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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 27

From जैनकोष



जीवो त्ति हवदि चेदा उवओगविसेसिदो पहू कत्ता ।

भोत्ता य देहमत्तो ण हि मुत्तो कम्मसंजुत्तो ।।27।।

जीवद्रव्य के विशेष व्याख्यान का आशय―इस ग्रंथ में पंचअस्तिकायों का वर्णन है, जिसकी भूमिका में 5 अस्तिकायों का वर्णन कर दिया गया है । उन्हीं अस्तिकायों में से उनका ही अब विशेष वर्णन चलेगा । समस्त द्रव्यों में प्रयोजनीभूत पदार्थ है जीवद्रव्य । हम आप सब जीव हैं । जीव की ही समस्या सुलझाने के लिए हम अन्य समस्त पदार्थों का भी ज्ञान किया करते हैं । कोई पुरुष अन्य पदार्थों का तो खूब परिचय करे और एक अपने आपका परिचय न करे तो उसने ज्ञान का प्रयोजन और लक्ष्य ही नहीं पाया । कोई पुरुष समस्त अचेतन का भी वर्णन सीख जाय, जीवद्रव्य की बातें करने लगे, किंतु अपने आपका स्वरूप नहीं समझे तो उसने कुछ नहीं किया । अंतस्तत्त्व का ज्ञान करना―यह ज्ञान का प्रयोजन है । इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए विशेष व्याख्यानों में सर्वप्रथम जीवद्रव्य का वर्णन किया जा रहा है ।

चेतयिता―जीव कैसा है? जीव का लक्षण बताने के प्रसंग में एक व्यापक दृष्टि रखकर कहा जा रहा है । कुछ बातें संसारी आत्मा में घटित होंगी कुछ बातें मुक्त आत्मा में धटित होंगी, कुछ बातें संसारी और मुक्त जीवों का ख्याल न रखकर उनकी अपेक्षा न करके एक निरुपाधि स्वरूप का वर्णन होगा । यह जीव चेतयिता है, चेतने वाला है । इस चेतयितृत्व स्वरूप में न संसारी अवस्था को छुवा गया है और न मुक्त अवस्था को छुवा गया है । इसका सहजस्वरूप अपने आपकी सत्ता के कारण जो स्वरूप है वह है चेतन । यह जीव जब चैतन्यस्वरूप के परिचय में नहीं लगता है तब अपने को नाना विशिष्ट उपयोगरूप मानता रहता है और नाना विशेषतावों में फंस जाने से इसकी दुर्गति होती है, संसार में भ्रमण होता है ।

आत्मप्रसंग में सामान्य का महत्त्व―लोक में विशेष की इज्जत मानी गयी है, साधारण की नहीं, यह तो जनरल (general) बात है, इसमें क्या तत्त्व है, कोई स्पेशल बात कहो, लोक में स्पेशल की कदर है, सामान्य की इज्जत नहीं है, विशेष की इज्जत है । किंतु आत्मकल्याण के मार्ग में विशेष की इज्जत नहीं है, सामान्य की इज्जत है । जब जीव की पर्यायों का वर्णन किया जाता है, मार्गणा आदि विशेषतावों का प्रतिपादन चलता है उस प्रसंग में जीव का स्वरूप समझने के लिए केवल इतना भी कह दिया जाता है कि देखो 1 घंटे तक जो हमने कहा है ना, गतिमार्गणा, इंद्रियमार्गणा, कायमार्गणा और जितना विस्तार कहा है ना, वह सब नहीं है, बस समझ लो वह जीव है । लो, विस्तार बताने में घंटों समय लगाया और जीव को कहने में एक अक्षर बोलना पड़ा । यह नहीं, उस ही के साथ कुछ सत् सामान्य तत्त्व उसकी दृष्टि में है, जिसको दृष्टि में रखकर उस समस्त को मना कर रहा है वह है चेतन सामान्य । देखो―एक शुद्ध आत्मा का आलंबन लो, यों उपदेश में बोल लेते हैं ना या वस्तु पर्याय वस्तु का आलंबन ले । पर्याय है विशेष और स्वभाव है सामान्य । आत्मकल्याण के मार्ग में सामान्य की पूछ है, विशेष की नहीं है । यह जीव चेतयिता है ।

