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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचगुरु भक्ति - श्लोक 5

From जैनकोष



संयग्दर्शनदीपप्रकाशकामेयबोधसंभूताः ।

भूरिचरित्रपताकास्ते साधुगुणास्तु मां पांतु ।।5।।

रत्नत्रयमूर्ति साधु परमेष्ठी से अभ्यर्थना―अब सिद्ध परमेष्ठी की भक्ति में कहते हैं कि जो सम्यग्दर्शनरूप दीप के प्रकाशक हैं जिनके दर्शनमात्र से भी निजतत्त्व से प्रभावित होकर मिथ्यात्व का वमन करके सम्यक्त्व का स्वाद लेते हैं अथवा जो सम्यग्दर्शन दीप से अंत: पूर्ण प्रकाशमान हैं, जिनका बहुत बड़ा भारी ज्ञान है, जिनकी बड़ी लंबी चारित्र पताका फहरा रही है ऐसे साधु के गुण हम सबकी रक्षा करें । वास्तव में आत्मा का हित है तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्ररूप परिणाम में है । यह देह भी जिसको हम आप लोग लादे-लादे फिर रहे हैं, कल्पना तो करो कि जैसे अन्य लोग मर गए और उनके शरीर जला दिए गए, राख हो गए, ऐसे ही राख होने योग्य तो यह हम आपका शरीर है । इसको कब तक लादे, कब तक इसे सम्हाले, कब तक शृंगार करें? इस शरीर का तो मोह छोड़ दे अर्थात् ऐसा ज्ञान बना ले कि मैं तो अकिंचन ज्ञानमात्र हूँ, यह देह मैं कतई नहीं हूँ । यद्यपि देह का वर्तमान में ऐसा बंधन है कि देह को छोड़कर मैं कहां जाऊं? मुझको छोड़कर देह कहां जाय? (जब तक आयु का उदय है तब तक की बात कह रहे हैं आगे भी यही बात है संसार में) इतने पर भी जैसे दूध और पानी मिले हुए होने पर भी न्यारे-न्यारे ही हैं इसी प्रकार यह जीव और यह देह इस समय एक क्षेत्रावगाही है तो भी न्यारे-न्यारे ही हैं । इनका स्वरूप विपरीत-विपरीत है । आत्मा तो अमूर्त है । इसमें रूप, रसं, गंध, स्पर्श नहीं और यह देह मूर्तिक है एक दूसरे से बिल्कुल उल्टा है । आत्मा ज्ञानस्वरूप है । इस देह में ज्ञान का नाम निशान भी नहीं है, इसमें तो हड्डी, चाम, खून, मांस आदिक ये ही भरे पड़े हैं । इनका स्वरूप ज्ञान तो नहीं है, और मुझे आत्मा का स्वरूप ज्ञान हैं । तो इस देह से मैं अब भी न्यारा हूँ । देह अज्ञान जड़ है और मूर्तरूप है । तो इस देह से यह मैं आत्मा अभी भी निराला हूँ, ऐसा अपना सम्यग्ज्ञान हो, विश्वास हो और इसी स्वरूप में रमण करने की कोशिश करें सो यह तो है हम आपके लिए शरण किंतु इस भाव को छोड़कर, रत्नत्रय स्वरूप को छोड़कर अन्य कुछ भी शरण नहीं है ।

