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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 35-36

From जैनकोष



संखेज्जा-संखेज्जाणंतपदेसा हवंति मुत्तस्स।

धम्माधम्मस्स पुणी जीवस्स असंखदेसा हु।।35।।

लोयायासे तावं इदरस्स अणंतयं हवे देसा।

कालस्स ण कायत्तं एयपदेसो हवे जम्हा।।36।।

परिज्ञान का प्रयोजन मोहनिवृत्ति―जिन पदार्थों से हमें मोह तोड़ना है, अलग होना हैं उन पदार्थों का परिज्ञान होना भी तो आवश्यक है। जिसमें मोह फंसा है उन पदार्थों को हम यथार्थ न जान सकें तो मोह हटेगा कैसे? ये धन, वैभव, मकान ये सब अचेतन पुद्गल स्कंध हैं। समानजातीय द्रव्य पर्यायें हैं। बहुत से अणु मिल करके यह मायारूप रख रहे हैं ये बिखर जायेंगे। भले ही थोड़ासा इतना अंतर आ जाय कि बादल जरा जल्दी बिखर जाते हैं और यहाँ के ये पदार्थ कुछ देर में बिखरते हैं। पर बिखरने की प्रकृति ये सब बनाए हुए हैं।

पदार्थों की क्षणभंगुरता―पुराणों में कथन आता है, कि कोई राजा छत पर बैठा हुआ आसमान में मंडराते हुए बादलों के सौंदर्य को देख रहा था, इतने में एक जगह बादलों की बड़ी उत्तम मंदिर की जैसी शिखर दिखी। वे बादल इस रूप हो गए थे कि मानों मंदिर की शिखर बन गयी हो। वह दृश्य उस राजा को बड़ा सुहावना लगा। सोचा कि मैं इसका चित्र बना लूं। वह राजा चित्र बनाने की कला जानता था। सो नीचे कागज, पेंसिल लेने के लिए राजा चला गया। जब कागज, पेंसिल लेकर राजा आया तो देखा कि सारे बादल छितर-बितर हो गए हैं। उसको देखते ही उसे वैराग्य आया। जैसे ये बादल अभी मंदिर और शिखर के रूप में थे, थोड़ी ही देर में ये सब बिखर गए, यों ही यह शरीर मिला है, यह समागम मिला है, थोड़ी देर को अपने आकार प्रकारों के रूप में ये प्राप्त हैं। कुछ समय बाद ये सब बिखर जायेंगे।

अतीत घटना से भावी घटना के अंदाज की सुगमता―वे बाबा दादा जिनका बड़ा प्यार था हम आपके प्रति, आज वे कहां सामने हैं? अब व्यवहार से ऐसा जाना जाता है कि पिता को पुत्र पर जितनी प्रीति हो सकती है उससे कहीं अधिक प्रीति बाबा की पोते पर होती है। कैसे जानें? पहिले तो एक सरकारी निर्णय देखो, बाबा की जायदाद पर नाती का अधिकार रहता है उस पर बाप का अधिकार नहीं रहता। बाप अपनी जायदाद का कुछ भी गड़बड़ कर सकता है मगर बाबा की जायदाद पर बाप क्या गड़बड़ कर सकता है? करेगा तो सरकार में बाप पर नालिश की जा सकती है। बाबा की जायदाद पर नाती के अधिकार का कानून बना हुआ है। पुराणों में प्राय: नाती का नाम वह रखा जाता था जो बाबा का नाम था। जैसे मानों कोई सत्यंधर है और उसका पुत्र जीवंधर है तो जीवंधर का पुत्र सत्यंधर नाम पायेगा। फिर मोह की बात देखो बाबा को नाती पर मोह ज्यादा होता होगा, इसका हमें कुछ परिज्ञान नहीं है, आप लोग ही बता देंगे तो समझ जायेंगे। तो ऐसा ही कई बातों से जाना जाता हे कि बाबा को नाती-पोतों पर प्रीति पुत्रों से भी अधिक होती है। तो वे बाबा रहे कहां जिनका अपने पर ऐसा विलक्षण प्यार बना था। उससे ही अंदाज कर लो, अपना भी ऐसा ही हाल होगा।

