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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 168

From जैनकोष



धरिहुं जस्स ण सक्कं चित्तुब्भामं विणा हु अप्पाणं ।

रोधो तस्स ण विज्जदि सुहासुहकदस्स कम्मस्स ।।168।।

क्षोभनिरोध के बिना संवर का अभाव―जिस पुरुष के चित्त का संकल्प, चित्त का उद्भ्रम भ्रामकत्व आत्मा के बिना अर्थात् निज शुद्ध आत्मा की भावना के बिना रोका नहीं जा सकता है उसके शुभ और अशुभ किए हुए कर्मों का सम्वर कैसे होगा? थोड़ा भी राग हो तो वह दोष परंपरा का कारण हो जाता है, ऐसी बात कही है । जैसे किसी से थोड़ा भी मन न मिलता हो तो आज तो जरासा ही मन न मिलने की बात है, किंतु वह ऐसा संकल्प-विकल्प और भ्रम उत्पन्न करता रहेगा कि थोड़े ही काल में वह विरोध का विराट रूप रख लेगा, ऐसे ही यह राग जिसे कि लोकव्यवहार में राजनीति में कहते हैं कि दुश्मन का कोई लेश भी रह जाय तो वह आगामीकाल में विघात का कारण होगा, ऐसे ही यह राग इस आत्मा का महा शत्रु है । यह राग थोड़ा भी रह जाय तो यह कुछ काल बाद विराट रूप रख लेता है ।

सूक्ष्म राग में भी संसरणहेतुता―नवग्रैवेयकों में सभी अहमिंद्र होते हैं अर्थात् वहाँ इंद्रादिक 10 भाँति की कल्पनाएँ नहीं हैं । उनके शुक्ललेश्या मानी है । अब समझ लीजिए कि शुक्ल लेश्या के लक्षण कितने ऊँचे हैं? पक्षपात न करें, इष्ट राग न करें, अनिष्ट में द्वेष न करें, समतापरिणाम रखें इतना उत्कृष्ट परिणाम हो गया, परंतु मंद राग अभी छिपा हुआ है । कोई-कोई लोग तो उस नवग्रैवेयक को ही मोक्ष मानते है । जैसी वहाँ की स्थिति होती है उस ही स्थिति को बैकुंठ का रूप देते हैं, चिरकाल तक वे मुक्त रहते हैं, परम आत्मा रहते हैं, सब झंझटों से छुट्टी रहती है और कल्पकाल बाद या कोई समय जो कि असंख्यातों वर्ष का है उतने वर्ष व्यतीत होने के बाद उनको वहाँ से च्युत होना पड़ता है और संसार में जन्म लेना पडता है । यही बात तो उनके संबंध में है । वे 31 सागर पर्यंत जिसमें कि असंख्याते वर्ष समाये हुए हैं वे रहते हैं । उनके राग कम है, बड़े सुख से हैं, अहमिंद्र कहलाते हैं, और अंत में अपनी आयु पूर्ण करने पर । इस भू लोक में जन्म लेना पडता है । तो देखो वह अल्प राग रहा तो राग रहा ना? वह एक बहुत बड़े राग का कारण बन गया ।

प्रभुभक्ति में भी राग की अनुवृत्ति―अरहंत आदिक के संबंध में भी जो भक्ति है वह भक्ति भी राग की अनुवृत्ति किए बिना नहीं होती अर्थात् शुद्ध वीतरागता के परिणाम में अर्हद्भक्ति नहीं होती, और इसी कारण भक्ति का प्रधान कर्तव्य श्रावकों को बताया गया है । यद्यपि साधु भी प्रभुभक्ति करते हैं, पर साधुजनो के लिए मुख्यता निर्विकल्प समाधि के यत्न का उपदेश है और उसमें जब वे नहीं ठहर पाते हैं तो वे अर्हद्भक्ति आदि भी करते हैं । अर्हद्भक्ति की मुख्यता साधुजनों को न बताकर श्रावकों को बतायी है और ऐसे ही दान की मुख्यता साधुवों को न बताकर गृहस्थों को बतायी है ।