जीवत्व का मंडन―भैया ! प्रथम तो यह ही देखिये । जीव है, है के समर्थन में बहुत से मर्म आ जाते हैं । यह आत्मा अथवा यह जीव है । शुद्ध निश्चय से देखा जाय तो ये चैतन्य अथवा ज्ञान आदिक सामान्यस्वरूप शुद्ध प्राणों से जीवित रहते हैं । अत: इसका नाम जीव है । शुद्ध दृष्टि में निरखा जा रहा है कि जो शुद्ध चैतन्य प्राणों से जीवित रहे उसका नाम जीव है । यों तो एक दृष्टि में यों निहार सकते हैं कि जीव, आत्मा और परमात्मा । इन तीन शब्दों से हम एक इस चेतन को तीन पर्यायों में निरखते हैं । जीव के कहने से जो द्रव्य प्राणों से जीता है, जो भवों को धारण कर रहा है, जहाँ जीने व मरने का व्यवहार किया जाता है वह जीव है । यह जीवित है, अब यह मर गया है, ऐसा जीना जिसमें हो उसे जीव कहते हैं । ऐसा जीवन जिसका एक काम बन गया है वह जीव कहलाता है―बहिरात्मा । तो जीव शब्द से अर्थ लेना बहिरात्मा । और आत्मा का अर्थ है जो जाने सो आत्मा । जो व्यापकरूप से जाने उसे आत्मा कहते हैं, ऐसा होता है सम्यग्दृष्टि पुरुष । और परमात्मा कहते हैं उसे जो वीतराग सर्वज्ञ शुद्ध हो चुका हो । यों इन तीन शब्दों को जब हम इस ढंग से रखते हैं तो इन तीनों का आधारभूत जो तत्त्व है उसका नाम है ब्रह्म ।

ब्रह्म, परमात्मा, आत्मा व जीव―इस आत्मा के ज्ञान के प्रकरण में चार चीजें समझिये―ब्रह्म, जीव, आत्मा और परमात्मा । ये चार बातें अन्य संप्रदायों में भी बहुत प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनके ख्याल से जो इन चारों तत्त्वों का स्वरूप उनकी दृष्टि में आता है, उसे स्याद्वाद से लगाये तो इस प्रकार का रूपक बनता है कि ब्रह्म तो है एक चैतन्यस्वरूप जो समस्त पर्यायों में व्यापक है व एक स्वरूप है । जैसे किसी व्यक्ति की प्रशंसा करे कोई तो व्यक्ति का नाम न लेकर किसी भाव या विशेषता का नाम लेकर कहा जाता है । जैसे कोई प्रशंसा करता है―अमुकचंद ने समाज पर बहुत प्रभाव डाला है । अब अमुकचंद का नाम न लेकर यह भी कह सकते हैं कि इस धर्मात्मा की किरण ने समाज पर बड़ा प्रभाव डाला है । ऐसे ही जब हम व्यक्ति रूप में जीवों को न तके और एक चैतन्यस्वरूप के रूप से तके तब हमें वहाँ नानापन नजर न आयगा । अब यों यह ब्रह्म एक हो गया और सर्वव्यापक हो गया।

