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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 68

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बंधणछेदणमारणआकुंचण तह पसारणादीया।

कायकिरियाणिवित्ती णिद्दिट्ठा कायगुत्तित्ति।।68।।

कायगुप्ति के विवरण का संकल्प―मनोगुप्ति, वचनगुप्ति के वर्णन के पश्चात् यहाँ कायगुप्ति का स्वरूप कहा जा रहा है। बांधना, छेदना, मारना, सिकोड़ना तथा फैलाना इत्यादि शरीर की क्रियावों की निवृत्ति कर देना सो कायगुप्ति है। किसी भी जीव को बांधना नहीं, इत्यादि उपदेश के रूप से कायगुप्ति में इस समय दूसरे जीवों के प्रति चेष्टावों का निषेध किया जा रहा है। कायगुप्ति में दोनों ही बातें होती हैं। दूसरों के प्रति अपने काय को न प्रवर्ताना और अपने लिए भी अपनी काय को न प्रवर्तना, सो कायगुप्ति है। इस ही कायगुप्ति का विवरण इस गाथा में किया गया है।

बंधन के प्रसाधन―दूसरे जीवों के बंधने में अंतरंग कारण तो उस जीव के कर्मों का उदय ही है और बहिरंग कारण दूसरे जीव के शरीर का व्यापार है। किसी भी जीव के सुख अथवा दु:ख मेरे उपार्जित कर्मों के उदय के बिना नहीं हो सकता। कोई पुरुष यह जाने कि मैं इस जीव को बांधता हूं, मारता हूं, यह उसका अज्ञान भरा आशय है। जो जीव अपने द्वारा दूसरे को कुछ किया हुआ तकते हैं उनकी यह आत्मघातिनी दृष्टि है। किसी जीव के बंधने में अंतरंग कारण निमित्त है और बहिरंग निमित्त दूसरे पुरुष का व्यापार है। दूसरा पुरुष यदि रागद्वेष के वश होकर व्यापार कर रहा है तो उस व्यापारी की अपने ही परिणम के कारण हिंसा हुई है और प्राय: यह ही होता है। किसी के द्वारा अन्य जीव का बंधनादिक हो तो उसका आशय खराब होता है तब चेष्टा होती है। कोई कुंथु जीव दब जाय उसमें तो यह भी संभव है कि बड़ी समितिपूर्वक चला जा रहा था, परिणाम भी शुद्ध था, भाव भी मलिन न था और गुजर गया जीव तो बंध नहीं होता, पर बांधने जैसी बात तो खुद में रागद्वेष हुए बिना, खुद का क्रूर आशय बनाये बिना हुआ नहीं करता। इस कारण यह काय-व्यापार तो नियम से कलुषाशयपूर्ण है, यह है काययोग। कायगुप्ति जहां नहीं है उसे काययोग कहते हैं। और जो योग है सोई आश्रव है।

छेदन के प्रसाधन―किसी पशु को, पक्षी को छेदने का भी अंतरंग उसके कर्मों का उदय है और बहिरंग कारण इस प्रमत्त जीव की काय की क्रियाएं हैं। कोई अपने बालक बालिकावों के नाक, कान बड़े प्रेम से छेदते हैं। यद्यपि इसमें यह भाव नहीं है जैसा कि किसी शिकारी को पशु पक्षी या अन्य के छेदने में होता है। लेकिन यह भी बात नहीं है कि वहाँ वह आश्रव से बच जाता हो। कोई आत्मा राग से छेदता है, कोई द्वेष से छेदता है। वहाँ द्वेष को छेदा किसी पशु पक्षी का कुछ अंग, यहाँ बच्चा का नाक कान राग से छेदा। और कभी पशुवों को भी राग से छेदा जाता है। बैलों की नाक, ऊंटों की नाक किसान लोग छेदते है तो वे रागवश छेदते हैं उन्हें अपने स्वार्थ से राग है। चाहे राग से छेदे, चाहे द्वेष से छेदे, वह तो आश्रव है, काययोग है। छेदने का अंतरंग कारण उस जीव के कर्मों का उदय है और बहिरंग कारण उस प्रमादी की कायक्रिया है। कोई सोचे कि अरे इतना तो श्रम कर रहा है और उसे प्रमादी कहा जा रहा है। ठीक है, वह मोक्षमार्ग का प्रमादी है। मोक्षमार्ग की ओर उसकी दृष्टि तक भी नहीं है।

