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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - नियमसार गाथा 66

From जैनकोष



Contents

  • 1 कालुस्समोहसण्‍णारागद्दोसाइ असुहभावाणं।
  • 2 परिहारो मणगुत्ती ववहारणयेण परिकहियं।।66।।
  • 3  
  • 4 ।।नियमसार प्रवचन चतुर्थ भाग समाप्‍त।।

कालुस्समोहसण्‍णारागद्दोसाइ असुहभावाणं।

परिहारो मणगुत्ती ववहारणयेण परिकहियं।।66।।

पूर्ववर्णित महाव्रत और समितियों का स्‍मरण—इससे पूर्व व्‍यवहार चारित्र अधिकार में पञ्चमहाव्रतों और पञ्चसमितियों का वर्णन हुआ। साधुजन व्‍यवहारचारित्र के समय भी अंत:चारित्र की उन्‍मुखता को नहीं छोड़ते हैं। चारित्र की जान अन्‍तर्भावना है। केवल मन, वचन, काय की चेष्‍टा और स्थिरता को चारित्र नहीं कहते हैं। चारित्र पुद्‌गल का गुण नहीं है, चारित्र आत्‍मा का गुण है। दर्शन और ज्ञान की पर्यायों में स्थिरता से आलम्‍बन होना अर्थात् ज्ञाता द्रष्‍टा मात्र रहना इसको चारित्र कहते हैं। व्‍यवहारचारित्र पालन करते हुए यदि इस अंत:संयम की सुध रहती है तब उसका नाम व्‍यवहारचारित्र है। पंचमहाव्रतों में साधुजन किस प्रकार अन्‍तर्भावना करते हैं इसका भी वर्णन पहिले निकल चुका है और समितियों के समय इस ही प्रकार साधुजन निश्‍चयसमिति का पालन करते हैं।

ईर्यासमिति में निश्‍चय व्‍यवहार—ईर्यासमिति में व्‍यवहार अंश तो इतना है कि जीवरक्षा का भाव रखते हुए अच्‍छे काम के लिए सद्‌भावना सहित दिन में चार हाथ आगे जमीन देखकर चलना। उस समय भी निश्‍चयसमिति उनके है। वे इस प्रकार से जानते हैं कि विहार करना आत्‍मा का स्‍वभाव नहीं, अविहारस्‍वभावी आत्‍मा की सिद्धि के लिए विहार करना पड़ रहा है। होती है कोई परिस्थितियां ऐसी कि जब विहार करना ही चाहिए। मैं तो इस अविहार स्‍वभावी आत्‍मतत्त्व में गमन कर रहा हू, गमन करना चाहिए। गमन करने का उनका जो यत्‍न रहता है वह है निश्‍चय ईर्यासमिति।

भाषासमिति में निश्‍चयव्‍यवहार—भाषासमिति में भी हित मित प्रिय वचन साधुजन बोलते हैं। इतने पर भी उनके अन्‍तर्भाव यह रहता हे कि वचन बोलने का स्‍वभाव मेरा है ही नहीं, मैं तो भाषा से रहित केवल भावमात्र चैतन्‍यस्‍वरूप हू। उस निर्वचन निर्वाध आत्‍मतत्त्व की उन्‍मुखता का यत्‍न रखते हुए वे रहते हैं, यह है उनकी निश्‍चयसमिति का पालन।

आदाननिक्षेपण समिति में निश्‍चयव्‍यवहार—व्‍यवहार में वे शौच, संयम और ज्ञान के उपकरणों को ग्रहण करते हैं और रखते हैं सावधानी सहित जीवरक्षा का ध्‍यान रखते हुए, किन्‍तु साथ ही अंतरंग में यह भी संस्‍कार बना हुआ है कि बड़ी सावधानी सहित अपने आपके गुणों का तो ग्रहण करना और विकारों का क्षेपण करना, ऐसी निश्‍चयसमिति सहित उनका आदान निक्षेपणव्‍यवहारसमिति में चलता है।

ऐषणासमिति में निश्‍चयव्‍यवहार—ऐषणासमिति में वे शुद्ध विधि सति अंतराय टालकर, दोषों को दूर कर आडम्‍बर पाखण्‍डों को न बढ़ाकर वे आहार की एषणा करते हैं। यह तो उनका व्‍यवहारसमिति अंश है किन्‍तु अंतरंग में उनके यह ध्‍यान बना हुआ है कि मेरे आत्‍मा का तो केवल द्रव्‍यापन का कार्य है। आहार करने जैसी अत्‍यन्‍त बेढंगी बात में लगाना पड़ता है। कहां तो यह मैं अमूर्त आत्‍मतत्त्व और कहां यह मूर्त पुद्‌गल आहार। इसका इसके साथ जोड़ा क्‍या? ऐसे अनाहारस्‍वभावी अमूर्त आत्‍मतत्त्व की सिद्धि के लिए चूकि यह परिस्थिति बड़ी विकट है सो आहार ग्रहण करना पड़ रहा है। आहार ग्रहण करते हुए अनाहारस्‍वभावी आत्‍मतत्त्व का ध्‍यान रखने वाले साधुवों को आहार का मजा ही क्‍या आयेगा? भले ही लोग हाथ जोड़ रहे हैं, बड़े मिष्‍ठ व्‍यञ्जन सामने रख रहे हैं, किन्‍तु उनका चित्त तो अनाहारस्‍वभावी आत्‍मतत्त्व की ओर है। या निश्‍चय समिति सहित व्‍यवहारसमिति का पालन करते हैं।

प्रतिष्‍ठापनासमिति में निश्‍चयव्‍यवहार—प्रतिष्‍ठापना समिति में वे गुप्‍त प्रासुक, बाधारहित जहां किसी की रुकावट न हो, ऐसे स्‍थान पर मलमूत्र क्षेपण करते हैं। मलमूत्र क्षेपण करने के पश्‍चात् कायोत्‍सर्ग करके उनकी ऐसी भावना में जो विशुद्धि बढ़ती है वह भी आश्‍चर्यजनक है। एक बेढंगी पर की बात से निपट कर, इस शरीर की हठों के झंझटों से दूर होकर वे साधु अपने आपमें विश्राम लेते हैं और उस निर्दोष निर्मल आत्‍मतत्त्व की भावना करते हैं। साथ ही इस शरीर के अशुचिपने का बार-बार परिणाम बनाते हैं, मन में चिंतन करते हैं। यों अन्‍तर में निश्‍चयसमिति सहित वे प्रतिष्‍ठापनासमिति करते हैं।

समितिधर संतों के गुप्ति की भावना—इस प्रकार प्रवृत्ति करते समय समितियों सहित अपनी प्रवर्तना करने वाले साधुसंत परिणाम यह रखते हैं कि यह सब कुछ भी न करना पड़े उस ही में भला है और इन झंझटों से दूर होकर जब-जब भी लम्‍बे-लम्‍बे अवसर आते हैं वे गुप्तियों के पालने में रत रहते हैं अथवा थोड़ा भी अवसर मिले तो वे गुप्तियों के पालने का यत्‍न करते हैं।

गुप्ति का अर्थ—गुप्ति कहते हैं रक्षा करने को। लोक में गुप्ति का अर्थ छुपाना प्रसिद्ध हो गया है। यह गुप्‍त बात है अर्थात् छुपाई गयी बात है, पर गुप्‍त का अर्थ छुपाना नहीं है। गुप्‍त का अर्थ है रक्षा करना। किन्‍तु रक्षा छुपाने में अधिकतया होती है इसलिए उसका असली अर्थ लोग भूल गए और छुपाना अर्थ प्रसिद्ध हो गया। यह मेरी बात गुप्‍त रखना, इसका अर्थ तो यह है कि वह मेरी बात सुरक्षित रखना। बात सुरक्षित कब रहेगी जब आप अपने मन में छुपाये हुए रहेंगे। यदि बोल दिया तो उस बात की टाँग टूट जायेगी और बोलने वाले की आफत आ जायेगी अर्थात् गुप्‍त का अर्थ है रक्षित करना। जिसमें निज आत्‍मतत्त्व की रक्षा हो उसे गुप्ति कहते हैं।

मनोगुप्ति का अर्थ—वह गुप्ति तीन प्रकार की है—मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति। इन

गुप्तियों में से इस समय मनोगुप्ति का वर्णन चल रहा है। मोह, संज्ञा, रागद्वेष आदि अशुभ भावों के परिहार करने को व्‍यवहारनय से मनो‍गुप्ति कहा गया है। मनोगुप्ति एक ही पद्धति की है, किन्‍तु जान बूझकर हठ करना, श्रम करना, मनोगुप्ति बताना सो तो व्‍यवहार मनोगुप्ति है और इतना अभ्‍यास बन जाय, इतनी स्‍वच्‍छता और दृढ़ता आ जाय कि वे सारे काम सहज हों, हो वह निश्‍चय से मनोगुप्ति है। मनोगुप्ति का उद्‌देश्‍य दोनों में एक है। एक बना करके यत्‍न किया और सहज हुआ।