अर्हद्भक्ति आदि में ज्ञानी का आशय―अध्यात्मग्रंथों के प्रणेता श्री कुंदकुंदाचार्यदेव ने भी रयणसार ग्रंथ में श्रावकों का मुख्य धर्म दान और पूजा कहा है और साधुवों का मुख्य धर्म सामायिक चारित्र निर्विकल्प समाधि विशुद्ध समता का परिणाम कहा है । इसके मायने यह नहीं हैं कि गृहस्थ केवल भक्ति, पूजा, दान ही करते रहें और वह निरुपराग आत्मतत्त्व की दृष्टि से दूर रहें, यह अर्थ नहीं है, पर निरुपराग शुद्ध आत्मतत्त्व की दृष्टि इन श्रावकों के गौणरूप से रहती है और दान, पूजा की बात श्रावकों में मुख्यरूप से रहती है, और साधु जनों में निरुपराग शुद्ध आत्मतत्त्व की साधना का कार्य मुख्यरूप से रहता है और उपदेश देना यही उनका दान हो जाता है । तो ये ज्ञानदान आदिक के कार्य और अर्हद्भक्ति आदिक के कार्य उनके गौणरूप से चलते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि श्रावक है मुख्यता से सराग सम्यग्दृष्टि । तो अब श्रावक को ऐसी स्थिति में जब कि राग करने के अनेक विषय सामने पड़े हैं―दूकान, घर, व्यवहार जब इतने राग के साधन पड़े हैं तो ऐसी स्थिति में यह श्रावक अपने राग का अधिकाधिक प्रयोग अर्हद्भक्ति आदिक रूप में करे ।

राग की अनुवृत्ति में ज्ञानप्रसार का अभाव―अर्हद्भक्ति राग की अनुवृत्ति किए बिना नहीं होती और राग की अनुवृत्ति होने पर बुद्धि का विस्तार नहीं बनता या कुबुद्धि का विस्तार बनता है, ज्ञान का विस्तार नहीं बनता । राग का स्वभाव ही ऐसा है कि राग रहे किसी ओर तो ज्ञानका प्रसार नहीं बनता । जिस विषय में राग रहता है तो इसका तो अंदाज किया ही होगा, ज्ञान का विशुद्ध प्रसार नहीं हो पाता । यहाँ है शुद्ध परमात्मप्रभु में राग । इस कारण विषयो के राग की तरह बुद्धि प्रसार को तो यह न रोकेगा, किंतु राग है और राग होने के कारण उपयोग किसी एक विषय में रुका हुआ है, ऐसी स्थिति में वहाँ बुद्धि का प्रसार नहीं हो सकता अर्थात् केवलज्ञानादिक जैसे मन:पर्ययज्ञान आदिक जैसे विशुद्ध ज्ञान प्रकट नहीं हो सकते । एक बात । दूसरी बात यह है कि बुद्धि का अर्थ यहाँ ,विशुद्ध ज्ञान न समझें, किंतु राग मिश्रित जो कल्पनाएँ होती हैं उसका नाम है बुद्धि । और जो ज्ञान का विरुद्ध फैलाव है उसका नाम है ज्ञान । तो जिस विषय में राग किया जा रहा है उस विषय में बुद्धि फैल गयी, अर्थात् बुद्धि लग गयी, बुद्धि न लगे तो रागभाव नहीं हो सकता । तो इस प्रकार की बुद्धि लगने पर शुभ और अशुभकर्म का निरोध न होगा । इस कारण एक ही अपने चित्त में कर्तव्य का निर्णय करें कि राग कलुषता विलास का कारण जो अध्यवसान परिणाम है वह अनर्थ परंपरावों का मूल कारण है ।

प्रतिपद विवेक―यहाँ निर्णय की बात चल रही है । निर्णय के समक्ष लोकव्यवहार की भी चिंता नहीं की जाती । अर्हद्भक्ति, दान, पूजा आदिक कर्तव्यों को ही यहाँ कहा जा रहा है कि ये हटाना चाहिए । यह एक वस्तुस्वरूप का निर्णय है । कर्तव्य की बात तो जो जिस पदवी में है उस पदवी में रहकर उस कर्तव्य को निभाता है । जैसे गृहस्थ पदवी में रहने वाले अविरत जनों से कोई साधु यह उपदेश करे कि तुम लोगों का काम तो यह है कि पूर्ण रूप से अहिंसा धारण करो, कोई मारे-पीटे तो पिट लो, कोई धन छीने तो छीन लेने दो, तुम ऐसा काम न करो जिससे दूसरे को कष्ट हो, ऐसा कोई साधु गृहस्थों को उपदेश दे तो क्या गृहस्थ इस बात को निभा सकेंगे? अरे नहीं निभा सकते । तब उनके कर्तव्य का विधान स्पष्ट बताया है ।

