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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 40

From जैनकोष



णो ठिदिबंधट्ठाणा पयडिट्ठाणा पदेसठाणा वा।

णो अणुभागट्ठाणा जीवस्स ण उदयठाणा वा।।40।।

जीव के बंधोदय स्थानों का अभाव―इस जीव के साथ विभावरूप अथवा विभाव का कारणभूत 5 प्रकार का बंध व उदयसंबंधी स्थान व्यवहारनय की दृष्टि में लगा हुआ विदित होता है। प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभागबंध, प्रदेशबंध और उदय स्थान या बंध और उदय के स्थान―ये सब इस जीव के कुछ नहीं हैं। यह जीवस्वरूप कारणसमयसार सहज आत्मस्वभाव नित्य है और नित्यनिरुपराग निजस्वरूप है। इसमें अन्य कोई तत्त्व की लपेट नहीं है। भले ही उपाधि का निमित्त पाकर इसमें उपराग रंग आये, पर इसके स्वभाव से स्वरस से इसमें किसी प्रकार का उपराग नहीं है। वस्तु अपने सत्त्व के द्वार से उसही रूप है जैसा स्वभावरूप वह शाश्वत रहता है।

जीव के स्थतिबंधस्थानों का अभाव―यह अंतस्तत्त्व जो कि भव्य जीवों के लिए उपादेयभूत है वह नित्य है और निरुपराग स्वभाव है, जिसमें किस प्रकार का अंजन नहीं है, द्रव्यकर्म का प्रवेश नहीं है ऐसे निज परमात्मतत्त्व के स्थितिबंध स्थान नहीं है। यह बद्ध कर्म, जघन्यस्वरूप को लिए हुए है, मध्यम स्थिति को भी लिए है और उत्कृष्ट स्थिति वाला भी है ऐसा कुछ है तो रहा कर्म में। वे कब तक रहते हैं कर्मरूप और कब कर्मरूप नहीं रह पाते हैं, यह बात उन कामार्णवर्गणावों में है। और भले ही यह बात जीव के काम का निमित्त पाकर हुई है पर इसके स्वरूप से निरखें तो यह स्थितिबंध स्थान इस निज परमात्मतत्त्व में कहीं नहीं है। यह तो निज सहज ज्ञायकस्वरूप से ही निर्मित है।

प्रकृतिबंधस्थान―इस प्रकार उन कर्मों में प्रकृति पड़ी हुई है, अमुक वर्गणाएँ ज्ञान के आवरण में निमित्त होगी, अमुक दर्शन गुण को प्रकट न होने देने में निमित्त हैं, कोई जीव के सुख अथवा दु:ख के वेदन में निमित्त है, कोई इसकी दृष्टि विपरीत करने में और कोई इसकी वृत्ति विरुद्ध बनाने में निमित्त है, कोई कर्म इस जीव को शरीर में बनाए रहने के लिए निमित्तभूत हैं, कोई कर्म इस जीव के शरीर की रचनावों में निमित्तभूत हैं, कोई ऊँच-नीच का वातावरण बनाने में निमित्त है, कोई योग्य मनचाही अभीष्ट हितकर तत्त्व की प्राप्ति में विघ्न करने में निमित्त हैं, ऐसी उनमें जो प्रकृति पड़ी हुई है, ऐसी चीज जो कुछ भी हो वह प्रकृति कर्म में है।