प्रभुदर्शन में रत्नत्रय की साधना का लक्ष्य―मैं हम जिनप्रभु की मूर्ति की वंदना करते हैं, दर्शन के लिए दूर-दूर आ जाकर यात्रा करते हैं, भक्ति में समय व्यतीत करते हैं वहाँ और बात क्या हुई? मूर्ति तो मूर्ति ही है । मूर्ति में उन महापुरुषों की, प्रभु की स्थापना की गई है और उसे देखकर हम झट उस जिनेश्वर की ओर दृष्टि ले जाते हैं जो वीतराग सर्वज्ञ हुए । वे वीतराग सर्वज्ञ हुए । वे वीतराग सर्वज्ञ किसके प्रताप से हुए? रत्नत्रय की साधना से । उन आत्माओं ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की अपूर्व साधना की, जिसके प्रताप से वे अरहंत हुए, सिद्ध हुए उनकी भक्ति में हम आते हैं । तो हम भक्ति करें और प्रभुता की शिक्षा ग्रहण करें कि हे प्रभो ! आपने मोह त्यागा, जिसका प्रताप है कि आप परिपूर्ण ज्ञानानंद में मग्न हो गए, कर्मकलंक से सदा के लिए छूट गए, सिद्ध हो गए, कृतकृत्य हो गए, अब अनंतकाल तक भी आपके लिए कोई अकल्याण की बात नहीं है । तो उनके गुण चिंतन करते समय साधन का स्मरण जरूर रखना चाहिए कि सम्यक्त्व ज्ञान और चारित्र के प्रताप से ही उन्होंने प्रभुता प्राप्त की और सदा के लिए शाश्वत आनंदमग्न रहे, उसका उपाय सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र का साधन है ।

सम्यक्त्वलाभ का कर्तव्य―सम्यग्दर्शन क्या है? आत्मा का जैसा सहजस्वरूप है अपने आपकी सत्ता से अपने आप जो इसमें भाव पाया जाता है उस भाव का अनुभव होना, उस भाव की प्रतीति होना, उस भाव के विषय में विपरीत अभिप्राय न रहना, ऐसी स्वच्छता को सम्यग्दर्शन कहते हैं । इसकी साधना तत्त्वचिंतन से होती है । सम्यग्दर्शन की प्राप्ति का उपाय तत्त्वचिंतन है । तत्त्व क्या? प्रत्येक आत्मा का जो सहज भाव है वही उस पदार्थ का तत्त्व है । मेरे आत्मा का जो सहज भाव है, केवल सहज ज्ञान बस वही मेरा तत्त्व है, वही मेरा वैभव है, जिसके निरख लेने पर सदा के लिए संकट टल जाते हैं । जो मेरे साथ जायगा, मेरे को शरण होगा यह सहजस्वरूप ज्ञानमात्र मैं हूँ, इस प्रकार की अनुभूति प्रतीति हो उसे सम्यग्दर्शन कहते हैं । सम्यग्दर्शन का भाव प्राप्त होने पर फिर उपयोग को उस ही स्वरूप के चिंतन में लगाने की कोशिश करना यह सम्यग्ज्ञान का उपयोग है । जों बात अनुभव कर ली गई है कि यही भाव, यही परिणमन, इस ही भाव का अनुभव मेरे लिए हितकारी है, आनंद देने वाला है, तो अब कर्तव्य यह होना चाहिए कि हम अपना ज्ञान उस ही भाव के लिए लगाये, ऐसा मन में अवधारण बनायें कि सिवाय इसके और कोई काम ही मुझे नहीं वास्तविक, सो मैं अपने उस सहज ज्ञानस्वभाव को ज्ञान में लिए रहूं, जिसका ज्ञान करने से, जिसका अनुभव करने से परमात्मा की तरह आनंद की झलक होती है।

