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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 112

From जैनकोष



एदे जीवणिकाया पंचविहा पुढविकाइयादीया ।

मणपरिणामविरहिदा जीवा एगेंदिया भणिया ।। 112 ।।

एकेंद्रियों के मनपरिणाम का अभाव―ये सब जीवसमूह पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक, ये 5 प्रकार के समूह मन के परिणमन से रहित हैं और एकेंद्रिय कहलाते है । इन सबके स्पर्शन इंद्रियावरण का क्षयोपशम है और शेष की चार इंद्रियावरणों का उदय है और नो इंद्रियावरण का भी उदय है । ऐसी स्थिति में यह जीव एकेंद्रिय और असंज्ञी होता है । ऐसा किन्हीं भी जीवो के संबंध में समझ लो । जो आज चारइंद्रिय जीव है उसके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु इंद्रियावरण इन चार का तो क्षयोपशम है और श्रोत्रइंद्रियावरण तथा नो इंद्रियावरण का उदय है । ऐसी स्थिति में वे चार इंद्रिय और असंज्ञी होते हैं । ये समस्त असंज्ञी जीव मन के परिणमन से रहित हैं । इन एकेंद्रिय जीवों को निरखकर अर्थात् पृथ्वी, जल आदिक शरीरों को निरखकर लोगों के चित्त में यह आशंका रहती है कि इनमें जीव है कहाँ? पृथ्वी को देखकर कहां मालूम पड़ पाता है कि यह जीव है । तो इस एकेंद्रिय में चेतन का परिणमन है, ऐसा सिद्ध करने के लिए दृष्टांतपूर्वक सिद्धांत की बात अगली गाथा में रख रहे हैं ।


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