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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 133

From जैनकोष



जम्हा कम्मस्स फलं विसयं फासेहिं भुंजदे णियदं ।

जीवेण सुहं दुक्खं तम्हा कम्माणि मुत्ताणि ।।133।।

कर्म की मृर्तिकता―इस गाथा में कर्मों को मूर्तिक सिद्ध किया है । जिस शरण से ज्ञानावरणादिक 8 कर्मों का सुख दुःखरूप फल सुख दुःख को उत्पन्न करने वाले इष्ट अनिष्ट रूप मूर्तिक स्कंध विषय को मूर्तिक इंद्रिय के द्वारा इस जीव के द्वारा भोगे जाने से प्राप्त होता है, इस कारण ज्ञानावरणादिक कर्म मूर्तिक हैं, इस बात को अनुमान प्रमाण से सिद्ध कर रहे हैं । कर्मों के फल भूत सुख दुःख के कारणभूत विषय, वे मूर्तिक पदार्थ मूर्तिक इंद्रिय के द्वारा ही भोगे जोते हैं । इससे यह अनुमान है, अनुमान प्रमाण से निश्चित है कि कर्म मूर्तिक होते हैं । इसे यों समझिये कि यदि कर्म मूर्तिक न हों तो उनका फल भूत मूर्तिक इंद्रियविषय का फल भोगने में नहीं आता ।

मूर्तकर्मफल―जो कुछ फल भोगने में आता है स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द ये पाँचों विषय पौद्गलिक हैं । ये पुद्गलस्कंध भोगने में आते हैं, इतना तो सब लोग जानते ही हैं । रसना के द्वारा रस भोगने में आता, स्पर्शनइंद्रिय के द्वारा स्पर्श भोगने में आता, घ्राण के द्वारा गंध, चक्षु के द्वारा रूप और कर्ण के द्वारा शब्द, ये पाँचों ही विषयभूत पुदगल के परिणमन हैं । तो पुद्गल के परिणमन अर्थात् मूर्त परिणमन भोगने में आते हैं तो क्यों आ रहे हैं, इसका जो निमित्त कारण है वह भी पौद्गलिक है, मूर्तिक है । अमूर्त से मूर्त फल नहीं भोगा जा सकता । मूर्तिक कर्म मूर्तिक के संबंध से अनुभूत होते हैं इस कारण ये कर्म मूर्तिक हैं ।

कर्मफल की अहितता―देखिये कर्मों का फल क्या मिला? इन पुद्गलों का इष्ट अथवा अनिष्ट भोग करना पड़ा । नरकगति में नारकी जीवों को लोहे की ताती पुतलियों से चिपकाया जाता । वह भी स्पर्शनइंद्रिय का भोग है, वह अनिष्ट है । यहाँ मनुष्य, देव, तिर्यंच अपनी स्त्री में आसक्त होते हैं यह उनका इष्ट भोग है । नरकों में गर्म लोहरस, ताँबारस पिलाया जाता है, यह रसनाइंद्रिय का भोग है और यहाँ नाना व्यंजन बनाकर खाया करते हैं तो कोई इष्ट भोग, कोई अनिष्ट भोग हैं, आखिर पुद्गलकर्म के फल में पुद्गल को ही तो भोगते हैं संसारी जीव पौद्गलिक इंद्रियों द्वारा।

विषम कार्यों की परापेक्षता―जितने विषम कार्य होते हैं उनमें कोई दूसरा कारण अवश्य होता है । जो बात घट-बढ़ होती है उसमें कोई दूसरा कारण होता है । स्वरूपदृष्टि से पदार्थ तो एक रूप ही रहेगा । कोई पदार्थ विभिन्नरूप परिणमता है तो यह निश्चित है कि उसमें दूसरा कोई साथ लगा है । दूसरा पदार्थ साथ न हो तो केवल कोई भी पदार्थ एक रूप स्वभावरूप परिणमेगा । इंद्रिय के द्वारा, इन पौद्गलिक इंद्रियों के द्वारा पौद्गलिक विषयों का संबंध और अनुभव होता है । इससे सिद्ध है कि इसका कारणभूत कर्म भी मूर्तिक है । जब उदय में आने वाला कर्मों का फल मूर्तिक है और वही भोगा जाता है तो समझिये कि वह कारण भी मूर्तिक है ।

