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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचगुरु भक्ति - श्लोक 2

From जैनकोष



अष्टगुणै: समुपेतानु प्रणष्टदुष्टाष्टकर्मरिपुममितीन् ।

सिद्धान् सतत मनंतांनमस्करोमीष्टतुष्टिसंसिद्धयै ।।2।।

सिद्ध परमेष्ठी को नमस्करण―मैं सिद्ध भगवान को नमस्कार करता हूँ, अनंत सिद्धों को नमस्कार करता हूँ । मैं सतत निरंतर अनंत सिद्धों को नमस्कार करता हूँ जो अष्टगुणों से सहित हैं और समस्त अष्ट कर्मशत्रुवों को जिन्होंने नष्ट किया है । यह आत्मा अपने आप सहज किस स्वभावरूप है? जब उस स्वभाव का विकास होता है तो उन विकासों के परिणमन से, परिज्ञान से हम यह समझ पाते हैं कि इस आत्मा का सहजस्वभाव कैसा है? किसी एक बड़े पत्थर के भीतर क्या है, स्वयं अपने आप उस जगह क्या है? यह बात भी जान सकेंगे जब कि ऊपर के आवरण हटें । ऐसे ही मेरे आत्मा में सहजस्वभाव क्या है, यह बात तब प्रकटरूप से विदित होती है, कि जब आवरण विकार इसके ढाकने वाले यै सब दूर हो जाते हैं तब विदित होता है कि इस आत्मा का सहजस्वरूप यह है । यह बात हमें सिद्ध भगवान के स्वरूप की उपासना से सुविदित हो जाती है । प्रभु में समीचीनता है । कोई मल नहीं है । शुद्ध हैं । अपने आप में लवलीन हैं । किसी भी प्रकार का विकार नहीं है । क्योंकि उनके मोहनीयकर्म का अभाव हो चुका है । प्रत्येक वस्तु में अपने आपकी ओर से कोई विकार नहीं होता, कोई दोष नदी होता । वह जैसा है तैसा ही है । विकार के मायने हैं कि जो उसमें बात स्वयं नहीं है वह बात आ जाय उसे विकार कहते हैं । अंतराय क्रम के न होने से ऐसी अनंत शक्ति प्रकट है जिससे परिपूर्ण विकास बना रहता है । प्रत्येक पदार्थ अपने आपके सहजस्वरूप में रहता है तो मैं भी हूँ, मेरा भी अपने आप कोई स्वरूप है अपने सहजस्वरूप का यह सिद्ध गुणस्तुति से सुगम विदित होता है ।

ज्ञान की अबाध गति―यद्यपि यह ज्ञानस्वभाव अनादिकाल से दबा हुआ है, इसका विकास नहीं हो पाया तो भी यह जो है सो ही है, दूसरा नही बन सकता । वस्तु का स्वरूप ही इसी भाँति का है । इस तरह की जो अपने आपके भीतर दृष्टि ले जाता है वह स्वरूप का कुछ परिज्ञान करता है तो कर लेता है, उसको बीच में कुछ अटक नही आती । एक दृष्टि चाहिए, भीतर में उत्सुकता चाहिए । वह यत्न करने लगे तो जान लेगा । ज्ञान की ऐसी पैनी गति होती है । जैसे यहीं बैठे हुए आप कही अपना उपयोग ले जाये । जैसे उदाहरण में कुछ बात रख लो, तीर्थक्षेत्र की बात रख लो । किसी मूर्ति की ओर आपकी दृष्टि लग गयी तो देखिये रास्ते में कितने ही पहाड़, कितने ही जंगल पड़ते है, मंदिर के फाटक भी लगे हुए हैं, सबको पार करके यह ज्ञान उस मूर्ति के समक्ष पहुंच जाता है । घर का दृष्टांत इसलिए नही लो कि इस समय अच्छे वातावरण में आप लोग बैठे हुए हैं । हम आपका उपयोग आपके घर की ओर क्यों ले जाये? नहीं तो आपके घर तिजोरी के अंदर कोई चीज गुप्त रखी हो और आप उसे यहाँ बैठे-बैठे ही जानना चाहें तो ये दीवाल, किवाड़, आदिक कोई आपके ज्ञान को रोक नहीं सकते । किवाड़ उसे कहते हैं जो कि मायने किसी को भी बाड़ मायने रोक दे । जैसे कुत्ता, बिल्ली, बंदर आदि सबको जो रोक दे उन्हें किवाड़ कहते हैं । पर ये किवाड़ इस ज्ञान को नहीं रोक पाते । आपकी तिजोरी के अंदर कई पोटलियों के बीच कोई कीमती चीज धरी हो, उसे आप यहाँ बैठे ही बैठे अपने ज्ञान में ले-ले तो इसे कोई रोक नहीं सकता । ऐसे ही आप अपने आपके अंदर की बात को जानना चाहें तो इसे कोई रोक सकता है क्या? ये रागादिक विकार, ये क्रोधादिक कषायें, ये भी इस ज्ञान को रोकेंगे नहीं । यह ज्ञान इन सब आवरणों को पार कर, रागादिक विकारों को पार कर सहजस्वरूप में जो एक ज्ञानस्वभाव है उसकी परख कर लेगा, जान लेगा । न जानता होता तो ये चर्चायें कहाँ से उठती? ज्ञानस्वभाव की जो चर्चायें की जाती है, जिनका कुछ भी किसी भी रूप में परिचय नही, उसकी ये चर्चायें ही यह साबित करती है कि इस ज्ञानस्वभाव को कोई जानना चाहे तो जान सकता है । इस समय भी इन रागादिक समस्त आवरणों से ढका हुआ होने पर भी हम आप अपने उस सहजपरमात्मतत्त्व को निरख सकते हैं ।

आत्मा के सहजस्वरूप के विकास में सिद्ध परमेष्ठित्व―आत्मा का स्वाधीन विकास, सहजस्वरूप जब सहज विकसित हो गया तो उसी को सिद्ध परमेष्ठी कहते हें । इस पर आज कितने मल कलंक लगे हैं उनके भेद प्रभेद करें तो कर ही नहीं सकते । संख्या से परे हैं, लेकिन मोटे रूप में बताया गया कि 8 प्रकार के आवरण हैं । कर्म साथ लगे हैं । देखिये अपनी ओर से अपने बारे में अपनी हीनता का ज्ञान करके ही कर्मों का ज्ञान किया जा सकता । आँखें पसारकर किसी इंद्रिय को अभिमुख करके इन कर्मों को समझना चाहें तो नहीं समझ सकते । ये कर्म इस जीव पर लगे हैं इसलिए ज्ञान नहीं हो रहा, यह बात यद्यपि निमित्तनैमित्तिक दृष्टि से सही है, पर इस ढंग से हम पता यों नहीं पाड़ सकते कि कर्म का तो हमें सम्वेदन हो नहीं रहा । इस ज्ञान की कमी का, इस ज्ञान की विकृति का, इस ज्ञान की चंचलता का बोध है । स्वसम्वेदन के द्वारा हम यह परख करते हैं कि हम पर कितने आवरण छाये हुए हैं और कितने हट गये हैं? यह बात निमित्तनैमित्तिक विधि से सही है कि ज्ञानावरण कर्म का उदय होने से इसका ज्ञान ढका है, लेकिन हमको या तो मूर्त पदार्थों का ज्ञान हो पायेगा या अमूर्त का । मूर्त पदार्थों का ज्ञान तो इन इंद्रियों द्वारा होता है, पर अमूर्त पदार्थों का ज्ञान इंद्रिय द्वारा नहीं होता । जो अमूर्त पदार्थ को जान सकेगा वह तो खुद को जान सकेगा, क्योंकि खुद-खुद है, खुद पर सब बातें बीतती हैं तो उसका सम्वेदन होता है । इसका ज्ञान किसे नहीं है? मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है, मैं बड़ा दुःखी हूँ, ऐसा सभी लोग कहते हैं, पर हम यदि पूछें कि जरा बताओ तो सही कि वह दुःख किस जगह है? सिर में है कि छाती में कि हाथ पैर आदिक में? अरे किधर दुःख बतायें, कहीं दुःख नहीं बता सकते कि यहाँ दुःख है, न दुःख की मुद्रा बता सकते, पर दुःख का सम्वेदन चल रहा है । तो अमूर्त पदार्थों में हम स्पष्टतया कुछ समझ सकते हैं तो निज अमूर्त को समझ सकते हैं, पर अमूर्त को नहीं जान पाते और मूर्त को स्थूल को जानेंगे तो इन इंद्रियों द्वारा जान जायेंगे । तो इन कर्मों को हम यों नहीं जान पा रहे हैं । इन्हें हम जानते हैं मुक्ति से, आगम से, अनुमान से, अविनाभाव से । यदि कोई हमारे इस ज्ञान पर आवरण न होता तो ये ज्ञान दर्शन न्यून न होते । यदि कोई कर्म न होता तो ये सुख दुःख आदिक की प्रवृत्तियाँ न होतीं और सहज पूर्ण विकास होता । आत्मा का पूर्णविकास ही सिद्धता है ।