मरण के प्रसाधन और एक जिज्ञासा―इसी प्रकार किसी जीव को मारने में जो काय विकार होता है वह भी काययोग है, मारने का भी अंतरंग कारण तो उस मरने वाले जीव की आयु का क्षय है और बहिरंग कारण किसी भी दूसरे जीव के काय का विकार है। कुछ ऐसा लग सकता है कि किसी का जीवन बना देना तो अपने हाथ की बात नहीं है, पर मारना तो अपने हाथ की बात है। कोई जीव को पैदा कर दे यह तो वश की बात नहीं है पर मारने में तो वश है ना। फिर मारने में भी मुख्यता तुम दे रहे हो। मरने वाले ही आयु के क्षय की। उसकी आयु का विनाश हो तो मरण होता है। समयसार जी में खूब लिखा भी है कि आयुकर्म के उदय के बिना जीवन नहीं होता, आयुकर्म के क्षय के बिना मरण नहीं होता। जब तत्त्व पर दृष्टि दें तो ये दोनों ही बातें सही लगती हैं अन्यथा हम यह कह सकते हैं कि जिंदा कर देना भी हमारे हाथ की बात है। माचिस की सींक ली और खींचकर जला दिया तो देखो हमने आग पैदा कर दी कि नहीं?हमारे हाथ की बात है ना कि हम तुरंत जीव पैदा कर दें।

पर के द्वारा पर के जीवन मरण का अभाव―भैया ! न तो जीवन अपने वश की बात है, न दूसरे जीव का मरण अपने वश की बात है। ऐसा मात्र निमित्तनैमित्तिक योग है कि दूसरे जीव के काय का व्यापार पायें और उसका निमित्त पाकर हमारी आयु की उदीरणा न हो जाय, बीच में ही अपघात हो जाय। मर गया, पर मरण नाम तब कहलाया जब उसकी आयु पूर्ण खिर जाय, यह चाहे किसी का निमित्त पाकर बने। इस जीव का यदि कुछ मार देना वश की बात हो तो देव, नारकी, तद्भवमोक्षगामी और असंख्यात वर्ष आयु वालों को क्यों न कोई मार दे? हाँ, अपवर्त्यायुष्कों में यद्यपि ऐसा ही योग है फिर भी मरण नाम दूसरे के व्यापार का नाम नहीं है, किंतु आयु के क्षय का नाम है। यों ही जीवन भी किसी के हाथ की बात नहीं है। माचिस की सींक खींचकर लगा दिया कि आग पैदा हो जाती है, उसमें एक तो यह बात है कि तैजस काम जीवों से भरा हुआ लोक है और वे गुप्तरूप से जन्मते या मरते रहते हैं। सो आग का निमित्त पाकर अग्निकाय के जीवों का विकास हो गया। फिर दूसरी बात यह है जो संभवत: ठीक भी होगी। अग्निकाय और बाकी के सभी स्थावर दो प्रकार के हुआ करते हैं। कुछ अग्नि ऐसी होती हैं कि अग्नि का शरीर मात्र है, पर जीव नहीं है। संभव है कि आपके उन सब प्रयोगों में कोई जीव भी आ गया हो, कोई अग्नि जीवसहित हो, कोई जीवरहित हो, पर इसका आप नियम नहीं समझ सकते। इस कारण साधुसंत जन अग्निकाय के प्रयोगों से दूर ही रहते हैं। कुछ हो जीव का मरना उनकी आयु के क्षय के बिना नहीं होता। यह तो हुआ उनके मरण का अंतरंग कारण। और दूसरे गुण का काय विकार हुआ बहिरंग कारण।

