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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 167

From जैनकोष



मुत्तममुत्तं दव्वं चेयणमियर सगच सव्वं च। पेच्छंतस्स हु णाणं पच्चक्खमणिदियं होइ।।167।।

प्रत्यक्षज्ञान की व्यापकता—प्रभु का ज्ञान कैसा होता है इस संबंध में यह गाथा कही गयी है। प्रभु मूर्त, अमूर्त समस्त द्रव्यों को जानते हैं, चेतन, अचेतन समस्त द्रव्यों को जानते हैं व आत्मा व अनात्मा समस्त द्रव्यों को जानते हैं, इसका कारण यह है कि उनके ज्ञान प्रत्यक्ष है और अतींद्रिय है। प्रभु के समस्त मूर्त-अमूर्त का ज्ञान—जगत में जितने भी पदार्थ हैं अर्थात् जो हैं वे दो प्रकार के हैं, एक तो रूप, रस, गंध, स्पर्श वाले और एक ऐसे जिनमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है। जैसे पुद्गल में तो रूप, रस आदि हैं और बाकी सब पदार्थों में रूप आदिक नहीं हैं। पदार्थ 6 जाति के होते हैं, जिनमें पुद्गल तो मूर्त है और शेष द्रव्य याने जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये अमूर्त हैं। केवली प्रभु मूर्त-अमूर्त समस्त द्रव्यों को जानते हैं। जीवद्रव्य—जैन शासन की प्रमुख विशेषता यह है कि यह पदार्थ का यथार्थ स्वरूप बताता है। एक जाति की विशेष बात दूसरे में न मिले और अपनी जाति में पूर्ण रूप से समान हो उसका नाम जाति है। जैसे जीव कहो, तो जीव-जीव जितने हैं वे सब एक समान हैं, और इनका जो असाधारण गुण, ज्ञान, दर्शन, जानना-देखना, वह किसी अन्य पदार्थ में हो नहीं सकता। इस कारण जीव एक जाति है और इस जीव-जाति में अनंत जीव आ गये है और जीव-जाति में कोई भी जीव छूटता नहीं है। जीव का जो स्वरूप है उस स्वरूप की दृष्टि से चाहे भव्य संसारी हों, चाहे अभव्य संसारी हों और चाहे सिद्ध भगवान हों, सबका एक स्वरूप है। जीवत्वस्वरूप के नाते से कोई जीव नहीं छूटता। ज्ञानी संत वे ही कहलाते हैं जो सब जीवों में इस जीवत्वस्वरूप को देखते हैं। कहते हैं ना कि जीव जीव सब एक समान हैं। चाहे सिद्ध भगवान हों, अरहंत प्रभु हों, साधु परमेष्ठी हों, श्रावक हों, कीड़ा मकोड़ा हों, स्थावर हों, निगोद हों, सभी जीवों में स्वरूप और स्वभाव एक समान है। स्वभाव की दृष्टि से किसी में अंतर नहीं पड़ता है। जाति उसे ही कहते हैं कि जिसमें सब बराबर अधिकार में समा जाय, जैसे गाय जाति कहो तो चाहे काली गाय हो, चाहे लाल हो, चाहे सफेद हो, अथवा हल्के सींग की हो, सब गायें गौ जाति में आ जाती हैं। जाति नाम उसका है कि जिसमें एक भी पदार्थ उस जाति का छूटे नहीं। इस दृष्टांत से जीव एक जाति है, जिसमें अनंत जीव समाये हुए हैं। पुद्गल द्रव्य—पुद्गल एक जाति है जिसमें गर्भित पदार्थों में रूप, रस, गंध, स्पर्श पाया जाय। पुद्गल जाति में कोई पुद्गल नहीं छूटता, चाहे वह सूक्ष्म हो अथवा परमाणु हो, सबमें रूप, रस, गंध, स्पर्श होता है। किसी को न भी विदित हो कोई गुण लेकिन जहाँ रूप आदिक चारों में से कोई एक है वहाँ तीनों अवश्य होते हैं। ये दिखने वाले जो पदार्थ हैं, इनमें शीघ्र समझ में आता है कि इनमें रूपादिक हैं, पर