ज्ञानावरण व दर्शनावरण के अभाव में प्रभु की ज्ञानदर्शनसमग्रता―किसी भी पदार्थ में कुछ विचित्र परिणतियां होती हैं तो किसी उपाधि निमित्त के सन्निधान होने पर ही हो सकती हैं । ऐसा निमित्तनैमित्तिक संबंध होने पर भी जब हम निर्णय और स्पष्ट बोध के रास्ते से चलते हैं तो पहिले हम अपने को परखते हैं, अपनी परख के बाद हम युक्ति से उन कर्मों का ज्ञान करते हैं । यह एक ज्ञान करने की बात है । निमित्त नैमित्तिक की बात दूसरे प्रकरण की है । तो ज्ञानावरण कर्म है जिससे ज्ञान प्रकट नहीं हो पा रहा । जिनके ज्ञानावरण नष्ट है उन सिद्धों के, अरहंतों के वह अनंतज्ञान प्रकट है । दर्शनावरण कर्म का उदय है इससे आत्मा का दर्शन नहीं हो पाता, सामान्य पूर्ण सहज प्रतिभास नही हो पाता और तब ये जीव स्वदर्शन किए बिना पर-आशा कर करके दुनिया में भटकते फिरते हैं । दर्शनावरणकर्म जिनके नष्ट हो गए उनके स्व प्रतिभास है । जाननहार निज की एक झाँकी ले लेना यह उनका दर्शन निरंतर होता रहता है । दर्शन हम आपके चलता तो रहता है जिसके योग्यता है, लेकिन हम उस दर्शन की बात को बिल्कुल पकड़ नहीं पाते, क्योंकि धुन लगी है हमारी परपदार्थों में, विषयसाधनों में, जिसके कारण? हम दर्शनगुण से परिणमते हुए भी और कुछ भी एक प्रतिभास नही कर पाते । सामान्यरूप प्रतिभास को भी नही समझ पाते । जैसे किसी मनुष्य को किसी ने बताया कि यदि तुम धनी होना चाहते हो तो अमुक पर्वतपर जो बहुत से पत्थर पड़े हुए हैं उनमें कुछ पारस पत्थर भी हैं । तुम किसी पारस पत्थर को वहाँ से ले आवो और फिर मनमाना जितना चाहे लोहा से सोना बना लो । वह पुरुष पहुंचा उस पर्वत पर और दो चार गाड़ी पत्थर समुद्र के किनारे लाकर इकट्ठा किया । समुद्र के किनारे ही एक लोहे का मोटा डंडा गाड़ दिया । अब उसने एक पत्थर उठाया । लोहे के डंडे में मारा, देखा कि लोहा स्वर्ण नहीं बना तो उस पत्थर को समुद्र को फेंक दिया । यों ही क्रम-क्रम से वह एक-एक पत्थर उठाये, लोहे के डंडे पर मारकर देखे और उसे समुद्र में फेंक दे । अब पत्थर तो बहुत से थे, सो उसकी एक धुनसी बन गयी, पत्थर उठाये, मारे और फेंक दे । अब वह काम इतना जल्दी-जल्दी होने लगा कि बस उठाये, मारे और फेंके । इसी बीच उन सारे पत्थरों में जो एक पारस पत्थर था वह भी उठाया, मारा और फेंका । अब वह बाद में देखता है कि लोहा तो स्वर्ण बन गया, पर वह पारसपत्थर समुद्र में फैंक देने से वह बड़ा पछतावा करता है । हाय ! बड़ा श्रम करने पर पारसपत्थर हाथ में भी आया पर उसे व्यर्थ ही समुद्र में फेंक दिया । इसी तरह से हम आप परपदार्थों की ओर तो बड़ा आकर्षण लगाये हुए हैं और इसी धुन में इस अमूल्य नरजीवन को व्यर्थ ही खोये जा रहे हैं । आखिर इसके फल में पछतावा ही हाथ लगेगा । तो प्रभु के दर्शनगुण प्रकट हुआ है ।

