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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 116

From जैनकोष



उद्दंसमसयमक्खियमधुकरभमरा पतंगमादीया ।

रूवं रसं च गंधं फासं पुण ते वि जाणंति ।।116।।

चतुरिंद्रिय जीव―संसारी जीवों के भेद विस्तार में चक्षुरिंद्रिय जीवों के प्रकार को सूचना इस गाथा में दी गई है । जिन जीवों के स्पर्शनइंद्रियावरण, रसनाइंद्रियावरण, घ्राणइंद्रियावरण और चक्षुरिंद्रियावरण इनका क्षयोपशम है और श्रोत्रइंद्रियावरण का उदय है तथा नौ इंद्रियावरण का भी उदय है ऐसी स्थिति में यह जीव चक्षुरिंद्रिय जाति में उत्पन्न होता है । ये जीव स्पर्श, रस, गंध और वर्ण के जाननहार हुआ करते हैं, मन से रहित भी होते हैं । ये जीव भी बहिरात्मा हैं । ये चार प्रकार के इंद्रियों के विषयसुख में आसक्त रहते हैं । इनके निर्विकार स्वसम्वेदन ज्ञान की भावना ही नहीं बनती । तब इस ज्ञानभावना से उत्पन्न होनेवाले समतारूपी आनंद सुधा रस से ये विमुख रहा करते हैं । ऐसे जीवों के द्वारा जो उपार्जित चक्षुरिंद्रिय जाति नामक कर्म था, उसके उदय के आसीन ये चक्षुरिंद्रिय जीव हुए हैं । इनके वीर्यांतराय कर्म का क्षयोपशम है ।

संसारी जीवों में वीर्यांतरायकर्म के क्षयोपशम की साधारणता―संसार के प्रत्येक जीव में वीर्यांतराय कर्म का क्षयोपशम पाया जाता है अर्थात् चाहे वे निगोद भी क्यों न हों, कुछ न कुछ शक्ति वहाँ अवश्य प्रकट रहती है । वीर्यांतराय कर्म उसे कहते हैं जो आत्मा की शक्ति का आचरण करे, उसमें विघ्न डाले । जैसे कोई भी संसारी जीव ज्ञान से शून्य नहीं है, क्षुद्र से भी क्षुद्र संसारी जीव हो, सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक भी हो उसके भी उसके योग्य मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण का क्षयोपशम पाया जाता है । क्षयोपशम का अर्थ है जहाँ सर्वघाती का उदयाभावी क्षय हो और उपशम हो तथा देशघाती का उदय भी साथ हो, ऐसी स्थिति में ज्ञान कम रहता है, पर रहता है जरूर । ऐसे ही समग्र जीवों के संसारियों के वीर्यांतराय का क्षयोपशम पाया जाता है । वीर्यांतराय का क्षय 12वे गुणस्थान में होता है । वहाँ तक क्षयोपशम ही है। इन चक्षुरिंद्रिय जीवों के वीर्यांतराय का क्षयोपशम है और चार इंद्रियावरणों का भी क्षयोपशम है। तब चार इंद्रियावरण व्यक्त हो गयी और श्रोत्रइंद्रियावरण का उदय होने से मन भी नहीं मिला। ऐसे ये जीव चतुरिंद्रिय जाति के होते हैं।

संसरणसृष्टि का हेतु और उसकी प्रतिक्रिया―इन संसारी जीवों के भेदों को सुनकर चित्त में यह निर्णय बनाये रहना चाहिए कि एक निज सहजस्वरूप के परिचय के बिना और यह आत्मा स्वयं आनंदमय है, ऐसी अनुभूति के बिना यह जीव ऐसी-ऐसी योनियों में भटक रहा है। आज हम आपको जितना समागम मिला है यह समागम सदा साथ तो देगा नहीं, पर इन समागमों में आसक्त होकर हम जो एक मोह मिथ्यात्व पाप बढ़ाते हैं, इस पाप के फल का भोगना भावीकाल में बनेगा। हम इतने सावधान रहें। इतने स्पष्ट रहें कि अंतरंग में जैसा सहज स्वरूप है तैसी ही दृष्टि के यत्न में रहे। यथार्थता तो यह है, ऐसे स्वरूप की सावधानी हम आपको मोक्ष के मार्ग में ले जायगी।


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