जीव के प्रकृतिबंधस्थानों का अभाव―कर्मद्रव्य अचेतन है, जीव चेतन है। जीव का कुछ गुण पर्याय कर्म में नहीं जा सकता। कम्र का गुण पर्याय जीव में नहीं जा सकता। अत्यंताभाव है दोनों का परस्पर में। निमित्तनैमित्तिक भाव उनमें अवश्य है, पर निमित्तनैमित्तिक भाव के संबंध के कारण उनमें कोई बंधन या गुण प्रवेश जैसी कोई बात हो जाय, यह नहीं हो सकता। भले ही उनमें प्रकृतिबंध के स्थान पड़े हैं, पड़े रहो, किंतु वे इस निज परमात्मतत्त्व के कुछ नहीं हैं। ज्ञानावरणादिक 8 प्रकार के कर्म हैं, उन कर्मों में उस-उस प्रकार के योग्य पुद्गल द्रव्यों का अपने आकार में बन जाना अर्थात् स्वभाव बन जाना यह प्रकृतिबंध है और वे प्रकृतिबंध नाना प्रकार के हैं। प्रकृति मूल में 8 प्रकार की हैं और फिर उत्तर में और अनेक भेदों की प्रकृति हैं और सूक्ष्मता से तो असंख्यात प्रकार की प्रकृति है। ये प्रकृतिबंध के स्थान इस निज परमात्मतत्त्व में नहीं होते हैं।

जीव के प्रदेशबंधस्थानों का अभाव―इस ही प्रकार कार्माणवर्गणावों में प्रदेश उनके स्वयं के हैं और यह जीव स्वयं के प्रदेश में है। जीव के प्रदेश तो ज्ञानादिक गुणों के विस्ताररूप हैं, अमूर्त हैं और इस कार्माणवर्गणा के प्रदेश ये मूर्तिक हैं। इनका यद्यपि इस अशुद्ध अंतस्तत्त्व के साथ परस्पर प्रदेश का अवगाह है, एकक्षेत्रावगाह है, तथापि ऐसा उभयप्रदेशबंध

अथवा उन कर्मों के परमाणुवों का परस्पर में बंध हो जाना इत्याकारक उनके द्रव्य प्रदेश बंध―ये दोनों के ही दोनों इस शुद्ध निज परमात्मतत्त्व में नहीं हैं अर्थात् जीव का अपने सत्त्व के कारण जो स्वभाव है उस स्वभावरूप अंतस्तत्त्व ये प्रदेशबंध स्थान नहीं हैं।

स्वभावदृष्टि होने पर स्पष्ट समझ―इस प्रकार कर्मों में जो बंध पड़ते हैं वे बंध कर्मों से हैं और निमित्तनैमित्तिक भाव से ये जीव के विभाव के निमित्त से हुए हैं। और इनके साथ बंध हो गया है इतने पर भी जीव किस रूप है उस रूप दृष्टि देकर सोचा जाय तो यह स्पष्ट ज्ञान में आ सकता है बुद्धि बल के द्वारा कि इस जीव के स्वरूप के ये कुछ नहीं हैं। जीव तो जैसा है सो ही है, अपने आप अपने सहज स्वभाव वाला है। भले ही अनादि से ही इसके साथ रंगबिरंगा चला आ रहा हो, तिस पर भी इस जीव के ये बंधस्थान आदिक ये कुछ नहीं हैं।

कार्माणवर्गणाओं में अनुभागबंध―इस प्रकार इन कर्मप्रकृतियों में अनुभाग बंध भी होता है। अनुभागबंध का अर्थ यह है कि उन कर्मवर्गणावों में ऐसी योग्यता पड़ी हुई हैं, ऐसी स्थिति है कि उनका उदय आए तो वह उदय किस प्रकार के किस डिग्री के फल को देने में समर्थ होगा निमित्त होगा। ऐसा अनुभाग बंध पड़ा है। यह अनुभाग बंध कर्मों में कर्मों की योग्यता से है। भले ही जीव का निमित्त पाकर यह सब कुछ हुआ है फिर भी अनुभागरूप पर्याय अर्थात् जीव को अमुक प्रकार की भक्ति में फल पाने के निमित्त हो सकने रूप अनुभाग बंधन यह पुद्गल का पुद्गल में है।

