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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 146

From जैनकोष



जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो ।

तस्स सुहासुहऽहणो झाणमओ जायए अगणी ।।146।।

शुभाशुभ भाव के दहन का उपाय―जिस जीव के रागद्वेष मोह और योगप्रवृत्ति नहीं है उस जीव के शुभ अशुभ भावों को जलाने वाली ध्यानरूपी अग्नि उत्पन्न होती है । पूर्व गाथा में यह बताया था कि शुभ अशुभ से रहित एक शुद्ध स्वरूप का आलंबन कर्मों को नष्ट कर देता है । तो यहाँ उपाय बताया है उसका कि वह उपाय कौनसा है कि जिससे शुभ और अशुभ परिणाम न रहें जीव में । वह उपाय है शुद्ध ध्यान । यह आत्मा, यह संसारी जीव सदा किसी न किसी ध्यान में रहा करता है और ध्यान ही करता है । एक भाव बनाने के अतिरिक्त अन्य कुछ करता ही क्या है? ध्यान शुद्ध अंतस्तत्त्व का बने तो शुभाशुभ कर्म दूर हो जाते हैं ।

बाह्य में जीव का अकर्तृत्व―एक जीवस्वरूप को निरखकर देखो यह जीव केवल अपने स्वरूप का ही कर्ता है, अपने परिणमन का ही कर्ता है, और उपाधि सहित होने से एक इच्छा करता है, उस इच्छा के होने पर जैसी सामर्थ्य है, जैसा निमित्तनैमित्तिक संबंध है उस इच्छा के कारण आत्मा में योग परिस्पंद होता है और उस योग परिस्पंद के कारण शरीर की वायु में परिस्पंद होता है और उस वायु के परिस्पंद से यह शरीररूपी इंजन चल बैठता है । रेल का इंजन भी तो वायु से प्रेरित होकर चलता है । वह हवा स्टीम के रूप से बनी है । तो जैसे अंतर वायु से प्रेरित होकर उस इंजन के पेंच पुर्जों के भीतर जो हवा बनती है उस हवा से प्रेरित होकर इंजन का सब मशीन ढाँचा चल उठता है ऐसे ही इस शरीर में जो अंतर्वायु है उसका हलन-चलन होने से उस अनुरूप इसके हाथ, पैर, ओंठ, जीभ ये चलने लगते हैं और उनके चलने से जैसा जो कुछ बाह्य में परिणमन होना है, होता है।

जीव में भावना का कर्तृत्व―जैसे जिह्वा आदिक के चलने से शब्दों का निर्माण होता है, शरीर आदिक के चलने से क्षेत्र से क्षेत्रांतर तक पहुंच जाता है, ये सारी बातें हो रही हैं और बड़ी शीघ्र हो रही हैं । विलंब नहीं रहता । मैं इच्छा करूँ अब कि यह बोले और बोल निकले देर में ऐसा भी नहीं है । गड़बड़ कोई बोल जाय उन समस्त बोलों में इच्छा बराबर नाच रही है । तब तो क्रमपूर्वक वैसे शब्द बोले जा रहे हैं । यह जीव सिवाय भावना के, ज्ञान की इच्छा के अन्य कुछ नहीं करता । तो देखो जब भावना से ही इतना बड़ा संसार बनाया है तो इस भावना से ही यह संसार मिटाया भी जा सकता है । वह कौनसी भावना है, वह कौनसा ध्यान है जिससे ये संसारसंकट दूर हों? निज शुद्धस्वरूप में चैतन्य वृत्ति अविचलित होवे उस ही का नाम यह ध्यान है ।