कलुषता का बोझ—कलुषता का अर्थ है क्रोध, मान, माया, लोभ। जैसे पानी स्‍वच्‍छ है, उसमें कोई दूसरी रंगीली चीज डाल दी जाय तो वह पानी कलुषित हो जाता है। इस ही प्रकार यह आत्‍मतत्त्व स्‍वच्‍छ है किन्‍तु इसमें क्रोध, मान, माया, लोभ का कोई रंग गिर जाय तो वह रँगीला और कलुषित हो जाता है। इसका स्‍वभाव स्‍वच्‍छ ज्ञातृत्‍व का है, केवल जानन यह कितना सूक्ष्‍म और व्‍यापक कार्य है। यह एक जानन का अभ्‍यासी पुरुष जान सकता है और मोटे रूप में यों स‍मझिये कि यद्यपि जीव के स्‍वभाव भाव और विकारभाव सब ही आकार रहित हैं, रूप, रस आदिक रहित है फिर भी ऐसा विदित होता है कि जहां केवल जाननरूप ही वृत्ति है वहाँ तो अत्‍यन्‍त सूक्ष्‍म भाव है और जब क्रोध, मान, माया, लोभ आदि तरंग आ जाते हैं तो वहाँ वह स्‍थूल भाव हो गया। इतना बोझ हो जाता है। सूक्ष्‍मतत्त्व का बोझ नहीं होता है किन्‍तु निर्भार स्‍थूल मोटी चीज आ जाय तो वहाँ बोझ हो जाता है। सो देख लो क्रोध, मान, माया, लोभ कषाय करते हुए में इस जीव को कितना बोझ रहता है? इतना बोझल होता हुआ यह जीव कर्मों के भार को, शरीर के भार को ढोता हुआ यत्र तत्र विचार रहा है।

मनोगुप्ति की उत्‍कृष्‍टता और अनुत्‍कृष्‍टता—उन क्रोधादिक चारों कषायों से रहित अपनी वृत्ति बनाना यह है मनोगुप्ति। अपने मन में दुर्भाव न जगना, मन को वश में करना सो है मनोगुप्ति। मनोगुप्ति का उत्‍कृष्‍ट अंश तो यह है कि शुभ और अशुभ सभी प्रकार के विचार भी दूर हो जायें और उससे अनुत्‍कृष्‍ट अंश यह है कि अशुभ संकल्‍प विकल्‍प उत्‍पन्‍न न हों और शुभ संकल्‍प से अपने आपकी रक्षा का यत्‍न करें यह अनुत्‍कृष्‍ट अंश है।

क्रोध में अविवेक का प्रसार—क्रोध कषाय में यह जीव बेहोश हो जाता है। कर्तव्‍य अकर्तव्‍य का विवेक नहीं रहता है। गुस्‍सा ही तो है। उस गुस्‍से में जो कुछ कर आये। क्रोध कुछ अविवेक को लिए हुए होता है। यद्यपि ज्ञानी पुरुष के भी कभी क्रोध भी आ जाता है तो भी विवेक को स्‍पर्श किए हुए होता है, एकदम अविवेक और अज्ञान भरानहीं होता है। फिर भी जितने अंश में विवेक है वह तो है ज्ञान का कार्य और जितने अंश में अविवेक है वह है क्रोध का कार्य।

क्रोध से स्‍वपरव्‍यपाय—क्रोध में आकर मुनि द्वीपायन ने अपना सर्वस्‍व नाश किया और नगरी का भी नाश हुआ। द्वीपायन सम्‍यग्‍दृष्टि साधु थे। सम्‍यग्‍दर्शन और सच्‍ची साधुता आये बिना तैजस ऋद्धि नहीं प्रकट होती। उनके तैजस ऋद्धि थी। तैजस दो प्रकार का होता है—शुभ तैजस और अशुभ तैजस। वह ऋद्धिधारी किसी नगर पर, किसी समूह पर, किसी पर प्रसन्‍न हो जाय तो उसके दाहिने कंधे से उत्तम ओज निकलता है और वह सबको भला करने का कारण हो जाता है। उनको ही किसी कारण से क्रोध आ जाय तो बायें कंधे से गंदा, विकराल, लाल रंग का बिलाव जैसे आकार का तेजपुञ्ज निकलता है उसके निकलते ही उसका सम्‍यग्‍दर्शन नष्‍ट हो जाता है, वह मिथ्‍यादृष्टि हो जाता है अपना विनाश कर लेता है और इस नगर का, उस समूह का, उस व्‍यक्ति का भी सर्वनाश कर देता है, प्राणघात कर देता है।

क्रोधविनाश की शीघ्रता में भलाई—क्रोध का थोड़ा भी उपजना बुरा है। थोड़ा भी उपजे उसही समय सावधानी कर ले। क्रोध के कारण दूसरों से जो वचनालाप हो जायेगा उसका विसम्‍वाद इतना बढ़ जायेगा कि पीछे चाहते हुए भी उस झगड़े का मिटाना कठिन हो जायेगा। इस क्रोध की कलुषता का परिहार करना, इसका नाम है मनोगुप्ति।

 

मायाचार की कलुषता—घमंड भी बहुत कलुषित भाव है। अचरज तो यह है कि घमंडी पुरुष घमंड करके, मान बगराकर, शान जताकर अपने को समझता है कि में श्रेष्‍ठ हो गया हू, किन्‍तु सारी दुनिया उसे उल्‍लू, बेवकूफ समझ रही है। उस घमंडी पुरुष का इस यथार्थता की ओर चित्त ही नहीं जाता है। मान कषाय तो उन्‍मत्त बना देता है। उसे मान कषायों का परिहार करना सो मनोगुप्ति है।

मायाचार की कलुषता—ऐसे ही माया कषाय बड़ी कलुषता है माया छल कपट करने को कहते हैं। मायाचार का परिणाम बहुत तीव्र कलुषता है। मन में कुछ हैं, वचन में कुछ कह रहे हैं, करना कुछ है, ऐसी अटपटी प्रवृत्ति इन जीवों का कितना विनाश कर देती है? इस ओर मायावी पुरुष का ध्‍यान नहीं जाता है और कदाचित् मायाचार करके किसी दूसरे की आंखों में धूल झोंक दिया अथवा दूसरों का विनाश हो जाय तो उसमें यह मायावी पुरुष आनन्‍द मानता है। मायाचार से बढ़कर कलुषभाव अन्‍य कषायों को भी नहीं कहा गया है। माया को शल्‍य में शामिल किया गया है अन्‍य कषाय का नाम शल्‍य में नहीं लिया है। ऐसे मायाचार का परिहार करना इसका नाम है मनोगुप्ति।

लोभ की कलुषता—इसी प्रकार लोभ कषाय का रंग भी बहुत गहरा रंग है। ये धन, मकान, जड़ पदार्थ जो अत्‍यन्‍त भिन्‍न हैं, अचेतन हैं जिससे इस आत्‍मा की कुछ भी भलाई नहीं है, बल्कि उनमें चित्त फंसा रहने से यह आत्‍मा नरक की ओर जा रहा है, पतन कर रहा है अपना। रहना अंत में कुछ नहीं है, छोड़ देना पड़ेगा ही, किन्‍तु तृष्‍णा बनी रहे, धन वैभव में उपयोग बसा रहे तो गति और बिगड़ेगी। रहना तो कुछ है ही नहीं। गति और बिगाड़ ली जाती है। लोभ कषाय का परिहार करना इसे कहते है मनोगुप्ति। साधुवों के मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति—ये तीनों विशुद्धि हो जाती है, सो प्राय: करके उन्‍हें अ‍वधिज्ञान अथवा मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो जाता है।

गुप्ति के प्रताप का एक उदाहरण—एक कथन में बताया है कि जब राजा श्रेणिक ने रानी चेलना से बहुत हठ किया कि तुम इस जगह साधु को आहार करावो और उस जगह हड्डियां भरवा दीं। चेलना ने उस जगह खड़े होकर यों पड़गाहा था, हे त्रिगुप्तिधारक महाराज ! तिष्‍ठ ! एक मुनि आया और एक अंगुली उठाकर चला गया, रुका नहीं। दूसरा मुनि आया वह भी एक अंगुली उठा कर चला गया। तीसरा मुनि आया वह भी एक अंगुली उठा कर चला गया और एक मुनि आया वह ठहरा ही नहीं, मौनपूर्वक चला गया। जब कारण विदित किया गया तो मालूम हुआ कि एक मुनि ने यह कहा कि मेरे मनोगुप्ति सिद्ध नहीं हुई। त्रिगुप्ति धारक कहकर पुकारा था। उन्‍होंने कथा भी बताई। समय नहीं है और न प्रसंग है। एक ने बताया था कि मेरे वचनगुप्ति सिद्ध नहीं है, एक ने बताया कि मेरे कायगुप्ति सिद्ध नहीं है और जिसको तीनों गुप्तियां सिद्ध हो गयी उसने सोचा कि त्रिगुप्तिधारक मुनिराज कहकर यह क्‍यों पुकार रही है। झट कारण जाना अवधिज्ञान से, अशुद्ध स्‍थान है, यहाँ आहार नहीं लिया। तो यही वैभव और यही महान् पुरुषार्थ है। मन का वश में रखना, मन का शुद्ध रखना, चारों कषायों का परिहार करना—इसे मनोगुप्ति कहते हैं।

