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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 125

From जैनकोष



सुहदुक्खजाणणा वा हिदपरियम्मं च अहिदभीरुत्तं ।

जस्स ण विज्जदि णिच्चं तं समणा विंति अज्जीवं ।।125।।

अजीव में जीव की विशेषताओं का अभाव―जिसमें सुख दुःख होना, हित में लगना, अहित क्रियायों से डरना―ये बातें नहीं पायी जातीं श्रमण साधुसंतजन उसे अजीव कहते है । सुख का अनुभवन करना, दुःख का अनुभवन करना, पदार्थ का जानना, हित में प्रवृत्ति करना, अहित से डरना―ये सब बातें जीव में ही दृष्टगत होती हैं । ये 5 बातें जिस पदार्थ में नहीं हैं साधुसंतजन उसे अजीव कहते हैं । अज्ञानी जनों ने तो अपना हित स्त्री पुत्रादिक में चंदन माला आराम शृंगार आदि में समझा है । उसका कारण क्या है? जिसमें अज्ञानी जीव हितरूप समझते हैं ऐसे वैभव के समागमों का कारण क्या है? मूल उत्तर तो पूर्वबद्ध पुण्य का उदय है । दान पूजा आदिक शुभ परिणामों के फल में पुण्य होता है और पुण्य से यह वैभव प्राप्त होता है । अब उन प्राप्त वैभवों का उपयोग करना यह ज्ञानी और अज्ञानी का जुदा-जुदा काम है । अज्ञानी जीव इन वैभवों से अपना हित मानते हैं और ज्ञानी जीव उन वैभवों से अपना हित नहीं मानते ।

हित और अहित का विश्लेषण―ज्ञानी जीव का तो हित अक्षय अनंत सुख है । वह अविनाशी अनंत सुख में स्वहित मानता है और उसके कारणभूत है परमात्मद्रव्य । जो निश्चय रत्नत्रय में परिणत है ऐसा यह चैतन्यतत्त्व जो चेतन अपने आपके स्वरूप की रुचि करता है, अपने ही स्वरूप का ज्ञान करता है और अपने ही स्वरूप में परिणमन करता है ऐसा यह चैतन्य पदार्थ ही हितरूप है, शरणभूत है, ऐसा भाव ज्ञानी जीव के रहता है । यहाँ के ये समस्त दुःख ज्ञानी जीव को अहितरूप लग रहे हैं । आकुलता को उत्पन्न करने वाले ये समस्त मोह विभाव ज्ञानी जीव को अहित जंच रहे हैं । उस मोह विभाव का करण है मिथ्यात्व, रागादिक में परिणमा गया बसा हुआ आत्मद्रव्य । इस प्रकार हित क्या है और अहित क्या है, इसकी परीक्षा जीवद्रव्य ही कर सकता है । भले ही कोई जीव अज्ञानवश अहित को हित मान ले, हित को अहित मान ले, किंतु हित अहित के मानने की कला जीवद्रव्य में ही पायी जाती है ।

जीव और अजीव में भेद―हित और अहित की परीक्षा करने रूप जो एक चैतन्य धर्म है वह चैतन्य धर्म विशेष अजीव के नहीं पाया जाता है, इस कारण आकाश आदिक सर्व पदार्थ अचेतन हैं । एक जीवद्रव्य ही चेतन है, इस प्रकार लक्षण के भेद से जीव जुदा है, अजीव जुदा है अथवा अजीव में व्यवहार में आने वाला पदार्थ पुद्गल है । तो यहाँ यह ज्ञान कराया गया कि जीव जुदा है, पुद्गल जुदा है । जुदा होने पर भी आज जीव और पुद्गल का इतना घनिष्ट संयोग है, जीव और पुद्गल का घनिष्ट संयोग होने पर भी उनमें ऐसा स्वरूप बदलता है जो उनका भेद प्रकट कर दे । भेदविज्ञान का कारणभूत स्वरूप अब अगली दो गाथावों में कहा जा रहा है ।


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