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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 17

From जैनकोष



मणुसत्तणेण णट्ठो देही देवो हवेदि इदरो वा।

उभयत्थ जीवभावो ण णस्सदि ण जायदे अण्णो।।17।।

पर्यायरूप से उत्पादव्यय होने पर भी जीवत्व का अनुत्पाद व अव्यय―पूर्वोक्त गाथा में जीव की गुणपर्यायों का वर्णन था। अब पर्यायों का उत्पादव्यय होता है और गुण ध्रुव रहता है । उसी विषय से संबंधित बात इस गाथा में कही गई है कि यह जीव पर्यायरूप से नष्ट होता है और नवीन पर्यायरूप से उत्पन्न होता है। फिर भी जीवरूप से न नष्ट होता है, न उत्पन्न होता है, वह तो शाश्वत अनादि अनंत है। पर्यायों की जो संतति चलती है धारा, एक पर्याय के बाद दूसरी पर्याय होना और इस तरह पर्याय होते चले जाना, इस पर्याय संतति का कभी विच्छेद नहीं होता, क्योंकि द्रव्य का स्वरूप ही यह है कि वह प्रतिसमय परिणमन रहे और एक परिणमन से दूसरा परिणमन होने में अगुरुलघुत्वगुण की हानि वृद्धिरूप परिणाम होता है। तो प्रतिसमय जो अगुरुलघुत्वगुण की हानि वृद्धि चलती रहती हो उससे रचा गया जो स्वभाव पर्याय है उसकी संतति का विच्छेद नहीं होता। सो यह तो वस्तु का स्वरूप है कि इसमें पर्याय संतति चलती ही रहे। अब उनकी उपाधि साथ में है तो सोपाधि पर्याय बन उठती है। तो सोपाधि पर्याय जैसे मनुष्य है, मनुष्यत्व के रूप से यह जीव विनष्ट हो जाता है और सोपाधि पर्याय ही एक नवीन बनती है तो उस नवीन पर्यायरूप से उत्पन्न हो जाता है, पर पर्यायरूप में मनुष्यत्वादिरूप में नष्ट हो गया, इससे कहीं जीवत्व नष्ट नहीं हो जाता या देवादिक रूप से उत्पन्न हो गया तो इससे कहीं जीव ही नहीं उत्पन्न हुआ, वह तो अनादि से ही है। इस तरह जीव में उत्पादव्ययध्रौव्य यह द्रव्यपर्यायों में और गुणपर्यायों में घटित होता जा रहा है। सो इस जीव का विनाश उत्पाद पर्यायार्थिकनय से है। द्रव्यार्थिकनय से न उत्पाद है, न विनाश है। पर्यायार्थिकनय से उत्पादव्यय चल रहा है, तिस पर भी द्रव्यार्थिकनय से देखने, पर उत्पादव्यय नहीं है, किंतु वह तो वही ही शाश्वत है। यहाँ दोनों नयों की दृष्टियों का विषय बताने से नित्य एकांत और क्षणिक एकांत का निराकरण स्वयमेव हो जाता है। मनुष्य, देव आदिकरूप से उत्पन्न हुआ, पूर्वपर्याय से नष्ट हुआ तो यह ही यह सिद्ध करता है कि द्रव्य सर्वथा याने एकांत नित्य नहीं है और जीव, जीवत्व वही रहता है। इससे यह सिद्ध होता कि क्षणिक एकांत नहीं है। तो यह द्रव्यत्व के नाते से व्यवस्था है, ऐसी ही व्यवस्था समस्त द्रव्यों की है कि वह नवीन पर्याय से उत्पन्न हुआ और पूर्वपर्याय से नष्ट हुआ और उसमें संतति का विच्छेद नहीं है, उसका आधारभूत द्रव्य सदा रहता है। यह ही बात जीव में भी समझना है कि वह मनुष्यादिकरूप से नष्ट हुआ, मगर जीवादिक से नष्ट नहीं हुआ।


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