भैया ! इतनी तो कम से कम अपने लिए भी शिक्षा लें कि यदि मन से सब प्राणियों के हित की बात सोची जाय तो उसमें तुम्‍हारा भला ही है, बिगाड़ कुछ नहीं हैं। तुम केवल भाव ही बना सकते हो। किसी दूसरे का कुछ नहीं कर सकते। जब केवल भाव बनाने तक ही तुम्‍हारी हद है तब शुद्ध भाव ही क्‍यों न बनाये जायें। सर्वप्राणियों का हित सोचें सर्व सुखी हों, शुद्ध दृष्टि बने, ज्ञान का उजेला पायें। ज्ञान से बढ़कर इस जीव का लाभ लोक में कुछ नहीं है। शुद्ध ज्ञान ही शरण हैं। बड़ी सम्‍पदा हो, राजपाट हो, फिर भी ज्ञान विपरीत है, अट्टसट्ट है, अविवेकपूर्ण प्रवृत्ति है तो उसे चैन तो न मिलेगी, अशांति ही रहेगी। और कोई दूसरा धनहीन भी है अथवा धन का त्‍याग करके संन्‍यासी हुआ है, वह तो अपने आपमें ज्ञानसुधारस का स्‍वाद लिया करता है। ज्ञान की सुख शांति का परम आधार है। इसलिए सही ज्ञान रहे, सब जीवों के प्रति हमारा पवित्र परिणाम रहे, किसी को भी कष्‍ट मेरी चाह से न आये, ऐसी वृत्ति बनाना हम सबका कर्तव्य है। यों मन को वश में रखने वाले साधुजन चारों प्रकार की कषायों का परिहार करते हैं।

मनुष्‍य को मनोगुप्ति की आवश्‍यकता—संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याय पाकर भी इस जीव को मन की हैरानी से इतना विह्वल होना पड़ता है कि जिसमें बहुत अधिक कर्मबन्‍ध हो जाया करता है, इतना कर्मबंध असंज्ञी पंचेन्द्रिय नहीं कर सकता। चारइन्द्रिय, तीनइन्द्रिय, दोइन्द्रिय इन सबमें उत्तरोत्तर कर्मों की स्थिति कम बंधने की योग्‍यता है। सर्वाधिक कर्मों की स्थिति का बंध संज्ञी पंचेन्द्रिय कर पाता है। यह मन बिगड़ता है तो ऐसा बिगड़ता है कि 70 कोड़ा-कोड़ी सागर की स्थिति का महान् कर्म यह ही बांधता है मन को वश में करना यह शान्ति के लिए अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। मन से जैसा चाहे वैसा प्रवर्तन करना मायामय इस दुनिया में इस मायामय रूप को देखकर इनमें अपनी शान चाहना, इनमें अपना बड़प्‍पन चाहना, मन को यों स्‍वच्‍छन्‍द चलाना, ये क्‍लेश के ही कारण हैं। संतजनों का आभूषण, सर्वोत्‍कृष्‍ट आभूषण मनोगुप्ति है। मनोगुप्ति वहाँ हो सकती है जहां मोह का अभाव है।

मोहविस्‍तार—मोह होते हैं दो प्रकार के। दर्शनमोह और चारित्रमोह। दर्शनमोह में श्रद्धा बेहोश रहती है और चारित्रमोह में चारित्र बेहोश रहता है। दर्शनमोह का नाम है अज्ञान और चारित्रमोह का नाम है राग और द्वेष। अज्ञान, मोह, मुग्‍धता, मूढ़ता, पर्यायबुद्धि, बहिरात्‍मपन ये सब दर्शनमोह की लीलाए हैं। रागद्वेष सुहा जाय, न सुहा जाय यह सब चारित्र मोह का विलास है। कैसी स्थितियां होती है कि अन्‍तर में दर्शनमोह रंच नहीं है, निज को निज पर को पर यथार्थरूप से जान रहे हैं, फिर भी कैसी पुरातन प्रेरणा है कि इस ज्ञानी संत को भी किन्‍हीं परिस्थितियों में कुछ सुहाये और कुछ न सुहाये—ऐसी स्थितियां आती है। इन स्थितियों में उसका तो आभार मानों, धन्‍यवाद मानों, जो इतनी स्‍वच्‍छता आयी है कि दृष्टि कलंकित नहीं हो रही है। फिर इतना खेद है कि भिन्‍न पदार्थों के प्रति कुछ सुहा जाने और कुछ न सुहा जाने का परिणाम हो रहा है।

मोह और रागद्वेष में अन्‍तर—मोह में और रागद्वेष में अन्‍तर है। कोई रोगी इलाज के खातिर औषधि पीने में रागद्वेष कर रहा है तो औषधि विषय के उस रोगी के रागद्वेष तो है, किन्‍तु औषधि से मोह नहीं है। औषधि से राग है, यदि दवा न मिले समय पर तो द्वेष भी हो जाता है, जो समय पर औषधि दे दें उससे राग भी हो जाता है, पर औषधि से मोह रंच भी नहीं है। ऐसे ही ज्ञानी पुरुष की ऐसी मोहनीय स्थिति हो जाती है कि विषयभोगों में, परपदार्थों में, मौज में, मोह रंच नहीं है। फिर भी कुछ प्रेरणा है ऐसे संस्‍कारों की और बाह्य में कर्मोदय की है कि इसे फिर भी कुछ राग और द्वेष हो जाता है। मनोगुप्ति उसके होती है जिसके दोनों प्रकार का मोह नहीं होता। मोह का परिहार किया जा रहा हो। जैसे दूसरे का बालक रूप में भी सुन्‍दर हो और चतुराई की बातें भी बोलता हो, साथ ही विनयशील और आज्ञाकारी भी हो, सबको पहिले प्रणाम कर देता हो, तो वह सुहा तो जाता है पर उसमें मोह नहीं रहता है जबकि अपने घर का पैदा बालक चाहे आज्ञा न मानता हो, कुछ थोड़ा रूप से भी हीन हो तिस पर भी मोह रह सकता है। मोह से बढ़कर कलंक कोई नहीं है इसको।

समागम में प्रसन्‍नता का अकारण—भैया ! कितना श्रेष्‍ठ मनुष्‍यभव पाया है? हम अपने जगत् के जीवों पर दृष्टि पसार कर देखें तो सही कि हम आपने कितनी ऊची स्थिति पा ली है? अब ऐसे अनुपम जीवन में अपने आत्‍मा के दर्शन और अनुभव का आनन्‍द न लूटा तो फिर काहे के लिए यह जीवन हुआ? किसी से कहा जाय कि हम तुम्‍हें दो दिन के लिए राजा बनाए देते हैं, दो दिन बाद तुम्‍हारे पास जो भी अट्टसट्ट है यह सब छीनकर तुम्‍हें तौलिया मात्र पहना कर जंगल में फेंक दिया जायेगा। ऐसे दो दिन के राज्‍य को कौन चाहेगा? ऐसे ही यह मनुष्‍यभव क्‍या है। दो दिन को राजा बन गया है। देखो ना बड़े से बड़ा बलवान भैंसों पर ऊंटों पर, हाथियों पर अपना राज्‍य चलाता है, अंकुश चलाता है, हुकूमत चला रहा है। राजा है यह मनुष्‍य। यह जब अन्‍य मनुष्‍यों पर दृष्टि डालता है तो अपने को तुच्‍छ अनुभवने लगता है, किन्‍तु व्‍यापक दृष्टि से लोक के सकल जीवों पर दृष्टि डालकर निहारो तो जरा, कितनी श्रेष्‍ठ स्थिति पायी है राजापने की? पर बनाया तो है तुम्‍हें दो दिन का राजा, लेकिन इसके बाद तुम्‍हारे पास जो कुछ अट्टसट्ट है वह भी सब छुड़ाकर तुम्‍हें दुर्गतियों में पटक दिया जायेगा, ऐसी स्थिति मालूम हो तो कौन प्रसन्‍न होगा दो दिन के राज्‍य में?