वेदनीय आदि अघातिया कर्मों के नाश से अव्यावाधादि गुणों की व्यक्ति―वेदनीय कर्म उनके नहीं है, अत: अव्यावाध गुण उनमें प्रकट हुआ है । उनको किसी तरह की बाधा नहीं है। जैसे सुख दुःख की बाधायें हम आपमें हैं वैसी बाधायें उनमें नहीं हैं । आजकल तो आप सबके घर में प्राय: सुख साधन मौजूद हैं, लेकिन कल्पनायें करके जो दुःख बनाये जा रहे हैं उनकी तो कोई सीमा नहीं है । जैसे कोई बालक आज्ञा नहीं मानता तो लो आप दुःखी हो गए । अरे उस बालक ने आपको डंडा मारा क्या, या आप से कुछ छीन लिया क्या, जो आप उसके पीछे दुःखी हो गए? दुःख तो आप लोग व्यर्थ के बना लेते हैं । नहीं तो आप सबके घर पेट भरने के लिए अन्न, तन ढाकने के लिए वस्त्र वगैरा हैं ही । तो सुख साधन हैं आप सबके पास, फिर भी तृष्णा होने के कारण बराबर दुःखों का अनुभव किया जा रहा है । और इन बाह्यपदार्थों की धुन में ही धर्मपालन का यह शुभ अवसर व्यर्थ ही खोया जा रहा है । आत्मदर्शन, ज्ञानानुभव आदिक काम जो आज तक हम आप कभी नहीं कर पाये उनके करने के लिए यह मनुष्यभव हम आपको मिला हुआ है, ऐसा समझना चाहिए । तो इन करने योग्य कार्यों को तो हम करें नहीं और विकल्प- जालों में पड़े रहें । परिजन, मित्रजन, इज्जत, लोक, देश, राष्ट्र आदिक के पीछे ही यदि विकल्प मचाते रहे तो समझो कि बड़ी मुश्किल से तिरने के लिए पाया हुआ यह मानवजीवन व्यर्थ ही खोया जा रहा है । यहाँ के ये इंद्रियजंय सुख भी एक दृष्टि से देखो तो दुःखरूप हैं । ये सब कर्माधीन हैं । उदय अनुकूल हुआ तो सुख मिला, मिल भी जाये सुख तो वह थोड़े समय में ही खतम हो जाता है । धनिक लोग इसी बात से तो हार गए । यदि वे इस धन को अपने साथ ले जा सकते होते तो उसमें भी वे कसर न रखते, पर इस पर वश नहीं चलता । उसे भी छोड़कर जाना पड़ता है, तो ये इंद्रियजंय सुख होते हैं और शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । जैसे किसी ने किसी को कोई अपनी कीमती चीज धरने को दिया तो वह उस चीज को भाररूप मानता है, क्योंकि वह जानता है कि यह चीज मेरे पास रहनी तो है नहीं इसी तरह ज्ञानी पुरुष इन सुखों को भाररूप मानता है, क्योंकि ये सुख विनाशीक हैं और फिर जितनी देर को ये सुख होते हैं उतनी देर को सुख ही सुख रहे, ऐसा किसी के होता नहीं, उस बीच भी अनेक बार दुःख ही दुःख की बातें आती रहती हैं । खूब एक सूक्ष्म निगरानी करके देख लो―पुत्र का विवाह हो रहा है तो वहाँ उस बाप को कहाँ आराम है? इधर जाना, उधर जाना, यह करना, वह करना कोई रिश्तेदार रूठ गया उसे मानना आदि, यों उस बाप को उस विवाह के प्रसंग में कहाँ सुख मिल पाता है? वह तो उस प्रसंग में बीच-बीच में बड़ा आकुलित होता रहता है । यों ही भोजन के सुख की बात है । भोजन करते हुए में उस भोजन करने वाले को कहाँ चैन है? अभी एक कौर मुख में चाबे हुए हैं, उसे निगल भी नहीं पाये कि दूसरा कौर और तोड़ने की पड़ती है । वह दूसरा कौर मुख में धर लिया, उसे चाब कर निगलना तो दूर रहा, तीसरा कौर फिर तोड़कर मुख में धर लेते हैं । तो उस भोजन करने के प्रसंग में भी उसे कितना क्षोभ करना पड़ता है? अत: उसे उस प्रसंग में भी सुख कहाँ है? तो वस्तुत: समस्त इंद्रियसुख दुःखरूप हैं और साथ ही ये पाप के भी कारण हैं । ऐसे सुख की क्या चाह करना? ये समस्त इंद्रिय सुख दुःख भगवान के दूर हो गए, सो उनके अनंत आनंद प्रकट हुआ । अब देखिये―एक माहि एक राजे एक माहि अनेकनो । सिद्धप्रभु के आयुकर्म नहीं रहा, सो उनमें अवगाहन गुण प्रकट हो गया । सूक्ष्मत्व गुण प्रकट हो गया, नामकर्म न रहा, गोत्रकर्म नहीं रहा, ऊँच-नीच का कोई व्यवहार न रहा । पूर्ण शुद्ध एक रूप है । अपने स्वरूप के भोगने में, अपने स्वरूप के अनुभवने में उन्हें कोई बाधा ही नहीं हो रही । यों अष्टकर्मों से रहित होने के कारण अष्टगुणों से युक्त सिद्ध भगवंतों को मैं नमस्कार करता हूँ ।

आत्मा की निकृष्ट अवस्था निगोद―समस्त आत्माओं में सर्वोत्कृष्ट आत्मा सिद्ध भगवान हैं, जो औपचारिक मल से भी दूर हैं । यहाँ आत्मा की सर्वोत्कृष्ट अवस्था की चर्चा चल रही है । जीव की सबसे निकृष्ट अवस्था है निगोद और सबसे उत्कृष्ट अवस्था है सिद्ध । जितने भी सिद्ध कहलाये हैं वे सब भी पहिले निगोद अवस्था में थे । निगोद में एक बार नाड़ी चलने में जितना समय लगता है उतने में 18 बार जन्ममरण निगोद जीव का होता है, जिसका हिसाब सेकेंड में 23 बार जन्म-मरण होना है । केवल एक स्पर्शनइंद्रिय है । यै निगोद कुछ तो होते हैं हरी आदि के आश्रित और कुछ होते हैं अनाश्रित आलू, गाजर, मूली आदिक वनस्पतियों में निगोद जीव अनंत रहते हैं । और यहाँ सर्वत्र जहाँ भी यह लोकाकाश है सब जगह सूक्ष्म जीव रहते हैं । निगोद से निकलना बहुत कठिन बात है, क्योंकि वहाँ पुरुषार्थ की प्रधानता नहीं है, कोई चिंतन नहीं । ज्ञान केवल एक स्पर्शनइंद्रिय का है, सो पृथ्वी जल आदिक एकेंद्रिय से भी कम है । कुछ उनकी पात्रता की सीमा में कोई भाव बनता है तब निगोद से निकलकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और प्रत्येक वनस्पति में आ सकते हैं । निगोदिया जीव निगोद से निकलकर पंचेंद्रिय भी हो सकते, मनुष्य भी हो सकते, पर ऐसा बिरले जीव के ही होता है । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और प्रत्येक वनस्पति―ये 5 प्रकार के स्थावर निगोद जाति के स्थावर से कुछ विशेष तरक्की पर हैं ।

उत्तरोत्तर आत्मविकास होते-होते अंतिम विकास दशा में सिद्ध परमेष्ठित्व―फिर पृथ्वी जल अग्नि वायु प्रत्येक वनस्पति से निकलकर दोइंद्रिय होना बहुत कठिन बात है । इसमें रसनाइंद्रिय और हो गयी । स्पर्शनइंद्रिय और रसनाइंद्रिय―इन दो इंद्रियों के द्वारा उनका ज्ञान अब चलने लगा, अंगोपांग भी प्रकट होने लगे । दोइंद्रिय से तीनइंद्रिय होना कठिन है । वहाँ एक इंद्रिय और बढ़ी । घ्राणइंद्रिय का भी ज्ञान होने लगा और उनके अब पैर निकल आये, पर पैर बहुत निकले । तीनइंद्रिय के चार पैर से अधिक तो होते ही हैं―चाहे 6 पैर हों, चाहे 8, 10, 20 आदि कितने ही हों । तीनइंद्रिय से निकलकर चारइंद्रिय होना कठिन है । इसमें उड़ने वाले जानवर मक्खी, मच्छर, टिड्डी आते हैं । प्राय: दो पैर से अधिक वाले ये जीव हैं । वहाँ से निकलकर पंचेंद्रिय होना कठिन है । पंचेंद्रिय में पशु हुए, पक्षी हुए, नारकी हुए, कुमानुष हुए, खोटे देव हुए, तो उनमें कुछ धर्म साधन की बात का प्रसंग नहीं होता । संज्ञी होने के नाते सम्यक्त्व तो उत्पन्न कर लेंगे, पर बिरले ही जीव । अब उन सब पंचेंद्रियों में से मनुष्य हुए । देश, जाति, कुल आदिक ठीक मिले, बुद्धि अच्छी मिली, जैनशासन का समागम मिला जहाँ कि पवित्र धर्मपालन की एक परंपरा चली आ रही है । इस जैनशासन की महिमा का तो कोई वर्णन ही नहीं कर सकता । इस जैनशासन का शरण लेने से हम आपका उद्धार हो सकता है । जिसमें वास्तविक ढंग से वस्तु का स्वरूप बताया है । जैन शासन में धर्म के संबंध में यह बताया है किं जिस वस्तु का जो स्वभाव है वह उसका धर्म है । कितनी निष्पक्षता की बात है? आत्मा का जो स्वभाव है वह आत्मा का धर्म है और जहां आत्मा का स्वभाव पूर्ण शुद्ध प्रकट हो गया है वह है भगवान । कितना निर्दोष निष्पक्ष वर्णन है? स्वरूप की प्रधानता है, नाम का कोई पक्ष नहीं । भले ही कोई नामधारी भगवान बना हो तो अब बिचार से नाम ले लेकर उनकी उपासना करे, लेकिन भगवान के स्वरूप का जब चिंतन करें तो वहाँ नाम की प्रतिष्ठा नही है । जो शुद्ध हुए वे भगवान हैं और जो शुद्ध होने के प्रयास में लगे हुए हैं वे हमारे गुरु हैं । इसमें सब आत्मा के नाते से ही वर्णन है । विकास होते-होते जहाँ आत्मा का पूर्णविकास हो जाता है वहीं सिद्धता है ।