अद्वैत से द्वैत का प्रसार―उस एक ब्रह्म के जब हम भेदभाव में आते हैं, द्वैतभाव में आते हैं तो हमें जीव, आत्मा, परमात्मा―ये तीन शक्लें नजर आती हैं । यथार्थ ज्ञानी पुरुष जब एक सहजस्वरूप के परिचय में मग्न हो गया है तो वह अद्वैत बन गया है, उसके उपयोग में अद्वैत है, वह स्वयं निर्विकल्प है । अथवा जैसे अद्वैत निर्विकल्प तत्त्व के परिचय में लगा है, देख रहा है, यह केवल एक प्रकाशमात्र है । ठीक, जब उसका यह कुछ एक्सपोजीशन करने चला तो वहाँ द्वैत उत्पन्न हो गया । है तो यह प्रकाश, मगर प्रकाश का अर्थ क्या है? प्रकाशक और प्रकाश्य―ये दो बातें माने बिना प्रकाश का स्वरूप समझ में नहीं आता । अरे कोई प्रकाश करनेवाला है, कोई चीज प्रकाश में आ रही है, इतना ध्यान में न हो तो प्रकाश नाम किसका है? यों अब द्वैत में आया प्रकाशक और प्रकाश्य अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय । अब जब द्वैत का सिलसिला लग उठा है तो द्वैत में द्वैत फूट-फूटकर यह विकल्पों का जाल मच गया है । मूल में इसका एक ही स्वरूप है जो स्वयं निर्विकल्प और अद्वैत है ।

जीव का प्रकाश―यह जीव शुद्ध निश्चय से शुद्ध चैतन्यप्राण से जीवित है, अतएव जीव कहलाता है, और अशुद्ध निश्चय से ये क्षायोपशमिक ज्ञान आदिक प्राणों से जीता है इसलिए जीव कहलाता है, अथवा इन द्रव्य प्राणों से कोई जीवित था पहिले, वह जीव अब शुद्ध है तो भी वह जीव है । यों जीव शब्द की हम चतुर्मुखी दृष्टि बनाते हैं तो यह आत्मा नाना रूपों में प्रकट होने लगता है । यह जीव है, यह मैं हूँ, ऐसा कह-कहकर भी इसका भान नहीं कर पाते हैं । अन्य-अन्य पदार्थों में नाना भावों में मैं हूँ ऐसा कोई भान करे तो वह 'मैं' का भान नहीं कहलाता । जो मैं हूँ उसका ही भान बने तो मैं का भान समझियेगा। जगत के ये समागम मकान, महल, परिजन ये सब विनश्वर हैं, स्वयं मायारूप हैं, स्वयं ही सारभूत नहीं हैं, परमार्थ नहीं हैं । इनके समागम में मुग्ध होना और अपने आपके उस विशुद्ध स्वरूप को भूल जाना, यह अपना ही घात किया जा रहा है ।

विविक्तत्व के श्रद्धान की आवश्यकता―धर्म के प्रसंग में हम तब तक नहीं आ सकते हैं जब तक हम अपने से भिन्न समस्त परपदार्थों का लगाव श्रद्धा में न छोड़ दें । हमारी श्रद्धा ऐसी निर्मल होनी चाहिए कि इस चैतन्यस्वरूप को छोड़कर अन्य परभाव मेरे विस्तार नहीं हैं । जब विभाव भी मेरे नहीं, तब अन्य प्रकट भिन्न चेतन अचेतन परपदार्थों की तो कहानी ही क्या हो? समयसार में बताया है कि परमाणुमात्र भी राग जिसके हो वह सम्यग्दृष्टि नहीं है । उसका प्रयोजन है श्रद्धा में, परमाणुमात्र भी राग जिसके हो अर्थात् रंच राग को भी जो अपना स्वरूप मानता हो कि यह मैं हूँ, वह पूरा अज्ञानी है, चाहे उसने बड़े-बड़े शास्त्रों का परिज्ञान कर लिया हो, लेकिन अपने आपके बारे में रंच राग आया हो, अपना हित, अपना महत्त्व माना हो वह अज्ञानी है, मिथ्यादृष्टि जीव है ।

