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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 138

From जैनकोष



कोधो व जदा माणो माया लोभो य चित्तमासेज्ज ।

जीवस्स कुणदि खोहं कलुसोत्ति य तं बुधा वेंति ।।138।।

कालुष्य का स्वरूप―जिस समय क्रोध, मान, माया, लोभ, मन को प्राप्त होकर आत्मा में आकुलता को उत्पन्न करते हैं उस समय उसके परिणामों में कालुष्य परिणाम कहा गया है चित्त में क्षोभ होना, चित्त का ठिकाने न रहना, यह कषायों के तीव्र उदय में संभव है । जो पुरुष ऐसा प्रश्न करते हैं कि मेरा चित्त ठिकाने नहीं है तो उसका कारण यह लगा लेना चाहिए इस जीव को या तो क्रोध कषाय तीव्र जगी, जिस कषाय के कारण विवेक गुण जल गये हैं, अब विवेक मार्ग पर नहीं ठहर सका है, इस कारण उसका चित्त ठिकाने नहीं है, अथवा यों समझिये कि इतना तीव्र मान का उदय हुआ है । दूसरों को अपने से नीचा समझना और अपने को उत्कृष्ट समझना और इस ही समझ के अनुरूप अपनी मान्यता विशेष चाहे, यह बात जब नहीं बनती है तो ऐसी परिस्थिति में चित्त ठिकाने नहीं रहता । अटपट मनचाहे विकल्पों की दाह में जलते रहना पड़ता है । अथवा माया कषाय का तीव्र उदय हुआ है, छल कपट का परिणाम जगा है । किसी को कुछ बताना और कुछ मन में चाहना और कुछ काम करना, जहाँ मन, वचन, काय तीनों में विषमता हो जाती है । मन चाहता है यह और, वचन बोलना पड़ा है और तरह का और शरीर से चेष्टा की जा रही है और प्रकार से । ऐसी विषमता में चित्त को बड़े व्यग्रता हुआ करती है । अथवा यों समझिये कि लोभ कषाय की तीव्रता हुई है जिस तृष्णा के वश होकर इसका चित्त ठिकाने नहीं है । चित्त में जब भी व्यग्रता होती है तो कषायों के तीव्र उदय होने पर हुआ करती है । यह चित्त कलुषता का परिणाम पापास्रव का कारण है । खोटा परिणाम तत्काल भी खेद पहुंचाता है और भविष्य में भी बहुत काल तक खेद मानता रहेगा ऐसा देखा जाता है ।

कषायों के अभाव में आत्मा का लाभ―जब इस क्रोध, मान, माया, लोभ का मंद उदय होता है तो चित में प्रसाद उत्पन्न होता है; प्रसन्नता, निर्मलता, बोझरहित, हर्षायमान चित्त रहता है । ये कषाय ही जीव को दुःख के कारण हैं, कषायें हटें तो जीव की सुख आनंद स्वयं ही प्राप्त हो जाता है । जिसे आनंद चाहिए उसका कर्तव्य कषायों के हटाने का होना चाहिए । पर मोह के उदय में जिस ही प्रवृत्ति से क्लेश होता है उस ही प्रवृत्ति में इसे आनंद सूझता है ।विषयों की प्रवृत्ति खेद का ही कारण है । पंचेंद्रियों के विषयों में से कौनसा विषय ऐसा है जो इस जीव को शांति का कारण बनता हो? शांति का कारण बनना तो दूर रहो, इन विषयों के संकल्पमात्र से ही चित्त में व्यग्रता उत्पन्न हो जाती है । जैसे कामविकार संबंधी विकल्प जगा तो चाहे उस कामवासना के अनुरूप आगे कभी बात बने या न बने, पर जिस काल में वासना उत्पन्न हुई है उस ही काल में इसे तीव्र व्यग्रता हुई है, फिर भोग के काल में भी व्यग्रता और भोगने के बाद में भी व्यग्रता ।