अहिंसकता का विकास―आर्ष ग्रंथों में चार प्रकार की हिंसायें बताकर यह दिखाया हैकि गृहस्थ संकल्पी हिंसा का तो पूर्ण त्यागी होती ही है । यदि वह विवेकी है, ज्ञानी है तो वह अपने इरादे से किसी भी जीव का अकल्याण नहीं चाहता । लेकिन आरंभ के प्रसंगों में, उद्यमों के प्रसंगों में अथवा किसी शत्रु द्वारा आक्रमण हुआ हो ती वहाँ पर जो हिंसायें हो जाती हैं उन हिंसाओं का त्यागी यह अविरत गृहस्थ नहीं है । फिर संयमासंयम के बीच में जैसे-जैसे उसकी प्रतिमा बढ़ती रहती है, प्रतिज्ञा बढ़ती रहती है, आशय विरक्ति की ओर जाता है तैसे-तैसे उन तीन प्रकार की हिंसावों में भी उसका त्याग बढ़ता जाता है और संयत हो जाने पर तो सर्वप्रकार की हिंसावों का सर्वथा त्याग हो जाता है । अब रह गया यह कि वे साधु श्वास तो लेते हैं ओर श्वास लेने पर भी जीव मरते हैं तो जो इस तन, मन, वचन के अनुकूल किया ही न जा सकता हो ऐसी स्थिति अशक्यानुष्ठान में कहलाती है और आशय रंच भी किसी के घात को न होने से वहाँ वह अहिंसक ही कहलाता है ।

हिंसा का दोष―तो जैसे पदवियों के अनुसार कर्तव्य का विभिन्न-विभिन्न वर्णन है, पर विभिन्न वर्णन होते हुए भी सम्यग्दृष्टि गृहस्थ है यदि, तो अपने निर्णय में तो वह साधु की तरह ही वस्तुस्वरूप लिए हुए है कि भले ही गृहस्थ उन तीन हिंसावों का त्यागी नहीं है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गृहस्थ को उन तीन हिंसावों का दोष नहीं लगता । जो भाव, जो कर्म जिस प्रकार के निमित्तनैमित्तिक भाव को लिए हुए होते हैं वहाँ फेर नहीं पड़ सकता । कर्मों के यह ज्ञान नहीं है, कर्म जड़ हैं । वे यह न सोच सकेंगे कि यह ज्ञानी गृहस्थ सम्यग्दृष्टि घर में रह रहा है अथवा अन्य कोई गृहस्थ सम्यग्दृष्टि ही न सही, घर में रह रहा है और इसका कर्तव्य हिंसावों के त्याग का बताया है और यह तीन हिंसावों को कर रहा है तो इसको हम न बाँधें । आगम में लिखा है ना । तो वहाँ यह बात नहीं है । वहाँ तो निमित्तनैमित्तिक भावों की जो विधि है उस विधि के अनुसार बंधन होगा ही।

विरति व अविरति की स्थिति में हुई हिंसा का दोष―हाँ यह बात बतायी है आगम में कि गृहस्थ तीन हिंसावों का त्यागी नहीं है अर्थात् चार प्रकार की हिंसावों का त्यागी साधु संतपुरुष यदि उनमें किसी प्रकार की हिंसा करे तो उसके महादोष है, त्याग किए हुए को उसने पकड़ा और यह प्रवृत्ति उसमें कषायों की तीव्रता जगे बिना नहीं हुई । जैसे गृहस्थ एक साधारणरूप से रसोई बनाता है, खा लेता है और कोई मुनि किसी समय बड़ी ही शुद्ध विधि से कोई थोड़ी-सी रसोई बना ले और खा ले तो अंदाज करो कि साधु को कितनी तेज कषाय करनी पड़ी होगी अंतर में तब वह ऐसी प्रवृत्ति कर सका । जो पुरुष जिस नियम पर रहता है उस नियम से च्युत होने के लिए कषाय तीव्र करना होता है, तब वह महादोष है । इस प्रकार का दोष तीन प्रकार की हिंसा में रहने वाले गृहस्थ को नहीं लगा ।

यथार्थ श्रद्धा व स्वरूपाचरणयत्न―भैया ! तो जैसे कर्तव्यपथ में पदवियों के अनुसार अलग-अलग विधान बताया है तिस पर भी स्वरूप यथार्थ सभी को समझना पड़ता है । इसी तरह गृहस्थ हो अथवा प्रमत्तविरत साधु हो, कर्तव्य के पथ में अपनी परिस्थिति के अनुसार अर्हद्भक्ति आदिक राग में लग रहा है वह फिर भी स्वयं निर्णय के मार्ग से उसका अंतःकरण निरुपराग शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना करने के लिए ही बना रहता है । इस प्रकार इस गाथा में यह शिक्षा दी है कि राग का लेश भी हो तो वह दोष परंपरा को बढ़ाने वाला होता है । अत: कोशिश यही करें, श्रद्धा में यही बात लाये कि मुझ में राग का लवलेश भी उत्पन्न न हो और उस रागद्वेष रहित शुद्ध निर्विकल्प अंतस्तत्त्व में रमकर सर्वसंकटों से मुक्त होने का एक सच्चा मार्ग प्राप्त करें ।


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