बद्ध जीव की कथंचित् मूर्तता―कर्मफल का भोगने बाला जीव भी तो देखो―व्यवहारदृष्टि से मूर्तिक बन गया । जीव का स्वभाव तो विषयों से अतीत शुद्ध सहज परम आनंद के भोगने का है जो कि निर्विषय परमात्मतत्त्व की भावना से प्रकट होता है । वहाँ तक तो जीव की एक शुद्ध अमूर्त सीमा की बात थी । उस सीमा को छोड़कर जो इन पौद्गलिक विषयों में रमने लगा, इन पौद्गलिक को भोगने लगा, ऐसा भोगने वाला जीव भी मूर्त कर्मों के संबंध से व्यवहार में मूर्त बन गया । जिन इंद्रियों द्वारा यह जीव विषयों को भोगता है वे इंद्रियाँ भी पौद्गलिक हैं । जीव का स्वभाव नहीं है कि इसमें इंद्रियां हों ।

परमार्थतः इंद्रियों की ज्ञानानंदबाधकता―इंद्रियां तो जीव के ज्ञान में बाधक हैं और आनंद में बाधक हैं, पर अनादि से बंधनबद्ध यह जीव जब-जब जिन-जिन इंद्रियों को पाकर ज्ञान करता है तो इसे वह ज्ञान का साधक मानता है । जैसे किसी एक कमरे में बैठा हुआ पुरुष कमरे में खुली हुई 5 खिड़कियों से बाहर देख सकता है । कमरे में 5 खिड़कियाँ हैं तो उनकी जगह से ही देख सकता है, पर उस पुरुष में जो देखने की ताकत है क्या उस ताकत में ये खिड़कियों कारण हैं? व्यवहार में लोग कहते है कि यह आदमी खिड़कियों से देख रहा है, पर खिड़कियां तो एक बाह्य आलंबन हैं और वस्तुत: इस पुरुष के सर्व सामर्थ्य की बाधक हैं । भीत ही न हो, कुछ भी खिड़कियां न हों तब तो यह पुरुष सर्व ओर से देख लेता है । ऐसे ही जीव में जानन का सामर्थ्य है, पूर्ण है, सर्व ओर से है लेकिन जब आवरण पड़ा है ऐसी स्थिति में क्षयोपशम के अनुसार इन द्रव्येंद्रिय की खिड़कियों से जानता है और देखता है । यह जीव तो इंद्रियरहित है । इंद्रियरहित अमूर्त शुद्ध आत्मतत्त्व से विपरीत ये इंद्रियाँ हैं जिन इंद्रियों के द्वारा यह जीव कर्मफल को भोगता है ।

उपाधि की सिद्धि―कर्मफल भोगने के विषय पुद्गल हैं । इससे यह सिद्ध है कि कर्म भी पुद्गल हैं । यह जीव केवल जीव ही होता तो यह विडंबना कहाँ हो सकती थी? यह विडंबना, यह विभिन्नता, ये विषमतायें यह सिद्ध करती हैं कि जीव के साथ जीव के स्वरूप से विपरीत कोई अन्य चीज लगी है, इतना तो साधारणतया निश्चित है । जीव के साथ कोई दूसरी चीज लगी है तब जीव की यह विडंबना है । वह दूसरी चीज क्या जीव के अनुकूल होगी? यदि जीव के स्वरूप के अनुरूप वह द्वितीय चीज है तो भी विडंबना नहीं हो सकती । जीव के मुकाबले में जीव का प्रतिपक्ष जीव के विपरीत कोई दूसरी वस्तु लगी है जिससे ये विसमताएँ होती हैं ।