विपदा के पूर्ववर्ती सुख में क्‍या आराम—जिसे फांसी का हुक्‍म होता है उसे फांसी पर चढ़ाने से पहिले, उसके आगे मिठाइयों का थाल रक्‍खा जाता है, खूब छककर खावो जीवन में भी न देखा हो ऐसा मिष्‍ठान तो उसे मिठाई खाना न रुचेगा, उसकी दृष्टि तो दूसरी जगह है। यों ही इस संसार महावन में बड़ी-बड़ी दुर्गतियां हो रही हैं, ऐसी स्थितियों के बीच में जिस ज्ञानी संत पुरुष को संसार की असारता विदित है उनके अनेक भोग साधन भी प्राप्‍त हो जायें तो क्‍या वह उनमें चैन मानेगा? नहीं मानेगा।

निर्मोहता की प्रतिभूति—साधुसंत क्‍या है? भगवान की एक प्रतिमूर्ति है। भगवान की मुद्रा और साधु की मुद्रा दोनों एक प्रकार हैं सो ही निर्ग्रन्‍थ भगवान्, सो ही निर्ग्रन्‍थ साधु। बाह्य तो एक रूप है, और यदि कोई अंतरंग में गृहस्‍थ से भी गया बीता हो तो उसमें फिर क्‍या बात हुई? कुछ भी नहीं। किन्‍तु अन्‍तरंग से प्रभु से होड़ लगाये हुए हो, वीतरागता की प्रगति में चल रहा हो वह साधु तो भगवान् की प्रतिमूर्ति है। ऐसे साधुसंतों के मोह का परिहार होता है। जहां मोह का परिहार है वहाँ मनोगुप्ति है।

मनोगुप्ति में आहार संज्ञा के परिहार में—जहां संज्ञावों का परिहार है वहाँ मनोगुप्ति हैं। संज्ञाए चार हैं—आहार, भय, मैथुन, परिग्रह। आहार विषयक वाछा होना सो आहार संज्ञा है। इससे पहिले एषणासमिति के प्रकरण में यह स्‍पष्‍ट आया था कि साधु संत आहार करके भी अनाहारी रहा करते हैं। उसमें भी जितने मात्र में आहारविषयक वृत्ति है, आहार विषयक वाछा है वह आहार संज्ञा है। उस आहार संज्ञा का भी परिहार हो वहाँ मनोगुप्ति है।

शून्‍यता व परिपूर्णता—भैया सच बात तो यह है कि इतना साहस होना चाहिए कि अपने को ऐसा मान ले कि मैं दुनिया के लिए कुछ नहीं हू, मैं हू तो अपने लिए, अर्थात् दूसरों को प्रसन्‍न करने के लिएदूसरों में बड़ा बनने के लिए मैं कुछ नहीं हू, अपने को शून्‍य समझे। शून्‍य रीता होता है कि पूर्ण? पूर्ण होता है। शून्‍य दिखने में तो यों लगता है कि रीता होता है, मगर शून्‍य पूर्ण होता है। शून्‍य में ऐसी पूर्णता है कि उसमें यह भी विदित नहीं होता कि कहां से शुरू होता है और कहां खत्‍म होता है? बना लो शून्‍य स्‍लेट पर बनाकर किसी को दिखावो कि शून्‍य शुरू कहां से हुआ और खत्‍म कहां हुआ? जब शून्‍य का आदि नहीं है और अंत नहीं है तो बीच क्‍या होगा? तो जैसे शून्‍य आदि अंत मध्‍य करि रहित है, यों ही मैं शून्‍य हू, आदि मध्‍य अन्‍त करि रहित हू। व्‍यवहार दृष्टि से मैं दूसरे पदार्थ के लिए कुछ नहीं हू इसलिए शून्‍य हू और निश्‍चयदृष्टि से मैं अपने आपमें आदि मध्‍य अंत से रहित हू, परिपूर्ण हू, सो शून्‍य हू, पर से विविक्त हू। रीता कौन होता है जो शून्‍य से मिटकर कुछ पसरना चाहता है। वही स्‍लेट पर लिखा हुआ शून्‍य अपनी शून्‍य अवस्‍था को छोड़कर कुछ यदि पसरना चाहे तो उसमें आदि, मध्‍य, अंत व अधूरापन हो जायेगा। अपने को शून्‍य न देखकर कुछ बनने की कोशिश करना यह अधूरापन है। अपने को निरखो कि मैं समस्‍त परपदार्थों से विविक्त हू और अपने आपमें परिपूर्ण हू।

धर्म व शान्ति का एकाधिकरण—प्रतिष्‍ठापनास‍मि‍ति में आया था कि मल मूत्र करना शरीर के धर्म हैं और फिर खाना पीना—ये भी शरीर के धर्म हैं। आत्‍मा का धर्म ज्ञाता द्रष्‍टा रहना है। जहां धर्म है वहाँ नियम से शांति है। लोक में जो यह प्रसिद्ध हो गया है कि जहां धर्म के झगड़े हैं वहाँ देश की बरबादी है। और झट समझ में भी आता है, इतिहासों में भी देखो जितने झगड़े फसाद हों, बरबादी हो, कलह हो वे सब धर्म के नाम पर हैं। आजकल जितने सम्प्रदाय के विवाद चलते हैं वे सब धर्म के नाम पर चलते हैं। अरे धर्म से विवाद नहीं, धर्म से अशांति नहीं किन्‍तु धर्म के साथ जो पाप लगे हुए हैं, धर्म की ओट में जो पाप आगे चल रहा है उससे विवाद झगड़े हैं।

धर्म की ओट में पाप का प्रसार—एक किसान था। उसके थे तीन बैल। ऐसी हालत में तो दो ही बैल जुतेंगे, सो एक बैल को घर में बाँध आता था और बाँध जाता था आँगन में, जिस जगह उस जगह की भींत में एक अलमारी थी, जिसमें किवाड़ भी लगे थे, सांकर भी लगी थी। सो जाते समय वह दाल रोटी चावल उस अलमारी में धर जाता था, सांकर लगा देता था। जब वह खेतों से वापिस आता था तो देखें कि अलमारी में कुछ नहीं है। और यह देखे कि बैल का मुह दाल से भिड़ा हुआ है। होता क्‍या था कि एक बंदर आया करता था, वह धीरे से सांकर किवाड़ खोले और भोजन कर जाय, अंत में जो दाल चावल बच जाय उसे उस बैल के मुख में लगा दे। कुछ दिनों तक वह देखता रहा। एक रोज उसे बड़ा गुस्‍सा आया सो वह उस बैल को पीटने लगा। किन्‍तु पड़ौसियों ने कहा कि इतनी निर्दयता से तू इस बैल को क्‍यों पीटता है। वह बोला—अरे पीटें नहीं तो क्‍या करें। हम रोज-रोज भोजन बनाकर रख जाते और यह बैल रोज इस अलमारी से निकालकर खा जाता है। लोगों ने कहा अरे ऐसा कैसे हो सकता है? इसमें सांकर लगी रहती है, अलमारी ऊची है वह कैसे खा लेता है? किसान ने कहा देखो ना मुख में दाल रोज लगी रहती है। तो पड़ौसियों ने समझाया कि यह बात नहीं है, किसी दिन छिपकर देख लो कि मामला क्‍या है? छिपकर उसने देखा तो क्‍या देखा कि धीरे से एक बंदर आता हे वह जंजीर खोलकर किवाड़ खोलकर सारा भोजन खा जाता है और बचे हुए दाल चावल को अंत में बैल के मुख पर लगा देता है।

अप्रभावना का कारण पाप—तो प्रयोजन इसमें इतना है कि जैसे बंदर की करतूत से बैल पिटा, ऐसे ही पाप की करतूत से धर्म पिटता है। धर्म में दोष नहीं है। धर्म तो आनन्‍द और शांति के लिए है। भला साधु हो गये, नदी के तट पर रहने लगे, संन्‍यासी हो गये, ठीक है। संन्‍यासी इसलिए हुए कि सर्वचिंतावों को छोड़कर अपने आपके शुद्ध ज्ञायकस्‍वरूप का खूब चिंतन करें और शुद्ध आनन्‍द का अनुभव किया करें। ज्ञातादृष्‍टा रहें, यह है संन्‍यासी होने का उद्‌देश्‍य। पर जब यह प्रवृत्ति चल जाय कि कोई बहू बेटी वहाँ से निकल आये या कोई पुरुष निकल आये तो उससे कुछ छल करे, यह अनुचित वृत्तियां करे तो साधु समाज की बदनामी हो जाती है। कैसे साधु समाज आज हो गये हैं कि लोग कहते हैं कि फलाने तीर्थ पर जाने का तो धर्म ही नहीं है, न जाने कोई कैसे फंस जाय, किसी के चंगुल में आ जाय, यह अपवाद बन गया। यह धर्म का अपवाद नहीं है। धर्म की ओट में जो पाप का प्रसार होता है उसकी करतूत है।

धर्म का वास्‍तविक पालन—धर्म तो ज्ञाता द्रष्‍टा रहने में है। हम आत्‍मा हैं, हमें अपना धर्म करना है। हमारा धर्म जो साम्‍प्रदायरूप में फैला है वह नहीं है। मैं तो ज्ञानदर्शन स्‍वभावी चैतन्‍य सत् हू। मैं मनुष्‍य नहीं हू। फिर मनुष्‍यता के नाते से जो कोई अटपट बातें प्रसिद्ध हैं उनमें कुछ अच्‍छा है, करे, सहायक है, करे तिस पर भी अच्‍छा हो तो, बुरा हो तो वे सब आत्‍मा के धर्म नहीं हैं। आत्‍मा का धर्म है ज्ञानदर्शन, ज्ञाता दृष्‍टा रहना। जैसा इसका स्‍वतंत्र स्‍वत: सहजस्‍वरूप है उस स्‍वरूप रूप विकास होना यह है धर्म। इस आत्‍मधर्म का पालन जो करे वही धर्म करता है। इस ओर दृष्टि रहनी चाहिए।