शब्द जो सुनाई दे रहे हैं ये भी पुद्गल हैं, इनके ठोकर भी लगती है। कोई जोर से बोले तो कानों में बहुत आहट पहुंचती है। छोटे-मोटे पदार्थ तो बोलने के ठोकर से ही उडकर भाग जाते हैं। कोई भींत के उस तरफ बोल रहा हो तो उसके शब्द भिड़ जाते हैं, यहाँ उन शब्दों को नहीं सुन सकते। कोई और शब्दों को तो वैज्ञानिकों ने यंत्रों में पकड़ रक्खा है, तो इस प्रकार ये शब्द भी रूप, रस, गंध, स्पर्श वाले हैं। इनसे भी और सूक्ष्म स्कंध है—जैसे कर्म, ये भी मूर्त हैं। ये कर्म न भिड़ते हैं, न स्वाद में आते हैं, न इनमें गंध विदित होती है, न इनके आवाज है, न इनमें रंग विदित होता है। कुछ विदित इसमें होता नहीं है, लेकिन हैं ये सब। एक आवाज तो नहीं है, बाकी चार गुण परिणमन हैं। आवाज होना पुद्गल का गुण नहीं है। यदि आवाज पुद्गल का गुण होता तो कर्म में भी होता। आवाज तो पुद्गल की द्रव्यपर्याय है। यों कर्म भी पुद्गल हैं और उनसे सूक्ष्म अनेक स्कंध और पड़े हुए हैं। वे सब पुद्गल हैं और एक अणु भी जो कि अबद्ध है, एक समय में 14 राजू तक गमन कर जाता है, ऐसा अणु भी पुद्गल है, तो द्रव्य में दूसरी जाति है पुद्गल की। धर्मद्रव्य और अधर्म द्रव्य—तीसरी जाति बतायी है धर्मद्रव्य। धर्मद्रव्य एक ही है इसीलिए इसे चाहे जाति कह लो, चाहे व्यक्ति कह लो, एक ही बात है। धर्मद्रव्य उसे कहते हैं जिसके निमित्त से जीव और पुद्गल गमन कर सकें। यदि लोक में धर्मद्रव्य न होता तो यह जीव और पुद्गल चल न सकते थे। इतनी सूक्ष्म बात जैनदर्शन में बतायी गयी है। इसके विषय में वैज्ञानिक लोग भी कुछ अनुमान करते हैं कि आकाश में भी सूक्ष्म तरंगें हैं जिसके सहारे शब्द चलते हैं। उससे भी और सूक्ष्म यह धर्मद्रव्य है। अधर्मद्रव्य उसे कहते हैं जो जीव और पुद्गल जो कि चलकर ठहरते हों उनके ठहरने में सहायक होता है। यह भी एक ही पदार्थ है, इसलिए अधर्म जाति कहो या अधर्म नाम का कोई व्यक्ति कहो, एक ही बात है। आकाश द्रव्य—एक आकाशद्रव्य है जो असीम है, लोक में भी वही एक आकाश है और लोक से बाहर भी वही एक आकाश है, क्योंकि कल्पना करो कि आकाश का यदि कही अंत हो जाय तो फिर जहाँ आकाश नहीं रहा वहाँ क्या चीज होगी? आकाश नाम मान लो पोल का है। जहाँ आकाश नहीं है, तो आकाश जब नहीं रहा तो इसका अर्थ है कि कुछ है, कोई ठोस चीज है। जब कोई ठोस चीज है तो आकाश भी है और उस ठोस का भी तो अंत होता है, ठोस के बाद फिर आकाश। कल्पना करते जावो, आकाश का कहीं अंत बता ही नहीं सकते हैं, ऐसा सीमारहित एक आकाशद्रव्य है। धर्म, अधर्म व आकाश की एक-एक संख्या का कारण—धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य व आकाश, ये एक-एक क्यों हैं? एक उसे कहते हैं कि जो एक परिणमन जितने पूरे में होना ही पड़े, अथवा जिसका कभी हिस्सा ही न हो सके वह एक होता है। आकाश का कभी हिस्सा नहीं होता है वह एक होता है और उसका जो भी परिणमन है अपने आपके स्वरूप में, वह एक परिणमन संपूर्ण आकाश में होता है।