पर में आत्मीयता की बुद्धि उन्मत्तचेष्टा―भैया ! जो कुछ भी समागम प्राप्त है वह सब बादलों की तरह उतनी जल्दी न सही, कुछ देर लगे सब बिखर जायेंगे। तो ये दृश्यमान् स्कंध, द्रव्य पर्यायें समानजातीय द्रव्य पर्यायें हैं। जब ये अनेक द्रव्यों से मिलकर मायारूप रख रहे हैं तो जो मिले हैं वे विघट जायेंगे। यहाँ कुछ भी मोह किए जाने के योग्य नहीं है ये चेतन पदार्थ मनुष्य, घोड़े, हाथी, परिजन, कुटुंब ये सब एक-एक जीव हैं और अपनी योग्यतानुसार अपने कर्मों के अनुसार अपनी सृष्टि करते चले जा रहे हैं। इनसे अपना कोई संबंध नहीं है। जैसे चलते-फिरते लोगों को कोई पागल अपना मान ले और उनके उपयोग में दु:खी होता फिरे, इसी तरह एक गति से दूसरे गति को चलते फिरने वाले इन कुटुंबी जनों को कोई अपना मान ले तो उनके उपयोग पर, उनके मन के प्रतिकूल होने पर दु:खी होगा।

ज्ञानी व मोही की वृत्ति में अंतराशय का एक दृष्टांत―जो वस्तु का यथार्थ स्वरूप है उस पर कायम रहने वाला उपयोग क्लेश नहीं पा सकता है। हम सही बात पर कायम नहीं रहते हैं। इतना ही अच्छा है कि दृष्टि तो बनी है कि उस पर कायम रहना चाहिये और मन में भाव होता है, पर ईमानदारी से यह बात यदि सत्य है कि हमारी दृष्टि जगी तो है कि हम वस्तु के ऐसे स्वतंत्र स्वरूप के परिज्ञान पर कायम रहें। यदि इतनी दृष्टि भी जगी तो उसे वर्तमान समागम में मोह का क्लेश नहीं रह सकता है। काम तो एक दूकानदार भी करता हे और एक सर्विस करने वाला भी करता है पर मोह सर्विस करने वाले को नहीं है। अपनी ड्यूटी का अथवा नियत काम कर लिया, छुट्टी पायी, मोह नहीं रहा, पर दूकानदारी के कार्य में प्राय: मोह बना रहता है। सो रहे हैं, अधनींद में भी दूकान की बात चक्कर काट रही है। ऐसे सर्विस करने वाले के चित्त में चक्कर नहीं काटती है। यह बात कह रहे हैं एक दृष्टांत के लिए ज्ञानी और मोही की वृत्ति के परीक्षण की बात।

ज्ञानी के परिणमन के प्रति उपेक्षा―यदि वस्तुस्वरूप पर हमारी दृष्टि कायम होने को है तो अन्य पदार्थ का विकल्प चिंतन चिंता रूप में न रहेगा उसमें ऐसा साहस जगेगा कि कोई जीव, कोई पदार्थ यों परिणमा तो भला, यों परिणमा तो भला, अंतर में आकुलता न मचायेगा। इन 6 द्रव्यों का स्वरूप जानने का फल यह मिलता है कि इसकी अपेक्षा जगती है, मोह हटता है, आकुलता दूर होती है। उन ही 6 द्रव्यों के संबंध में प्रदेशत्वता के रूप में यहाँ यह बताया जा रहा है कि किस पदार्थ के कितने प्रदेश होते हैं?

प्रदेशमुखेन वस्तु का व्यावहारिक विशद बोध―इन द्रव्यों में कितने प्रदेश होते हैं यह कथन कर रहे है। प्रदेश किसे कहते हैं? पहिले यह समझ लीजिये तो यह समझ में विशेष आयेगा कि यह पदार्थ इतने प्रदेशवान् है तो इसका यह मतलब है शुद्ध पुद्गल परमाणु के द्वारा जितने आकाश का स्थल रोका जा सकता है उसका नाम प्रदेश है? प्रदेश परमाणु के बराबर है और परमाणु एक प्रदेश के बराबर है। इस तरह पुद्गल द्रव्य में संख्यात, असंख्यात और अनंत प्रदेश होते हैं।