परनिवृत्त होकर स्वरत होने के पौरुष में ही प्राप्त सुयोग की सफलता―संसार में जन्म मरण करते हुए हम आप आज मनुष्य पर्याय में आये है । यहाँ से भी मरण करना होगा और किस-किस जगह जन्म होता है वह संसार के जीवों को देख करके परख कर सकते हैं । तो इस असार संसार में हम आप अकेले ही हैं । यहाँ माता, पिता, स्त्री, पुत्र, मित्रादिक किसका विश्वास करें? भले हैं सब और सीमा में विश्वास करने योग्य हैं, लेकिन वे क्या हमें इस जन्ममरण के दुःख से बचाने में कुछ अपना योगदान दे सकेंगे? सब कुछ अपने को अकेले ही करना है । जिस किसी भी प्रकार अपने आपके सहजस्वरूप पर दृष्टि पहुंचे तो यह समझ ले कि अब हमने अपने जीवन को सफल किया और एक अपने आपके सहजस्वरूप का ज्ञान न हो सका तो चाहे कितनी ही लौकिक शिक्षायें व लौकिक पद प्राप्त कर लें पर वे सब व्यर्थ हैं । उन स्थितियों में भी सुख नहीं और फिर उन सुखों का किया क्या जाय? अपने आत्मस्वभाव की दृष्टि जिस प्रकार बने, सो कर लें । यह बात केवल बूढ़े लोग ही कर सकें अथवा जवान ही कर सके, ऐसी बात नहीं है । यह बात एक आठ वर्ष के बच्चे से लेकर सभी लोग कर सकते हैं । सबको अधिकार है कि अपने आपके आत्मस्वरूप का वे ज्ञान कर सकें, उसका अनुभव कर सकें । यह बात करने की है, और बातें जौ करने को पड़ी हुई हैं उन्हें पड़ी रहने दो या प्रयोजनवश उन्हें निपटा लो । वे किये जाने योग्य कार्य नहीं हैं । जैसे पुरुषों का लेन-देन व्यापार आदि का कार्य व महिलाओं का खाना बनाने व बर्तन मलने आदि का कार्य । अरे ये सब तो बाहरी बातें हैं, ये कोई सारभूत कार्य नहीं हैं । अपने करने का मुख्य काम है अपने आपके स्वरूप का अनुभवन करना, सम्यक्त्व की प्राप्ति, सम्यग्ज्ञान का लाभ―यही एक मात्र कर्तव्य हे, इसी में ही विवेक है, इसी में ही अपने आपकी चतुराई है । अरे यहाँ के समस्त प्राप्त समागम किसी दिन छूट जाने हैं । यदि आपको ये लौकिक सुख साधन कम प्राप्त होते हैं तो कोई बात नहीं, इसमें घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं, बाहर में जहाँ जो कुछ भी परिणमन हो रहा हो, होने दो । बाह्यपदार्थ कभी मेरे हो नहीं सकते, वे मेरे से अत्यंत पृथक् हैं ।

निर्लेपवृत्ति में निर्लेपता का अभ्युदय―पर से विविक्तता की दृष्टि जिन जीवों ने प्राप्त की और फिर इस ही आत्मस्वरूप में लीन हुए, उसकी ही जिनकी धुन बनी, वे ही पुरुष अपने को अकिंचन अनुभव करते हैं । सर्वपरिग्रहों से वे हटकर निर्ग्रंथ अवस्था को धारण करते हैं । निर्ग्रंथ अवस्था के मायने हैं कि जहां अब कोई काम नहीं, कोई झंझट नहीं, कोई विकल्प नहीं । केवल एक आत्मस्वरूप का ध्यान करना, आत्मस्वरूप को निरखकर उसके निकट रहकर तृप्त बने रहना, यह ही मात्र उनका काम है, ऐसी स्थिति जिनकी होती है उनका बाह्य में स्वरूप निर्ग्रंथ दिगंबर का होता है । लेकिन भीतर में अनित्व होता है, यह आत्मा को लाभ देगा । हुए वे जीव निर्ग्रंथ मुनि और बराबर अप्रमत्त अवस्था का, निराकुल निर्विकल्प स्थिति का स्वाद लेते जाते है, और इस स्वाद लेने की वजह से जब कभी उनकी निर्विकल्प भाव में स्थिति देर तक ठहरती है तो उनमें एक अपूर्व विशुद्धि प्राप्त होती है । 8वें 9वें 10वें गुणस्थान में पहुंचकर वहाँ सर्व कषायों का अंत में विनाश कर 12वें गुणस्थान में क्षीणमोह हो जाता है । अब कषायें रंचमात्र भी नही हैं ईर्यापथ आस्रव है, साता वेदनीयकर्म आते हैं और चले जाते है, वे भी बंध को प्राप्त नहीं होते । तब उस निर्विकल्प परमसमाधि दशा में ऐसा अंतर्बल बढ़ता है कि चार घातियाकर्म अंत में नष्ट होते हं और वे अयोगकेवली गुणस्थान पाकर सर्वज्ञ हो गए, अरहंत हो गए । पुन: 4 अघातियाकर्म नष्ट होने से वे सिद्ध भगवान होते हैं ।

अंतस्तत्त्व की चर्चा व महिमा―उक्त विवरण से यह निश्चय करना कि यों निकृष्ट निगोद अवस्था से निकलकर सर्वोत्कृष्ट सिद्ध अवस्था में यह जीव पहुंचता है । यह चर्चा सिद्ध की, की जा रही है, ऐसा ही मात्र न समझें, यह अपनी चर्चा है, अपने स्वरूप की चर्चा है । एक हिम्मत बना कर जो निज को निज व पर को पर जान ले, ज्ञानमात्र अमूर्त निर्लेप अपने स्वरूप को पहिचान ले तो फिर वहाँ रागद्वेष मोहादिक का क्या काम? यों अकिन्चन ज्ञानमात्र अपने आपकी प्रतीत कर ले । मैं और कुछ नहीं हूं―यदि यह बात सही हो तो ऐसी दृढ़ प्रतीति कर लो, निर्णय कर लो कि यह बात सही है कि नहीं । मुझ आत्मा का है क्या कोई यहाँ? ये नाते रिश्ते इस आत्मा के कुछ हैं क्या? अरे इस मुझ आत्मा को पहिचानने वाला भी कोई नहीं है । यदि यह खुद भला है तो रिश्तेदार भी भले हैं और यदि खुद ही भला न रह सका, खुदे दोषवान हुआ, उद्दंड प्रकृति का हुआ तो वे सारे नाते रिश्तेदार भी उससे किनारा कर जायेंगे । तो यहाँ भी जो कुछ दूसरे लोग संबंध रखते हैं, कुछ हमारी सुख शांति के भाव रखते हैं, सो हम ही जब खुद अच्छे रह सकेंगे तो दूसरे भी पूछेंगे और अगर खुद अच्छे न रह सके तो दूसरा कोई पूछने वाला नहीं है । सब कुछ अपने आपके ही बल पर निर्भर है अपना भविष्य । सिद्ध भगवंत में और बात ही क्या हुई? जो निजी सहज खुद को बात है बस वही रह गयी, इसी के मायने शुद्ध दशा है । अपने आत्मा की प्राप्ति हुई । जो परतत्त्व हैं, परद्रव्य हैं उनका संबंध दूर हो गया, केवल रह गये । कहीं वे भगवान कोई अभावरूप नहीं हो गए । कुछ न रहे―उसका नाम भगवान है, ऐसी बात नहीं है, किंतु पूर्ण अंतस्तत्त्व का जो विकास है उसके मायने भगवान हैं ।

