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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 157

From जैनकोष



आसवदि जेण पुण्णं पावं वा अप्पणोध भावेण ।

सो तेण परचरित्तो हवदित्ति जिणा परूविंति ।।157।।

परचरित्रता―जो शुभ भावों से उपरक्त भाव है वह पुण्यास्रव है और जो अशुभोपयोग से उपरक्त भाव है वह पापास्रव है । इसका प्रतिपादन इस गाथा में किया है, जिस परिणाम से आत्मा का पुण्य अथवा पाप आस्रवित होता है वह आत्मा में अशुद्ध भावों से परचारित्री होता हुआ अपने आपको मोक्षमार्ग से दूर रखता है और संसार में अपने को रुलाता है, ऐसा जिनेंद्र भगवान ने बताया है । आत्महित का पंथ कितना मुक्ति अनुभव पर आधारित है, वैज्ञानिक है, देखते जावो और करते जावो । देखते जा रहे हैं, हम जब जिस प्रकार का परिणाम करते हैं उस समय उस प्रकार का हम में श्रम क्लेश विह्वलता आदिक उत्पन्न होती हैं । और जब शुद्ध परिणामों की ओर चलते हैं तो सहज ही निराकुलता प्रकट होने लगती है । जैसा करते हैं तैसा हम भोगते हैं, यह बात अनुभव भी बता देता है और यही बात वस्तुस्वरूप की बात यथावत् जिनेंद्रदेवने भी बतायी है ।

आस्रव का परिणाम―पुण्य और पाप का आस्रव करने वाला भाव इस निरास्रव परमात्मस्वरूप से अत्यंत उल्टा है । कहाँ तो उसका सहजस्वरूप आस्रव से दूर रहने का है, निरास्रव है, परमात्मस्वरूप है और कहाँ उससे विपरीत है यह परिणाम, जो पुण्य और पाप का आस्रवण करता है? बहुत दूर की भी बात जाने दो, तत्काल की बात देख लो, यहाँ बुरा परिणाम किया और वहाँ ही मन से, वचन से अथवा काय से प्रवृत्ति हुई कि वही लोग लथाड़ देते हें और दंड देते हैं । कोई बलवान हुआ और तत्काल न भी दंड लोगों से पा सके, पर खोटी वृत्ति के फल में किसी समय दंड अवश्य पायगा और फिर कर्मों के बंधन से आत्मपरिणामों का तो परस्पर निमित्तनैमित्तिक भाव है । कैसा ही बली, कैसा ही यशस्वी, कैसा ही अधिकारी हो और भले ही वह अपने जीवन तक भी अपने पाप कृत्यों को निभा ले जाय, किंतु बचकर जायगा कहाँ, कर्मबंधन से छूटकर रहेगा कहाँ? क्लेश, संक्लेश तो उसे तत्काल मिल ही रहे जो फल पाया वह तो वाजिब था ही, पर भविष्य में वह खोटा ही फल पायगा ।

सारभूत और असारभूत काम―भैया ! शुद्ध आत्मा का अनुभव ही एक सारभूत काम है, इस वाक्य को अपने सामने लिखकर रख लो, जब चाहे इसको याद कर लो, जब चाहे इसको कसौटी पर कस लो । मैं शुद्ध ज्ञानमात्र हूँ―इस प्रकार का अनुभव बने वह परिणाम तो है आनंददायक, शिव साधक, कल्याणस्वरूप । और एक इस आत्मानुभव के अतिरिक्त किसी भी परतत्त्व में लगे-बड़े अच्छे लड़के हैं, बड़ा अच्छा परिवार हैं, लोग बड़े प्रेम से बोलते हैं, बड़े सुख में जीवन कटता है, बड़ा विनय करने वाले स्त्री पुत्र हैं, हमारी आज्ञा सभी मानते हैं, सब कुछ है, किंतु ये सब तुम्हारे विकल्पों के कारण ही तो बन रहे हैं । तुम्हारे लिए तो क्षोभ परिणाम के ही आश्रय बन रहे हैं । अच्छा हो कोई तो, बुरा हो कोई तो, किसी भी परपदार्थ में लगाई हुई दृष्टि से जो चारित्र बनता है वह जीव के अहितरूप ही है ।