निर्मल स्वभाव के दर्शन बिना जीवन की विफलता―भैया ! श्रद्धा में तो अपने को निर्मल बना ही लो, अन्यथा यह मनुष्य भव पाना बेकार-सी बात रही । विषयों के भोग, मन की मौज सूकर कूकर, घोड़ा, हाथी अथवा बैल और-और कीड़े-मकोड़े, इन भवों में नहीं मिल रहे थे क्या? जितना प्रिय मनुष्यों को हलुवा पूड़ी होती होगी उतना ही प्रिय ऊँटों को नीम की पत्ती होती है । जो जिस भव में है उस भव के अनुकूल जो जितना भोजन है उसे वह ही प्रिय है । केचुवा आदिक कीटों को मिट्टी ही बहुत प्रिय लगती है । वे मिट्टी का भक्षण करके मौज मान रहे हैं । आज मिल गया इतना ठाठ, खान-पान का साधन तो यह क्या है ? मिट्टी की तरह है, कोई जीव मिट्टी को पसंद करते हैं । यहाँ दो पैरों पर खड़े होने वाले जानवरों ने हलुवा पूड़ी पसंद किया है । देखो सुनकर बुरा न मानना । जानवर कहलाता है वह, जो ज्ञान में श्रेष्ठ हो । जान मायने ज्ञान, वर मायने श्रेष्ठ । जिसके ज्ञान श्रेष्ठ हो उसका नाम जानवर है । जानवर शब्द उच्च है, किंतु किसी मूर्ख आदमी को उच्च शब्द बोल दिया जाय तो वह शब्द गाली कहलाने लगता है ।

चेतना की व्यक्तियां―प्रकरण चल रहा है कि यह आत्मा चेतयिता है । चेतना तीन रूपों में होती है―ज्ञानचेतना, कर्मचेतना और कर्मफलचेतना । चेतना का काम है सबका सम्वेदन करना । मैं हूँ, इस प्रकार की चेतना बनाये रहना चेतना का काम है । जो कोई जीव मैं एक शुद्ध ज्ञानमात्र हूँ, इस प्रकार की चेतना करता है तो उसे कहते हैं ज्ञानचेतना वाला । कोई जीव अपनी करतूत में चेतना लाता है―ज्ञान के सिवाय अन्य जीवों का मैं कर्ता हूँ, इस प्रकार कर्तृत्व की बात लाता है तो उसे कहते हैं कर्मचेतना वाला । इस जीव ने अपने आपको कर्मरूप में, कर्मठ रूप में चेता । अथवा यह आत्मा इन कर्मोंरूप नहीं है, वह शुद्ध ज्ञानचेतना रूप है । इस कारण जो कर्मचेतना रखता है उसको अज्ञानी कहा गया है । कोई जीव अपने आपको भोगने के रूप में चेतता है, मैं विषय को भोगता हूँ । एक शुद्ध ज्ञानस्वरूप के अतिरिक्त अन्य भावों को भोगने की बात जो चित्त में लाता है, चेतता है उसे कहते हैं कर्मफलचेतना वाला । चेतना की बात चूंकि जीव में ही हो सकती है, अतएव इसे चेतयिता कहते हैं।

उपयोगविशेषितता―पूर्व भूमिका में छहों द्रव्यों का वर्णन था और वह सामान्य रूप से था । जो बात सबमें घटित हो वह बात कही गयी थी । अब इस प्रसंग में जीवतत्त्व की बात कह रहे हैं । यह जीव है, यह जीव चेतयिता है और यह उपयोग विशेषित है, उपयोग नाम है यूज का, प्रयोग करने का । ज्ञानशक्ति है तो ज्ञानशक्ति को काम में लाना, इसका नाम है उपयोग । अब जो जीव जिस प्रकार के उपादान वाला है वह अपनी ज्ञानशक्ति का उस प्रकार से उपयोग करता है और यों इसके मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये 5 भेद हो जाते हैं । इन पाँचों में निश्चय से तो यह केवलज्ञानरूप उपयोग से विशेषित है और अशुद्ध निश्चय से मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय―इन चार क्षायोपशमिक उपयोगों से विशेषित है । यह जीव है, चैतन्यशक्ति वाला है, और इस चैतन्यशक्ति का कुछ न कुछ उपयोग प्रतिसमय बनाये रहता है ।