    आकाशपरिणतिविषयक एक जिज्ञासा का समाधान व काल द्रव्य—यहाँ यह शंका की जा सकती है कि कालद्रव्य तो केवल लोकाकाश में है और कालद्रव्य का काम है वस्तुवों के परिणमन का निमित्त होना। तो लोकाकाश के कालद्रव्य की वजह से लोकाकाश के आकाश का तो परिणमन हो जायेगा, पर इसके बाहर में जो आकाश है उसका परिणमन तो नहीं हो सकता। उसका उत्तर यह है कि चूँकि आकाश एक द्रव्य है, अखंड है, इस कारण आकाश का जो भी एक परिणमन है वह समस्त आकाश में होता है और उस परिणमन के लिए निमित्त चाहिए काल, सो वह कालद्रव्य कहीं भी स्थित हो वह तो निमित्तमात्र है। लोकाकाश में स्थित कालद्रव्य का निमित्त पाकर आकाश परिणमन करता है। कालद्रव्य असंख्यात हैं, लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालाणु मौजूद हैं। जहाँ जो कालद्रव्य है उस पर स्थित जो भी पदार्थ है उसके परिणमन का निमित्तभूत वह काल है।

मूर्त-अमूर्त के बोध का प्रतिपादन—इस प्रकार द्रव्य 6 होते हैं, उन पदार्थों में यदि मूर्त और अमूर्त दो विभाग किए जायें तो मूर्त तो हुआ पुद्गल और अमूर्त हुए 5 पदार्थ जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। इन 5 प्रकार के पदार्थों में रूप आदिक नहीं होते हैं। प्रभु भगवान मूर्त और अमूर्त समस्त पदार्थों को जानते हैं और इन मूर्त-अमूर्त पदार्थों के जो परिणमन हो चुके हैं, हो रहे हैं, होंगे, उन समस्त परिणमनों को जानते हैं। प्रभु के चेतन-अचेतन समस्त द्रव्यों का ज्ञान—इसी प्रकार इन 6 जाति के पदार्थों का यदि चेतन और अचेतन की पद्धति से भेद किया जाय तो चेतन तो केवल एक जीव है और बाकी 5 अचेतन हैं—पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। ये 5 पदार्थ अचेतन हैं। चेतन उसे कहते हैं, जिसमें चेतने का परिणमन पाया जाय। चेतन नाम है प्रतिभास का, जो कुछ जान सके, देख सके। जीव प्रतिभासता है और बाकी 5 द्रव्य रंच भी प्रतिभास नहीं कर पाते हैं। इसी कारण जीव तो मात्र ज्ञाता ही बने अथवा ज्ञेय ही बने , ऐसा नहीं है। वह ज्ञाता भी है और ज्ञेय भी है, किंतु शेष 5 प्रकार के पदार्थ केवल ज्ञेय है, ज्ञाता नहीं है। जीव जानने वाला भी है और जानन में भी आता है किंतु शेष 5 प्रकार के पदार्थ जानने में तो आ जाते हैं परंतु वे स्वयं जानते नहीं हैं। इस तरह चेतन और अचेतन में भी सब पदार्थ आ गए। इन समस्त पदार्थों को केवली भगवान एक साथ स्पष्ट त्रिकालवर्ती परिणमनों सहित जानते हैं। प्रभु के आत्मा और अनात्मा का समस्त परिज्ञान—इसी प्रकार इन पदार्थों का यदि आत्मा और अनात्मा इस तरह से भेद किया जाये तो इस आत्मा में तो केवल एक ही पदार्थ लेना है, जो जानने वाला भगवान है उसका आत्मा तो हुआ स्व। उसके अलावा अनंत जानने वाले जो और प्रभु हैं वे भी पर हैं, संसार के समस्त जीव भी पर हैं, पुद्गल धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी पर है। इस तरह स्व को और पर को ये प्रभु स्पष्ट त्रिकालवर्ती परिणमन सहित जानते हैं अर्थात् जो समस्त सत् को जाने वह केवली प्रभु है। यह निरंतर जानते और देखते रहते हैं, उनमें एक समय का भी बीच में व्यवधान नहीं होता है। उनके ज्ञान में तो समस्त भूतकाल के और भविष्यकाल के भी पदार्थ ऐसे स्पष्ट हो रहे हैं