सिद्ध भगवंत की लोकशिखरस्थता―अब ये सिद्धप्रभु लोक के अंत में अपने जिस देह से मुक्त हुए उस देह प्रमाण वहाँ विराजे हैं । जीव जब कर्मों से मुक्त हो जाता है, शरीर से भी छूट जाता है तब ऊर्ध्वगमन स्वभाव के कारण ऊपर ही जाता है । इस जीव ने, इस साधु ने अनेक बार लोक के अंत में विराजमान सिद्धभगवान का ध्यान किया । वहाँ इसका उपयोग बहुत बहुत बसा तो मानो अब कर्म नष्ट होने पर इस ही पूर्व प्रयोग सौ यह आत्मा लोक के अंत में पहुंचता है अथवा जब तक इस पर परिग्रह था, जैसे कि तूमी में कीचड़ भर दिया जाय और पानी में डाल दी जाय तो कीचड़ के भार से वह तूमी पानी में नीचे बैठ जाती है, पर तूमी का कीचड़ ज्यों-ज्यों घुलता जाता है त्यों-त्यों तूमी ऊपर उठती जाती है, और कीचड़ पूर्ण धुल जानें पर वह पानी के ऊपर आ जाती है । इसी प्रकार कर्मों का कीचड़ इस जीव के साथ लगा हुआ है, सो यह जीव नीचे बस रहा है, पर जब इसके कर्म कलंक पूर्णरूपेण धुल आते हैं तो यह जीव स्वभावत: ऊर्द्धगमन करता है । और ऊर्द्धगमन के स्वभाव से चलकर लोक के अंत में विराजमान होता है । इस भगवान को नमस्कार करने की जो लोगों की पद्धति है वह भी यह साबित करती है कि प्रभु सिद्ध भगवान लोक के अंत में विराजमान हैं । जब कोई प्रभु से प्रार्थना करता है तो जमीन में नीचे दृष्टि गड़ाकर थोड़े ही करता है । वह तो अपनी दृष्टि ऊपर उठाकर हाथ जोड़कर प्रभु का स्मरण करता है । हे प्रभो ! तुम ही शरण हो । तो लोगों की प्रभुस्मरण की यह पद्धति भी यह बतलाती है कि प्रभु, उत्कृष्ट आत्मा लोक के अंत में विराजमान हैं ।

सिद्धभगवंतों की चरमदेहाकारता―ये प्रभु सिद्धभगवंत होने पर इस देह के आकार ही क्यों रह जाते हैं? इस संबंध में कुछ लोग यह सोच- सकते हैं कि देह के कारण आत्मा फैला था, यह देह न रहा तो आत्मा बटबीज की तरह बहुत छोटा हो जाता होगा । जैसे दीवाल न रहे तो दीपक का प्रकाश फैलने की ओर ही अग्रसर रहता है, यों ही यह आत्मा इस देह दीवाल के न रहने पर फैलने की ओर ही अग्रसर रहता है । यों यह आत्मा एकदम सर्वव्यापक हो जाता होगा, । तो, यह समझिये कि अब तक जो आत्मा देह में रहता है, देह प्रमाण रहता है उसका कारण क्या है? कर्मोदय । जब तक कर्म साथ हैं तब तक देहप्रमाणता बनी है, और जब कर्म न रहे तब बतलावो यह बढ़े कैसे और घटे कैसे? फिर तो जिस देह से मुक्ति होती उस देह प्रमाण ही वह आत्मा रहेगा । ऐसो पावन उत्कृष्ट वंदनीय अवस्था उनकी उनके उपादान से सिद्ध है । यहाँ वहाँ की चीज लाकर लपेटकर वह सिद्ध अवस्था नहीं बनती है, किंतु जिन आत्माओं ने अपने आपके स्वभाव पर दृष्टि दी, शुद्ध उपादेय का आलंबन लिया, सहजस्वरूप का आश्रय किया उनके इस पावन उपयोग के प्रताप से सिद्ध दशा प्राप्त हुई ।

परविविक्तता में परमानंदमयता―कुछ लोग उद्दंडतावश या शंका वश यह तर्क करने लगते हैं कि जब देह भी छूट गया, कर्म भी छूट गए, सब कुछ छूट गया तो वे सुखी कैसे होते होंगे? यहाँ तो हमारे लड़के बच्चे है, स्त्री है, सुख के अनेक साधन हैं, हम तो यहाँ सुखी हैं । लेकिन यह देखिये कि आत्मा का स्वरूप ज्ञान और आनंद है । यह दृश्य समागम तो यहाँ आपका अभी भी छूटा हुआ है । दूसरों से मोह किया उनके पीछे रुले मरे । खुद का क्या किया सो सुध भी भूले । कितना बड़ा अंधकार हे जिससे यह जीव सुख मानता है । बच्चे लोग कुछ पैसे या कोई वस्तु पाने के लिए अपने माँ बाप से रूठ जाते हैं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि इस तरह से रूठ कर हम कोई चीज उनसे नहीं पा सकते । जैसे वे बच्चे अपने माँ बाप की आज्ञा में थोड़ा चलने लगें, थोड़ा विनय का व्यवहार करने लगे तो वे माँ बाप तो उनके पीछे मर मिटेंगे, बड़े सुखी रखने को बात सोचेंगे, उन बच्चों की सेवा करने के लिए सदा कमर कसे रहेंगे ।

लोग रागद्वेष मोहादि के वश होकर अपने आपके जीवन को बरबाद करते हैं और दूसरे को आराम मिले, ऐसा भाव बनाकर अपने को सुखी मानते हैं, लेकिन ये सब झंझट हैं । इन समस्त झंझटों का मूल कारण हैं शरीर से संबंध । जब सर्वज्ञ हो गए, केवल आत्मा रह गया तो अनंतकाल के लिए समस्त दुःख मिट गए । कहाँ वेदना, कहाँ भूख, कहाँ राग, कहाँ वियोग, कहाँ संयोग? वह तो विशुद्ध आत्मा है । परिपूर्ण ज्ञानानंद का स्वामी है । एक स्वाधीन आनंद है, यही दशा प्रकट करना है और कोई काम करने को नही पड़ा है । जैसे लोग सोचते हैं कि अब यह करना है, अब वह करना है ऐसे ही महिलायें भी सोचती हैं कि अब मुझे यह करना है, वह करना है, तो भाई ये कोई काम किये जाने योग्य नहीं है । काम तो एक यही किये जाने योग्य है कि अपने आपको पहिचान ले कि यह मैं सबसे निराला केवल ज्ञानमात्र हूँ । यदि यह काम न कर सके तो कुछ न बनेगा ।

निज ज्ञानांदस्वरूप की सम्हाल बिना जीवन की व्यर्थता―एक गाँव में हफ्ते में एक दिन हाट लगती थी । तो एक बूढ़ा आदमी सब्जी खरीदने उस हाट में जाने लगा तो पड़ौस की कई स्त्रियां आयीं और बोली―बब्बा जी ! हमारे लिए भी सब्जी खरीद लाना । यों 10-20 बहूओं ने पैसे दे दिये और सब्जी लाने को कहा । जब वह बूढ़ा आदमी हाट पहुंचा तो पहिले अपने पड़ौस की बहूओं के लिए सब्जी खरीद ली और बाद में जो रही सही सब्जी बच रही उसे अपने लिए खरीद लिया । जब सबकी सब्जी खरीदकर वह घर आया तो सबकी सब्जी सबके घर भिजवा दिया और अपनी सब्जी अपने घर रख लिया । अपने घर की रही सही सब्जी देखकर उस बुड्ढे की बहू ने बुड्ढे को भला बुरा कहा । तो वह बुड्ढा बोला―देखो मैंने बड़ा उपकार किया । पहिले अच्छी-अच्छी सब्जी पड़ौस की सब बहूओं के लिए खरीद लिया, बाद में जो रही सही बची हुई सब्जी थी उसे मैंने अपने लिए खरीद लिया । तो बहू बोली―पहिले अपने लिए तुम्हें अच्छी-अच्छी सब्जी खरीद लेनी थी, बाद में पड़ौस की बहुवों के लिए खरीदते । तो यों ही समझिये कि सबके काम तो खूब आये, पर अपने काम कुछ न आये । यदि अपना ज्ञान न बना सके तो क्या किया? तो आत्मा के स्वभाव को निरखें, उसका आलंबन, उसका आश्रय लें तो समझिये कि हम अपने लिए भी कुछ कर रहे हैं, अन्यथा बेकार जीवन है ।

