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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचगुरु भक्ति - श्लोक 9

From जैनकोष



सर्वान् जिनेंद्रचंद्रां सिद्धानाचार्यपाठकान् साधून् ।

रत्नत्रयं च बंदे रत्नत्रयसिद्धये भक्त्या।।9।।

रत्नत्रय की सिद्धि के अर्थ पंच परमगुरुवों का अभिवंदन―समस्त जिनेंद्रचंद्र चंद्रमा की तरह अमृत प्रदान करने वाले हैं । चंद्र यदि लोकरूढ़ शांति शीतलता अथवा रोगहरक अमृत प्रदान करते है तो ये जिनेंद्रदेव, ये वीतराग सर्वज्ञ प्रभु जीवों को ऐसा ज्ञानामृत प्रदान करते हैं कि सदाकाल के लिए जन्ममरण के संकटों से छूट जायें ऐसे समस्त जिनेंद्रचंद्रों को मैं रत्नत्रय की सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ । आचार्य, उपाध्याय और साधु ये रत्नत्रय की साधना में लगे ही हुए हैं। इनके संग से, इनकी उपासना से, इनकी भक्ति से मेरे भी रत्नत्रय की साधना का बल प्रकट हो । इन सब परमेष्ठियों को रत्नत्रय की सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।


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  • पंचगुरु भक्ति
  • प्रवचन
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