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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 25

From जैनकोष



धाउचउक्कस्स पुणो जं हेऊ कारणं ति तं णयो।

खंधाणं अवसाणं णादव्वो कज्जपरमणु।।25।।

कारणपरमाणु और धातुचतुष्क―कारणपरमाणु तो वह है जो चारों धातुओं का कारण होता है। चार धातुएं हैं‒ पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। यद्यपि देखने में वनस्पति भी एक स्वतंत्र काय है और दो इंद्रिय आदिक पंचेंद्रिय पर्याप्त जीवों के शरीर भी काय हैं और धातु चतुष्टय इन दोनों का ग्रहण नहीं करता है फिर भी ग्रहण हो जाता है। जो कड़ी चीज है पिंडरूप चीज है वह सब पृथ्वी तत्त्व में आ गया। यद्यपि भिन्न क्षयोपशम वाले जीवों के भेद से पृथ्वी में और मनुष्यादिक शरीरों में भेद है, फिर भी पिंडरूपता की दृष्टि से स्थूलपने की दृष्टि से यह सब पृथ्वी मान लीजिए।

पिंडरूप कायों को पृथ्वी में गर्भित की जा सकने की दृष्टि―पृथ्वी में ये सब पिंडात्मक चीजें आ गयीं। पेड़ होना, कीड़ा-मकोड़ा का शरीर होना, मनुष्य का शरीर होना ये सब पृथ्वी में मान लिए गए। व्यवहार में भी कहते हैं कि यह मिट्टी है शरीर के जलने पर कहते हैं कि मिट्टी मिट्टी में मिल गयी तो एक दृष्टि से जितने ये पिंडात्मक काय हैं वे पृथ्वी कहलाते हैं।

जल धातु―पृथ्वी की जाति से जल भिन्न जाति का है, वह प्रवाही है। कोई पिंड रूप नहीं है। जैसे चौकी का एक हिस्सा पकड़ कर ले जावो तो सारी चौकी जाती है, पृथ्वी के ढेले को जरा भी पकड़कर खींचो तो सब खिंच आता है इस तरह पानी तो नहीं है कि मुट्ठी में पानी पकड़कर खींच ले तो कुवे का सारा पानी खींचा चला आए। वह ऐसा स्थूल पिंडात्मक नहीं है।

अग्नि व वायुनामक धातु―जल की जाति से अग्नि जुदी चीज है। परस्पर दोनों विरोधी हैं। जल आग को मिटा देता है और आग जल को खौला देती है। ये मूषक बिलाव जैसे परस्पर विरोधी हैं। देखो इसीलिए आचार्यों ने जो 5 स्थावरों का सूत्र बनाया है―‘‘पृथ्व्यप्तेजोवायुवनस्पतय: स्थावरा:’’ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति। तो पहिले की जो तीन चीजें हैं पृथ्वी, जल और आग, इन तीनों के बीच में जल रखा है। बीच में जल नहीं आवे और पृथ्वी और आग समीप हो जायें तो क्या हाल हो सब भस्म हो जायें। यह शब्दों की बात कह रहे हैं। परसोनीफिकेशन अलंकार में देखो तो जल और आग दो विरोधी जाति की दो धातुएं हैं। वायु यह भी विचित्र जाति का है। वायु चलती है और शरीर में लगती है, आंखों नहीं दिखती।

धातुचतुष्क की एकद्रव्यता―ये चार धातुएं हैं, इनकी जाति न्यारी-न्यारी है। प्रकरणवश जितनी सीमा में न्यारा-न्यारापन दिखता है उतना ही देखता है यह जीव। वैसे तो ये चारों एक पुद्गल जाति के हैं। ये भिन्न-भिन्न जाति के चार तत्त्व नहीं हैं।

