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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 19

From जैनकोष



एवं सदो विणासो असदो जीवस्स णत्थि उप्पादो।

तावदिओ जीवाणं देवो मणुसो त्ति गदिणामो।।19।।

उत्पादव्यय होने पर भी जीववस्तु की शाश्वत एकरूपता―जीव सत् है उसका कभी विनाश नहीं होता, और जो पर्यायें नजर आती हैं, पर्यायोंरूप से जीव का होना देखा जाता है तो उसमें कहीं असत् पदार्थ का उत्पाद नहीं होता। यदि वास्तव में जीव मरता हो तो यह कहा जाय कि सत् का नाश हो गया या जीव जन्म लेता हो याने पहले कुछ नहीं है और जब जीव पदार्थ बन गया तो कह सकते कि असत् का उत्पाद हो गया, लेकिन स्थूलदृष्टि से भी देखो तो जो जीव मरता है वही तो जन्म लेता है । विनाश कैसे होगा? और जो जीव जन्म लेता है वही तो मरता है, तो इसमें सत् का विनाश और उत्पाद नहीं है, किंतु उसही सत् की ये अवस्थायें बतायी जाती हैं, और चूंकि अवस्था होने का ही नाम उत्पादव्यय है, उसही समय में नवीनपर्याय की दृष्टि से उत्पाद है और पुरानी पर्याय के रूप से विनाश है। जीव का न उत्पाद है, जीव का न विनाश है, ऐसी बात समझने से यह एक साहस जगता है कि मैं जीव तो सदा रहने वाला पदार्थ हूँ । मेरा न नाश है, न जन्म है, और पर्यायरूप से मैं उत्पन्न और नष्ट होता हूँ । तो जो अब तक अज्ञान की पर्याय मिलती आयी उसका विनाश हो सकता है और जो शांति, निर्मलता, पवित्रता अब तक नहीं उत्पन्न हुई है उसकी उत्पत्ति हो सकती है, ऐसा आत्मकल्याण के सम्मुख जीव अपने आपको हित के मार्ग में प्रेरित कर लेता है। जीव में मनुष्यपना और देवपना आदिक क्यों होते हैं? तो यह जीव जैसे भाव करता है उस भाव के अनुसार कर्म बन जाते हैं। कर्म यद्यपि अपने आप में ही हैं और वे अपनी ही सत्ता बनाते हैं तो उन कर्मों का जब उदय होता तो जैसे-जैसे गति नामकर्म का उदय हुआ वैसे ही उनको फल मिलने लगता है। तो देव और मनुष्य पर्यायों को रचने वाला देव गति नामकर्म, मनुष्य गति नामकर्म होता है और वह जब तक उदय में रहता है तब तक उस भव में मनुष्य आयु समाप्त होने पर वह उस भव में नहीं रहता। तो जिनको अपने इस शरीर में अज्ञान नहीं है, भेद प्रकाश है तो वह अंत: अपने को पर्यायरूप नहीं अनुभव करते, इसीलिए उनके आगामी शरीर परंपरा मिलें, ऐसे कर्म नहीं बंधते। जीव तो अमर्यादित है, तीनों काल रहने वाला है। एक जीव द्रव्य है और उसमें पर्याय और गुण दोनों भाव बने रहते है। अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से तो इसकी सत्ता है, दूसरे के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से इसकी सत्ता नहीं है। तो इन पर्यायों में अटककर, इन पर्यायों में व्यापकर रहने वाला जो एक त्रैकालिक भाव है, चैतन्य स्वरूप है उसमें ही यह मैं हूं ऐसा अनुभव हो तो उसका संसार मार्ग छूटता है। अपना सारा भविष्य अपने इस ही निर्णय पर आधारित है कि मैं क्या हूँ, इसका जो उत्तर होगा उसही रूप इसका परिणाम बनेगा। तो अपने चैतन्यस्वरूप को भूलकर जो शरीर में यह मैं हूँ, ऐसा अनुभव बनता, यह घोर अंधकार है और इस अंधेरे में रहने वाला जीव अपने आपको विपत्ति से नहीं बचा सकता। ऐसा यह जीव जीवद्रव्य से शाश्वत अपने आप में ही विहार करने वाला है। जो इस शाश्वतस्वरूप की ओर अपनी धुन लगाये है तो वह नियमत: संसार संकटों से छूटकर उत्तम निर्वाण सुख में पहुंच सकता है। इस तरह इस जीवद्रव्य का शाश्वतपना इन गाथाओं में बताया गया है―पर्यायरूप से उत्पन्न विनष्ट होकर यह जीव वस्तु न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है, किंतु वह शाश्वत एकरूप है।


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