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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 164

From जैनकोष



दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गोत्ति सेविदव्वाणि।

साधूहि इदं भणिदं तेहिं दु बंधो व मोक्खो वा ।। 164।।

साधुसेवितव्य दर्शनज्ञानचरित्र―इस गाथा में इन दो मर्मों पर दृष्टि डाली गयी है कि दर्शन, ज्ञान, और चरित्र―ये तो किसी प्रकार बंध के भी कारण हो सकते हैं किंतु जीव के स्वभाव में नियत हो जाने रूप निश्चय चरित साक्षात् मोक्ष का ही कारण होता है । साधुजनों ने यह बात बतायी है कि साधुजनो ! दर्शन, ज्ञान और चरित्र, यह है मोक्ष का मार्ग, इनका सेवन करना चाहिए, परंतु उनके सेवन में कभी बंध भी हो सकता है और मोक्ष भी होता है ।

राग संबंध से दर्शनज्ञानचारित्र की बंधहेतुता―दर्शन, ज्ञान, चरित्र कब किस प्रकार बंध के कारण होते हैं, इसको भी दो दृष्टियों से सोचिये―एक तो शाब्दिक गुंजाइश की दृष्टि से यह ही तो कहा ना कि दर्शन, ज्ञान, चरित्र कथचित् बंध के कारण हैं, ठीक तो है । वे दर्शनज्ञान, चरित्र यदि मिथ्या हैं तो बंध के कारण हैं और सम्यक् है तो बंध के कारण नहीं हैं । यह तो शाब्दिक गुंजाइश का निपटारा है । अब भीतरी मर्म की बात सुनो । हम आप से पूछें कि बतावो घी ठंडक पैदा करने का कारण है या जलाने का कारण है? उत्तर दो । क्या घी ठंडक पैदा करने का कारण है? तो अच्छा सुनो ! कड़ाही में पक रहे घी को डाल दे कोई तुम्हारे ऊपर तो... अरे क्यों भागते हो, घी तो ठंडक पैदा करने का कारण है, ठीक है । घी यद्यपि शीतलता लाने का कारण है, परंतु अग्नि से संबंधित होकर तो यह घी जलाने का ही कारण बनेगा । ऐसे ही समझिये कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र भी सम्यग्दृष्टियों के भी ये तीनों हैं तो मोक्ष के कारण ना? तब जब कभी रत्नत्रय शुभोपयोग और राग से संबंधित है, रागी पुरुष में है तो शुभोपयोग से राग से संबंधित यह रत्नत्रय स्वर्ग का कारण बनेगा ।

अद्वैतवस्तु का प्रति समय अद्वैत परिणमन―बंध और मोक्ष की हेतुता का बहुत विश्लेषण करें और उनके अंश-अंश की बात करें तो यों कह लेंगे कि जितने अंश में रत्नत्रय है उतने अंश में मोक्ष का कारण है और जितने अंश में राग है उतने अंश में बह संसार का कारण है, लेकिन यह अंश आपके दिमाग में ही तो है । आत्मा में प्रकट तो कहीं जुदा अंश नहीं पड़ा है? वहाँ तो जो कुछ है प्रतिसमय में एक ही परिणमन है । अद्वैत पदार्थ है और प्रतिसमय में अद्वैत परिणमन है । जैसे उस घी के संबंध में भी कह सकते हैं, जो कड़ाही में उबल रहा घी है, उसमें जितने अंश में घृतपना है उतने अंश में यह शीतलता का कारण है और जितने अंश में गर्मी का संबंध है उतने अंश में जलाने का कारण है, मगर उस घी में यह शीतलता का हेतुभूत और जलाने का हेतुभूत अंश जुदा-जुदा कहाँ पड़ा है? वह तो एक हो रहा है । जिस प्रकार से भी वह परिणत है उस प्रकार से वह एक है । तब यही बात हुई ना कि जैसे अग्नि से संबंधित उबला हुआ घी विरुद्ध कारणरूप होता है ऐसे ही किसी भी मात्रा में शुभोपयोग की परिणति से संबंधित ये दर्शन, ज्ञान, चारित्र बंध के कारण भी होते हैं ।

दर्शनज्ञानचारित्र में मोक्षहेतुता का आविर्भाव―ये दर्शन ज्ञान चारित्र मोक्ष के कारण कब होते हैं? इसे जैसे कि उस धी में से अग्नि का संबलन दूर हो जाय तो वह घी अब विरुद्ध कार्य का कारण नहीं रहा अर्थात् जलाने का कारण नहीं रहा, इस ही प्रकार जब, सर्वप्रकार के पर समयों की परिणति दूर हो जाती है और स्वसमय परिणति से लग जाता है तब वह मोक्ष का कारण ही होता है, बंध का कारण नहीं है । जीवस्वभाव में नियत होने रूप जो चारित्र है वह तो साक्षात् मोक्षमार्ग का कारण है अर्थात् सर्व प्रकार से जो स्वसमय परिणत है वह साक्षात् मोक्ष का मार्ग है । जैसे अग्नि के संयोग से स्वभाव से शीतल होने वाला भी घी दाह का कारण बन जाता है, ऐसे ही पंचपरमेष्ठी आदि पावन द्रव्य के आश्रय से बने हुए जो भक्ति आदिक परिणाम हैं इन परिणामों से सहित जो परिणमन है, रत्नत्रयरूप प्रवर्तन है वह भी साक्षात् पुण्यबंध का कारण होता है, और अत्यंत मोटी बात जैसे पहिले शाब्दिक गुंजाइश में बताया था, मिथ्यात्व, विषयकषाय निमित्तभूत परद्रव्यों का आश्रय करके होने वाला जो दर्शनज्ञान चारित्र का परिणमन है वह तो पापबंध का ही कारण होता है । इससे यह निश्चित कर लीजिए जीव के स्वभाव में नियत होने रूप चारित्र ही मोक्ष का मार्ग है ।

दृष्टि की चारकता―सब कुछ जीव की एक दृष्टि लगने की बात है । लग जाय जीव इस ओर तो उसका कुछ भविष्य ही उज्ज्वल होने लगता है, और लग जाय पापों की ओर तो उसका भविष्य भी सब गंदा हो जाता है । यहाँ भी केवल दर्शन ज्ञान चारित्र का परिणमन किया और शुद्ध पथ में लगने पर भी दर्शन ज्ञान चारित्र का परिणमन किया । न यहाँ संसार में फंसने की परिणति में भी कुछ अन्य हाथ लगा और मोक्षमार्ग में भी कुछ अन्य हाथ लगने की कथा ही क्या है, वह तो स्व के उपलंभ स्वरूप है । संसारमार्ग में चाहते हुए भी जीव को कुछ मिलता नहीं है बाहर में । मोक्षमार्ग में भी मिलता नहीं, लेकिन यह चाहता भी नहीं । इतना अंतर है । संसारमार्ग की चाह है, पर मिलता कुछ नहीं है, मोक्षमार्ग में चाह भी नहीं है, मिलता भी नहीं है बाहर से कुछ । इस प्रकार इस निश्चय मोक्षमार्ग के प्रकरण में जीव आत्मस्वभाव में नियत रहे, यही शांति का उपाय है, यह बात बताई गयी है ।


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