और अपने को देख लेना, यह अंश है निश्चयनय का। ऐसे ही हमने ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों को जाना, किंतु सब पदार्थों में तन्मय होकर नहीं जाना। मैं यह ज्ञान अपने ही आत्मा में ठहरकर इन सब पदार्थों को जानता रहता हूँ, तो हुआ क्या कि ज्ञान में जो जाननरूप, ज्ञेयाकाररूप किया उसको हमने जाना, यह है निश्चयनय से और सब पदार्थों को जान लिया, यह है व्यवहारनय से। निश्चयव्यवहारविधान का प्रतिबोध—नयप्रतिबोध के लिये एक लौकिक दृष्टांत लीजिये। आपके 101 डिग्री बुखार चढ़ा है तो आप उस बुखार को जान रहे हैं, एक तो यह जानना है और दूसरे को 101 डिग्री बुखार हो तो उसके थर्मामीटर लगाकर देख लिया कि 101 डिग्री बुखार चढ़ा है। तो इन दोनों जाननों में क्या अंतर है? अपने बुखार को जानना, लौकिक दृष्टांत में तन्मय होकर अनुभवने रूप जाना है और दूसरे के बुखार को जानना तन्मय होकर अनुभवने रूप नहीं जाना है। इसी तरह यह ज्ञान अपने आपके ज्ञेयाकारों को जानता है, वह तन्मय होकर अनुभवने वाली बात है और अन्य समस्त पदार्थों का जो जानना है यह तन्मय होकर अनुभवने वाली बात नहीं है। यही यहाँ व्यवहारनय और निश्चयनय का अंतर जानना चाहिए। जिस पर व्यवहारनय से यह ज्ञान परप्रकाशक है इस ही प्रकार यह दर्शन भी परप्रकाशक है और इसही तरह कार्यपरमात्मा अरहंतदेव जो बड़े-बड़े इंद्र, देवेंद्रों के द्वारा भी प्रत्यक्ष वंदना के योग्य हैं ऐसे तीर्थंकर परमदेव के आत्मा का भी परप्रकाशत्व जानना चाहिए, अर्थात् वह आत्मा भी व्यवहारनय से परप्रकाशक है। परमदेव की महिमा—ये तीर्थंकर परमदेव तीन लोक के प्रक्षोभ के हेतुभूत हैं। प्रक्षोभ मायने खलबली। खलबली हर्ष में भी होती है और विषाद में भी होती है। जब तीर्थंकर देव जन्मते हैं तो तीनों लोक में खलबली मच जाती है। भवनवासी, वैमानिक, व्यंतर और ज्योतिषी आदि देवों के निवास में स्वयं ही शंखध्वनि, घंटाध्वनि, आसन का हिलना–ये सब खलबली मच जाती है। निमित्तनैमित्तिक योग की परख करना, कितना विचित्र संबंध है? तीर्थंकर देव के पुण्य कर्मों का उदय भी आत्मा से निकलकर उन शंख और घंटों में ठोकर नहीं मारता है और उन कर्मों में ठोकर मारने की योग्यता भी नहीं है और फिर भी इतनी विचित्र घटनायें हुआ करती हैं, यह सब बिल्कुल भिन्न-भिन्न स्थानों पर होकर हो रहा है, यह एक विचित्र बात है। ऐसे तीन लोक के प्रक्षोभ का कारणभूत तीर्थंकर परमदेव का आत्मा भी व्यवहारनय से परप्रकाशक है, यह आत्मा भगवान, ज्ञान व दर्शन भी व्यवहार से परप्रकाशक है, इसी प्रकार व्यवहारनय से परप्रकाशकता और निश्चयनय से स्वपरप्रकाशकता दृष्ट की है। प्रभु और छद्मस्थ के ज्ञानदर्शन की वृत्ति का परिचय—भगवान कार्यपरमात्मा के केवलज्ञान और केवलदर्शन एक साथ होते हैं। इस कारण यह बात तो स्पष्ट घटित होती है कि केवलज्ञान से जो जान रहे हैं ऐसा जानते हुए आत्मा को जो दर्शन से प्रतिभास कर रहे हैं उनका दर्शन भी व्यवहारनय से परप्रकाशक है। किंतु यहाँ छद्मस्थ अवस्था में चूँकि ज्ञान दर्शनपूर्वक होता है, अत: जिस ज्ञान के लिए तैयारी कर रहा है यह आत्मा, एक ज्ञान छोड़ करके नवीन जानन की तैयारी के काल में, इस ज्ञानयोग्यता संपन्न आत्मा को प्रतिभास रहा है। और साथ ही यह जानो कि छद्मस्थ अवस्था में भी ज्ञान का परिणमन और दर्शन का परिणमन एक साथ होता है। केवल उपयोग क्रम पूर्वक है। कोई भी गुण ऐसा नहीं है जो गुण अपने परिणमन को एक क्षण भी बंद कर सके। चूँकि आत्मा में जैसे ज्ञान शाश्वत गुण माना है यों ही दर्शन भी शाश्वत गुण माना है और इन दोनों गुणों का परिणमन प्रतिक्षण निरंतर होता रहता है, पर उपयोग, जिसे यूज कहते हैं इंग्लिश में, छद्मस्थ अवस्था में क्रमपूर्वक होता है और इस दर्शनोपयोग की स्थिति में यह आत्मा नवीन ज्ञान की तैयारी के सम्मुख होते हुए की स्थिति में ज्ञान की जिस वृत्तिरूप परिणम रहा है, उस आत्मा को प्रतिभासने का काम कर रहा है। इस तरह यह आत्मा, ज्ञान, और दर्शन ये व्यवहारनय से परप्रकाशक कहे गये हैं। ज्ञानपुंज का जयवाद—यह कार्यपरमात्मा भगवान जिसने दोषों को जीता है, जिसके चरण देवेंद्र और नरेंद्रों के मुकुटों से प्रकाशमान होते हैं, जो लोकालोक के समस्त पदार्थों को एक साथ जानते हैं, ये समस्त पदार्थ स्वतंत्र हैं, किसी का सत्त्व किसी दूसरे पदार्थ में प्राप्त नहीं होता है, ऐसी भिन्न-भिन्न स्वतंत्र–स्वतंत्र चीजें हैं, वै जैसी हैं तैसे उन्हें प्रभु एक साथ जानते हैं। वह जिनेंद्र जयवंत हो। किसी भी महापुरुष के जयवाद में अपना जयवाद विदित होता है और लोकव्यवहार में भी किसी-किसी की यह पद्धति होती है। भिखारी लोग भी सेठ लोगों के यहाँ भोजन पा जाने पर आशीर्वाद देकर जाते हैं, तुम खूब फलो फूलो। वह अपने फले फूले बनने के परिणाम के हर्ष की ज्ञप्ति है। ऐसे ही भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए की स्थिति में जो हमारे गुणविकास की ज्ञप्ति हो रही है उसके हर्ष में हम समा नहीं पाते हैं और प्रभु का मुख से जयवाद बोलते हैं। उसमें अपने ही जय की बात निहित है और दूसरी बात यह है कि जयवाद में श्रद्धा का प्रकाशन है, हम भगवान के उपकार से कितना उपकृत हुए हैं, उसका बदला देने की सामर्थ्य हममें कहाँ है? ये ही वंदन, नमस्कार और जयवाद के शब्द ही आभारप्रदर्शन के लिए समर्थ हो पाते हैं। वह प्रभु जयवंत हो।


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