जीव की निर्नामता―यह मैं जीव हूं, मुझ जीव में कोई नाम नहीं खुदा है, सब लोग सोच लो । जो आज नाम रक्खा है किसी ने, किसी दिन रख दिया है? कदाचित् इन शब्दों का नाम न रक्खा होता, कोई दूसरा नाम होता तो कोई उस में यह बाधा आती थी क्या कि यह नाम फिट नहीं बैठता और कुछ नाम धर दो । इसका तो जो नाम धर देते हैं उसी को फिट बैठाने की आदत है । अर्थात् उस प्रकार का व्यामोह है । कोई नाम का संबंध नहीं है इस जीव के साथ । यह तो है एक जीव । जिसमें कि इस प्रकार का उपयोग चलता है, रागद्वेष मोह परिणाम चलते हैं ऐसा है यह । इसका नाम जो रखना है रख दीजिए ।

प्रभुता―यह आत्मा प्रभु है । प्रभु किसे कहते हैं? प्रकृष्ट रूपेण भवति इति प्रभु: । प्र मायने बड़ी तेजी से भू मायने होवे उसका नाम प्रभु है । यह जीव प्रभु है । इसमें बड़ी सामर्थ्य है । यह शुद्धता की ओर जाय तो अपना इतना चमत्कार फैलाता है कि तीन लोक, तीन काल के समस्त पदार्थों को एक समय में एक साथ स्पष्ट जान जाता है । है ना बहुत बड़ा चमत्कार, और यह जीव जब बिगड़ता है तो बहुत बड़ा प्रभाव फैलाता है । न जाने क्या से क्या कर डालें । तो यह जीव प्रभु जब बिगड़ता है और बिगड़कर मानो किसी विशाल वृक्ष के रूप को अंगीकार करता है तो तने-तने में, पत्ते-पत्ते में प्रत्येक लतावों में और कैसी-कैसी ऊटपटाँग डालियों में फैल जाता है । कोई कुछ ढंग है क्या फैलाने का? किसी भी तरह फैल जावे । उनके फूल और फूलों में भी जो मकरकंद होता है तंतु की तरह बिल्कुल पतला, ऐसे इन तंतुवों में इन सबमें यह एक ही जीव कैसा फैल जाता है? यह क्या कम चमत्कार है । यह बिगड़ता है तो ऐसे-ऐसे चमत्कार दिखाता है और जब यह सम्हलता है तो केवलज्ञान जैसा चमत्कार दिखाता है ।

बाहरी बहादुरी―यह जीव प्रभु है । एक तरह से देखो, चाहे मजाक की दृष्टि समझ लो और चाहे एक विशेष चिंतना की दृष्टि समझ लो । सिद्ध भगवान बनकर जो चमत्कार फैलाया, उसमें उनकी क्या तारीफ है? वह तो उनका स्वरूप है । सीधी-सी बात है, सीधा सा खेल है वह तो । केवलज्ञानी होना, लोकाकाश का प्रकाश करना, यह तो सीधा सा खेल है । स्थावर बनकर नाना तरह के त्रस बनकर ढंग-बेढंगे शरीरों को धारण कर, नाना प्रकार के भव पाकर अपना विचित्र विस्तार बनाया, बहादुरी तो इसमें है जीव की । सिद्ध बन गये सीधे-सादे, जैसा स्वरूप है तैसे बन गये, स्वाधीन हो गये, अकेले रह गये, इससे ज्यादा बढ़ाई की बात तो इसमें होगी ना (हँसी) । संसार के प्रत्येक प्रदेश पर यह जन्म लेता है, मरण करता है, इतना सफर कर रहा है और इतनी तरह के विचित्र रूप रख रहा है, शायद इसमें ज्यादा बहादुरी होगी? खैर यहाँ दृष्टि यह कीजिये कि जीव को शांति प्रिय है, इस कारण बहादुरी तो सिद्ध बनने में ही है, किंतु एक परिणति की दृष्टि से देखा जाय तो सर्वत्र परिणतियाँ छायी हुई हैं । शुद्ध निश्चय से तो मोक्ष और मोक्ष के कारणभूत शुद्ध परिणामों से परिणमने में समर्थ है, अतएव प्रभु है और अशुद्धनय से यह नाना संसारी पर्यायों से परिणमता है, अतएव प्रभु हैं । अब जीव के संबंध में कुछ और चर्चायें होंगी ।