पदार्थों की जातियों के संबंध में बेमेल दर्शन―देखो कुछ दार्शनिकों की बात कि चार महाभूतों को तो स्वतंत्र-स्वतंत्र तत्त्व कहते हैं जो कि मूल में एक जातिरूप हैं। पृथ्वी जल बन जाय, जल आग बन जाय। आग हवा बन जाय, जो चाहे जो बन जाये। ऐसे जो भिन्न-भिन्न जाति के नहीं हैं उन्हें तो स्वतंत्र चार तत्त्व कहा और चैतन्य (जीव) जो कि अत्यंत पृथक् जाति का है उसे कहते हैं कि भूत से उत्पन्न हुआ, पृथ्वी, जल, आग, वायु से बना। कितनी बेमेल बात कही जा रही है? जो एक है उसे तो अनेक में रख दिया, जो विलक्षण नहीं है उन्हें तो विलक्षण मान लिया और जो इन चारों से अत्यंत विलक्षण हैं ऐसे चैतन्य तत्त्वों को भूतों से उत्पन्न हुआ मान लिया। पृथ्वी, जल, आग और वायु एक में मिल जायें तो क्या जीव बन जाता है। ऐसा कहने पर बड़ा घपला हो जायेगा। कहीं मिट्टी की हंडी में चूल्हे पर कढ़ी बनाये तो उसमें से आदमी, शेर आदि निकलने चाहियें क्योंकि वहाँ पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु चारों चीजें मिल गयी हैं। देखो जो अत्यंत विलक्षण तत्त्व है चैतन्य, उसे तो मान लिया गया कि भूतों से उत्पन्न हुआ और ये भूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु जो एक पुद्गल के परिणमन हैं उन्हें भिन्न मान लिया गया।

धातुचतुष्कों का परिवर्तन―बताओ पृथ्वी कभी जल बन सकती है या नहीं? बन जाती है। चंद्रकांतमणि या और भी अनेक दृष्टांत हैं वे गल जाते हैं और पानी हो जाते हैं। जल आग बन जाता है कि नहीं? बन जाता है। जब जल गरम हो जाता है, गरमी का रूप रख लेता है तो उसमें अग्नितत्त्व आ गया अथवा कालांतर में जल के अणु आगरूप बन सकते हैं पृथ्वी आग बन जाती है कि नहीं? बन जाती है। कोयला, लकड़ी, पत्थर ये सब आग बन जाते हैं। कोई कुछ बन जाय, यह संभव है इन चारों में।

प्रत्येक धातु में गुणचतुष्कता के संबंध में चर्चा―इस संबंध में कुछ लोग यह कहते हैं कि पृथ्वी में तो गंध पायी जाती है। पृथ्वी का लक्षण गंध है और पानी का लक्षण है रस और आग का लक्षण है रूप और वायु का लक्षण है स्पर्श। उनका कहना है कि पृथ्वी में गंध ही पायी जाती है और जल में रस ही पाया जाता है और ऐसा मानते भी हैं कि लोग भी झटिति जल में रस तो आप समझेंगे और अग्नि में रूप समझेंगे और हवा में स्पर्श समझेंगे और इतना तो जल्दी ध्यान में आयेगा कि हवा में स्पर्श के सिवाय कुछ नहीं है। न रूप देखने को मिलता है, न गंध, न रस। किसी हवा में कोई गंध आ जाय तो उसे हवा की गंध नहीं कहते, किंतु जिन कूड़ा कचरों को बिखेरती हुई हवा आयी है उन कूड़ा कचरों की गंध है। कूड़ा कचरा है पृथ्वी।

प्रत्येक धातु में गुणचतुष्कता―भैया ! वास्तविक बात यह है कि पृथ्वी में भी रूप, रस, गंध, स्पर्श चारों गुण हैं, जल में भी चारों गुण हैं अग्नि में भी चारों हैं और वायु में भी चारों हैं। चाहे आपको कोई चीज मालूम पड़े अथवा न मालूम पड़े। यह नियम है कि इन चारों विषयों में से एक भी चीज हो तो ये चारों ही होंगे। अग्नि किसी ने चखी है क्या कि वह खट्टी होती है या मीठी? शान में आकर कहीं चखने नहीं बैठ जाना। कोई रस तो अग्नि में नहीं चखा गया, फिर भी उसमें रस है, अव्यक्त है। चारों में चारों गुण पाये जाते हैं। पृथ्वी की बात तो जल्दी समझ में आ जायेगी कि उसमें रूप है, रस है, गंध है, स्पर्श है। जल की बात जरा कम समझ में आएगी। जल में गंध जल्दी नहीं मालूम होती, रूप दिख जाता है, रस दिख जाता है, स्पर्श दिख जाता है पर गंध नहीं मालूम पड़ती। पर गंध भी है उसमें। हवा में केवल स्पर्श मालूम होता है पर है उसमें भी सब। एक भी न हो तो ऐसी बात नहीं है। ऐसे ही अनुमान कर लो कि जो जिस चीज को बनाती है जिसने बनाया उसमें जो गुण होंगे वे कार्य में भी गुण आ गये। मिट्टी का घड़ा बनता है तो मिट्टी में जो गुण पाया जाय वह घड़ा बनने पर भी उसमें रहता है।