अनुभागी की निमित्तता पर एक लोकदृष्टांत―जैसे कोई खूब मजबूत चौकी या तखत है, वह बैठने से नहीं टूटता है तो ऐसी शक्ति वाला वह पुष्ट तखत मान लो कि बैठने का निमित्तभूत है, किंतु यह पुष्टि ऐसी मजबूती तखत में तखत की ही पर्याय से है बैठने वाले की पर्याय से नहीं है। पर ऐसा निमित्तनैमित्तिक मेल देखा जाता है कि आदमी बैठ सकता है तो उसकी पुष्टि उस तखत का निमित्त पाकर बैठ सक रहा है। सड़ियल तखत हो अथवा कपड़ा ही तानकर फर्श कर दिया गया हो तो यह तखत क्या बैठने का निमित्त हो पाता है? तो ऐसा पुष्ट तखत हमारे बैठने आदि का निमित्त है, इतने मात्र से कहीं बैठने वाले का इसमें संबंध नहीं जुड़ गया। उसकी पर्याय उसका गुण कुछ यहाँ नहीं आया, तखत की बात तखत में हैं, पर ऐसा देखा जाता है कि इतना पुष्ट हो तो तखत जिस पर मान लो बैठा करते हैं, वह बैठने का निमित्त हो पाता है यहाँ कुछ अन्वयव्यतिरेक रहित कारणता है, पर इस द्रव्यकर्म का अनुभाग बंधन जो हुआ है और उसही अनुभाग बंध को लिए हुए उदय में आयेगा तो वहाँ अन्वयव्यतिरेक बराबर है। इतने पर भी जीव में जो परिणाम हुआ है वह जीव के कारण है। पर इस कार्माणवर्गणा में जो अनुभाग बंधन हुआ है वह कर्माणवर्गणा के कारण से है। वे सब अनुभाग बंध स्थान भी इस जीव के कुछ नहीं हैं।

अनुभाग का विपाक―इस अनुभाग का यह काम है, यह कह लीजिए अर्थात् ऐसे ये निमित्तभूत हैं कि जब ये झड़ने का अपना समय पाते हैं तो सुख अथवा दु:खरूप फल के प्रदान करने की शक्ति से युक्त हैं अर्थात् निमित्तभूत हैं। ये कर्म कब फल देते हैं जब ये मिटने को होते हैं, जब इनकी निर्जरा होने को होती है। फल देकर झड़ना इस ही का नाम उदय है और बिना फल दिए झड़ना इसका नाम है हम लोगों के प्रयोग में आने वाली मोक्षमार्ग के प्रयोजनभूत निर्जरा। जैसे गोष्ठी में होते हैं ना कोई दुष्ट अभिप्राय के लोग, सो जब संग जोड़ने को होते हैं तो वे कोई ऊधम मचाकर कष्ट देकर मिटा करके भागा करते हैं और जब तक गोष्ठी में सम्मिलित रहते है तब तक कुछ भी बात नहीं करते हैं। ऐसी ही इन कर्मों की बात है जब तक ये कर्म जीव के साथ बंधे हुए हैं, सत्त्व में पड़े हुए हैं, चुपचाप हैं तो इनकी ओर से कुछ भरी ऊधम नहीं होता। रहें न रहें बराबर से हैं, जीव को कष्ट के कारणभूत नहीं हैं, किंतु जब इनके छूटने का समय होता है, उदयकाल होता है तो इनमें जान तो है नहीं। अगर जान होती तो अपन यों कह सकते थे कि ये ऐसा दुष्ट आशय रख रहे हैं कि हम तो मिटने ही वाले हैं, इनको बरबाद करके क्यों न मिटें, सीधे-सीधे क्यों मिटें? फिर भी यों ही समझ लो, ये उदय काल के झड़ने के समय में नाना प्रकार के शुभ अशुभ फल प्रदान करके मिटा करते हैं। और ऐसे फल के देने में जो निमित्तभूत हैं वे हैं अनुभाग बंध।