सिद्धप्रभु की निष्ठितकार्यता―जीवों में सबसे उत्कृष्ट जीव सिद्धभगवान हैं, क्योंकि वे निष्ठित कार्य हैं अर्थात् जो करने योग्य काम है वह पूर्णतया वे कर चुके हैं । संसार में करने योग्य काम क्या है? सब कामों में दृष्टि देकर उत्तर दो । दूकान के, घर के, व्यापार के, राग द्वेष मोहादिक के, इन सबमें कौनसा ऐसा काम है जो जीव का भला कर सकने वाला हो? शरीर के नाते से, शरीर के संबंध से तो जो भी कार्य हैं वे सब जीव के अकल्याण के कारण हैं । करने योग्य काम तो केवल यह है कि देह देवालय में विराजमान जो यह मैं ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ सो इसका सही स्वरूप जानूं और वैसा ही स्वरूप जानते रहने में लगा रहूं । सिवाय इसके और कोई काम लोक में श्रेष्ठ नहीं है । कभी धन बढ़ गया तो क्या, घट गया तो क्या? वह तो मेरा स्वरूप नहीं, उससे तो मेरा संबंध ही नहीं । मुझे ये दुःख सुख धन घटने-बढ़ने से नहीं होता । उपयोग के बदलने में, उपयोग के उस प्रकार बनाने में सुख-दुःख होते हें । बाहर में कुछ भी बात बीतती रहे, उससे जीव को कष्ट की कोई बात ही नहीं है । यह जीव अज्ञान में आता है और कष्ट मानता है । एक इस शरीर को मानकर कि यह मैं हूँ, चिंतायें बसा ली जाती हैं । लोक में मेरी इज्जत बढ़े; ऊँचे-ऊँचें पदों पर पहुंचें, लोग मुझे बड़ा समझे, ये सब कल्पनायें आत्मा को निरखकर तो नहीं होती, शरीर को ही आत्मा मानकर होती हैं । कोई पुरुष यदि सहज ज्ञानस्वरूप अपने आपको मानता हो कि यह मैं हूँ, उसकी यह भावना न बनेगी कि मैं इस दुनिया में बड़ा कहलाऊँ, जो शरीर को मानता हो कि यह मैं जीव हूँ उसमें ही यह भावना बनेगी कि मैं लोक में अच्छा कहलाऊँ । मनुष्यों में मानकषाय की ही तो प्रबलता बतायी गयी है । लोभ इतना प्रबल नहीं है जितना कि मनुष्यों में मान प्रबल है । मान के ही कारण लोग धन जोड़ना चाहते, क्योंकि धन से ही लोक में बड़प्पन आजकल मिलता है । मान के ही कारण लोग सारे ठाट-बाट बनाते हैं । और की तो बात जाने दो । मान के ही कारण अनेक लोग मंदिर में आते, धर्मसाधना करते लोगों में बैठें ताकि लोग समझे तो सही कि यह भी धर्मात्मा हैं, यह भी ज्ञानी हैं । मान के ही कारण सब कुछ छोड़कर तपस्वी भी बन जाते । और यहाँ तक कि लोग अपने प्राण भी त्याग देते हैं, पर मूल में यही बात रहती है कि मेरा मान हो । यह बात किसके रहती है? जो अज्ञानी जीव है, जिसने देह और जीव को एक मान रखा है, किंतु जिसने आकाशवत् निर्लेप अमूर्त ज्ञानमात्र अपने आपको सही समझ लिया उसके ये सांसारिक भावनायें उत्पन्न नहीं हो सकतीं । गृहस्थी में जब तक हैं तब तक कुछ जरूरत भी है यश की, धन की, इतने पर भी प्रतीति में यही बात रहती है ज्ञानी के कि ये सब बेकार बातें हैं । करने योग्य कार्य तो अपने आत्मा के स्वरूप का ज्ञान करना और उसमें ही तृप्त रहना है । सिद्ध भगवान ने यही कार्य कर लिया है, अतएव वे सर्वोत्कृष्ट आत्मा है।

सिद्धधाम―ये सिद्ध भगवान विराजे कहां हैं? वे विराजे हैं लोक के अंत में । जिसके नीचे 8 वीं पृथ्वी है, सिद्धशिला एक कायम है और ऐसी पृथ्वियां नीचे 7 हैं और ऊपर है वह एक सिद्धशिला । इस पृथ्वी से अतिरिक्त पृथ्वी नहीं है । स्वर्गो में जो विमान हैं वह पृथ्वी नहीं हैं । चंद्र सूर्य तारे ये पृथ्वी नहीं हैं । पृथ्वियां 8 ही हैं । 7 तो नीचे हैं और एक सिद्धशिला है, जिसके बहुत ऊपर सिद्ध भगवान विराजे हैं । सिद्धशिला पर सिद्ध नहीं बैठे, उससे तो बहुत ऊपर हैं । लेकिन सिद्धशिला और सिद्ध भगवान इनके बीच में न देव की रचना है न अन्य कुछ रचना है, इस कारण उसे सिद्धशिला कहते हैं ।

सिद्धयता―जितने भी सिद्ध होते हैं वे तीर्थंकर ही होते हैं, ऐसा नहीं है । तीर्थंकर भी सिद्ध होते और अन्य पदवीधारी बलभद्र चक्रवर्ती आदिक भी मुक्त होते और जो पदवीधर नहीं हैं ऐसे भी अनंत मुनि मुक्त हुए हैं । चित्त जिनका स्वच्छ है, उपयोग जिनका सही है, जो तृप्ति और संतोष सच्चा पा सके, ऐसा ज्ञान उन्ही के है जिनके चित्त में सिद्ध भगवंत की उत्कृष्टता बसी हुई है । एक यह ध्येय बनाना चाहिए इस ओर दृष्टि रहनी चाहिए कि भगवान सिद्ध ही एक सर्वोत्कृष्ट जीव हैं और वे हुए कहां से? यह ही आत्मा जब सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रत्नत्रय की आराधना करता है तब कर्ममल दूर होते हैं, देहरहित होते हैं, सिद्ध भगवंत हो जाते हैं । अपने आपके संबंध में भी ऐसा ही सोचे, मैं हूँ ना ज्ञानमात्र । तो जैसा मैं हूँ तैसा अपने को जानें तो क्या जान न सकेंगे? पर की ओर दृष्टि रखकर पर को जानते हैं तो अपने आपकी ओर अभिमुख होकर क्या अपने आपको नहीं जान सकते? जान सकते । और जहां अपने आपको समझा कि उसकी सारी आकुलतायें दूर हो जाती हैं । दुनिया में आकुलतायें किन्हें कहते हैं? परपदार्थों में संयोग वियोग का कल्पित अनुकूल प्रतिकूल परिणमनों का परिणमन हो तो उसे निरखकर यह जीव अपने आप में कष्ट मानता है । क्यों कष्ट मानता? कष्ट की तो बात जरा भी नहीं है । अपने आपको निरखें, सबसे निराला देह से भी निराला ज्ञानमात्र यह मैं आत्मा हूँ और ऐसा ही अपने उपयोग में बनाये रहें केवल ज्ञानस्वरूप, बस संकट कटे, आनंद मिला, कर्म दूर हुए ।