हवा में भी गुणचतुष्कता―अच्छा देखिये‒ एक अनाज आता है जौ। जौ बहुत सस्ता अनाज था, तब लोग जौ भी खूब खाते थे। अब इतना महंगा अनाज हो गया, फिर भी जौ बहुत कम लोग खाने वाले होंगे। देखो कितनी विचित्र बात है? जौ मैं बतावो कि रूप है या नहीं? है। इसमें रस भी है, गंध भी है, स्पर्श भी है। जौ से हवा बनती है पेट में। जौ खा लो तो उससे भारी हवा बनती है, जौ परेशान करती है। यह हवा पेट में नीचे से निकल जाती है। इससे हवा बहुत बनती है। उस हवा में भी चारों गुण हैं। मालूम पड़े अथवा न मालूम पड़े, समस्त पुद्गलों में चारों गुण हैं। बांस तो पृथ्वी है ना, प्रकरण के अनुसार चारों धातुओं में सबको गर्भित करना है। बांसों के आपस में रगड़ खाने से आग पैदा हो जाती हैं। जिसके उपादान में ये चारों चीजें हैं, उसके कार्य में भी चारों बातें हैं। इस तरह ये चारों के चारों ही धातुएं एक पुद्गल जाति में आयीं, लेकिन कुछ सीमा तक इसमें जातियां बन गयीं और उन दृष्टियों से पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु―ये भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतीत होते हैं।

परमाणुवों में धातु की कारणरूपता―चारों धातुओं का जो कारणरूप है, उसे कारणपरमाणु जानों अर्थात् परमाणु की व्यक्त शक्ल किन रूपों में हुआ करती है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि धातुवों के रूप में। यह तो हुआ कारणपरमाणु। जो इन चार धातुओं का बीजभूत है और इन स्कंधों का जो अवसान है, बिछुड़ते-बिछुड़ते जो अंतिम अविनाशी अंश है, उसे कार्यपरमाणु कहते हैं। वह परमाणु था नहीं परमाणु के रूप में, अब विघटते-विघटते वह परमाणु रह गया, अविभाज्य अंश रह गया। परमाणु अंश नहीं है, अंशी है, परिपूर्ण है, अविभाज्य है, वह कार्यपरमाणु कहलाता है। इस गाथा में कारणपरमाणु द्रव्य का और कार्यपरमाणु द्रव्य का स्वरूप बताया गया है। जो पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु―इन चार धातुओं का कारणभूत है, उसे तो कारणपरमाणु कहते हैं।

परमाणुओं की बंध्यरूपता―वह कारणपरमाणु जब जघन्यपरमाणु रह जाता है अर्थात् स्निग्धरूक्ष गुण की जब वहाँ अनंतता नहीं रहती है, जघन्य अंशित्त्व को किए रहता है, तब चाहे एक जाति के हों अथवा भिन्न जाति के हों, वे बंध के अयोग्य हैं। पुद्गलपरमाणुओं में जो कि अलग बिखरे हुए हैं, वे स्कंध बनें, मिल जायें इसका कारण तो वहाँ है स्निग्ध और रूक्षगुण। जो वर्णन चलता है स्निग्धरूक्षत्वाद्बंध:, वह परमाणु-परमाणु के लिए बात है। स्कंध और स्कंधों का वर्णन नहीं है कि इस प्रकार से वे एक दूसरे को अपने रूप परिणम लें, किंतु परमाणुओं में यह बात है कि कोई अजघन्यगुणी चिकना परमाणु हो और उससे दो गुण अधिक परमाणु हो तो वे दोनों एक स्कंध बन जायेंगे और वह स्कंध सारा रूक्ष हो जायेगा। जो गुण अधिक है, उसी रूप दूसरा परिणम जायेगा।

परमाणुओं के बंधन का कारण―यह बंधन स्निग्धरूक्षगुण के कारण होता है। ठंड-गरमी के कारण नहीं कि एक ठंडा परमाणु हो और एक गरम परमाणु हो अथवा एक कम ठंडा हो, दूसरा अधिक ठंडा हो और वे परमाणु मिल जायें, एक बंध हो जाये―ऐसा उस गुण के कारण एक बंधन नहीं होता है। स्निग्धरूक्षगुण जब अपनी बंधनयोग्य की सीमा में जितने अंश होना चाहिये, उन अंशों से ऊपर हो और अन्याणु में अधिक दो गुण हो जायें तो उसका परस्पर में जो बंध है वह समबंध है और तीन गुण अधिक वाले परमाणुओं का पाँच गुण अधिक वाले परमाणुओं के साथ बंधन होने को विषमबंध कहते हैं। यह चर्चा है परमाणुओं की।

