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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 183

From जैनकोष



णिव्बा णमेव सिद्धा सिद्धा णिव्बाणमिति समुद्दिट्ठा।

कम्मविमुक्को अप्पा गच्छह लोयग्गपज्जयंतं।।183।।

निर्वाण और सिद्ध का अभेदाख्यान—निर्वाण और निर्वाण को प्राप्त हुए जीव इन दोनों में अंतर मत देखो। उन जीवों को छोड़कर निर्वाण किसी अन्य वस्तु का नाम है क्या? जो निर्वाण है सो भगवान है भगवान है सो निर्वाण। जैसे यहाँ भी साहित्यकार किसी पुरुष का नाम न लेकर पुरुष के भाव का नाम लेकर वर्णन करते हैं। जैसे कुछ उनके साथ ऐसे खोटे तत्त्व लग गये कि ये हमको बरबाद करने पर तुले हैं ऐसा बोलते हैं लोग। उस तत्त्व के मायने क्या? खोटे आदमी। आदमी का नाम लेने की जगह लोग तत्त्व का नाम लेकर बोलते हैं अथवा किसी साधु के बारे में कहते हैं—साधु का नाम न लेकर उसका व्यक्तित्व कहते हैं। यह बड़ा व्यक्ति है। व्यक्ति भी नहीं बोलते, यह अपूर्व व्यक्तित्व है जिससे हम लोग शांति प्राप्त करते हैं। लोग साधु का नाम नहीं लेते, भाव का नाम लेते हैं। ये अहिंसा की मूर्ति हैं, ये साक्षात् सत्य हैं, ये साक्षात् सदाचार हैं, इस प्रकार भाव का भी नाम लेकर लोग पुरुष की बात किया करते हैं, तो यहाँ भगवान का नाम न लेकर, जीव का नाम न लेकर केवल निर्वाण, निर्वाण ही कहा जाय तो उसमें भी प्रभु परमात्मा ही आते हैं, निर्वाण की पूजा करो, ऐसा कहा जाय तो किसकी पूजा करोगे? निर्वाण और निर्वाण को प्राप्त हुए भगवान इन दोनों में भेद मत देखो, निर्वाण ही सिद्ध है और सिद्ध ही निर्वाण है। निर्वाणधाम—निर्वाण कहाँ है, मोक्ष कहाँ है? व्यवहारदृष्टि वाले कहेंगे कि मोक्ष लोक के शिखर पर है, भगवान मोक्ष में रहते हैं। जैसे कि हम आप घर में रहते हैं बोलते हैं ना? आप कहाँ रहते हैं? घर में, दुकान में। भगवान कहाँ रहते हैं? मोक्ष में, तो इसमें कौनसी खूबी निकली? वे तनिक और अच्छी दुकान में पहुंच गए होंगे। मोक्ष नाम स्थान का नहीं है, मोक्ष नाम है शुद्धस्वरूप का। भगवान कहाँ रहते हैं? शुद्धस्वरूप में रहते हैं, इस उत्तर में कुछ अध्यात्म की उपासना जगी है। वहाँ केवल बातचीत हुई है भगवान मोक्ष में रहते हैं, प्रभु शुद्धस्वरूप में रहते हैं, अब उसका व्यवहारदृष्टि से विवरण किया जाय तो यह अर्थ आता है कि उनका निवास लोक के अग्रभाग पर है। परमार्थत: जानना चाहो तो उत्तर मिलेगा नहीं, वह तो बाह्य स्थान है, प्रभु तो सदा अपने शुद्ध स्वरूप में ही रहते हैं। यहाँ कोई आपसे पूछे कि आप कहाँ रहते हैं? तो आप बतायें कि हम घर में रहते हैं, यह व्यवहारिक उत्तर है। हम विषयों में रहते हैं, यह वास्तविक उत्तर है। आप कषाय में रहते हैं, हम कषाय में रहते हैं, कोई शुद्ध भावों की बात बने तो कह सकते हैं कि इस समय हम प्रभु भक्ति में रह रहे हैं। आत्मा है भावात्मक। इस भावात्मक आत्मतत्त्व का निवास भी भावात्मक है, इस भावात्मक आत्मतत्त्व का स्थान भी भावात्मक है, इसका घर भी भावात्मक है, इसका प्रयत्न, इसका परिश्रम, व्यायाम सब कुछ भावात्मक है। व्यक्ति में व्यक्तित्व का वाग्व्यवहार—परमार्थत: