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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 179

From जैनकोष



णवि दुक्खं णवि सुक्खं णवि पीडा णेव विज्जदे बाहा।

णवि मरणं णवि जणणं तत्थेव य होइ णिव्वाणं।।179।।

    यातनावों के अभाव में निर्वाण—निर्वाण वहाँ ही है जहाँ न दु:ख है, न सुख है, न पीडा है, न बाधा है, न मरण है और न जन्म है। संसार अवस्था में ये सभी दोष हैं। दु:खों का कारण है अशुभ कर्म का उदय। असाता वेदनीय के उदय में दु:ख होता है। यह असाता वेदनीय बनता है तब, जब आत्मा में अशुभ परिणमन होता है। यह अशुभ परिणमन कलंक है। यह परमात्मतत्त्व, यह आत्मा भगवान अपने ही सत्त्व के कारण शुद्ध ज्ञानप्रकाशमात्र है। इसमें दु:ख का अवसर ही नहीं है, किंतु अनादि काल से ऐसा उपादान मलिन चला आ रहा है कि अशुभ कर्म का उदय पाकर यह जीव दु:खी बन रहा है। यों तो जितने भी कर्म हैं वे सब कर्म दु:ख के हेतु हैं, यह आत्मा केवल जैसा अपने स्वरूप से है वैसा ही रहा आये तो इसको कोई दु:ख नहीं है। लोग कल्पनायें करके अन्य पदार्थों को मानते हैं कि ये मेरे हैं, यह मैं हूँ, यह कल्पनाजाल जो इसमें घर बनाये हुए है वही समस्त दु:खों का कारण है।

इच्छावों की क्लेशकारणता—अशुभ परिणति मेरा स्वरूप नहीं है। जो निरंतर अपने आत्मस्वरूप में अंत:प्रकाशमान् रहा करता है उस अपने आपके सहजस्वरूप की ओर झुकाव हो तो अशुभ परिणमन नहीं होता। जितनी भी इंद्रियों की इच्छा है यह सब बाह्य दृष्टि होने पर होती है। इस इच्छा से आत्मा को साध्य कुछ नहीं है। केवल इच्छा करके यह क्लेश पाता रहता है। मोक्ष तक की भी जब तक वांछा रहती है तब तक मोक्ष नहीं मिलता है, अन्य की वांछावों का तो कहना ही क्या है? ज्ञानी विरक्त पुरुष मोक्ष की चाह रखता है, ठीक है, यह शुभ परिणाम है, फिर भी यह जानो कि तब तक मोक्ष की इच्छा है तब तक सविकल्प अवस्था है। एक शुभ विकल्प अपना हुआ। निर्वाण की पात्रता—जब यह आत्मा, आत्मा ही ज्ञाता, आत्मा ही ज्ञेय रहकर एक अभेदोपयोगी बनता है, तब मोक्ष तक की भी वहाँ इच्छा नहीं रहती है। वहाँ मर्म यह है कि एक अद्वैत बुद्धि रहना सो तो सिद्धि है और जहाँ द्वैत भाव आया, द्वैधीकरण आया बस वहीं क्लेश है। यह मैं आत्मा हूँ इतना तक भी परिणाम हुआ तो वह विकल्प है। आत्मा को पूर्ण निर्विकल्प समाधिमय होना चाहिए तब उसकी मुक्ति होती है। यह आत्मतत्त्व निरुपराग है, जो कुछ भी है वह अकेले है, दूसरे को लेकर है कोई नहीं बनता। दूसरे का गुण उधार लेकर सत् नहीं बना करता है। जो भी पदार्थ है वह पूरा अपने आप है, मैं आत्मा हूँ तो मैं अपने आप ज्ञानमात्र हूँ, सत् हूँ, किसी दूसरे का सहारा लेकर नहीं हूँ। ज्ञायक की ज्ञानानंदरूपता—भैया ! ऐसा मालूम होता है मोह में