मनोगुप्ति का मूल उपाय—वस्‍तुस्‍वरूप को यथार्थ बताने वाला जैन शासन पाकर भी हम वस्तु पद्धति से धर्म न करें तो बड़े खेद की बात है। हम जैन हैं, हमें जैन धर्म के अनुसार हाथ पैर चलाने चाहियें ऐसे आशय की चेष्‍टा में धर्म नहीं है। मैं तो एक चेतन सत् हू, ऐसी प्रतीति के सहारे अपने अंतस्‍तत्त्व में प्रवेश करे और ज्ञाताद्रष्‍टा रहेगा तो इसे मिलेगा धर्म। ऐसा करना प्रत्‍येक कल्‍याणार्थी का कर्तव्‍य है। इस धुन को रखकर हमें अपने उस चैतन्य धर्म की प्रगति करना है मन, वचन, काय के कार्यों को गुप्‍त करना है, वश करना है, दूर करना है और अपना जो शुद्ध सहज ज्ञायकस्‍वरूप है उसका विकास करना है। साधुसंतजन ऐसी ही मनोगुप्ति का यत्‍न करते हैं।

अपमानामृत—जिन संत पुरुषों ने अपने मन को वश किया है उनके आहारसंज्ञा का अनुराग होना तो दुर्गम बात है। साधुसंत इतने हृदय में स्‍वच्‍छ और बली होते हैं कि उनका कितना भी कदाचित् अपमान हो जाय तो वे अपने मन में कलुषित भाव नहीं लाते हैं। लौकिक जनों को अपमान जहां विषवत् है, वहाँ साधुजनों को अपमान शृङ्गार है। अपमान का अर्थ ही यह है कि अपगत हो गया है मान घमंड जिसमें। अपमान होना उत्तम बात है। मान न रहे उसका नाम अपमान है, किन्‍तु लौकिक जनों के लिए अपमान मरण की तरह है किन्‍तु सम्‍यग्‍दृष्टि के लिए, ज्ञानी संत पुरुषों के लिए अपमान अमृत की तरह है। हो किसी ज्ञानी में ऐसी धुन कि वह चाह करे कि मेरे लिए विपरीत प्रसंग आयें और उसही प्रसंग में क्रोध पर विजयी रहे, मेरे लिए अपमान के अनेक प्रसंग आयें और में मान कषाय पर विजयी रहू। माया और लोभी की तो वहाँ चर्चा ही नहीं है। ऐसे साधु संत पुरुष आहारसंज्ञा से दूर रहते हैं। मनोगुप्ति में ये सब लक्षण आये हुए हैं।

भयसंज्ञा के परिहार में मनोगुप्ति—जहां भय संज्ञा का परिहार है वहाँ ही मनोगुप्ति है। भय लगा हुआ हो और मन वश रहे, यह कभी हो ही नहीं सकता। मनोगुप्ति जहां है वहाँ भय का नाम कहां है? निर्भय हों तो स्‍वरक्षा है, मन की गुप्ति है। इस मोही प्राणी के निरन्‍तर भय बना रहता है। कोई भय जब अधिक डिग्री पर पहुंचता है तब अनुभव में आता है। अनेक भय अनगिनते भय इस मोही में आते हैं और उन्‍हें वह महसूस भी नहीं कर पाता है। परपदार्थों में यदि राग है तो भय भी नियम से होता है, चाहे वह कितनी ही मात्रा का भय हो। ज्ञानीसंत जानता है कि मेरा आत्‍मतत्त्व समस्‍त परभावों से विविक्त केवल चैतन्‍यस्‍वरूपमात्र है। में तो मात्र इतना ही हू, इससे अधिक में कुछ नहीं हू। इससे जो अधिक है वह सब व्‍यवहार खाते का हिसाब है। मैं तो ज्ञानमात्र हू। साधुपुरुष निर्भय है और निर्भयता के कारण मनोगुप्ति में प्रगतिशील है।

मैथुनसंज्ञा के परिहार में मनोगुप्ति—जहां मैथुन संज्ञा का परिहार है वहाँ ही मनोगुप्ति आती है। कामवासना का भाव जब कुछ अधिक बढ़ जाता है तब वह महसूस होता है, उसका पता पड़ता है किन्‍तु काम की भी अनेक डिग्रियां अनेकों अनगिनती हैं ऐसी कि जिनके होने पर भी यह जीव मालूम ही नहीं कर पाता कि मेरे कामभाव चल रहा है। जब उसकी अधिक मात्रा होती है तब इसे पता पड़ता है कि कामवेदना का अनुभव होता है तथा विवेक जागृत हो तो सोचता है—ओह यह मैं अनुचित भाव वाला हो रहा हू। पशु, पक्षी, कीड़ा, मकोड़ा इन सबके काम भाव है, ये क्‍या महसूस करें? साल दो साल के बच्‍चे 6 माह के बच्‍चे इनमें से कामभाव है, पर ये भी महसूस नहीं कर पाते। कामभाव का जहां परिहार है वहाँ ही मन वश में है। लोग कहते हैं कि हमारा मन वश नहीं है, कोई उपाय बतावो कि हमारा मन वश रहे, यहाँ वहाँ न डोले। जब स्‍वयं अपराधी है तो मन वश में कहां रहेगा?

अपराध, फल व निवृत्ति का उपाय—देखो डाकुवों का मन अत्‍यन्‍त अस्थिर रहता है, वे किसी ठिकाने बैठ नहीं पाते हैं क्‍योंकि उन्‍होंने अक्षम्‍य अपराध किया है। आहर की संज्ञा, भय का संस्‍कार, मैथुन की वाछा, परिग्रह का लगाव—ये भी महान् अपराध हैं। इतने बड़े अपराध को करने वाला यह अपने मन को कैसे स्थिर रख सकेगा? अपराध को दूर करें फिर स्थिर न हो तब तुम्‍हारी शिकायत हो कि मेरा मन स्थिर नहीं है। यत्‍न करें अपराध के दूर करने का। वह यत्‍न है वस्‍तुस्‍वरूप का यथार्थ ज्ञान। प्रत्‍येक जीव मुझसे अत्‍यन्‍त भिन्‍न है, द्रव्‍य गुणपर्याय सर्वचतुष्‍टय पर का पर में ही हैं मेरा मुझमें ही हैं, कि‍सी की कितनी ही चेष्‍टावों से कितनी ही पोलें बताने से, कितने ही मन के दुर्ध्‍यानों से इस मुझमें रंच भी परिणमन नहीं होता, हो ही नहीं सकता। वस्‍तु में वस्‍तु का वस्‍तुत्‍व बड़ा दृढ़ दुर्ग है, जिसमें अन्‍य वस्‍तु का प्रवेश नहीं हो सकता। फिर मेरे लिए इस लोक में भय क्‍या है? मैं ही भीतर में भय की बात रक्‍खू तो भय सामने आ जाता है।

निर्भय में भय का उद्‌गमस्थान—खरगोश के पीछे शिकारी कुत्ते जब छोड़े जाते हैं तो खरगोश छलांग मारकर बहुत आगे निकल जाता है और एक बड़ी गुप्‍त झाड़ी में छिप जाता है जिस झाड़ी में बहुत निगाह करके देखने पर भी खरगोश का पता नहीं पड़ सकता। वह खरगोश उस झाड़ी में सुरक्षित रहता है। कुत्ते भी वापिस लौटने वाले हैं। बहुत दूर रह गये हैं, लेकिन खरगोश अपने भीतर में कल्‍पनाए बनाता है। कहीं कुत्ते आ तो नहीं रहे हैं ऐसा देखने के लिए झाड़ी से बाहर निकलकर देखता है। लो कुत्तों ने देख लिया, अब फिर पीछा करने लगे। अरे झाड़ी में बैठा था बड़ा सुरक्षित था, रंच भी क्‍लेश न था, किन्‍तु भीतर ही एक भय बनाया तो बाहर भी भय आ गया। यों ही ज्ञानी समझता है कि मेरा स्‍वरूप परपदार्थों से अत्‍यन्‍त भिन्‍न है, स्‍वयं सुरक्षित है। इस मुझ का सामर्थ्‍य नहीं है कि किसी अन्‍य में बिगाड़कर सके। किन्‍तु यहाँ ही एक कल्‍पना उठती है चित्त में और परवस्‍तु में अनुराग करके अपनी पर्याय में राग करता है। मैं मनुष्‍य हू, अरे जब यह मान चु‍का कि मैं अमुक चंद हू, अमुक लाल हू तो अब उसे इस अमुक की शान बढ़ानी पड़ेगी। अरे बाह्य में किसी की शान रह ही कैसे सकती है? जब कल्पित विपरीत घटनाए आयेंगी तो उन घटनावों में दु:खी होंगे।