भगवान सिद्ध स्वरूप में ही रहते हैं। वे सिद्ध क्षेत्र में ठहरते हैं, यह व्यवहारकथन है। निर्वाण ही सिद्ध है, सिद्ध ही निर्वाण है। किसी नेता की प्रशंसा नाम लेकर भी की जा सकती है। महात्मा गांधी ने यों किया, और यों भी कह देते हैं कि गाँधी के व्यक्तित्व ने यह किया। दोनों में अंतर क्या है? व्यक्तित्व ने किया इससे बात और स्पष्ट हो जाती है, गांधी तो एक आदमी है हम जैसे, इनके हाथ पैरों ने क्या किया, व्यक्तित्व ने किया। वह व्यक्तित्व और वह गाँधी जिसके बारे में बात कही जाय कोई जुदी चीज है क्या? किसी पदार्थ का भावरूप से वर्णन करना यह तो उसके मर्म का और विशद व्याख्यान है। निर्वाण ही सिद्ध है, सिद्ध ही निर्वाण है—इन दोनों शब्दों का एकत्व है। परमभाव की भावना का प्रसाद—कोई भी आसन्न भव्यजीव परमगुरु के चरण—कमल का प्रसाद पाये उससे परमभाव की भावना बनती है। मैं ज्ञानमात्र हूँ, इस प्रकार अपने आपके ज्ञानस्वरूप का पोषण करें तो समस्त कर्मकलंक-बँध से मुक्त होकर यह जीव उत्कृष्ट आत्मा होता हुआ लोक के अग्र भाग तक जाता है। जैसे तूंबी में कीचड़ भरी हो भीतर और उसे पानी में डाल दें तो वह तूंबी दबी रहती है और जब उसका कीचड़ बिखर जाता है तो वह तूंबी पानी में ऊपर उठकर उतराने लगती है। ऐसे ही संसारी जीव कर्म-कीचड़ से पगे हुए हैं इसलिए वे इस संसारसागर में डूबे हैं, यहाँ वहाँ भटकते है। जब हम आपका कीचड़ बिखर जाय, केवल शुद्ध ज्ञानमात्र रह जाय, द्रव्यकर्म, शरीर व विभाव सब दूर हो जायें, प्यौर पवित्र एकाकी बन जाय तो हम स्वभावत: ऊपर ही आ जायेंगे। कहाँ तक ऊपर जायेंगे जहाँ तक जीव का निवास है। प्रभु में और गुण-विकास में हम अंतर नहीं मानते। उस मुक्त में और परमात्मा में हम अंतर नहीं मानते हैं, जो निर्वाण है उसी का नाम सिद्ध है, जो सिद्ध है उसी का नाम निर्वाण है। यदि कोई भव्य जीव समस्त कर्मों को निर्मूल कर देता है, अपनी उपाधियों से अपने को दूर कर लेता है तो वह भी मुक्तिमय हो जाता है, निर्वाण स्वरूप हो जाता है। भावना पर भविष्य—भैया ! अपने को जैसा बनाना है वैसा स्वभाव अभी से न मानें तो वैसे बन कैसे सकते हैं? हमें बनना है सिद्ध, ज्ञानमात्र। यही तो सिद्ध का स्वरूप है। जब हम अभी से अपने आपको शुद्ध ज्ञानमात्र निरखा करें तो हम शुद्ध ज्ञानमात्र बन सकते हैं। जिस तत्त्व की हम भावना ही न बनाएँ उसकी सिद्धि हमें कैसे हो सकती है? हमारा यह कर्तव्य है कि हम अपने आप में सामर्थ्य बनाएँ कि जब चाहे तब हम अपने को सबसे न्यारा केवल ज्ञानमात्र प्रतीति में ले सकें। यदि यह कला प्रकट हो गयी तो जब हम व्यवहार दृष्टि से कभी किसी विपत्ति में फँस गये हों तब हम तुरंत विविक्त, निजस्वरूपमात्र अपने आप पर दृष्टि डालें तो उसी समय संकटो से निवृत्ति हो सकती है। लोग वैभव इसलिए जोड़ते हैं कि वक्त-मौके पर काम आये, अरे ! वक्त-मौके पर वैभव काम न देगा, ज्ञानबल काम आयेगा। इसलिए प्रत्येक संभव उपायों से अपना ज्ञानबल बढ़ावें तो विकट परिस्थिति में, कष्ट के अवसर में यह ज्ञानबल सहायक होगा और अपने को संकटो से दूर कर देना।


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