कि मैं इंद्रियों के सहारे जानता हूँ। पहिली बात वहाँ यह है कि इंद्रियों का सहारा लेने से हमारे ज्ञान में कमी आयी है, ज्ञान का विकास रुक गया है। ये इंद्रियाँ तो एक कमरे की खिड़कियों की तरह हैं। जानने वाला पुरुष तो अलग है, खिड़कियाँ नहीं जानती हैं। खिड़कियों के होने से तो बल्कि उस जानने वाले पुरुष को रुकावट हो रही है। वह अब केवल खिड़कियों से जाने और जगहों से नहीं जान सकता। ऐसे ही मैं तो ज्ञानमात्र हूँ। ज्ञान से सबको निरंतर जानता रहता हूँ। इन इंद्रियों के कारण तो मेरे में रुकावट आयी है। मैं अब सबको नहीं जान सकता। इंद्रियों का जब तक हम सहारा लेते हैं तब तक हम सर्वज्ञ नहीं हो सकते। इंद्रियों का सहारा मोहवश लेता है यह जीव। इन इंद्रियों की उपेक्षा करके अपने शुद्ध ज्ञानामृत का पान करना चाहिए। मोह में भ्रमपूर्ण श्रम—लोक में किसी भी स्थिति में आनंद नहीं है। यह जीव मोह से पीड़ित हुआ नाना श्रमों को करके सुखी होना चाहता है, किंतु सुखी होने का यह रास्ता ही नहीं है। हम गलत रास्ते पर चल रहे हों और गलत रास्ता हम जान जायें तो यह भी एक सुलझने का मार्ग है। रास्ता तो गलत रखें और यही समझें तो यह मेरे भटकने का मार्ग है, ऐसे ही यह भी एक धर्मपालन है कि हम इसका खेद विषाद मानते रहें कि मेरा उपयोग क्यों बाह्यपदार्थों में अटकता है, क्यों परिजनों में ममता बुद्धि बनती है? मेरा तो यह देह भी नहीं है मैं तो नामरहित एक आत्मसत् हूँ। परमार्थत: पदार्थ की निर्नामता—भैया ! सच पूछो तो नाम तो किसी वस्तु का होता ही नहीं है। जो भी विशेषता उस वस्तु में नजर आयी वही नाम लोग लेते हैं। वह नाम उस वस्तु का नहीं है। जैसे लोग कहते हैं इस देह को शरीर। तो कोई कहे कि शरीर तो नाम है। पर शरीर नाम नहीं है, ‘शीर्यते इति शरीरम्।’ जो सड़ेगले उसका नाम शरीर है। यह विशेषण है। इस शब्द ने विशेषता बतायी है। ‘देह दिह्यते उपचीयते इति देह:’ जो संचित हो उसे देह कहते हैं। संदूक भी नाम नहीं है, ‘सं’ मायने अच्छी तरह से ‘दूक’ मायने छिप जाय जिसमें वह संदूक है। यह विशेषता है, पदार्थ का निज का नाम नहीं है, नाम किसी का होता ही नहीं है, विशेषता को लोग पुकारते हैं। दुकान-दुकान नाम नहीं है, जहाँ दो कानों से व्यवहार चले उसका नाम दुकान है, एक बेचने वाले का कान और एक लेने वाले का कान। अथवा, दुकान कोई चीज दुकावो नहीं, सामने रक्खो, उसका नाम दुकान है। चौकी—यह नाम नहीं है, किंतु चार कोने जिसमें हों उसका नाम चौकी है। किसी वस्तु का नाम ही नहीं होता। लोग तो अपने मतलब के अनुसार जो उनके प्रयोजन की विशेषता मालूम हुई—नाम रख लिया। किवार कि मायने किसी को वार दे मायने रोक दे, कुत्ता, बिल्ली, आदमी आदि सबको किसी को न आने दे वह किवार है। भींट-भींच करके ईंट लगाये उसका नाम है भींट। नाम किसी का होता ही नहीं है, अपने स्वार्थवश जो विशेषता हम देखते हैं उसका नाम लगा देते हैं। परमार्थत: आत्मा की निर्नामता—इस आत्मा का भी नाम कुछ नहीं है। आत्मा तो एक विशेषता है। ‘अतति सततं गच्छति जानाति इति आत्मा।’ जो निरंतर जानता रहे उसका नाम आत्मा है। क्रोध कर रहे हों वहाँ भी जानते हैं, मान आदिक कर रहे हों वहाँ भी जानते हैं, कषाय न कर रहे हों, वहाँ भी जानते हैं, यह सत् जानने से कभी नहीं चूकता है, इसका नाम है आत्मा। जीव—दसों प्राणों करि जीवे उसका नाम है जीव, चैतन्यप्राण से जीवे तो जीव। ब्रह्म, अपने गुणों से जो बढ़ने की प्रकृति रखता है उसका नाम है ब्रह्म। इस मुझ सत् का कोई नाम नहीं है। लोगों ने व्यवहार के अर्थ इस व्यंजनपर्याय का नाम रख लिया। नामधारी बन जाने से अब इस जीव को धन में हो गया ममत्व। इस कारण अब अपनी कल्पना के अनुसार इसे नाना श्रम करने पड़ते हैं। कलह और विवाद भी करने पड़ते हैं। परमात्मतत्त्व में क्लेशहेतुओं का व क्लेशों का अभाव—यह परमात्मतत्त्व तो निर्लेप रत्नत्रयात्मक परमात्मस्वरूप है। सदा अंतर्मुखाकार परम अध्यात्मस्वरूप में निरत है। इसकी अशुभ परिणति का अभाव होने से न इसके साथ कर्म हैं, कर्मों का अभाव होने से न इसमें दु:ख है, स्वभाव दृष्टि से अपने आपमें ऐसा निरखिये। और पर्यायदृष्टि से सिद्ध भगवान में, मुक्त अवस्था में ऐसा निरख लीजिए प्रभु के किसी प्रकार का दु:ख नहीं है। हम प्रभु को क्यों पूजते हैं? हम दु:खरहित होना चाहते हैं, और दु:खरहित है प्रभु का स्वरूप। सो प्रभु के स्वरूप का ज्ञान बनाकर मैं अपने दु:खरहित स्वरूप का पोषण करता हूँ। उससे दु:ख दूर हो जाता है। यदि प्रभु दु:खरहित न होते तो हम उनको कभी न पूजते। परमात्मतत्त्व में सुखरूप क्षोभों का भी अभाव—प्रभु के सांसारिक सुख भी नहीं हैं। सांसारिक सुख मलिन परिणाम है। यह पुण्य कर्मों के उदय से होता है। जैसे दु:ख में क्षोभ रहता है ऐसे ही सुख में भी क्षोभ रहता है। पुण्य और पाप ये दोनों कर्म इस जीव को बेड़ी की तरह बाँधे हुए हैं। जैसे लोहे की बेड़ी कैदी को पहिना दिया जाय, चाहे सोने की हो, पर वह तो एकसा बंधन है, यों ही संसार के प्राणियों में कोई पुण्य की बेड़ी से जकड़ा है, कोई पाप की बेड़ी से जकड़ा है। पुण्य और पाप से रहित सिद्ध भगवंत हैं। अनुभव करके भी देख लो, जब इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग आदिक पाप के फल मिलते हैं वहाँ भी चैन नहीं रहती और जब संपदा, इष्टवियोग आदिक के फल मिलते हैं तो वहाँ भी इस जीव को होश नहीं रहता। सुख के रूप में क्षोभ मचता है, शांति तो रहती नहीं। शांति होना ज्ञान का फल है, पुण्य का फल नहीं है। पुण्य का फल क्षोभ है, पाप का फल क्षोभ है। पुण्यपाप