पुद्गलद्रव्य की प्रदेशवत्ता के संबंध में पारमार्थिक व औपचारिक निर्णय―पुद्गलद्रव्य में वस्तुत: तो एक ही प्रदेश है क्योंकि पुद्गल एक परमाणु का ही नाम है, किंतु परमाणु परस्पर में मिलकर ऐसा बंधनबद्ध हो जाता है कि वह सजातीय अनेक द्रव्य पर्यायात्मक हो जाता है। तब ऐसे छोटे स्कंध हैं कि कोई संख्यात प्रदेश वाले हैं, कोई स्कंध असंख्यात प्रदेश वाले हैं और कोई अनंत प्रदेश वाले हैं। संख्यात दो से शुरू होता है, गिनती एक से शुरू नहीं होती है। वह तो एक है, गिनती शुरू होती है 2 से। तो जघन्य संख्यात 2 का नाम है और उत्कृष्ट संख्यात अनगिनते की तरह है अर्थात् जघन्य असंख्यात में एक कम कर दिया जाय तो उत्कृष्ट संख्यात हो जाता है। असंख्यात भी नाना प्रकार के होते हैं और अनंत भी कई प्रकार के होते हैं।

स्कंधों की विभिन्न प्रदेशिता―किसी भी स्कंधरूप पुद्गलद्रव्य में उत्कृष्ट अनंत प्रदेश नहीं होते हैं फिर भी अनुत्कृष्ट अनंत प्रदेश होते ही है। दिखने में जितने पुद्गल आते हैं वे अनंतप्रदेशी पुद्गल हैं संख्यात प्रदेशी और असंख्यातप्रदेशी भी पुद्गल दिखने में नहीं आते। अब जान लीजिए कि सबसे छोटा स्कंध जो आंखों से दिख सकता है उसमें अनंत परमाणु समाये हैं। एक परमाणु कितना छोटा होता होगा? यह व्यवहार पर्याय में नहीं बताया जा सकता है। एक युक्ति से ही समझा जायेगा। पुद्गलद्रव्य परमार्थत: एकप्रदेशी है और उपचारत: कोई संख्यातप्रदेशी है, कोई असंख्यातप्रदेशी है और कोई अनंतप्रदेशी है।

आकाश का औपचारिक भेद व प्रदेशवत्त्व―एक जीव, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य ये असंख्यातप्रदेशी होते हैं। आकाशद्रव्य अनंतप्रदेशी होता है, पर उस आकाश के प्रदेश में दो विभाग कर लिए जाते हैं। जितने आकाश में समस्त द्रव्य रहते हैं उतने का नाम है लोकाकाश। और उससे परे समस्त आकाश अलोकाकाश कहलाता है। जहां आकाश ही आकाश है अन्य कोई द्रव्य नहीं है उसे लोकाकाश कहते हैं। अलोकाकाश के तो अनंत प्रदेश हैं और लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। वास्तव में ये दो भेद हैं नहीं, आकाश एक अखंड द्रव्य है, पर इतने बड़े विस्तार वाले आकाश में जो कि एक अखंड है उसमें द्रव्य के रहने और न रहने की अपेक्षा से भेद किया गया है। कोई कहे कि आकाश भी अनंत मान लो। एक-एक प्रदेश पर एक-एक आकाश है। सो आकाश यों अनंत नहीं माना जा सकता है क्योंकि आकाश का कुछ भी एक परिणमन है वह अनंत प्रदेशों में वही का वही एक परिणमन होता है।

एक पदार्थ का परिमाण―द्रव्य एक उतना कहलाता है कि जो एक परिणमन जितने में पूरे में होना ही पड़े और जिससे बाहर परिणमन कदाचित् न हो, उतने को एक कहा करते हैं। इस परिभाषा के अनुसार जीव में निरख लो―एक जीव उतना है कि एक परिणमन जितने में होता है और जिससे बाहर कभी नहीं होता है। जैसे ज्ञान परिणमा तो यह न होगा कि आधे भाग में ज्ञान परिणम जाय और आधे भाग में न परिणमे। वही ज्ञान परिणमन जो एक प्रदेश में है वही ज्ञान परिणमन सर्वप्रदेशों में है। यदि गुणपरिणमन पदार्थों में ऐसे विभाग से रहे तो वह एक पदार्थ नहीं है, अनेक पदार्थ है और अनुभव से भी यह बात विदित होती है कि जीव में जो भी एक परिणमन है, ज्ञान का हो या कोई क्रोधादिक विकार परिणमन हो वह सर्वत्र आत्मप्रदेशों में होता है।