जैसे मानो वर्तमान में हों। ज्ञान में तो सभी पदार्थ वर्तमान रहते हैं। उन पदार्थों में भूत और भविष्य का भेद है। पदार्थों में यह परिणमन तो हो चुका था और ये परिणमन आगे होंगे, ऐसा पदार्थों में तो भेद है, पर जानने में क्या भेद? प्रभु के ज्ञान में भूत भविष्य के ज्ञान की वर्तमानता—जैसे आप अबसे 10 वर्ष पहिले की बात का स्मरण कर रहे हो तो वह बात, घटना आपके ज्ञान में इसी समय है। भले ही उस घटना को 10 वर्ष गुजर गये हैं, पर 10 वर्ष पहिले की बात को जानने में आपको 10 वर्ष नहीं गुजारना है, आप तो वर्तमान में उसे स्पष्ट जान रहे हैं। तो भूतकाल का ज्ञान आपके ज्ञान में वर्तमान की तरह है। यों ही भविष्यकाल की बात भी आप अनुमान से जानते हैं, न प्रत्यक्ष ज्ञान हो उसका भी अनुमानरूप, संभावनारूप जाना गया भविष्यकाल भी वर्तमान की तरह हो जाता है। फर्क यह है कि हमारे अपने ज्ञान में भूत और भविष्य की बात आये तो विशदपना न होने से अर्थात् स्पष्ट जानन न होने से हम उसे वर्तमानवत् नहीं कहते हैं, किंतु प्रभु के ज्ञान में तो भूतकाल के समस्त पदार्थ ज्ञात हो रहे हैं और भविष्यकाल के भी समस्त पदार्थ स्पष्ट ज्ञात हो रहे हैं, उनके लिए तो वर्तमान है। वर्तमान ज्ञान की विशदता का अनुमान—जैसे जिन-वाणी संग्रह में जहाँ भूतकाल के 24 तीर्थंकरों के नाम लिखे हैं और वर्तमान काल के 24 तीर्थंकरों के नाम लिखे हैं और भविष्यकाल के 24 तीर्थंकरों के नाम लिखे हैं, तो नानारूप से जानने में तो आपके वे 72 नाम सामने हैं। प्रभु का ज्ञान तो विशद है, उनके ज्ञान में तो भूत और भविष्य के सब पदार्थ ऐसे सामने हैं जैसे कि आपके सामने पत्थर पर लिखे हुए भूत और भविष्य के पुरुषों के नाम हैं। उनके तो ज्ञान में समस्त पदार्थ ही सदा ही वर्तमान रहते हैं, पदार्थों में यह पर्याय पहिले थी, यह पर्याय आगे होगी, इस प्रकार काल भेद है, पर हम आपके ज्ञान में जैसे कुछ-कुछ भूत और भविष्य की बात सामने आती है इससे भी अत्यंत विशद जीव का निरावरण ज्ञान है। प्रभु के ज्ञान में भूत और भविष्य का सब परिणमन स्पष्ट ज्ञात होता है, क्योंकि उनके ज्ञान में क्रम नहीं है। छद्मस्थों का क्रमिक ज्ञान—जो इंद्रिय से जाने उसके ज्ञान में क्रम होता है। अभी हम अमुक इंद्रिय से जान रहे हैं तो शेष चारों इंद्रियों का ज्ञान अभी नहीं हो रहा है, बाद में होगा। हमारा इंद्रियज ज्ञान एक साथ नहीं होता। कल्पना करो कि कोई बेसन से तेल में पपरियाँ बनाए बड़ी कड़ी और आप उसे मुख से खा रहे हैं तो कल्पना जग सकती है कि उस समय हम पपरियों की आवाज भी सुन रहे हैं, चुर्रु चुर्रु हो रही हैं, आंखों से भी देख रहे हैं, स्वाद भी आ रहा है, गंध भी खूब आ रही है, यह कड़ी है इस प्रकार का बोध हो रहा है। पाँचों इंद्रियों से इस प्रकार का ज्ञान हो रहा है, पर वहाँ भी एक साथ ज्ञान नहीं होता। इस ज्ञान की ऐसी तीक्ष्ण गति है या यहाँ के लिए यों कहो कि मन की ऐसी तीव्र गति है कि वह क्रम-क्रम से इन सब इंद्रियों द्वारा ज्ञान कराता रहता है लेकिन क्रम नहीं मालूम पड़ता। जैसे 50 पान रक्खे हैं एक गड्डी में और आप उसमें