आकुंचन प्रसारण का योग―इसी प्रकार किसी जीव को सकोड़ दिया या किसी जीव को फैला दिया यह भी काययोग है, हिंसा की बात है। जैसे केचुवा है, लट है, कुछ है, इन्हें पकड़कर अथवा लकड़ी से फैला रहे हो और किसी जीव को जरा दाब भी दें तो ये सब भी काययोग हैं, हिंसा की बातें हैं। इसका भी परिहार कायगुप्ति में रहता है। ये सब मोटी-मोटी बातें कहीं जा रही हैं। पर के प्रति जो कायचेष्टा होती है उसके निषेध की बात कही जा रही है, यों ही किसी को सिकोड़ देना, किसी जीव को हल्का बना देना यह भी काययोग है, इसका भी जहां निषेध है वहाँ कायगुप्ति होती है, ऐसी इस काय की क्रिया की निवृत्ति कर देने का नाम कायगुप्ति है। यह कायगुप्ति पर के प्रति काय व्यापार का निषेध करने वाला कहा गया है, पर अपने लिए भी काय की चेष्टावों का परिहार करे तो कायगुप्ति का पूर्ण रूप होता है।

कायगुप्ति की असुगमता व महत्ता का एक उदाहरण―जिस समय राजा श्रेणिक ने किसी जगह हडि्डयां गड़वाकर चेलना से जबरदस्ती आहार लगवाया था, उस समय चेलना ने कैसा कहकर पड़गाहा था कि हे त्रिगुप्तिधारी महाराज तिष्ठ, तिष्ठ, तिष्ठ। तब ऐसा प्रतिग्रह सुनकर एक मुनि एक अंगुली उठाकर चला गया, दूसरा मुनि भी एक अंगुली उठाकर चला गया और तीसरा मुनि भी एक अंगुली उठाकर चला गया। जब पूछा गया कि पड़गाहने पर आप चौके में क्यों नहीं पधारे? तो एक ने बताया कि मेरे मनोगुप्ति न थी, एक ने बताया कि हमारे वचनगुप्ति न थी और एक ने कहा कि मेरे कायगुप्ति न थी। जरा कायगुप्ति वाले की बात सुनिये। मैं मृतकासन से श्मशान में ध्यानस्थ हो रहा था मरे हुए आदमी की तरह हाथ पैर पसारकर निश्चल होकर पड़ा हुआ था। देव, शास्त्र, गुरु की पूजा में आप पढ़ते हैं मृतकासन, वज्रासन आदि। मैं मृतकासन से ध्यान कर रहा था। इतने में एक मंत्र सिद्ध करने वाला कोई पुरुष आया उसको जरूरत होगी मरे पुरुष की खोपड़ी पर खिचड़ी पकाकर खाने की। कोई तंत्र होता होगा। तो उसने मेरे सिर पर मरी खोपड़ी जानकर खिचड़ी पकानी शुरू कर दी। उसे मैं बहुत देर तक सहन करता रहा, पर थोड़ी देर बाद मेरा शरीर हिल गया था। तो मेरे कायगुप्ति नहीं है। इसलिए मैं पड़गाहने से नहीं आया। उसने तो त्रिगुप्तिधारी महाराज कहकर बुलाया था।