विषयों में व्यग्रता―खूब खोज कर लीजिये―कौनसा विषय ऐसा है जिसका उपभोग शांतिपूर्वक होता है? खाने की आसक्ति जिस पुरुष के रहती है उसके खाने में प्रवृत्ति रसास्वादन में प्रवृत्ति क्षोभ पूर्वक होती है । चित्त में उल्झन, व्यग्रता, बाह्यदृष्टि जब तक रहती है तब तक क्षोभ उत्पन्न होता है, और मनमाना आसक्ति सहित खाने के बाद भी क्लेश होता है और कम से कम इतना तो हो ही जाता है तुरंत कि खाकर इसे चित्त लेटना पड़ता है, बेचैन होकर यह पेट पर हाथ फेरता है, व्यग्र होता है । शरीर उस समय वश में नहीं रहता और उसका परिणाम भी बुरा निकलता है । इसके लिए साधन भी जुटाने होते हैं । सैकड़ों आपत्तियाँ हैं । गंध में, रूप के अवलोकन में, शब्दों के श्रवण में सबमें चित्त की व्यग्रता है । यह तो लोभकषाय की बात कही है । इंद्रिय के विषयों का उपभोग करना लोभ कषाय में सम्मिलित है । अब इस ही बुनियाद पर पद-पद पर इसके क्रोध, मान, माया और लोभ जगते हैं । उनका भी इसे बड़ा क्लेश भोगना होता है ।

अकालुष्य की परिस्थिति―जब इनका मंद उदय हो तब चित्त में एक प्रसाद उत्पन्न होता है । कुछ-कुछ इसे अब दुनिया के जीव समान दिखने लगते हैं । तीव्र कषाय में तो यह ही नजर आता था कि यह मेरा है, बाकी सब गैर हैं । अब इस हठ में भी कमी होने लगती है । इसे कहते हैं अकालुष्य परिणाम । कलुषता न रही, कालिमा न रही । तो जहाँ चित्त की कलुषता नहीं रहती है वहाँ पुण्य का आस्रव होता है । देखिये कभी-कभी सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष के भी कर्मोदयवश कलुषता उत्पन्न हो जाती है, लेकिन अंतरंग में श्रद्धान उसका निर्मल है अतएव झुकाव पर की ओर, कलुषता की ओर नहीं रहता है । यद्यपि पर का उपयोग करके और उस कलुषता में थोड़ा चलकर वह व्यग्रता कर रहा है ज्ञानी पुरुष किंतु वहाँ कैसा दो धारावों का संगम है कि व्यग्रता होते हुए भी भीतर में व्यग्रता नहीं है, ऐसा होना एक कितनी आश्चर्य की और कठिन बात है? एक ही जीव में व्यग्रता भी लोट रही है और भीतर इसमें अव्यग्रता का भी साधन बना हुआ है ।

अज्ञानी का कादाचित्क अकालुष्य―कभी अज्ञानी जीव के भी अकलुषता का परिणाम हो जाता है । अब कषाय मंद हों उस समय में अज्ञानी पुरुष के भी उस चित्त में प्रसाद जगता है, लेकिन उसके अंतर भीतर में व्यग्रता का सारा साधन पड़ा हुआ है और उसकी अव्यग्रता उसका चित्तप्रसाद यों समझिये, जैसे कोई पुरुष मांगे तो छाछ और दूध उसके समक्ष हाजिर कर दे तो जैसे वह पुरुष बड़ा प्रसन्न होता है, नम्रता दिखाता है और अपने मंद कषाय की मुद्रा बनाता है । ठीक है, लेकिन उस पुरुष में अंतर में व्यग्रता की योग्यता पड़ी है और उस ही पुरुष को वह कभी मांगे दूध और दे-दे छाछ तब उस समय निरख लो । जो पुरुष प्रशंसा की बातें सुनकर बड़ी नम्र और बड़ी निष्कषाय जैसी बातें बनाया करता है क्या ऐसी बात उसमें वास्तव में है? इसका निर्णय करना हो तो जब कभी निंदा अथवा गाली-गलौच की बात कही जाय तो उस घटना में परीक्षा हो सकती है । अज्ञानी मोही जीव के कभी इन कषायों का मंद उदय आने पर चित्त की अकलुषता रहती है, लेकिन अंतर में उसके मोहजन्य व्यग्रता पड़ी ही है ।