न कुछ से कुछ की विडम्‍बना—भैया ! यह दृश्‍यमान् विडम्बना है क्‍या जगत् में। न कुछ से कुछ पैदा हो जाय ऐसी कोई मिसाल है तो वह है जीव की एक कला और इसीलिए अन्‍य लोग यह कहते हैं कि यह ईश्‍वर सृष्टि रचता है। कुछ भी न था और केवल एक भावमात्र कर लेने से ये शरीर, ये पशु पक्षी के ढांचे, ये विभिन्‍न प्रकार के शरीर कैसे बनते चले जा रहे हैं? यद्यपि यहाँ भी प्रत्‍येक द्रव्‍य स्‍वयं का उपादान है जो अपनी-अपनी सृष्टि बनाता हुआ चला जा रहा है, किन्‍तु जीव का यह विभाव इन सब सृष्टियों का निमित्त तो हुआ ना। जो ज्ञानीपुरुष वस्‍तु के यथार्थस्‍वरूप को समझते हैं उनका ही मन वश में हो सकता है अन्‍यथा नहीं। इस मोही प्राणी के सिर पर कितने संकट लदे हुए हैं? घर जावे तो घर चैन नहीं हैं, देश में कहीं जावे तो वहाँ चैन नहीं है और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन हो वहाँ पहुंचे तो वहाँ भी चैन नहीं। अरे आत्‍मन् हे मूढ़, हे मोही, हे पर्याय के आसक्त, हे आत्‍मघाती तू बाहर में चैन कहां ढूढ़ने चला है? तू स्‍वयं आनन्‍दमय है। बाहर की आशा तज दे, अपने ही अंत:स्‍वरूप को निहार ले, तुझे तो प्राकृतिक देन है कि तू चैन में रहे। वस्‍तुस्‍वरूप के विपरीत श्रद्धानी को कहीं चैन नहीं है। सर्वत्र विडम्‍बना है, सर्वत्र आपत्ति है।

बेवकूफ को फजीहत की चिन्‍ता क्‍यों—एक मियां बीबी थे। मियां जी का नाम था बेवकूफ और स्‍त्री का नाम था फजीहत। प्राय: दोनों में लड़ाई हो जाया करती थी और थोड़ी देर में दोस्‍ती हो जाती थी। एक बार ऐसी लड़ाई हुई कि फजीहत घर छोड़कर भग गयी। तो बेवकूफ पड़ौसियों से पूछता फिरता है कि तुमने हमारी फजीहत देखी? लोग जानते थे कि फजीहत इसकी स्‍त्री का नाम है सो कह दिया कि हमने नहीं देखी। इसी तरह उसने दसों से वही बात पूछी। एक बार किसी परदेशी अपरिचित से पूछ बैठा कि भाई तुमने हमारी फजीहत देखी? उसकी समझ में कुछ आया नहीं सो वह पूछता है कि तुम्‍हारा नाम क्‍या है? मियां साहब बोले कि मेरा नाम बेवकूफ हैं। तो अ‍परिचि‍त पुरुष कहता है कि बेवकूफ होकर भी तुम फजीहत की तलाश कर रहे हो। अरे बेवकूफ को तो जगह-जगह फजीहत मिल जाती है। जहां ही औंधा-सीधा बोल दिया, वहाँ ही जूता, घूसा खाने को मिल गये। बेवकूफ होकर भी तुम फजीहत की चिंता क्‍यों करते हो?

मुग्‍धबुद्धि की विडम्‍बनायें—ऐसे ही मोही जीवों में चूकि मुग्‍धबुद्धि है इसके कारण इसे जगह-जगह विडम्‍बनाए हैं, कहीं जावे, कहीं बैठे, इसे सर्वत्र विपदा है। कहां जायेगा? किसी स्‍थान पर जाने से सुख दु:ख में अन्‍तर नहीं आता। परिणामों में अन्‍तर आने से सुख दु:ख में अन्‍तर आया करता है। यह ज्ञानी संत यथार्थस्‍वरूप का ज्ञाता है। इसके बल को कौन कह सकता है? लोग कहते हैं के ऐटमबम में बड़ी ताकत है। ऐटम को अंग्रेजी में लिखो कैसे लिखते हो? उसी का नाम है आतम। अरे आत्‍मा में बल है, ऐटम में क्‍या बल है? आत्‍मा के बल की कुछ कथनी नहीं की जा सकती। अभी-अभी आपके आंखों के आगे ही गांधी जैसे नेतावों ने यह प्रदर्शित कर दिया कि हथियार न होने पर भी, धन पैसा न होने पर भी एक आत्‍मा का यदि बल है तो उस आत्‍मबल से इतना बड़ा एक वातावरण किया जा सकता है साम्राज्‍य लिया जा सकता है।

पुनीत आत्‍मा की भक्ति में यत्‍न—कोई पवित्रात्‍मा विभव का समूल नाश करके अरहंत हो गये तो देव इन्‍द्र मनुष्‍य सभी के सभी अपनी पूरी सामर्थ्‍य लगाकर समारोह शोभा भक्ति किया करते हैं। वह क्‍या है? वह आत्‍मबल का प्रताप हीतो है। जब ही अरहंत स्‍वरूप की स्‍मृति होती है, रागद्वेष जहाँ रंच नहीं हैं केवल शुद्ध ज्ञानमात्र स्‍वरूप है ऐसे ज्ञान मात्र उस शुद्ध परमात्‍मतत्त्व की स्‍मृति होती है तो चित्तभक्ति से गद्‌गद हो जाता है। ओह ! जिन पुत्र, मित्र, स्‍त्री के खातिर जिन बंधु, मित्रों के खातिर जिन रिश्‍तेदार, देवर, पति आदि पुरुषों के खातिर अपना जीवन तन, मन, धन न्‍यौछावर कर-करके व्‍यतीत कर डाला। अंत में फल क्‍या निकला? कुछ भी नहीं। रीता का रीता, बल्कि जो कुछ पूर्वजन्‍म में लाये थे शुद्ध संस्‍कार वह भी गंवाकर चला। इसकी प्रीति में रंचहित नहीं है। किन्‍तु उन अरहंत की प्रीति में, उस धर्ममय आत्‍मतत्त्व की प्रीति में महान् हित है। किस किसी भी महाभाग से बने, कायदे मुताबिक प्रीति करो। ज्ञानमूर्ति की भक्ति से क्षण भर में ही भव-भव के संचित कर्म दूर हो जाते हैं।

यथार्थज्ञानबल से मनोगुप्ति के धारण का स्‍मरण—वस्‍तुस्‍वरूप का जैसा यथार्थज्ञान है और उस ज्ञान के परिणाम में जिसने अपना प्रायोगिक परिणमन समतारूप बनाया है ऐसे ज्ञानी संत पुरुष के मनोगुप्ति होती है जहां परिग्रह का रंच भी संस्‍कार है वहाँ मनोगुप्ति नहीं होती है। देखो ज्ञानी गृहस्‍थ में भी इतना आत्‍मबल है कि लाखों करोड़ों की प्राप्ति हुई सम्‍पदा से भी अत्‍यन्‍त न्‍यारा भिन्‍न ज्ञानमात्र अपने आपकी प्रतीति रख सकता है। तब इससे अंदाज लगावो कि साधु पुरुष के परिग्रह से कितनी परम विरक्ति होगी? उनको तो उनका आत्‍मा उनके हाथ पर रक्‍खे हुए की तरह स्‍पष्‍ट बना रहता है। जहां परिग्रह का परिहार हैं वहाँ मनोगुप्ति होती है। पंचमहाव्रत पंचसमितियों को पालन करनहार साधुसंतों को महाव्रत और समिति में ही संतोष नहीं रहता है। वे इन तीन गुप्तियों के अर्थ ही अपना अंत: प्रयत्‍न रखा करते हैं। गुप्तियों में न ठहर सके तब का काम है महाव्रत और समिति। गुप्तियों में श्रेष्‍ठ मनोगुप्ति है। यद्यपि कायगुप्ति, वचनगुप्ति भी साधना में बड़े सहायक हैं किन्‍तु ये भी गुप्तियां दोनों क्‍यों की जा रही है कि मनोगुप्ति बने। जहां आहार, भय, मैथुन, परिग्रह इन चारों संज्ञावों का परिहार है वहाँ ही मनोगुप्ति होती हैं। मिले तो कोई ऐसा निष्‍प्रह परपदार्थों के सम्‍बन्‍ध से अपने महत्त्व की प्रतीति न रखने वाला, सबसे न्‍यारा, वह प्राय: सबका प्‍यारा हो जाता है। जिनका मन वश नहीं है उनका जीवन क्‍या जीवन है? वे व्‍याकुल रहते हैं और चिंतित रहते हैं। सर्वप्रयत्‍न करके अपनी मनोगुप्ति को संभालना चाहिए।