अपनी सकल सृष्टियों में प्रभुता―यह जीव स्वयं प्रभु है । यों तो प्रत्येक पदार्थ अपने आपके परिणमन से परिणमनशील है, अतएव सभी पदार्थ प्रभु हैं, किंतु अचेतन पदार्थ में चेतना शक्ति न होने के कारण प्रभुता जैसी व्यवहार की बात नहीं होती है । अत: यहाँ अन्य को प्रभु की विशेषता न कहकर जीव में प्रभुता बतायी जा रही है । यह जीव स्वयं समर्थ है, अतएव प्रभु है । प्रभु नाम समर्थ होने का है । निश्चय से तो यह जीव निज शुद्ध भावों के परिणमन में समर्थ है, और अशुद्ध निश्चयनय से रागादिक भावकर्म के परिणमन में स्वयं ईश है, प्रभु है, और व्यवहारनय से देखें तो द्रव्यकर्मों का जो परिणमन होता है, आस्रव, बंध, सम्वर, निर्जरा और मोक्षरूप जो पंचपर्यायों में कर्मों का भी परिणमन होता है उसमें निमित्त समर्थ यही है । यों यह प्रत्येक स्थितियों में ईश है, अतएव यह जीव प्रभु हैं ।

प्रभुता के वर्णन में शिक्षा―हमें इस प्रभुता के वर्णन से यह समझ लेना चाहिए कि हम अपने दुःख में किसी दूसरे पर विरोध की दृष्टि क्यों डालें? कोई भी परपुरुष मेरे में दुःख उत्पन्न कर ही नहीं सकता । वह जो कुछ करेगा अपने में खुद में करेगा, इससे बाहर उसकी करतूत नहीं है । ऐसी ही मेरी भी बात है । मेरी प्रभुता मेरे तक है, तब किसी परजीव पर अपने दुःख के विरोध की दृष्टि करना मूढ़ता है । इस ही प्रकार किसी राग प्रेम के व्यवहार में जो यह जीव सुख मानता है उस सुख की परिणति में भी परजीवों पर सुखदाता की कल्पना करना मूढ़ता है । अरे आनंदशक्ति से भरा हुआ यह आत्मा बिगड़ते-बिगड़ते कहाँ तक बिगड़े? किन्हीं-किन्हीं प्रसंगों में अपनी ही आनंदशक्ति का कुछ अंश मिल जाता है, उसी को यह जीव भोगता है, पर मोह लगा है, इस कारण परनिमित्त पर यह आरोप करता है कि मुझे इस पर से सुख मिला है, वस्तुत: परपदार्थों की ओर जो इसकी दृष्टि लगी, आकर्षण हुआ, इसे बाह्यवृत्ति के कारण आनंद में बाधा आयी है आनंद नहीं मिलता है।

आनंदप्रभुता―यह मैं आत्मा स्वयं के सुख दुःख और आनंद के निर्वाण में समर्थ हूँ । मैं अपनी ही पर्यायों को अपने ही परिणमन से रचता रहता हूं, किसी अन्य निमित्त पर अन्य आश्रय पर दयनीय दृष्टि रखना―यह मेरा दाता है, यह मेरा कर्ता है, मेरी जान इसके अधीन है, मेरा भवितव्य इसी के ही हाथ है, ऐसी कायरता लेना, यह इस प्रभु को युक्त नहीं है । यह मैं आत्मा स्वयं समर्थ हूँ, एक साहस चाहिए अंतरंग में । आनंद तो चाहिए है ना । वह आनंद जिस विधि से मिले उस विधि के करने में क्यों शंका की जा रही है? आनंद प्राप्ति का उपाय एक केवल निज अंतस्तत्त्व से नाता लगाना है, अन्य कोई उपाय नहीं है । जब किसी भी क्षण दृढ़ता के साथ समस्त परवस्तुवों से नाता तोड़कर श्रद्धा में तो अभी भी तोड़ा ही जा सकता है, परविविक्तता अंगीकार करके केवल अपने आपको देखना इसमें ही कैवल्य को सिद्धि है ।