दोनों से रहित यह सिद्ध भगवंत हैं, अत: इनके न दु:ख है और न संसार का सुख है। परमात्मतत्त्व में पीड़ा व बाधा का अभाव—प्रभु के शरीर ही नहीं है, केवल ज्ञान और आनंद की ज्योति हैं वे। जहाँ दु:खयातनायोग्य शरीर हो वहाँ पीड़ा होगी। शरीर ही नहीं है तो पीड़ा क्या होगी। भूख, प्यास, ठंड, गर्मी, रोग, ये समस्त शरीर के सहारे होते हैं। पीड़ा के योग्य यातनामय शरीर है। शरीररहित होने से सिद्ध भगवान के पीड़ा नहीं होती। हम जिस भगवान की आराधना करते हैं हमें चाहिए कि हम उस भगवान के स्वरूप से पूर्ण परिचित रहें। संसार में कोई पदार्थ ऐसा नहीं है जिसका शरण गहा जाय और शांति मिले। एक प्रभु स्वरूप ही ऐसा है कि जिसका शरण गहें तो शांति मिले। प्रभु के बाधा भी रंच नहीं है। असाता वेदनीय कर्म का अभाव होने से रंच मात्र भी बाधा नहीं है। मानसिक जितनी भी वेदनाएँ हैं वे सब बाधाएँ कहलाती हैं। शरीर के सहारे जितनी वेदनाएँ हैं वे सब पीड़ा कहलाती हैं। प्रभु के न कोई पीड़ा है और न किसी प्रकार की बाधा है। निर्वाण में मरण व मरण के आश्रयभूत शरीरों का अभाव—प्रभु मरणरहित हैं। शरीर हो तो मरण हो। किसी प्रकार का सिद्ध प्रभु के शरीर ही नहीं है, वे तो शुद्ध ज्ञानानंद का पुंज हैं। शरीर 5 होते हैं—औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्माण। इन 5 शरीरों में दो शरीर तो अत्यंत सूक्ष्म हैं और सदा साथ रहते हैं संसारी जीवों में। वे दो शरीर है तैजस और कार्माण। जीव के मरने पर यह शरीर तो नहीं रह जाता है किंतु तैजस और कार्माण शरीर जीव के साथ जाते हैं, इसी को लोग सूक्ष्म शरीर कहते हैं। तैजस शरीर उसे कहते हैं जिसके कारण पाये हुए शरीरों में तेज उत्पन्न हो। लोग जैसे कहने लगते कि इसमें जान नहीं रही, मुर्दा हो गया है, मुर्दनी छा गयी है, कांति नहीं रही है जब जीव ही निकल गया और उसके साथ तैजस शरीर भी निकल गया तो कांति कहाँ से रहे? कार्माण शरीर उसे कहते हैं जो इस जीव के कर्म बँधे हैं, पुण्य अथवा पाप, उन समस्त कर्मों का जो शरीरात्मक ढाँचा है उसे कार्माण शरीर कहते हैं। यह सूक्ष्म शरीर जीव के साथ जाता है। औदारिक और वैक्रियक स्थूल शरीर हैं, आहारक भी सूक्ष्म है, पर वह किसी साधु के प्रकट होता है। हम आपका शरीर औदारिक कहलाता है और देव और नारक का वैक्रियक। सर्व प्रकार के शरीरों का अभाव होने से अब प्रभु के मरण नहीं है। अब वह प्रभु शरीर जिससे बनता है ऐसी वर्गणावों को कोई ग्रहण नहीं कर सकते, इस कारण अब उनके जन्म-मरण नहीं है। प्रभु का आराध्य स्वरूप—भैया ! सर्वझंझटों से रहित ज्ञायकस्वरूप परमात्मतत्त्व केवल ज्ञानादिक अनंतचतुष्टय से संपन्न प्रभु के सदा निर्वाण रहता है। हमें आराधना करनी है प्रभु की, तो प्रभु को हम यदि नाना रूपों में