वेदना की सर्वप्रदेशिता―कभी ऐसा मालूम देता है कि हाथ में फोड़ा हुआ तो जहां फोड़ा होता है वहाँ ही वेदना का दु:ख है, किंतु बात ऐसी है नहीं। दु:ख सर्वत्र प्रदेशों में है किंतु वह दु:ख जिस अवयव का निमित्त पाकर हुआ है यह उपयोग उस पर लगता है। यह तो बात है ही कि उस फोड़े का निमित्त पाकर दु:ख हुआ, सो उस फोड़े का निमित्त न रहता तो इस जीव को दु:ख न रहता। तो अब वह वेदना का आश्रय वहाँ मिला। तो जैसा वहाँ परिणमन हुआ उसका आश्रय पाकर वेदना की उत्पत्ति होती है, एतावन् मात्र संबंध है, पर वेदना नामक जो संक्लेश परिणमन है वह संक्लेश परिणमन आत्मा में सर्व प्रदेशों में होता है।

ज्ञान की सर्वप्रदेशिता―कभी ऐसा लगने लगता है कि ज्ञान मस्तक में पैदा होता है किंतु ऐसा नहीं है। ज्ञान सर्वत्र आत्मप्रदेशों में उत्पन्न होता है किंतु हमारे इस क्षायोपशमिक ज्ञान की उत्पत्ति जैसा कि हमारा बाह्य स्थान है, जैसा इंद्रिय स्थान है, मन स्थान है ऐसा ही विशेष अंग स्थान है, इस कारण दृष्टि वहाँ जाती है और वहाँ उपयोग अपना केंद्र बना लेता है किंतु वस्तुत: ज्ञान का परिणमन सर्वत्र आत्मप्रदेशों में होता है। पदार्थ अपनी सर्वशक्तियों में तन्मय है तब उसका सद्भाव सर्वत्र है उस पदार्थ में और जब जीव परिणमन होता है वह भी सर्वत्र है। इस परिभाषा के अनुसार जो एक-एक जीव हैं, वे सब संचित होकर अनंत हैं।

परमाणु में एक परिणमन―पुद्गल में ऐसा एक परमाणु परमाणु है। किसी काठ में, चौकी में, किसी भी खूंट में अग्नि लग जाय तो वह एक ओर से जल रहा है बाकी नहीं जल रहा है। ये दृश्यमान पुद्गल यदि एक होते तो उनका जलन एक ही समय में सर्वत्र होता। एक ही समय में वही परिणमन सर्वत्र हो, ऐसी बात किसी पुद्गल में रहेगी तो वह परमाणु है। इस कारण परमाणु वास्तविक पुद्गल द्रव्य है और स्कंध अनेक द्रव्य पर्याय है।

पदार्थों के प्रदेशित्व विवरण का उपसंहार―आकाश वस्तुत: एक है, अखंड है। उसमें पर की अपेक्षा लेकर दो भेद किए गए है―लोकाकाश और अलोकाकाश। लोकाकाश में धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य सदा विस्तार में भी एक प्रमाण वाले हैं। जितना बड़ा लोकाकाश फैला हुआ है उतना ही बड़ा यह धर्मद्रव्य फैला है और उतना ही बड़ा अधर्मद्रव्य फैला है, किंतु एक जीव द्रव्य असंख्यात प्रदेशी होकर भी विस्तार में लोकाकाश के बराबर केवल एक समय में केवली समुद्घात के लोकपूरण अवस्था में होता है और कभी भी नहीं होता है। तो इस प्रकार धर्मद्रव्य एक ही है, अधर्मद्रव्य एक ही है तथा एक जीव, इसमें असंख्यात प्रदेश होते हैं। बाकी जितने असीम अलोकाकाश हैं उनके अनंत प्रदेश हैं। यह तो हुआ 5 अस्तिकायों का वर्णन। अब एक द्रव्य रह गया काल, उसका वर्णन सुनिये। कालद्रव्य एकप्रदेशी है और इसी कारण उसे अस्तिकाय नहीं कह सकते हैं किंतु द्रव्यरूप अवश्य है अर्थात् है और परिणमता रहता है। द्रव्यत्व के नाते जो भी बात चाहिए वह सब कालद्रव्य में है पर अस्तिकायपना नहीं है। एक-एक प्रदेशी कालाणु एक-एक लोकाकाश के प्रदेश पर अवस्थित है।