कैवल्य की दृष्टि में अशांति का अभाव―भैया ! केवलपना अपने उपयोग में आये वहाँ अशांति नहीं होती । जहाँ दूसरे लोग दृष्टि में आयें वहाँ अशांति हो जाती है । किसी के इष्ट का वियोग हो गया हो तो वह इष्ट का ख्याल कर-करके दुःखी होता है, यह दु:ख पर की दृष्टि में ही तो हुआ है । कोई मान लो रोते-रोते बहुत थक गया हो, कुछ विश्राम से बैठा हो और इतने में अपने इष्ट मौसा-मौसी, फूफा-फूफी कोई बाहर से आ जायें, जैसे कि फेरों में लोग आया करते हैं तो उनको दृष्टि में लेते ही फिर यह और तेज रोने लगता है । किसी बाह्य की दृष्टि करना नियम से क्लेश के लिए होता है । यदि इतनी श्रद्धा नहीं है तो जैनधर्म मानने का और अर्थ ही क्या है? पूजा, वंदन, दर्शन, जाप, सत्संग, स्वाध्याय, गुरुसेवा आदि सबका और अर्थ ही क्या है? मूल में यदि यह श्रद्धा है कि बाह्य पदार्थों की ओर दृष्टि करना ही बंधन है, भ्रमण है, रुलना है, क्लेश है, पाप है । यह श्रद्धा हो तब तो उसके ऊपर, इस नींव पर धर्म महल की भीत खड़ी हो सकती है । यह श्रद्धा नहीं है, कर्तृत्व की वासना अंदर पड़ी है तो फिर सब व्यर्थ है । धर्मकार्य का फिर अर्थ क्या रहा?

अपनी बात―भैया ! अपनी बात अपनी भलाई के लिए अपने पर दया करके दृढ़ता के साथ समझ लीजिए । इसमें कुछ आपका जाता है क्या? यहीं बैठे ही बैठे अपने उपयोग द्वारा केवल एक अपने आपमें पहुंचें, और सब समस्याएँ हल कर ली जाये । यह मैं आत्मा चूंकि वस्तु हूँ, इसलिए निरंतर परिणमनशील होता हूँ, एक क्षण भी मेरा परिणमन रुकता नहीं है- और उस परिणमन में मैं ही समर्थ हूँ, कर्ता हूँ, अन्य कोई मुझमें तादात्म्यरूप से मिलकर मेरा परिणमन नहीं करता है, ऐसी स्वतंत्रता, प्रभुता मुझमें है । यह श्रद्धा न हो तो फिर कल्याण के लिए आगे और कोई कदम नहीं हो सकता है ।

जीव का कर्तृत्व―इस प्रकरण में जीवद्रव्य का विशेष व्याख्यान चल रहा है । यह जीव परमशुद्धनिश्चय से अकर्ता है, शुद्ध निश्चय से अपने शुद्ध परिणामों का कर्ता है, जो शुद्धज्ञानादिक भाव हैं उन भावों का कर्ता है, और अशुद्ध निश्चयनय से पुद्गल कर्मों का निमित्त पाकर जो रागादिक भाव उत्पन्न होते हैं उन रागादिक भावों का कर्ता है और व्यवहार से इन रागादिक भावों के कारण जो कर्मबंध आदि होते हैं उन पौद्गलिक कर्मों का कर्ता है । कैसी निमित्तनैमित्तिक योग के कारण गुत्थी बनी हुई है? यह जीव पुद्गल परिणमन के निमित्त रागादिक करता है, इसके दो मुख्य अर्थ हो जाते हैं । कर्मों के उदय का निमित्त पाकर रागादिक भावों का कर्ता है और रागादिक भावों का कर्ता कर्मबंध के निमित्त होता है अर्थात् रागादिकभाव करके ये कर्मबंध करेंगे । इसके विभावों के कारण इस पर दोहरी मार पड़ रही है―आंतरिक मार और बहिरंग मार । आंतरिक मार का नाम है घातिया और बहिरंग मार का नाम है अघातिया । ये बहिरंग साधन सीधे मेरा घात नहीं करते, किंतु मेरा घात करने वाले परिणामों के लिए सहायक साधन बनता है ।