झूठे दुर्विपाक सुख में राग करने से विपन्नता―जीव को आनंद ही तो चाहिए । सत्य आनंद ढूँढें । उस झूठे मोह के आनंद में क्या रखा है? जो कर्म के आधीन है, अनेक साधन जुटने पर प्राप्त हों, जिसमें बीच में अनेक दुःख भरे हैं यह सुख है क्या? वह तो विष है, केवल एक मोह की नींद का स्वप्न है । दिख रहे हैं ये घर के स्त्री-पुत्रादिक कि ये सब मेरे कितने अनुरागी हैं । अरे अनुरागी कौन है? जगत में अनंत जीव हैं, उन अनंत जीवों में से ये एक दो जीव घर में आ गए । ये न आते और कोई आते । तो जीव का वास्तविक संबंध रहा क्या कि ये ही मेरे कहलाये? यहाँ तो मोह की बान पड़ी हुई है तो जो भी जीव आता उस ही के संबंध में मोह करने लगते । कोई जीव से नाता तो न रहा । यह तो अपनी आदत की बात हुई । मोही जीव हैं, मोह करने की आदत है । मोह दूसरे से नहीं आता, मोह खुद का विकार है । सो जो भी जीव मिला उसमें मोह बना लेते हैं । यों कुछ-कुछ राग मोह तो अन्यत्र भी बहुत सी जगह कर ही रहे हैं । गधी, कुतिया, बिल्ली, खरगोश आदिक के छोटे-छोटे बच्चे भी कितने प्यारे लगते हैं, उनके प्रति भी लोगों का, कुछ न कुछ आकर्षण हो ही जाता है । तो इन सब जीवों से मेरा कोई नाता है क्या? किसी जीव से मेरे रिश्ते की बात लिखी है क्या? इस जीव को मोह करने की आदत है सो जो भी मिला उस ही से यह जीव मोह कर बैठते है । तो यह इसके मोह करने की बात है । संबंध कुछ नहीं है । तो ऐसे झूठे पराश्रित सुख में मग्न रहना यह तो मानव-जीवन को निष्फल खो देने की बात है ।

विषयसुख की उपेक्षा में ही सत्य सहज आनंद का लाभ―भैया ! विषयसुख से मुख मोड़कर जो वास्तविक स्वाधीन आत्मा से उत्पन्न हुआ निरपेक्ष सुगम सहज आनंद है उसकी धुन में लगे । इस सहज आनंद की धुन में लगने पर वह आनंद प्राप्त होता है । एक अपने आपके सहज आनंद की बात पा ली जाती है तो समझो कि सब कुछ पा लिया । उसके प्रसंग में यदि देह भी छूटता है तो छूटे? अन्य धनवैभव आदिक भी छूटते हैं तो छूटें । बड़े-बड़े मुनीश्वरों ने जिनको स्यालिनी ने खाया, शेरनी ने चबाया, जो कोल्हू में पेले गए, कंडों में जलाये गए उन साधुवों में कौनसा साहस था कि इतनी बड़ी विपत्ति में भी धीर रहे, आनंदमग्न रहे, अंत: प्रसन्न रहे? वह साहस यही था कि आत्मा के सहज आनंद के मुकाबले से सारी बातों को वे असार समझते थे । एक अपना सहज आनंद प्राप्त हो उस एवज में देह भी जलता है तो जले, प्राण जाते हैं तो जावे, लोग किनारा कसते हैं कसे, वैभव मिटता है मिटे, जो भी बात होती हो सब हो, पर मेरे इस सहज आनंद की धुन मत मिटे । तो ये साधु पुरुष ऐसे ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के आश्रयरूप हैं ।

उपासक की साधुगुणों में आस्था―जब साधु गुणों पर दृष्टि देते हैं । कैसा अमूर्त आत्मा, कैसा स्वच्छ ज्ञान, कैसी निरपेक्ष वृत्ति की बाहर में कहीं जिनका आकर्षण नहीं, सर्व जीवों में समताभाव जग गया है, जगेगा ही, जगना ही पड़ेगा, और होगा क्या? जिनको अपने आपके सहज स्वभाव का अनुभव हुआ, आनंद प्राप्त हुआ, उस ही धुन में जो रह रहे हैं वे बाहर में रागद्वेष कैसे कर सकेंगे? तो ऐसे समता के पुंज साधु परमेष्ठी के अब अंत: गुणों का विचार करते हैं तो इस भक्ति से उन गुणों में विशिष्ट अनुराग होता और अंत: आवाज निकलती कि ये साधुगुण मेरी रक्षा करें । कैसे रक्षा करेंगे कि उन साधुगुणों का निरंतर चिंतन रहे ऐसा चिंतन करने वाला उपयोग फिर वह मेरा रक्षक है । हमारा रक्षक हमारा उपयोग है, हमारा भक्षक भी हमारी उल्टी चाल है । तो यह भक्त पुरुष साधु गुणों का चिंतन करता हुआ कहता है कि साधुगुण मेरी रक्षा करें ।


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