पदार्थों के परिज्ञान से शृंगार व आत्महित शिक्षा―द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की प्रधानता से यदि अणुवों को सोचा जाय तो द्रव्याणु तो परमाणु है, क्षेत्राणु आकाश का एक प्रदेश है, कालाणु कालद्रव्य है और भावाणु जीवद्रव्य है। यहाँ प्रधानता से और मर्म को समझने के लिए ऐसा कहा जा रहा है। यह 6 द्रव्यों का समस्त विवरण शृंगार के लिए भी है और परमार्थ शिक्षा के लिए भी है। लोक शृंगार क्या है कि इन 6 द्रव्यों के विषय में विविध ज्ञान हो और वह कंठस्थ हो और उसे हम बोल सकें, बता सकें तो यह 6 द्रव्यों के द्वार से पुरुष का शृंगार बना है और परमार्थ शिक्षण क्या है कि हम समस्त द्रव्यों के संबंध में यह जान जायें कि प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, अपने आपमें परिपूर्ण है, अधूरा कोई नहीं है। प्रत्येक परिणमते रहते है। ऐसा स्वतंत्र स्वरूप निरखकर हम समस्त पर से विरक्त हों और ज्ञानानंद रस में मग्नता पायें, यह है सर्वद्रव्यों के परिज्ञान से प्राप्त होने वाली शिक्षा।

व्यवहारपूर्वक निश्चयप्रतिबोध―इस विवरण के परिज्ञान में वर्तमान पुरुष व्यवहारमार्ग को जानता है और व्यवहारमार्ग जानकर फिर शुद्ध मार्ग का प्रतिबोध पाता है। ज्ञानी पुरुष के उस धर्ममार्ग के प्रचार के प्रति भी बड़ा धैर्य है। किस पदवी में किस पुरुष का किस विधि से अध्ययन और उपदेश होना चाहिए, यह ज्ञानी की दृष्टि से ओझल नहीं है। एक निश्चय मार्ग से हमने जान लिया और सभी जीवों को एक उस निश्चयमार्ग से ही प्रतिबोधा जाय, सिखाया जाय तो कोई यदि यह प्रश्न कर दे उस व्यक्ति से कि क्या आप भी प्रारंभ से इस ही निश्चयस्वरूप से प्रतिबोध को प्राप्त हुए हैं? उत्तर क्या देगा? बच्चे थे, मां बाप के साथ दर्शन का कौतूहल रखते थे। बालक बनकर विद्याध्ययन किया और कितने-कितने स्थानों में समागम से लाभ लिया और सर्व प्रकार व्यवहार की बातों में कुशल बने अपनी शक्ति अनुसार और फिर इस निश्चयमर्म को भी जाने। तो जिस चीज का विधान हुआ करता है जिस पद्धति से पद्धति का प्राय: प्रयोग हो तो उसमें सफलता होती है, पर व्यवहार मार्ग जाने, सर्व प्रकार पर्याय और व्यवहार का विवरण समझे, वहाँ निश्चय का मर्म भर पाये तो यह हमारा उद्बोधन हमें सफल होगा।