आत्मा की सात्त्विकी वृत्ति―आत्मा का स्वभाव क्रोध नहीं है । इसका तो सात्विक काम उत्तम क्षमा परिणतिरूप शुद्ध आत्मतत्त्व का सम्वेदन है । यह विषयरहित क्षमाशील शुद्धज्ञायकस्वरूप आत्मतत्त्व का सम्वेदन करे, अनुभव करै कि मैं तो यह ज्ञानप्रकाशमात्र हूँ, यह है इस जीव की सात्विक वृत्ति । सात्विक शब्द का क्या अर्थ है? अपने ही सत्त्व में, अपने ही सत्त्व के कारण निरपेक्ष होकर जो बात जगे उसका नाम है सात्विक वृत्ति । व्यवहार में सात्विक रहन-सहन का अर्थ किया जाता हैं―कोई आडंबर न होना, कोई विशेष पराधीनता की बात न लगाना उसे कहते हैं सात्विक रहन-सहन । यह अर्थ कहाँ से निकला? इसमें भी मर्म यह पड़ा है कि केवल तुम्हारे ही द्वारा तुम्हारी ही अधीनता से स्वतंत्र होकर तुम अकेले अपने आप जिस प्रकार रह सकते हो उस प्रकार रहना उसको कहते हैं सात्विक रहन-सहन । फिर व्यवहार में अर्थ उसका यह निकला कि परद्रव्यों का जितना आडंबर हटे उसे कहते है सात्त्विक वृत्ति ।

सात्त्विकी कृत्ति में क्रोध मान का अभाव―इस जीव की सात्विक वृत्ति है क्षमारूप बने रहना । उस सात्विकता से अत्यंत विरुद्ध बात है क्रोध करना । क्रोध जीव का भूषण नही है, कलंक है । मान कषाय भी जीव का कलंक है । मान कषाय में यह जीव अपना बड़प्पन चाहता है । किंतु हे बड़प्पन चाहने वाले पुरुष ! जरा अपने आपके स्वरूप पर निगाह तो दे । तेरा यह शुद्ध आत्मतत्त्व निरहंकार है । केवल एक ज्ञानानंद प्रकाश का ही अनुभवन करते रहने की तेरी प्रकृति है । निरहंकार शुद्ध आत्मतत्त्व की उपलब्धि से अत्यंत प्रतिकूल भाव है, यह मानकषाय । मान में आकर किसने शांति पाई? घमंड में आने पर जीव की बरबादी ही हुई ।

मान का कुफल―रावण का मानकषाय के कारण वध हुआ, ऐसी दुर्गति हुई और आज तक भी लोग उसको अपमान भरी दृष्टि से देखते हैं । हालांकि वह पंडित था, विवेकी था, बलवान था, धर्म की प्रभावना करने वाला भी था, पर सारे गुणों पर पानी फिर गया एक अभिमान में आकर । एक गल्ती हो गई थी, सीता को हर लिया था, पर उस गल्ती होने पर भी उसने गल्ती नहीं की । अपनी उस प्रतिज्ञा पर अडिग रहा कि जो परनारी मुझे न चाहेगी उसको मैं कुछ न कहूंगा, और सीता को लौटा देने का मन में निर्णय था । क्योंकि वह करे क्या? जब अपनी प्रतिज्ञा निभा रहा था तो सीता का क्या करना? लेकिन इसे इस तरह कैसे दे दिया जाय, मैं लडूं और राम पर विजय पा लूँ, फिर सौंप दूँ । इस मानकषाय के वश होकर उस पर क्या बीती? अपने भी जीवन में व्यवहार में दिन भर में जो कष्ट होते हैं उन कष्टों का प्राय: करके यह मानकषाय बहुत-बहुत कारण पडता है । चलना, बैठना, गोष्ठी में, इस जगहों में जरा-जरासी बात में मानकषाय जगती है, और अंतर जल भुन जाता है । और ऐसी प्रवृत्ति होती है, ऐसे फिर वचन निकलते हैं कि जिससे आपदायें ही बढ़ती हैं ।