जीव में अनुभागबंधस्थानों का अभाव―अनुभाग बंध के स्थान को भी इस निज परमात्मतत्त्व में अवकाश नहीं है। जैसे कोई धातु है, सोना है अथवा पीतल है, उसके ऊपर मिट्टी चढ़ी हो, काई सी लगी हो या जो भी लेप हो सकता हो, होने पर भी ज्ञानी जानता है कि इस धातु में मैल नहीं है। यह ऊपर का प्रसंग है। सोने में जरा जल्दी समझमें आ जाता है, पीतल में भी कुछ-कुछ समझ में आता है, ऐसी समझ उनके है जो उस धातु के स्वभाव पर दृष्टि देते हैं। उसके अंदर उन्होंने केवल उस धातु के स्वभाव पर दृष्टि दी है। वह कहते हैं कि इसमें मैल नहीं है। पानी में रंग घोल दिया जाय तो पानी रँगीला हो जाता है लेकिन भेददृष्टि वाला वहाँ भी यह समझ रहा है कि पानी में रंग नहीं है। रंग रंग की ही जगह है। रंग में ही रंग है, पानी में ही पानी है। रंग और पानी हैं दोनों अलग-अलग, पर देखने में पानी और रंग अलग-अलग नहीं दिख रहे हैं। पानी में रंग ऐसा व्यापकर फैला हुआ है कि उसे अलग कोई नहीं बता सकता। इतने पर भी ज्ञानी पुरुष जानता है कि रंग यह पानी में नहीं है। पानी तो अपने सहजरूपमय है। रंग रंग में है। यों ही निज परमात्मतत्त्व के संबंध में भी ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि इस परमात्मतत्त्व में ये किसी प्रकार के बंधस्थान नहीं हैं।

जीव में उदयस्थान का अभाव―जब उनका उदय आता है उस काल में जो द्रव्यकर्म में बात बनती है वह और भावकर्म में याने जीवविभाव में जो बात बनती है―ये दोनों प्रकार के उदयस्थान भी इस निजपरमात्मतत्त्व में नहीं है यह आत्मा का अंतस्तत्त्व अपने ही सत्त्व के कारण जैसा है चित्स्वरूप है। केवल उस स्वभाव को देखकर कहा जा रहा है कि इस जीव में न बंधस्थान है―और न उदयस्थान है।

स्वभाव में अस्वभाव की अप्रतिष्ठा―किसी मां का बेटा बड़ा सीधा सादा सज्जन आज्ञाकारी धर्मात्मा विनयशील है और किसी गलत लड़के के संग से कुछ उसमें ऊधम की बात आ गयी है जुवा वगैरह या उसमें कुछ ऐसी आदत पड़ गयी है तो अब भी उसकी मां यही कहती है कि मेरे लड़के में तो ऐब है ही नहीं। अरे कैसे नहीं है ऐब, चलो हम दिखा दें। जुवारी के बीच में बैठा है या नहीं और जुवा भी खेलता है या नहीं? हां हमें मालूम हो गया कि कुछ जुवा भी खेलने लगा है, मगर यह आदत अमुक लड़के की लग गयी है। मेरे बेटे में तो कोई ऐब नहीं है। वह मां अब भी दम भरकर कह रही है क्योंकि उसने तो 10-15 वर्ष तक अपने बच्चे की सर्वप्रकार की सज्जनता देख ली है ना, तो ऐब लग जाने पर भी उस ऐब को अपने बेटे में नहीं माना, क्योंकि जो उसका स्वरूप था उस स्वरूप में ही उसे तक रही है। यह तो एक मोटे लोकदृष्टांत की बात है पर यहाँ तो जब उसके स्वभाव को तका जा रहा है अपने आपके स्वरूप को तो वहाँ तो गुंजाइश ही नहीं है कि उसमें उदयस्थान या बंधस्थान बताया जा सके।