परिज्ञान का प्रयोजन यथार्थ लगाव व अलगाव की वृत्ति―यह समस्त विवरण एक ज्ञान की स्वच्छता के लिए है। जितना विशद बोध होगा उतना ही जिससे हमें हटना है उसका हटाव उत्तम होगा और अपने आपमें लगाव होगा। पर से लगाव और अपने से अलगाव कुछ वस्तुगत नहीं है किंतु इस जीव ने बाह्य पदार्थों से तो मोहवश लगाव लगाया है और अपने आपकी ओर से अलगाव बना हुआ है। यहाँ भी कुछ पर से लगाव नहीं है और अपने से अलग नहीं है, पर उपयोग में तो वह पर से लगा है और अपने से अलगाव है, जुदा है। जब ज्ञानप्रकाश होता है तब पर से तो अलगाव हो जाता है और अपने आपमें लगाव हो जाता है। कितना बहुत छोटासा कार्य है मूल में कि जिस कार्य के विस्तार में संसार और मोक्ष जैसा महान् अंतर हो जाता है।

मुक्ति का उपक्रम―मोक्ष में हम कैसे लगें, धर्मपथ हमारा कैसे बने? इसका उपाय बहुत थोड़े शब्दों में कहा जाय अथवा कोई कहे कि मुझे बहुत सी बातें न बतावो। मुक्ति के लिए तो मुझे केवल एक छोटीसी बात बता दो, जिसका आश्रय लेकर हम संकटों से मुक्ति पाने में शीघ्र सफल हो सकें तो वह उपाय एक बहुत छोटासा है क्या कि ‘जितपिट्ठा तिटदिष्ट्ठा जित दिट्ठा तित पिट्ठा।’ इतना ही उपाय है। जिस ओर हमारी पीठ इस समय बनी है उधर को देखना है और जिस तरफ देख रहे हैं उस तरफ पीठ करना है। उपयोग दृष्टि की बात कही जा रही है। हम अपने आत्मस्वरूप की ओर तो पीठ किए हुए हैं तो उस ओर तो हमें देखना है और बाह्यपदार्थों की ओर दृष्टि किए हुए हैं सो उस ओर पीठ करना है। ये बाह्य पदार्थ खूब भले-भले दिख रहे हैं, ये मेरे हैं, ये दूसरे के हैं सो इन बाह्य पदार्थों की ओर पीठ करना है और अपने आत्मस्वरूप की ओर दृष्टि करना है।

परिचित की उपासना―जैसे आप लोग यहाँ बैठे हों। इनमें से जिन्होंने श्रवण-बेलगोल में बाहुबलि की प्रतिमा के दर्शन किये हैं उनसे कहा जाय कि उसको निरख लो तो एक क्षण में ही वे निरख लेंगे क्योंकि उनकी देखी हुई वह चीज है। इसी तरह ज्ञानानंदस्वरूप जिसके परिचय में आया है, जिसने सहज आनंद का अनुभव किया है उसे जब कभी मन में आये तो इस ज्ञानानंद रस में मग्न होने में विलंब नहीं लगता। कितना ही बाह्य झंझटों में आप पड़े हों, एकदम ज्ञानानंद स्वरूप में आपका उपयोग लग जाता है और ज्ञानानंद रस का अनुभव होने लगता है।

आनंदवृत्ति का उद्यम―जैसे मोटर गाड़ी आगे नि:शंक चले सो वे पेट्रोल आदि डालकर पहिले से ही ठीक कर लेते हैं ताकि फिर आनंद से बढ़ाए चलें। ऐसे ही आनंद की गाड़ी बढ़ाने के लिए, चलाने के लिए हम अपने इस ज्ञानस्वरूप की दृष्टि करने रूप कुछ तैयारी बना लें, फिर तो उसके स्मरण के प्रसाद से भी शेष समय हमारे अनाकुलता में चल सकते हैं। यों 6 द्रव्यों का वर्णन उनसे अपने को हटाने के लिए और अपने में अपने को लगाने के लिए किया जा रहा है।

अजीवाधिकार में 5 प्रकार के जीवों का न अतिसंक्षेप से, न अति विस्तार से वर्णन किया गया। अब उस वर्णन का इस अंतिम गाथा में उपसंहार किया जा रहा है। उपसंहार कहते हैं जो कुछ कहा गया है उसमें रही सही बात को अथवा उसका किसी संक्षिप्त तत्त्व को कह देना, सो उपसंहार है। कथन को संकोच करके मूल मुद्दे को दर्शाते हुए वर्णन करने को उपसंहार कहते हैं। अजीव द्रव्य के व्याख्यान के उपसंहार में अब यह गाथा अवतरित होती है।


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