एक सूई मार दें तो ऐसा लगता है कि पचासों पान एक साथ छिद गए हैं पर ऐसा नहीं है। वे एक के बाद एक छिदे हैं। उन पचासों पानों में 50 बार विलंब लगा, किंतु यह विलंब ज्ञात नहीं होता है, ऐसे ही इस मन की इतनी तीव्र गति है कि हम इस ज्ञान को क्रम-क्रम से जानते हैं। फिर भी हम ऐसा महसूस करते हैं कभी-कभी कि हम एक साथ ही तो जान रहे हैं, लेकिन है नहीं ऐसा। प्रभु का युगपत् सर्वज्ञान—प्रभु का ज्ञान एक साथ स्पष्ट जानता है, किंतु हम आप छद्मस्थों का ज्ञान क्रम क्रम से जानता है। प्रभु के ज्ञान में कभी कोई व्यवधान नहीं है। हम आपके आँखों के आगे यदि भींत आड़े आ जाय तो हम चीजों को नहीं जान सकते हैं जो भींत के उस पार रक्खी हैं, हमारे ज्ञान में व्यवधान आ गया है परंतु प्रभु का ज्ञान व्यवधानरहित है, वह केवल आत्मा से ही जानते हैं, इंद्रिय से नहीं जानते। सिद्ध भगवान के तो इंद्रियाँ हैं ही नहीं, वह तो अशरीर हैं। अरहंत भगवान के शरीर में यद्यपि इंद्रियों का आकार है पर केवलज्ञान हो जाने से वे उन इंद्रियों द्वारा नहीं जानते हैं, केवल आत्मा से जानते हैं। तब उनके लिए आड़ क्या काम करे? जैसे मन के द्वारा हम किसी चीज को जानते हैं तो आड़ हमारे ज्ञान को रोकती नहीं है। जैसे यहाँ बैठे हुए आप अपने घर की तिजोरी के भीतर संदूक में रक्खी हुई पेटी के भीतर किसी पोटली में बंधी हुई अंगूठी को आप जानना चाहे तो आपके ज्ञान को न तो आपके घर के किवाड़ रोक सकेंगे, न तिजोरी के फाटक, न संदूक, न पेटी और न कपड़े की पोटली आपके ज्ञान को रोक सकेगी। यहाँ बैठे ही बैठे आप उस गुप्त चीज को जान जायेंगे। तो मन से तो विलक्षण विशुद्ध ज्ञान है प्रभु का, वे अपने ज्ञान से समस्त लोक को जानते हैं, उसमें किसकी अटक होगी। प्रभु की निर्मल ज्ञानमयता—प्रभु का ज्ञान व्यवधानरहित है, ऐसा पूर्ण निर्मलज्ञान केवलज्ञान सकलप्रत्यक्ष प्रमाणरूप होता है। वह मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन, आत्मा—अनात्मा समस्त पदार्थों को क्रमरहित व्यवधानरहित स्पष्ट जानते हैं। जो इंद्रियों द्वारा जाने उसका ज्ञान तो है परोक्ष और जो केवल आत्मा को ही जाने उसका ज्ञान है प्रत्यक्ष। ऐसे इन प्रभु के केवलज्ञान नाम का तीसरा नेत्र प्रकट हुआ है। जिस केवलज्ञान नेत्र के कारण जिनकी महिमा प्रसिद्ध है, जो तीनों लोक के गुरु हैं, शाश्वत अनंत जिनका तेज है ऐसे तीर्थंकर नाथ जिनेंद्रदेव केवली प्रभु निर्दोष वीतराग सर्वज्ञ समस्त पदार्थों को एक साथ स्पष्ट जानते हैं। ऐसे सर्वज्ञदेव को हम बड़ी भक्तिपूर्वक पूजने आते हैं। हम जिसे पूजते हैं उसका स्वरूप जानना अत्यंत आवश्यक है। प्रभु का स्वरूप जाने बिना हमारी प्रभुपूजा कैसी? प्रभुपूजा प्रभु के गुणस्मरण में है और उसका फल यह निकालो कि जो प्रभु में ऐश्वर्य है, स्वरूप है, वही ऐश्वर्य, वही स्वरूप मुझमें है। जिस पथ से चलकर प्रभु निर्दोष हुए हैं उसी पथ से चलकर हम भी निर्दोष हो सकते हैं, ऐसा अपने स्वरूप में उत्साह जगाना, यही केवली प्रभु के गुणानुवाद का फल है।


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