साधु की प्रगतिशील साधना―चेलना ने त्रिगुप्तिधारक यों कहा कि जिसके तीनों गुप्ति हैं उसको अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान जैसी ऋद्धियां प्रकट हो जाती हैं। यदि ऋद्धि संपन्न कोई मुनि आवेगा तो वह मुनि यह सोचेगा कि त्रिगुप्तिधारी विशेषण लगाकर इसने क्यों पड़गाहा। वह जान जायेगा कि इसमें कोई न कोई बात है। साधु संत तो सच्चे होते हैं, वहाँ यह बात न होती है कि मान न मान मैं तेरा महिमान। लो आप समझ लीजिए कि अपने आपके शरीर की वेदना भी न सह सकने से तो कायगुप्ति से च्युत हो गया है, फिर हम आप लोग कितना पिछड़े हुए है अथवा वे साधु संतजन है जो बड़े-उड़े हाथ पैर चलायें, कुछ काम बनायें, काम करें, आरंभ करें, महल बनवायें, धराई उठाई करें कितने वे च्युत हो गये? यही समझिये कि वे पतित हो जाते हैं। अरे न बने अपना शरीर संभालने की बात तो कम से कम गृहस्थजनों के करने योग्य आरंभ के कार्यों में प्रवृत्त तो न रहें। गृहस्थों जैसे आरंभ परिग्रहों में प्रवृत्त होने में तो प्रमत्तविरतपना भी नहीं रहता, यों संतजन काय के विकार को छोड़कर शुद्ध आत्मतत्त्व की बार-बार भावना करते हैं।

कायगुप्ति की सूक्ष्म और पूर्ण साधना―अरे जब मेरा निष्क्रिय स्वरूप है तो अट्टसट्ट काय व्यापार करने की क्या आवश्यकता है? मेरे में तो जरा भी योग हो तो वह मेरे स्वभाव से परे की बात है। फिर जान बूझकर रागद्वेष करके मोह बढ़ाकर किसी प्रकार के विकल्पों में फंसकर व्यापार बनाऊं यह तो अत्यंत अनुचित बात है। दूसरे पुरुष के प्रति काय की चेष्टा हो या अपने आपमें भी संकोचन प्रसारण हो, ये सब कायगुप्ति नहीं है। कोई ऋद्धियों का प्रयोग करे, वैक्रियक ऋद्धि का प्रयोग क्या है हाथ पैर आदि फैलाना अथवा अन्य कोई इस अवस्था में समुद्घात प्रसरण हुआ ये सब कायगुप्ति से अलग चीजें हैं। भला बतलावो कि जहां शरीर को भी वश में किये हैं और फिर भी कारणवश समुद्घात बन गया, वेदना समुद्घात हो गया, कषाय समुद्घात हो गया, इन उपायों से भी कुछ प्रसारण हो जाय तो कायगुप्ति का भंग माना गया है। फिर शरीर की चेष्टाएं जो मनमानी करे उसके कायगुप्ति की तो चर्चा ही क्या करें?

धर्मप्रवृत्ति के लिये अज्ञानियों द्वारा ज्ञानियों में विश्वास होने की आवश्यकता―जो साधुजन कामविकार का परित्याग करते हैं, बार-बार शुद्ध आत्मा की सम्यक् भावना करते हैं उनका ही जन्म सफल है। जहां आनंद भरा हो ऐसे स्वरूप की शरण में पहुंच जायें उससे बढ़कर इस लोक में कुछ कार्य भी है क्या, पर करें क्या?यहाँ ज्ञानियों और अज्ञानियों की झर मिलती नहीं है, क्योंकि अज्ञानी यह सोचता है कि यह ज्ञानी दु:खी है और ज्ञानी सोचता है कि ये अज्ञानी दु:खी हैं। ज्ञानी को अज्ञानी की चेष्टा पर विश्वास नहीं है और अज्ञानी को ज्ञानी की चेष्टा पर विश्वास नहीं है। अब बतावो धर्म की गाड़ी कैसे अच्छी तरह चले? नीचे ऊंचे पहिया लगे हों तो बढ़िया ढंग से धर्म की गाड़ी चले, यह कैसे हो सकता है क्योंकि जो धर्म कर चुके हैं उनके लिए मुख्यतया क्या है धर्म की और जो धर्म से अत्यंत दूर हैं उनके धर्म की मुख्यता क्या? जो पार हो गए हैं उन्हें इस संसार से मतलब क्या? धर्म किसके लिये चलाना है, वे तो धर्ममय हो गए हैं। धर्म चलाया जाता है अज्ञानीजनों के लिए और अज्ञानीजन यहाँ हाथ भी नहीं धरते हैं। उन्हें ज्ञानियों पर विश्वास नहीं है। तो इस लोक में ज्ञानी और अज्ञानी की झर मिलती नहीं है। फिर भी कदाचित् कोई बिरले अज्ञानी ज्ञानियों से मिल जाते हैं तो वे ज्ञानी बनकर संसार के संकटों से पार होने का उद्यम करते हैं।