व्यर्थ समययापन―अहो, जितनी प्रीति परिजन और वैभव में होती है उतनी प्रीति देव, शास्त्र, गुरु के प्रति होती तो यह प्रीति लाभ देने वाली होती । मोह का परिणाम किया वर्षों तक, जिंदगीभर स्त्री-पुत्र ही सब कुछ सुहाये, उनकी व्यवस्थाओं में ही अपने उपयोग को लगा दिया । समय तो गुजर रहा है, आयु तो प्रतिसमय घट रही है, मृत्यु के तो सन्मुख ही जा रहे हैं, एक तो यह जीवन छिद भिद रहा है और फिर दूसरे परोपयोग करके बेचैनी बन रही है, जिस बेचैनी का स्वागत भी करते जाते हैं उस बेचैनी का फल भी भोग रहे हैं और आगे भी भोगेंगे । अब शत-प्रतिशत अपने मन में यह निर्णय बना लो कि मेरा मेरे स्वरूप के अतिरिक्त अन्य समस्त पदार्थ मेरे कुछ नहीं हैं । किसी भी परपदार्थ के समागम से अपने को सौभाग्यशाली समझना, यह बड़ी भूल होगी ।

भाग्य की अहितरूपता―भैया ! भाग्य को तो फोड़ना पड़ेगा । लोग किसी निर्धन असहाय को देखकर कहते हैं कि इसका भाग्य फूट गया । अरे कहाँ भाग्य फूट गया? भाग्य फूट जाता तो कल्याण हो जाता । यह भाग्य शुभ अथवा अशुभ दो भागों में बँटा है । यह भाग्य ही तो इस जीव को परेशान कर रहा है, चारों गतियों में भटका रहा है । हमें भाग्य की रंच जरूरत नहीं है । हमें न चाहिए भाग्य । मैं तो यह केवल ही अनंत समृद्धियों से परिपूर्ण हूँ, मुझे अन्य कुछ भी लेप न चाहिए । मैं जैसा सहज शुद्ध निजस्वरूपमात्र हूँ मैं तो उतना ही भर रहना चाहता हूँ अर्थात अपने उपयोग से इतना ही मानता रहूँ कि मैं इसमें ही रति करता रहूँ, बस यह चाहिए, अन्य कुछ न चाहिए ।

अभीष्टता―लोग केवलज्ञान से सर्वज्ञपने का चमत्कार सुनकर उस सर्वज्ञता की चाह में बढ़ने लगते हैं । मुझे न चाहिए सर्वज्ञता । मुझे तो केवल अपने स्वरूप का स्पष्ट ज्ञान चाहिए और उस स्वरूप में लगना चाहिए । मुझे न चाहिए वह केवल दर्शन, सर्वदर्शिता, मैं तो केवल अपने सहजस्वरूप को ही लखता रहूँ यही दर्शन चाहिए । मुझे न चाहिए अद्भुत अनंतआनंद । किंतु स्वरूप से विरुद्ध जो बात है, आकुलता का परिणाम है, क्षोभ का कलंक है वह क्षोभ न चाहिए । क्षोभ से रहित केवल ज्ञाताद्रष्टा रहने की स्थिति में रहूं, इतना भर चाहिए । मुझे न चाहिए अनंतशक्ति । मैं तो इतनी शक्ति चाहता हूँ कि मैं अपने स्वरूप में स्थित रह जाऊँ । भले ही हमारे इस निज की संभाल में जो कुछ विकास बने, पर मुझे उसकी तृष्णा करना नहीं है, केवल स्वरूप की ओर लगना है । ऐसा ज्ञान का जो स्वचारित्रभाव रहता है उस भाव से अज्ञान दूर रहता है । अज्ञानभाव परपदार्थों में ही अपनी दृष्टि बनाता है, विकल्प परिणति करता है, वह तो बंध का मार्ग है, मोक्ष का मार्ग नहीं है ।


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