सात्त्विकी वृत्ति में माया का अभाव―माया कषाय छल कपट के जाल में अपने आपको उलझा लेना, जैसे कहते हैं कि मकड़ी अपना जाल खुद पूरती है और उस जाल में फंसी रहती है । शायद वह अपनी रक्षा के लिए जाल पूरती हो और फंसी भी न रहती हो, जिस चाहे गली से चलकर निकल जाती हो, लेकिन उदाहरण यह है कि जाल पूरकर जाल में मकड़ी फंसी रहती है । उससे भी विकट परिस्थिति इस मायावी जीव की है । यह अपने आपकी कल्पनाओं में कितने ही जाल पुरता रहता है । यों कहना, यों करना, विरुद्ध-विरुद्ध बातों की कल्पनाएँ बनाकर उस जाल में यह बना रहता है । हैं आत्मन्! जरा अपने आपके स्वभाव की महिमा को तो निरखो । तू निष्प्रपंच है, बाह्य मायाजाल से भी रहित है । जो यह बनाव बन गया, शरीर में फंसा है, कर्मों से बँधा है, व्यग्रता कर रहा है । इस मायाजाल से भी रहित है और अंतरंग में ज्ञातादृष्टा रहने के अतिरिक्त जितने भी विभाव हैं, भाव प्रपंच हैं उनसे भी तू रहित है । ऐसा प्रपंचरहित शुद्ध आत्मतत्त्व की उपलब्धि से विपरीत यह माया कषाय है जिसके तीव्र उदय होने पर चित्त में व्यग्रता उत्पन्न होती है और पापास्रव होता है ।

सात्त्विकी वृत्ति में लोभादिक प्रपंचों का अभाव―लोभ बाण के बिंधे हुए सभी मनुष्य सभी जीव अपने आप में बेचैनी का अनुभव किया करते हैं, जबकि ये समस्त बाह्य पदार्थ अत्यंत न्यारे हैं, उनसे इस आत्मा का कुछ भी संबंध नहीं है । जैसे नन्हें-नन्हें बालकों का कुछ भी स्नेह नहीं है इस बड़े पर । वे तो अपने खेल में मस्त हैं । छोटे बच्चे तो अपनी बात में मस्त हैं, पर यह बड़ा पुरुष ही अपने मन में कल्पनाएँ बनाकर उन बच्चों के अधीन बन रहा है । कहाँ भागे, कहाँ जाय, कहाँ रहे, बंधन ही बंधन बना हुआ है । तो यहाँ वे बच्चे फिर भी चेतन हैं, लेकिन इन अचेतन पदार्थों के प्रति जो राग बन रहा है वे अचेतन तो थूलमथूल अपनी जगह पड़े हुए हैं, उनका कुछ भी आप पर आकर्षण नहीं है । वैभव, मकान, दूकान, धातु, सोना, चाँदी, कंकर, पत्थर ये आप पर कुछ प्रसन्न हैं क्या? ये थोड़ा बहुत आपको चाहते हैं क्या? आपके साथ कुछ लगाव रख रहे हैं क्या? वे तो अपनी जगह जड़ स्वरूप रखते हुए विराजे हुए हैं । यह लोभ कषाय वाला पुरुष अपने आप में कल्पनाएं उठा-उठाकर उन ज्वालावों में जलता भुनता रहता है ।

कालुष्य के अभाव में ही आत्महित―कषाय तृप्ति का प्रतिबंधक है, निर्दोष आनंद का बाधक है । तृप्ति और संतोष तो शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना से ही उत्पन्न होते हैं । अपने स्वरूप को तो देखो । स्वरूप की भावना करने से एक अद्भुत आनंद उत्पन्न होता है । तू लोभकषाय के वश होकर उस अद्भुत सहज स्वाधीन आनंद को बरबाद कर रहा है । ये चारों कषायें इस जीव को संसार में भ्रमण के कारण हैं । ये कषायें न जगे तीव्र तो चित्त में जो प्रसाद रहता है वह पुण्यास्रव का कारण है । कभी-कभी अनंतानुबंधी कषाय मंद होने पर यह चित्तप्रसाद अज्ञानी जीव के भी होता है और यह चित्तप्रसाद शुभोपयोग रूप है । तो जिस ज्ञानीजीव के निर्विकार निज अंतस्तत्व का अनुभव नहीं जग रहा है तब यह चित्तप्रसाद ज्ञानी जीव के रहा करता है खोटे ध्यान का परिहार करने के लिए।


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