स्वभाव के उपयोग में दृष्टव्य―वह आत्मतत्त्व अबद्ध है, स्वतंत्र है, परिपूर्ण है, उसमें दूसरे तत्त्व की चर्चा ही नहीं है, यद्यपि विभाव है मगर किसी पर्वत के शिखर पर खड़े होकर बोला जा रहा है, इसको न पहिचाना जाय तो यह बात समझ में न आयेगी। यह आत्मस्वभाव कारणपरमात्मतत्त्व अपने ही सत्त्व के कारण जैसा अपना सहजस्वभाव हो सकता है उसको दृष्टि में रखकर कहा जा रहा है। इसमें न बंधन है, न स्पर्श है, न अन्य चीज इसके साथ लगी है या न अन्य भावों का यहाँ पर उदय चल रहा है। वे तो सब इसके स्वभाव के बाहर ही बाहर तैरने वाले तत्त्व हैं। ये इस स्वभाव में प्रतिष्ठा नहीं पा सकते। ये द्रव्यकर्म के बंधन चाहें कि हम आत्मस्वभाव का आसन ग्रहण कर लें और इस स्वभाव में एकमेक हो जायें तो यह बात नहीं होती।

निष्कर्ष और उद्बोधन―भैया ! तक फिर ऐसा ही आत्मवस्तु के संबंध में अनुभव करो ना, अनुभव तो अपने अंत:स्वरूप का ही किया जा सकता है और अपने बाह्यस्वरूप का भी किया जा सकता है। अब यह अपनी छांट की बात है। अज्ञानीजन बाह्यतत्त्वों में ही अपना अनुभव लगाते हैं जब कि ज्ञाता पुरुष बाह्यतत्त्व को अनात्मतत्त्व जान कर अपने अंतस्तत्त्व में दृष्टि लगाया करते हैं। एक उस ही सर्व ओर से प्रकाशमान अनादि अनंत अहेतुक चित्स्वभाव का ही अनुभव ये क्यों नहीं करते हैं? यदि परमात्मतत्त्व का ही अनुभव करें तो वे मोह से दूर होकर इस सम्यक् स्वभाव को नियम से पा लेंगे। एक यह ही महान् कर्तव्य है कि जो नित्य शुद्ध है, चिदानंदस्वरूप है, सर्व समृद्धियों का निधान है, विपदावों का जहां रंच भी स्थान नहीं है ऐसे इस उत्कृष्ट पद का ही संचेतन किया करो। ऐसे निज परमात्मतत्त्व के स्वभाव की दृष्टि में सर्वविशुद्धता निरखकर ज्ञानीजन मात्र निज शुद्धस्वरूप का ही अनुभवन करते हैं।

विधिविपाकविविक्तभावना―इस गाथा में बंधस्थान और उदयस्थानों का निषेध किया गया है। यह स्थान निज परमात्मतत्त्व में नहीं होता है। बंधस्थान का तो बंध जाना और उन स्थानों में बंधा रहना, यह कार्य है और उदयस्थान का कार्य है जीव में शुभ अशुभ सुख दु:ख नाना प्रकार के परिणमन होना। ज्ञानी जीव उदयस्थान के प्रसंग में यह चिंतन करता है कि ये कर्मरूप विषवृक्ष से उत्पन्न हुए थे नाना फल जो आत्मा के स्वरूप से विलक्षण हैं उनको छोड़कर सहज चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व को ही मैं भोगता हूं, सेवता हूं, इस प्रकार जो भावना रखता है और निजतत्त्व के अभिमुख होता है वह बहुत ही शीघ्र मुक्ति को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है। इस विभावस्थान का निषेध करने का प्रयोजन अपने आपको शुद्धस्वभावमय अनुभव करना है। इस जीव को इस लोक में किसी भी समय अन्य कोई शरण नहीं है। केवल आत्मा का यह आत्मा ही अपने आपको शरण है। अब इसके बाद अन्य स्थानों के संबंध में भी कुंदकुंदाचार्य देव कहते हैं―


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