अज्ञानियों की कुबुद्धि का परिणाम―अहो अज्ञानी जीव तो बाहरी बातों में अपने को कृतार्थ समझते हैं । दुनियावी कोई ऊंचा पद पा लिया, धन वैभव बढ़ा लिया तो उससे अपने को कृतार्थ समझ लेते, किंतु ये सब स्वप्न की तरह व्यर्थ की बातें हैं । जैसे स्वप्न आता है दो चार मिनट को तो वहाँ जो दिखता है वह बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है, लेकिन निद्रा भंग होना पर विदित होता है कि है कुछ नहीं, इसी प्रकार मोह की नींद में जो कुछ मिला, जो दिखता वह सब भी सत्य प्रतीत होता है, लेकिन सत्य नहीं है झूठ है, यह कब जाना जायगा? जब नींद खुल जाय अर्थात् मोहनिद्रा भंग हो जाय । जब तक मोह की नींद का स्वप्न चल रहा है तब तक यह सब सत्य विदित होता है । जैसे―तीर्थयात्रा कर रहे हों, जंगल में जा रहे हों, किसी उपद्रव में घिर गए हो या हीरा रत्न जवाहरात मिल गये हों स्वप्न में तो वह स्वप्न देखने वाला झूठ तो नहीं मानता, लेकिन जब नींद खुल जाती है तब पता पड़ता है कि ओह ! यहाँ तो कुछ भी नहीं है । इसी प्रकार मोह की नींद में जो ये 10-20-50 वर्ष के जीवन के स्वप्न देखे जा रहे हैं, जैसे―धन वैभव से अपना बड़प्पन समझना, लोगों में सम्मान अपमान का बड़ा ध्यान रखना, परिजनों को अपना समझना आदि, पर ये सब मेरे कुछ नहीं हैं, बिल्कुल व्यर्थ की बातें हैं । यह बात तब विदित होती है जब कि मोहनींद टूटती है, सम्यग्ज्ञान जगता है, वस्तु के यथार्थस्वरूप की समझ आती है । यह जीव जिस भव में पहुंचता वहीं रागद्वेष मोह आदि करता हें । नया-नया विषय, नये-नये ढंग, पर वही आदत पुरानी की पुरानी । जैसे अनादिकाल से रागद्वेष मोहादि करते आये, काम तो वही करते लेकिन विषय बदलते जाते हैं । कभी सूकर, कुत्ता, बिल्ली, गधा आदि हुए तो वहाँ उस ढंग का राग किया, कीड़ा मकोड़ा, चूहा चुहिया आदि हुए तो वहाँ भी राग किया । क्या ये चूहा चुहिया अथवा कुत्ता बिल्ली आदि अपने बच्चों से प्रेम नहीं करते? जैसे―मनुष्य अपनी बच्चों से प्रीति करते हैं ऐसे ही अन्य जीव भी तो अपने बच्चों से प्रीति करते हैं । तो रागद्वेष मोहादि करने की यह इस जीव की पुरानी आदत है । तो परदृष्टि करके ये जीव उस परदृष्टि के माफिक कार्य करते जाते । परदृष्टि कर रहे हैं और परदृष्टि करते-करते मरण भी हो जायगा । यहाँ का कुछ भी न उठेगा । कोई सोचे कि मैंने अपने हाथों लाखों का धन कमाया, अब मरणसमय में एक धेला भी मेरे साथ चला चले तो यह कभी हो ही नहीं सकता । तो मोहनींद के स्वप्न में अज्ञानी प्राणी सब अपनी बरबादी कर रहे है, मिलता कुछ नहीं ।

निर्मोहता में अतिशयानंदरूपता―जिन आत्माओं ने मोह छोड़ा, आत्मदृष्टि की, आत्मस्वरूप के निकट उपयोग बसाये रहने में आनंद का अनुभव किया, आत्मतत्त्व को जाना, वे ही पुरुष सुखी हैं और झगड़े से परे हैं । सिद्ध भगवंत सभी चाहे तीर्थंकर होकर सिद्ध हुए हों और चाहे सामान्य मुनि रहकर सिद्धे हुए हों, वे सब कृतार्थ हैं । उन सबका सुख अतिशय वाला है, अनंत आनंद हैं । जिनके सुख में अब कहीं कुछ भी बाधा नहीं आ सकती, क्योंकि आत्मा से उठा हुआ उनका आनंद है, उनकी पवित्रता में अब कभी धोखा नही हो सकता, क्योंकि अपने आप में कैवल्य रूप पवित्रता उत्पन्न हुई है । उनका सुख बाधारहित है, उनके सुख का कभी विनाश नहीं होता और वे इंद्रियविषयों से अतीत हैं । जब उनके देह ही नहीं है तो इंद्रियां कहा से बसें? ऐसे सिद्ध भगवान का सुख (आनंद) जो उत्कृष्ट है, अमिट है, ऐसा आनंद हम आप भी पा सकते हैं । लेकिन इस झूठे मायाजाल का, इन कल्पित विषयसुखों का परिहार करना होगा तब हम अपने आपके स्वाधीन आनंद को प्राप्त कर सकते हैं । गृहस्थजन नहीं त्याग पाते तो 24 घंटे में एक आध घन्टे का समय ऐसे ज्ञानी गृहस्थ रखते हैं कि जिस समय में अपना चित्त मुनिवत् बना लेते हैं । मैं अकिंचन हूँ, मेरा कहीं कुछ नहीं है, मैं किसी का उत्तरदायी नहीं हूँ, मैं अपने आप में अकेला ही बसा करता हूँ, आदि सब प्रकार से भला चिंतन करके ज्ञानी गृहस्थ 24 घन्टे में कुछ समय अपने आपको अकिंचन ज्ञानमात्र अनुभव किया करता है । हम आप इस ढाई द्वीप के अंदर मनुष्यभव में उत्पन्न हुए हैं । उत्तम जाति, कुल, देश, समागम आदि प्राप्त हुए हैं । इतने पर भी हम यदि इन समागमों का सदुपयोग नहीं करना चाहते तो इस भूल का दंड कोई दूसरा उठाने आयगा क्या?

मनुष्यलोक के सर्वस्थानों से मुक्ति―इस ढाई द्वीप में प्रत्येक प्रदेश से जीव सिद्ध हुए हैं, अनादिकाल से ये जीव मुक्त होते आ रहे हैं और ढाई द्वीप से ही मुक्त होते हैं तो इस ढाई द्वीप में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है जिस प्रदेश से जीव मुक्त न हुए हो । पृथ्वी से भी मुक्त हुए, जल से भी मुक्त हुए और आकाश से भी मुक्त हुए । जहाँ आज जल है, समुद्र है और कुछ हजार वर्ष बाद वहाँ पृथ्वी निकल आये, ऐसे स्थान को भी बात नहीं कहते । यद्यपि ऐसे भी स्थान हैं कि जहाँ आज पृथ्वी दिखती वहाँ कुछ समय बाद संभव है कि समुद्र हो जाय और जहाँ आज समुद्र है, संभव है कि कुछ समय बाद वहाँ पृथ्वी हो जाय, लेकिन ऐसे स्थानों से भी जीव मुक्त गए । जहाँ सदा जल ही जल रहेगा, वहाँ से कैसे मुक्त हुए? तो सुनो―कोई मुनिराज के विरुद्ध कोई देवता हो, विद्याधर हो और द्वेषवश उस मुनि को उठा ले जाय और वह समुद्र में पटक दे, वहीं से वह मुनि मुक्त हो जाय तो देखो जल की जगह से भी सिद्ध हुए ना? तो जल के स्थान में भी कोई ऐसा प्रदेश नहीं बचा जिस जगह से अनेक सिद्ध हुए हों । आकाश सिद्ध कैसे हुए? तो कोई चारणऋद्धिधारी मुनि आकाश में विहार कर रहे हों, आकाश में ही ठहर गए और वही ध्यान बन गया और वहीं सिद्ध हो गए, ऐसे भी अनंत सिद्ध हैं ।