साधुपुरुष के रागद्वेष का परिहार—मन की गति को स्‍वरूपानुभव के विरुद्ध जानकर इस मन को वश में रखने के उद्यमी साधुसंत जन सदा सावधान रहते हैं। जिन कृत्‍यों में राग और द्वेष की प्रवृत्ति विदित होती है उसे वे दूर कर देते हैं। ऐसे प्रसंगों में रागद्वेष की बात की कथा दूर रही, जब कोई भी धर्मचर्चा करता है और उस चर्चा के मध्‍य कभी कोई बात समता की सीमा से कुछ अधिक हो जाती है अथवा होने लगती है यह उस धर्मचर्चा को भी समाप्ति कर देता है। जिस प्रसंग में राग अथवा द्वेष की स्थिति हो वह धर्मचर्चा नहीं है। वह तो अपनी हठों का पक्षों का इच्‍छा का संपादन करना है। धर्मचर्चा के समय यदि कोई अपनी बात नहीं मानता है और उस पर अपने को खेद होता है तो यह अपना अपराध है। यदि वहाँ खेद होता है तो समझो कुछ धर्मचर्चा न कर रहा था वह, किन्‍तु अपनी हठ चर्चा कर रहा था तब उसे दु:ख हुआ। यदि वह मात्र धर्मचर्चा होती तो न मानने पर कुछ भी विषाद न होता। ज्ञाताद्रष्‍टा रहना। जगत् में अनन्‍त जीव तो हैं जो धर्म से विमुख हैं। एक जीव ने, दो जीवों ने बात न मानी उसका इतना बड़ा विषाद बन जाना, यह तो मोह को जाहिर करता है। धर्मचर्चा के प्रसंग में साधुसंतों के राग और द्वेष नहीं रहता है।

मनोगुप्ति में शुभ अशुभ दोनों रागों का परिहार—राग दो तरह के होते हैं। एक शुभराग, दूसरा अशुभ राग। शुभराग तो वह है जहां धर्म में लगने का कुछ प्रसंग है। गुरुभक्ति, स्‍वाध्‍याय की व्‍यवस्‍था, सत्‍संग, परोपकार, दान आदिक ये सब शुभ राग है। अशुभ राग वह है जिसके माध्‍यम से विषय और कषायों को बल मिलता है। अशुभ राग की बात अधिक क्‍या कहें सारा जहान प्राय: अशुभ राग में ही लीन है। मनोगुप्ति वहाँ ही संभव है जहां शुभराग और अशुभ राग दोनों का परिहार हैं। ज्ञानी संतों को अपने आपके उस शुद्धस्‍वरूप के जौहर का इतना अधिक परिचय है कि उसे शुभराग भी यों दिखता है जैसे लोग कहते हैं—ऐसा सोना किस काम का जो नाक कान को फाड़ दे।

शुभराग में राग के आशय की कथा—भैया ! शुभराग में जिन्‍हें राग है उनकी कथा भी थोड़ी सुन लीजिये। शुभराग से ही हमारा कल्‍याण है, हमें यह राग करना ही चाहिए। इस राग से ही मेरा बड़प्‍पन है सो राग छोड़ने का स्‍वप्‍न में भी ध्‍यान नहीं रखते हैं। वे मिथ्‍याबुद्धि वाले हैं, उनकी दृष्टि ही विपरीत है। जो व्‍यक्ति सीधा शुद्ध ज्ञायकस्‍वरूप का लक्ष्‍य न रक्‍खें वह दृष्टि सही दृष्टि नहीं है। निज सहजस्‍वरूप को छोड़कर अपने को नाना रूप मानना, वे सब दृष्टियां विपरीत दृष्टियां हैं। शुभराग और अशुभ राग को अपनाने वाले जीव मिथ्‍यादृष्टि होते हैं।

ज्ञानी की समागम में अरुचि पर दृष्‍टान्‍त—जैसे ए क्‍लास की कैद में पड़ा हुआ कैदी मिले हुए बहुत ठाट बाट से भी राग नहीं रखता है, उसे जेलखाने में बड़ी सुविधायें दी गयी, खूब ब‍ढ़ि‍या मनपसंद भोजन करे, उसके लिए एक रसोइया भी रक्‍खा जाय, कितना चाहे खर्च करे, जेब खर्च भी मिले, जिस तरह से घर में रहता है उस तरह से जेल में रहे, ऐसा ए क्‍लास का कैदी अपने पाये हुए समागम में, आराम में राग नहीं करता है। ऐसे ही ए क्‍लास का संसार का कैदी पुण्‍योदय वाला धनिक राजा महाराजा ज्ञानीपुरुष अपने पाये हुए समागम में राग नहीं करता है। वह तो सोने की बेड़ी को भी बंधन समझता है। इन भिन्‍न असार परवस्‍तुवों में राग के परिणाम होने को गंदगी मानता है। और जैसे सी क्‍लास के कैदी चक्‍की पीसने, बोझा ढोने, खेती करने आदि जितने भी उनसे काम कराये जाते हैं और पीड़ाए देते हैं, क्‍लेश होते हैं—जैसे उन क्‍लेशों में उन्‍हें रुचि नहीं है ऐसे ही ये ज्ञानी पुरुष भी कदाचित् पाप उदय के कारण सी क्‍लास के कैदी बनकर बड़ी विपत्तियों का बोझ ढोते हैं, फिर भी उनके राग विरोध नहीं है।

अज्ञानी की उद्‌दंडता—इसके विपरीत धनिक राजा महाराजा अज्ञानी पुरुष पाये हुए समागम को छोड़ना नहीं चाहते। इन समागमों के खातिर अन्‍याय करना पड़े, धर्म का विरोध करना पड़े सब कुछ करने को तैयार है। खोटा रोजिगार, खोटी कम्‍पनियां, कषायी खाना और बड़े गंदे होटल कितने ही काम करने पड़ें, धर्म का विरोध करना पड़े तो वह धर्म का विरोध करके अन्‍याय करके भी मस्‍त रहना चाहते हैं, अपनाना चाहते हैं और पाप का उदय आने पर उससे भयभीत होते हैं और इतना ही नहीं, अपने विषयसाधनों के खातिर तो बड़े कष्‍ट भी सहने पड़ते हैं। परदेश जा रहे हैं, सवारियों में भिचे हुए जा रहे हैं, खड़े-खड़े जा रहे हैं, भूखे प्‍यासे रहते हैं, इन सब कष्‍टों को भी खुशी-खुशी सहते हैं और अपने मोह ममता की खोटी दृष्टि भी नहीं छोड़ सकते। ये शुभराग और अशुभ राग यों ही नृत्‍य कर रहे हैं।

साधुवों की परमोपेक्षा—साधु ज्ञानी पुरुष किसी प्रकार के राग को अपनाता नहीं है, ऐसे ही द्वेष परिणाम का जहां परिहार है वहाँ ही मनोगुप्ति है। द्वेष परिणाम एकांतत: अशुभ है। प्रत्‍येक पदार्थ अपने स्‍वरूप से है, पर के स्‍वरूप से नहीं है। वे जैसे हैं, तैसे पड़े हुए हैं, किन्‍तु हमारा ही जब अन्‍तर का परिणाम मलिन होगा तो उन पदार्थों में किसी को इष्‍ट मान लेते हैं और किसी पदार्थ को अनिष्‍ट मान लेते हैं।

धर्मपात्रता के लिये नीतिशास्‍त्र का वर्णन—नीतिशास्‍त्र में लिखा है कि धर्म को वही पाल सकता है जो ऐसा दृश्‍य बनाये हुए है कि मृत्‍यु मेरे केशों को पकड़े हुए बैठी है, न जाने कब झकझोर दे और मुझे इस शरीर को छोड़कर जाना पड़ेगा। नीतिशास्‍त्र कहता है कि विद्या और धन इन दोनों का उपार्जन तो तब किया जा सकता है कि जब यह जाने कि मैं अजर अमर हू, न मैं बूढ़ा होऊगा, न मरूगा—ऐसी पूर्ण दृष्टि न हो तो थोड़ा बहुत भी हो तो धन कमा सकते हैं और विद्या प्राप्‍त कर सकते हैं। कोई ऐसा भी विश्‍वास लिए हो कि हम तो आज ही मर जायेंगे तो वह सोचेगा कि धन क्‍यों कमायें और ये व्‍याकरण के जीवस्‍थान के शास्‍त्र काहे को पढ़ें, शाम को तो मरण ही हो जायेगा, तो जिसे अपने आपके ध्‍यान में अजरत्त्व और अमरत्त्व की बात नहीं है वह विद्या और धन का संचय नहीं कर सकता है। इसी प्रकार जिसको यह विश्‍वास न हो कि मृत्‍यु मेरे केशों को पकड़े हुए बैठी है, जब चाहे उठा ले जाय, ऐसी मन में बात न जमें तो धर्म का पालन भी उत्तम रीति से नहीं हो सकता।