तकते हैं, यह आ गये मुकुट बाँधे, अथवा बढ़िया पोशाक पहिने संगीत बाजे बजाते हुए, शस्त्र हथियार रखते हुए, स्त्री साथ में रखे हैं, भगवान के ये बच्चे भी पास में बैठे हैं, इस रूप में यदि भगवान को तकते हैं तो आत्मा में शांति का तो कोई साधन नहीं बन पाया। विकल्प ही बढ़ाया और इंद्रियों पर ही जोर देकर ऐसा प्रभु को तकने का यत्न किया। आप प्रभु को केवलज्ञान और आनंद के स्वरूप में निरखें। प्रभु तो शरीररहित है। केवल जानन और निरंतर आनंदमग्नता जिनमें बनी हुई है ऐसा विशुद्ध एक भाव है परमभाव। उत्कृष्ट ज्ञान ज्योति प्रभु है, उस ज्ञान और आनंद के स्वरूप का अनुभव करते जाइए, तो इस पद्धति से अपने आपमें शांति भी मिलेगी और जो वास्तविक प्रभुता है उसका दर्शन भी होगा। प्रभुभक्ति का प्रयोजन—इस लोक में जीव के भव-भव में सुख-दु:ख बने रहते हैं, ये सुख-दु:ख जिसके नहीं हैं, बाधा, जन्म, जरा, मरण जिनके नहीं है ऐसे परमात्मा को मैं किसलिए नमस्कार करता हूँ? इसलिए कि जो ज्ञान और आनंद का विकास प्रभु के प्रकट हुआ है वह मेरे प्रकट हो। तुलसीदास जी जब काम वासना से पीड़ित होकर स्त्री से मिलने रात्रि को गये ससुराल, तो मुर्दे को पकड़कर नदी तैर गये, साँप को पकड़कर महल पर चढ़ गये। स्त्री ने जब पूछा कि कैसे नदी तैरी और कैसे महल आ गए? देखा तो मालूम पड़ा कि यह तो सांप है जिसके सहारे तुलसीदास मकान में आये हैं और यह मुर्दा है जिसको पकड़कर नदी पार कर पाये हैं। तो स्त्री बोलती है ‘जैसा हेत हराम से, तैसा प्रभु में होय। चले जावो बैकुंठ में पल्ला न पकड़े कोय।।’ तुलसीदास को वहाँ सीख मिली और स्त्री से हाथ जोड़कर बोले कि आज से तुम हमारी माँ हो, गुरु हो और वापिस चल दिया। जितना स्नेह हम इस जड़ वैभव से करते हैं उतना स्नेह प्रभु की प्रभुता से करें तो हम संसार के संकटों से पार हो सकते हैं। यहाँ के श्रम से कुछ लाभ न होगा। आत्मा की आराधना में निरपराधता—जो पुरुष आत्मा की आराधना नहीं करते हैं उन्हें तो अपराधी कहा गया है। राध मायने आराधना और अप मायने दूर हो गयी। जिसके आत्मा की आराधना नहीं है उसे अपराधी कहा गया है। मैं निरपराध होऊँ, इसके लिए कर्तव्य है कि मैं इस आनंदपुंज ज्ञाननिधान आत्मा को भजूँ। इस ज्ञानस्वरूप आत्मा को ज्ञान ही रूप में ज्ञान से जाना करूँ, अन्य सब विकल्पों को तोड दूँ, यह है आत्मा की आराधना। जो आत्मा की आराधना करता है वह निरपराधी है और इस ही सहज ज्ञानस्वरूप आत्मा के ध्यान के प्रसाद से ऐसे निर्वाण को प्राप्त होता है ज्ञानी संत, जहाँ न दु:ख है, न सुख है, न पीड़ा है, न बाधा है, न जन्म है, न मरण है। हम प्रभु की उपासना करें और ऐसे ही स्वरूप वाले आत्मतत्त्व की आराधना करें।


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