ध्यानाग्नि―जब यह जीव अनादिकालीन मिथ्यात्व की वासना के प्रभाव से दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय के उदय से अनेक कामों में प्रवर्त रहे, इस उपयोग को संकोच करके बाह्यपदार्थों से कुछ हट करके जब न मोह करने वाला, न राग करने वाला, न द्वेष करने वाला इस प्रकार अपने को निष्कषाय बनाता है, अत्यंत शुद्ध बनाता है अर्थात् निज शुद्धस्वरूप में अपने उपयोग को जमाता है उस समय इस जीव के शुद्ध ध्यान प्रकट होता है । वहाँ यह निष्क्रिय केवल प्रतिभासस्वरूप चैतन्य में ही विश्रांत हो जाता है । वहाँ मन, वचन, काय की भावना नहीं रहती । उनके परिस्पंद का यत्न नहीं रहता और ये इंद्रियाँ अपने कर्मों में उद्यत नहीं होतीं । उस समय जो ध्यान बनता है वह ऐसा उत्कृष्ट है, ऐसी अद्भुत अग्नि की तरह है जो शुभ और अशुभ सब प्रकार के कर्म ईंधन को जलाने में समर्थ है अथवा यों कह लीजिए कि जैसे तुषार के द्वारा बडे-बड़े वृक्ष भी जल जाया करते है, इसी तरह इन शांत परिणामों के द्वारा इस अपने आप में अपने उपयोग को समा लेने रूप शुद्ध ध्यान के द्वारा ये शुभ अशुभ कर्म, ये संसार विषवृक्ष सब जल जाया करते हैं ।

ध्यानाग्नि का प्रताप―निज शुद्धस्वरूप का ध्यान ही परमपुरुषार्थ की सिद्धि का उपाय है । जैसे थोड़ी भी अग्नि बहुत अधिक मात्रा में हुए तृण काष्ठ की राशि को थोड़े ही समय में जला देती है इसी प्रकार मिथ्यात्व और कषाय आदिक विभावों से परे शुद्धस्वभाव के ध्यानरूपी अग्नि, जो कि विभाव की परिहार रूपी वायु से प्रज्ज्वलित हुई है ऐसी यह ध्यानाग्नि और जो कि परमानंद रस रूपी घी से सिंचित हुई है ऐसी यह आतम सम्वेदन रूपी ध्यानाग्नि समस्त कर्मों को, ईंधन राशि को क्षणमात्र में जला देती है । अग्नि को हवा मिले और कुछ घी मिले तो वह अग्नि तेज ज्वलित हो जाती है, इसी प्रकार आत्मानुभव रूपी अग्नि को विभावों की परिहार रूपी महान वायु मिली है और विशुद्ध आत्मीय आनंदरस का धृतसिंचन हुआ है, उससे प्रज्ज्वलित हुई यह ध्यानाग्नि समस्त कर्मों को दूर कर देती है ।

पुरुषार्थ का अवसर―आज के इस कठिन समय में भी कोई पुरुष यदि कल्याण की विशुद्ध भावना बनाये तो आज भी योग्य सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र से शुद्ध होकर यहाँ से इंद्र-पद प्राप्त कर सकता है, लोकांतिक देव बन सकता है जहाँ से चलकर मनुष्य होकर निर्वाण को प्राप्त कर सकता है । जीवन का समय थोड़ा है, आगम का विषय बहुत बड़ा है और हम आप लोग भी मंद बुद्धि के लोग हैं, ऐसी स्थिति में हम आपको कम से कम इतनी शिक्षा तो दृढ़ता से ग्रहण कर लेनी चाहिए जिस शिक्षा पर रखी हुई वृत्ति इस जन्ममरण से व्यास संसार की जड़ को काट सकती है अर्थात् वह सीधा सा उपाय है । हम अपने आपको परिजनों से, वैभव से, देह से सबसे निराला केवल ज्ञानस्वरूप अनुभव किया करें, यह अंतः श्रद्धा हमारी प्रत्येक परिस्थिति में बनी रहे, ऐसी प्रवृत्ति, प्रकृति और दृष्टि बने तो नियम से अपना कल्याण होगा, इसमें संदेह की रंच भी बात नहीं है ।


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