दृष्टांतपूर्वक उपाधि की सिद्धि―जैसे एक जल पड़ा हुआ है । जल गर्म हो गया तो गर्म हो जाना यह साबित करता है कि इस जल के साथ जल के लक्षण से विपरीत किसी दूसरी चीज का संबंध होता है तब यह जल गर्म होता है । जल के साथ जल ही जुड़ जाय तब तो गर्म नहीं होता । जल जैसी ही चीज जल के साथ जुड़ने से जल में विपरीत स्पर्श नहीं होता । कोई विपरीत ही वस्तु साथ है तब जल गर्म हुआ । चाहे सूर्य की किरण हो, चाहे अग्नि हो चाहे बिजली हो, कुछ भी चीज जल के स्वरूप से विपरीत स्वरूप वाली जल के संयोग में हुई तब जल गर्म दुआ । ऐसे हो शुद्ध ज्ञायकस्वभावी इस आत्मा की जो यह विडंबना होती है―गति, इंद्रिय, काय आदिक रूप में इनकी व्यक्ति हुई है तो इस विडंबना में कारण कोई दूसरा पदार्थ हैं और वह दूसरा पदार्थ जीव के स्वरूप से विपरीत ही होगा । जीव चेतन है तो वह उपाधि अचेतन है, जीव अमूर्त है तो वह उपाधि मूर्त है । यों जीव के साथ लगी हुई उपाधि जिसको कर्म नाम से कहते हैं वह मूर्तिक है और अचेतन है ।

कर्मव्यपदेश का कारण―यहाँ एक बात और खास समझने की है कि कर्म नाम इन उपाधिभूत पौद्गलिक वर्गणावों का पड़ गया है । थोप कर के नाम हुआ है । वे पौद्गलिक वर्गणायें जो हैं सो ही हैं । कर्म तो उसे कहते हैं जो किया जाय । क्रियते इति कर्म: । जो जीव के द्वारा किया जाता है उसका नाम कर्म है । कोई भी पदार्थ किसी अन्य पदार्थ का करने वाला नहीं होता । जो परिणमता है वह कर्ता है । जो परिणमन होता है वह कर्म है । तो जीव के द्वारा किया गया कुछ अधिक से अधिक बहुत कुछ भी होगा तो विभाव है, राग द्वेष मोह है । इससे आगे जीव की कुछ करतूत नहीं है तो जीव के द्वारा किए गए रागादिक भाव हैं और रागादिक भावों का निमित्त पाकर जिसमें अवस्था कुछ बनी है, अंतर में जिन वर्गणावों में जो जीव के साथ बंध को प्राप्त हैं उनका नाम अब कर्म पड़ा । तो कर्म वर्गणावों में कर्म नाम औपचारिक है । जीव के विभाव का कर्म नाम साक्षात् है । कुछ भी तो नाम रखना पड़ता है जो जीव के साथ उपाधि के साथ लगा हुआ है, उनका नाम कोई देव कहे, कोई भाग्य कहे, कोई तकदीर कहे, कोई विधाता कहे उसका नाम अन्वर्थक संबंधित कर्म है । जिनकी समझ में उस कर्मवर्गणा का स्वरूप यथार्थ नही आया वे इस कर्म के बारे में ईश्वर जैसा रूप, सृष्टा, ब्रह्मा आदिक रूप में मानते हैं । तो वे कर्म औपाधिक हैं, मूर्त हैं, अचेतन हैं जिस कर्म के फल को यह जीव उन पौद्गलिक इंद्रियों के द्वारा पौद्गलिक विषयों का भोग करता है । यह विषय चल रहा है पुण्य और पाप का । पुण्य और पाप पौद्गलिक कर्म हैं । पहिले कथन में जीवपुण्य और जीवपाप का वर्णन था, अब इस गाथा में अजीवपुण्य और अजीवपाप का वर्णन चल रहा है । अजीव पुण्य अथवा पापकर्म मूर्तिक हैं, अचेतन हैं, जीव के स्वरूप से विपरीत हैं ।


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