सिद्धभगवंतों के आत्मक्षेत्र की चरमदेहप्रमाणता―सिद्ध प्रभु सिद्धधाम में उस आकार में है जिस आकार से कि देह से वे मुक्त हुए हैं । जैसे गहना ढालने के लिए जो ढलवा गहना होता है उसे ढालने के लिए एक मोम का मंजूषा बनाया जाता है और उसमें धातु भर दी जाती है, मोम गल जाता है और उस पोल में वह गहना अपना स्वरूप रख लेता है । तो यों ही जब यह देह गल गया, दूर हो गया, बिखर गया, देह से मुक्त हो गया तो जिस आकार में वह आत्मा था बस उसही आकार में रह गया और ऐसे सिद्ध भगवंत कम से कम साढ़े तीन हाथ की अवगाहना वाले और अधिक से अधिक 525 धनुष की अवगाहना वाले होते हैं । चार हाथ का एक धनुष होता है, तो 2109 हाथ की अवगाहना वाले सिद्ध भगवान हैं । ज्ञान की पर्याय 5 होती हैं―मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, अवधि, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान । केवलज्ञान होने पर भगवान कहलाने लगते हैं । इससे पहिले छद्मस्थ अवस्था में चार प्रकार के ज्ञान होते हैं । कोई मुनि केवल दो ज्ञान (मति, श्रुत) के धारी होकर केवलज्ञानी बन गए, कोई मुनि मति, श्रुत, अवधिज्ञान वाले होकर या मति, श्रुत, मन:पर्ययज्ञान वाले होकर या मति, श्रुत, मन:पर्ययज्ञान वाले होकर केवलज्ञानी हुए, कोई चार ज्ञान के धारी होकर केवलज्ञानी हुए । केवलज्ञानी होने पर ये चार ज्ञान रहते नहीं हैं, क्योंकि ये अपेक्षा लिए हुए हैं, अल्प विषय वाले हैं, पर किस-किस प्रकार के ज्ञानी पुरुष मुक्त हुए हैं? यह बात इस प्रकरण में समझ लीजिए । सिद्धभगवान जितने हुए वे या तो खड्गासन से अथवा पद्मासन से मुक्त हुए हैं और वे अब सिद्ध क्षेत्र में जो जिस आसन से मुक्त हुए हैं उनका आकार उस आसनरूप उतने ही प्रकार से सिद्ध होने पर, शरीर से अलग होने पर जो अवस्था थी वही अवस्था रहती है । वे घट जाये, बढ़ जाये, और तरह के फैल जायें, यह बात क्यों नहीं होती कि ये सब बातें कर्म के उदय से होती हैं । कर्म रहे नहीं, जिस स्थिति में वे मुक्त हुए उसी स्थिति में उनका आकार रहता है ।

ज्ञानसिद्धता―अनेक मुनि तो प्रत्येक बुद्ध थे, जिन्होंने कभी किसी पाठशाला में किसी अध्यापक से अध्ययन नहीं किया । सहज स्वयं अपने आप उन्हें बोध हुआ । जैसे तीर्थंकर महाराज सब स्वयंबुद्ध होते हैं, वे किसी पाठशाला में मास्टर से नहीं पढ़ते और न साधु होने पर अध्ययन करते हैं, स्वयं ही उनके ऐसा ज्ञान है और दीक्षित होने के बाद यह ज्ञान सहज ही बढ़ जाता है । यह उनकी एक निर्मलता का फल है । कोई मुनि बोधितबुद्ध हुए हैं । दूसरा समझाये उससे ज्ञान प्राप्त करते हैं । तो प्रत्येक बुद्ध भी मुक्त हुए हैं और बोधितबुद्ध भी मुक्त हुए हैं, ऐसे सिद्ध भगवानों में वर्तमान में तो कुछ अंतर नहीं, किंतु इनकी पूर्व स्थितियों का विचार करने से उपचार से अंतर समझते हैं । अंतर नहीं समझते, किंतु उनकी पूर्व स्थितियों को बोलकर उनकी भक्ति करते हैं । सिद्ध भगवंत होने का अर्थ यह है कि यह आत्मा अपने ही सत्त्व के कारण सहज जिस स्वभाव को लिए हुए है वही केवल प्रकट हो जाय, जो दूसरी चीज औपाधिक भाव साथ लगे हुए हैं वे इसके निकट न रहें, केवल रह जाय, उस ही के मायने हैं सिद्ध होना । वे सिद्धप्रभु अब संसारचक्र के गमक गमन नहीं करते, उनका अब जन्म मरण नहीं होता अथवा विषयकषाय इच्छायें ये विकार अब नहीं उत्पन्न होते, केवल ज्ञानमात्र रहे, उनके साथ देह भी नहीं, विकार नहीं कर्म नहीं, कुछ दूसरी चीज ही नहीं, वे केवल ज्ञानघन हो गए । ज्ञान ही ज्ञान निरंतर बर्तता रहता है । अन्य कोई बात नहीं होती । न देह हें, न गमनागमन है, न विकार है, न कर्म है, कुछ भी अब उनके साथ न रहे, इसलिए वे संसारचक्र के गमनागमन से रहित हो गए । देव, देवेंद्र, नरेंद्र और पशु पक्षियों में भी जो विवेकी हैं वे इनकी आराधना करते हैं ।

सिद्धस्वरूपस्मरण की शरण्यता―देखो, वीतराग प्रभु की आराधना करने में साक्षात् कुछ फल नहीं दिखता कि धन मिल जाय या परमिट मिले या सुविधा मिले । उनके ध्यान के प्रताप से पुण्यरस ऐसा उमड़ता है कि जिसके उदय में स्वयमेव सुखसामग्री प्राप्त होती हैं और प्रभु का स्मरण या प्रभु कोई कृपा करके हमें कोई साधन जुटा दे, सो बात नहीं । अथवा अदया करके नाराज होकर मेरा कुछ बिगाड़ कर दें सो भी बात नहीं । जैसे लोग दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं तो जैसा मुख स्वयं का बनायेंगे वैसा ही मुख उस दर्पण में दिखेगा । जैसे कोई रोता हो तो रोता हुआ, हँसता हो तो हँसता हुआ, और दांत निकालता हो तो दाँत निकालता हुआ, यों जिस प्रकार का अपना मुख बनायेंगे उस प्रकार की उस दर्पण में बात बन रही है । इसको कोई दूसरा बना रहा है क्या? यों ही अपने को जिस परिणाम से ढालते हैं, जैसा उपयोग बनाते हैं उसके अनुसार हमारी सृष्टि चलती है । तो हम अपने स्वभाव को निरखें और उस स्वभावदृष्टि के बल से उपाधि और औपाधिक भावों को दूर करें । जिन्होंने इन सब उपाधियों को, विकार भावों को सदा के लिए नष्ट किया है वे तीन लोक के जीवों के द्वारा पूजित हैं, विशुद्ध हैं, उत्कृष्ट आत्मा हैं, निर्दोष हैं, ऐसे सिद्ध भगवंतों की शरण को मैं प्राप्त होता हूँ । जगत में मेरा और कुछ शरण नहीं है, ज्ञानपुंज स्वरूप को देखें, अपने ज्ञान को उपयोग में लाये, तो एक निर्विकल्पता जगेगी, समाधिमात्र बनेगा, समस्त संकट दूर होंगे, कर्म भी दूर होंगे । तो इस कार्य के लिए सिद्ध भगवंतों का स्मरण शरण है । सो यहाँ ज्ञानी भावना कर रहा है कि मैं ऐसे निर्दोष पवित्र सिद्ध आत्मा की शरण को प्राप्त होता हूँ ।


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