विवेक में धर्म की प्रतीक्षा—भैया ! जरा इसका अंदाज ही कर लो। जब कोई कठिन बीमारी हो जाती है, जिसमें यह दिखता है कि अब तो मेरी मौत होने वाली है उस समय धन वैभव परिजन वगैरह कुछ नहीं रुचते हैं और यह इच्‍छा होती है कि कुछ समय और जीवित रहता तो मैं केवल धर्म ही धर्म का प्रोग्राम रखता। उन सुभटों की बात नहीं कह रहे हैं कि जो मरने के समय भी आत्‍महित की रंच भी कल्‍पना नहीं लाते। उन्‍हें विषयों की प्रीति ही सुहाती है। मरते समय भी कहते हैं कि मेरी स्‍त्री से मिला दो, पुत्र से मिला दो जिससे आंखें तृप्‍त हो जायें। ऐसे विषय कषायों के प्रेमी सुभटों की बात नहीं कह रहे हैं किन्‍तु जिनमें जरा भी विवेक हैं उनको मृत्‍यु के समय धर्म की चाह होती है। धन वैभव परिवार इन सब की रुचि नहीं रहती है।

धर्म की उन्‍मुखता में मनोगुप्ति की संभवता—धर्म है ज्ञातादृष्‍टा रहना अर्थात् रागद्वेष मोह के मलिन परिणाम न होने देना। इस ओर जिनकी उन्‍मुखता होती है उनका मन वश हो जाता है। यह बात उनके ही सम्‍भव है जो वस्‍तुस्‍वरूप के यथार्थ विज्ञानी है। वे ही मनोगुप्ति का पालन कर सकते हैं। मनोगुप्ति के सम्‍बन्‍ध में उत्‍कृष्‍ट बात तो यह है कि चिंतन सब रोक दें और अनुत्‍कृष्‍ट बात यह है कि अशुभ चिंतन को बिल्‍कुल समाप्‍त कर दें। यह मन खाली नहीं बैठा करता। यहाँ जितने पुरुष बैठे हैं इतने ही मन हैं और सबके मन अपनी-अपनी कम्‍पनी को संभाले हुए हैं, जिनका जैसा जो कुछ चिंतन है। मन धर्म की ओर कुछ कहीं लग रहा है और किसी तरह लग रहा है, कुछ बाहर से भी हटा हुआ है, कुछ धर्म की बात में भी चित्त लगा हुआ है और लो फिर यह कुछ हट गया, फिर यहाँ लग गया, कैसी विचित्र परिणतियां कर रहा है यह मन।

मन मरकट को शुभ में उपयुक्त करने की आवश्‍यकता—अहो, यह मन बंदर से भी अधिक चंचल है। बंदरों को देखा होगा कि वे खाली नहीं बैठ सकते। जब नींद आ जाय तो चाहे थोड़ी देर पड़े रहें, पर जागते हो तो स्थिर नहीं बैठ सकते। कहीं पैर हिलाया, कहीं हाथ हिलाया और उनकी आंखें तो बड़ी ही विचित्र हैं। कैसा मटक ही है कि जरासी देर में आंखों में टोपी लग जाती है जरासी देर में टोपी हट जाती है। कैसी विचित्र चंचलता है? उससे भी अधिक चंचल यह मन है। इस मन को किसी न किसी शुभ कार्य में जुटाये रहना चाहिए यदि अपना कल्‍याण चाहते हो। इसे शुभ कार्य न मिलेंगे तो अशुभ कार्य में लग बैठेगा। इस तरह ज्ञान ध्‍यान पूजा, सत्‍संग, परोपकार, सेवा इन कार्यों में भी लगना चाहिए। इन शुभ कार्यों में मन लगा होगा तो यहाँ इतनी पवित्रता है कि उन शुभ कार्यों का भी परिहार करके क्षण मात्र तो अपने आपके शुद्धज्ञायक स्‍वरूप का अनुभव कर सकेगा।

मन को अभीक्ष्‍ण कार्य में लगाने की आवश्‍यकता पर एक दृष्‍टान्‍त—एक राजा था, उसने देवता सिद्ध किया। देव सिद्ध हो गया तो राजा से कहा राजन् ! जो तुम कहो वही काम क्षणभर में कर देंगे। राजा बड़ा प्रसन्‍न हुआ। राजा ने कहा—अच्‍छा एक महल बना दो। झट महल बन गया। कहा राजन् काम बतावो। काम न बतावोगे तो तुम्‍हारी जान ले लेंगे। अच्‍छा वहाँ तालाब बना दो। बन गया तालाब। राजन् ! काम बतावो। वहाँ सड़क बना दो। बन गयी वहाँ सड़क। फिर कहा—राजन् ! काम बतावो नहीं तो तुम्‍हारी जान ले लेंगे। वह बड़ी चिंता में पड़ा, सोचा कि अब क्‍या करें? समस्‍या का एकदम बुद्धि ने हल कर दिया। देव कहता हे राजन् काम बतावो। अच्‍छा 60 हाथ की एक लोहे की डंडी लावो। आ गई डंडी। काम बतावो। अच्‍छा एक 65 हाथ लम्‍बी जंजीर लावो। आ गई जंजीर। राजन् काम बतावो। अच्‍छा उस जंजीर का एक छोर डंडी में बाँध दो। लो बाँध दिया। राजन् काम बतावो। अच्‍छा इस जंजीर का एक सिरा बंदर बनकर अपने गले में फंसावो। लो बन गये बन्‍दर, गला फांस लिया। राजन् काम बतावो। अच्‍छा जब तक हम नहीं कहे तब तक तुम इस डंडी में चढ़ो और उतरो। लो बार-बार के चढ़ने और उतरने में वह परेशान हो गया। हाथ जोड़कर देव कहता है, राजन् ! माफ करो, हम अपनी वह बात वापिस लेते हैं कि काम न बतावोगे तो हम तुम्‍हारी जान ले लेंगे। हम अपने वचन वापिस लेते हैं और तुम जब भी हमारी याद करोगे तब हम तुम्‍हारा काम आकर कर देंगे।

शिवस्‍वरूप अन्‍तस्‍तत्त्व में मन लगाने का परिणाम—यह मन बंदर से भी अधिक चंचल है, इसे तो ऐसा काम बतावो कि जिस काम में रहकर फिर यह अपना काम भी छोड़ दे। कौनसा काम ऐसा है कि जिस काम में रहकर यह मन अपना काम हठ छोड़ सकता है? विषय और कषायों के पुष्‍ट करने वाला यह काम ऐसा नहीं है कि इस काम में रहकर यह मन अपना काम छोड़ दे। खूब खोज करो—ऐसा कौनसा काम है कि जिस काम में रहकर यह अपना काम भी छोड़ दे? वह काम है निज शुद्ध ज्ञायकस्‍वरूप के दर्शन करने में इसके ध्‍यान और चिंतन में मन को लगाना, इस ओर जरा मन तो लगे, बस फिर वह अपना काम छोड़ देता है और तब आत्‍मानुभूति प्रकट हो जाती है। भले ही हमारी गड़बड़ों के कारण हमारी कायरता और कमजोरी के कारण फिर से मन हम पर हावी हो जाय पर कार्य ऐसा है यह कि जिस कार्य में रहने पर यह मन अपने कार्य को भी त्‍याग देता है।

आत्‍मचारित्र के अर्थ अपना कर्तव्‍य—भैया ! अपने मन को अशुभ कार्यों से हटाकर शुभ कार्यों में लगाना यह अपना कर्तव्‍य है। किन्‍तु साथ ही सर्वोत्‍कृष्‍ट कर्तव्‍य यह है कि वस्‍तुस्‍वरूप का यथार्थज्ञान करके समग्र वस्‍तुवों के यथार्थ सहजस्‍वरूप के ज्ञाताद्रष्‍टा रह सकना, यह सर्वोत्‍कृष्‍ट कर्तव्‍य है। मुनिजन सब प्रकार के राग और द्वेष से दूर रहते हैं, ऐसे समग्र अशुभ परिणामरूपी आश्रवों का परिहार करना ही मनोगुप्ति है। मन चूकि बाह्य वस्‍तु है, आत्‍मा के स्‍वभाव की बात नहीं है ऐसे उस मन को वश में करने की बात यह सब व्‍यवहारचारित्र है। निश्‍चयचारित्र तो वह है कि यह मन गुप्‍त होकर जिस स्‍वच्‍छता को प्रकट करने में स्‍वच्‍छता बर्ते और अन्‍तर में स्‍वच्‍छता जब जागृत हो जाय तो वहाँ यह मन भी विलीन हो जाय। निश्‍चयचारित्र तो यह है। इस प्रकार तीन गुप्तियों में से यह उत्‍कृष्‍ट मनोगुप्ति का वर्णन अब समाप्‍त होने को है।

 

।।नियमसार प्रवचन चतुर्थ भाग समाप्‍त।।


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