पुद्गलों की परिस्थितियां―उन परमाणुओं के जानने से क्या फायदा और न जानने से क्या बिगाड़? हो गए रहने दो। इतना जानना तो आवश्यक है कि आत्मातिरिक्त अन्य सब पदार्थों से अत्यंत पृथक् हूं, फिर भी जितना अधिक बोध होगा, उतनी ही भेदविज्ञान की विशदता प्रबलता में सहायता होगी। अब जो अनंतगुणों से ऊपर दो गुण, चार गुण आदि का बंधन कहा गया है, वह उत्कृष्ट परमाणु की बात है। वैसे उसमें कम अंश के भी स्निग्ध और रूक्ष में बंध होता है, पर जघन्यगुण वाले के साथ बंध नहीं होता है। यह आचार्यदेव के द्वारा सर्वज्ञ प्रतीत उपदेश बताया गया है। ये बिखरे हुए परमाणु किस ढंग से ऐसे एक स्कंधरूप हो जाते हैं कि उसमें परमाणु संबंधी कार्य अब व्यक्त नहीं होता। चौकी के रूप में परमाणुओं का पुंज हो गया तो अब परमाणु परमाणु के रूप में परिणमन व्यक्त कर सके, यह बात अब कहां है? जला दो तो जल जायेगा। परमाणु कहीं जलते भी हैं? अत: ये अणु इस प्रकार स्निग्धरूक्षगुण के कारण बंधन को प्राप्त होते हैं।

अणुओं के प्रकार―चार प्रकार के अणु हैं―कारणपरमाणु, कार्यपरमाणु, जघन्यपरमाणु, उत्कृष्टपरमाणु और मध्य के भेद लगावो तो परमाणु के अनंत भेद हो जाते हैं। उस परमाणुद्रव्य में विभावपुद्गल नहीं आये हैं। विभाव नाम है स्कंधपरिणमन का―ऐसा विभाव का भेद है। वे अणु अपने स्वरूप में स्थित हैं।

पारिणामिक भाव और परिणाम का अनिवार्य संबंध―कारणपरमाणुओं का परमस्वभाव है पारिणामिक भाव। पारिणामिक भाव केवल चेतन में ही नहीं होता है, बल्कि समस्त द्रव्यों में पारिणामिक भाव है। वह एक स्वभाव जो कि परिणमन का आधार स्रोतभूत है, जिसका परिणमन ही प्रयोजन है, उसे पारिणामिक भाव कहते हैं। हे पारिणामिक भाव ! तुम किसलिये हो? जरा जवाब तो दो। उसका जवाब यही होगा कि हमें कुछ मतलब नहीं है, हम तो परिणमन के लिये हैं। ध्रौव्य का प्रयोजन है उत्पादव्यय और उत्पादव्यय का प्रयोजन है ध्रौव्य। ये चीजें क्यों बनती बिगड़ती हैं? क्या उत्तर होगा? बने रहने के लिए बनती-बिगड़ती हैं, ये चीजें क्यों बनी रहती हैं? बनने-बिगड़ने के लिए बनी रहती हैं। यह सब पारिणामिक भाव प्रत्येक पदार्थ में होता है।

पुद्गल के परिज्ञान का प्रयोजन―अजीवाधिकार में और अजीव में मुख्य, जिसके साथ प्रकट निमित्तनैमित्तिक संबंध आत्मा का चलना है―ऐसे पुद्गल का वर्णन चल रहा है। पुद्गल दो प्रकार के हैं―स्वभाव पुद्गल और विभाव पुद्गल। स्वभाव पुद्गल दो प्रकार के हैं‒ कारणपरमाणु और कार्यपरमाणु। विभावपुद्गल 6 प्रकार के हैं, जिनका इस गाथा में वर्णन है ही। इन सब पुद्गलों को जानकर ज्ञानीसंत यह भावना करता है कि ये सब पुद्गल हैं, किंतु इन 6 प्रकार के स्कंधों से मेरा क्या प्रयोजन और चार प्रकार के अणुओं से अथवा दो प्रकार के अणुओं से मेरा क्या प्रयोजन? मैं तो अविनाशी शुद्ध आत्मा का आराधन करूं। प्रकरण अजीवाधिकार का है और उसमें सर्वप्रथम पुद्गल का प्रसंग है। उस प्रसंग में अब परमाणु का स्वरूप बता रहे हैं।


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