झर मिलने का अर्थ―झर मिलना किसे कहते हैं? पहिले ऐसे ताले लंबे चौड़े बनते थे कि उनकी तीली की झर मिलाना पड़ती थी। किसी में दो झर लगी हैं, उसमें कुंजी से झर मिला कर ताला खोल देते थे। यों ही यह धर्म का ताला तब खुल सकता है जब ज्ञानी की झर में निकटभव्य किसी अज्ञानी की झर मिल जाय तभी इस लोक में धर्म की प्रवृत्ति चल सकती है।

साधु संतों का प्रताप और प्रसाद―उन साधुसंतों का जन्म सफल है जो कामविकार को छोड़कर बारबार शुद्धआत्मा की भावना में रत हैं। उन्हें कहीं बाहर में कुछ शरण ही नहीं दिखता। किसको प्रसन्न करना, किससे राग करना, मुझे किसी से मतलब नहीं, ऐसा ज्ञानी में साहस होता है इसलिए सहज ही बारबार शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना में ज्ञानी मुनियों की प्रवृत्ति होती है। सच्चे मुनियों का संग मिलना, उनका सहवास मिलना, सत्संग होना यह बड़े सौभाग्य की बात है। जहां उपासक बारबार यह ध्यान ध्या सके, जिसकी मुद्रा को देखकर जिनकी अंतरंग चेष्टा का विचार करे कि अहो इनका उपयोग देखो, कैसा निरंतर एक शुद्ध ज्ञायकस्वरूप की ओर बना रहता है? अहो इसीलिए यह प्रसन्न हैं, इसीलिए ये सदा सुखी रहते हैं। मैं मोही पुरुष कहां इस संसार में डोल रहा हूं। मुद्रा मात्र को देखकर उदय सुंदर का बहनोई बज्रभानु जैसा महा मोही क्षणमात्र में ही मोहरहित हो गया। आप बतलावो कि साधु के संग और दर्शन से कितना भला होता है? वह कितना मोही था लेकिन उस साधु की मुद्रा के दर्शन कर इतना बड़ा प्रताप हुआ कि उसका भला हो गया। ये साधु संत निरंतर अपने शुद्ध आत्मतत्त्व के ध्यान में रहा करते हैं। जो ऐसे साधुजन हैं उनके मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति सम्यक् विधि से चलते रहते हैं, उनका ही जन्म सफल है।

निश्चय के सहवास से व्यवहार के प्रताप का संबंध―इन गुप्तियों के प्रकरण में यहाँ तक व्यवहारनय से मनोगुप्ति क्या है, वचनगुप्ति क्या है और कायगुप्ति क्या है―इसका वर्णन किया गया है। अब यह बताया जाएगा कि निश्चयनय से मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति क्या है? इसमें मनोगुप्ति और वचनगुप्ति के वर्णन में एक गाथा आएगी और कायगुप्ति के वर्णन में स्वतंत्र एक गाथा आएगी। उससे यह विदित होगा कि ओह, निश्चय की मनोगुप्ति बिना, निश्चय की वचनगुप्ति बिना, निश्चय की कायगुप्ति बिना वह गुप्ति भी श्रमरूप रहती है, पर उतनी लाभप्रद वह नहीं हो सकती, जितनी निश्चय गुप्ति के साथ रहकर लाभकर होती है। अब उन्हीं गुप्तियों का वर्णन चलेगा।


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