व्यामोह और बंधन―अहो यह आत्मा अनंत प्रभुशक्ति होकर भी आज कैसा बंधन में जकड़ा हुआ है? जकड़ा तो अनादि से है, पर दृष्टि में अब आया है । अब की बात कही जा रही है । कैसा जकड़ा हुआ है? कर्म और जीव का तो निमित्तनैमित्तिक योग सहित एकक्षेत्रावगाही बंधन है । मूढ़ता की बात तो देखो―जो भिन्न क्षेत्र में रहता है, अत्यंत भिन्न है, जिस पर मेरा रंच भी अधिकार नहीं है, अपने-अपने कर्मों को लिए हुए है, अपनी परिणति से अपनी दशाएँ बनाता फिर रहा है―ऐसे दो-चार जीवों को अपना कुटुंब मानकर उपयोग में केवल उनके लिए ही अपने को मान रखा है । मेरा तन, मन, धन, वचन सब कुछ इन परिजनों के लिए है, बाकी जीव तो सब गैर हैं, यों व्यामोह कर रखा है । अरे उन गैरों में से फिर कोई जीव आज घर में पैदा हो जाय तो वह भी इसकी कल्पना में अपना बन गया और इन माने हुए अपने में से मरकर कोई दूसरी जगह, पड़ोसी के यहाँ पैदा हो जाय तो वह अब गैर हो गया । क्या बावलेपन जैसी बात है? थोड़ी देर में उसी जीव को, अपना कह डाला, थोड़ी देर बाद उसी जीव को गैर कह डाला, गैर को फिर थोड़ी देर बाद अपना कह डाला, यह कैसा मोह का नशा चढ़ा हुआ है? किसी बात पर टिक नहीं सकता यह जीव ।

पर का अकर्तृत्व―सांसारिक परिस्थितियों में भी यह जीव करने वाला किसी दूसरे का नहीं है । कहीं किसी को अपना मान लेने से अपना नहीं हो जाता । कभी किसी परपरिणति का, मैं कर्ता हूं, ऐसा मान लेने से कहीं यह उसका कर्ता नहीं हो जाता । यह तो सर्वत्र अपने ही परिणमन का कर्ता है । यदि अपना मान लेने से कुछ अपना हो जाय तो इस संसारी की महिमा भगवान से भी बड़ी हो जायगी । जो भगवान नहीं कर सकते उसे यह संसारी करके दिखा रहा है, पर ऐसा है ही नहीं । जैसा जो है वह भगवान के ज्ञान में आता है । जो जैसा नहीं है वह ज्ञान में नहीं आता । हम कल्पना कर-करके अपने को उल्झन में डाल लें, यह मेरा है, यह मेरा है, डाल ले, पर भगवान तो यों नहीं जानते कि यह घर इनका है । आप कह रहे हो कि यह मेरा घर है और यहाँ के 10 आदमी भी कहते हैं कि यह घर इन साहब का है, पर क्या ऐसा भगवान के ज्ञान में भी ज्ञात है कि यह घर इन साहब का है । यदि भगवान यों जान जायें कि यह घर इन साहब का है तो फिर यह ऐसी रजिस्ट्री की बात हो गयी कि समझो फिर वह घर उनका मिट नहीं सकता । सरकार की रजिस्ट्री तो काल पाकर फेल हो सकती है । सरकार की भी नियत बदल जाय या कोई भी बात कर डाले । एक संकटकाल का कानून होता है आपकी बनी बनाई हवेली कहो हड़प ले और कहे कि तुम जावो अन्य जगह रहो, यहाँ आफिस बनना है । लो अब तो कुछ बात भी नहीं रही । यह सब न कुछ चीज हो जायगी । भगवान जान लेवें कि यह घर इनका है तो फिर पचासों लोगों से बताने की जरूरत नहीं है ।अरे जो असत्य है उसे भगवान नहीं जानते । यह अपनी कल्पना में जो चाहे बात बनाकर रहे ।

जीव का भोक्तृत्व―मैं केवल अपने परिणामों का कर्ता हूँ, अपना ही स्वामी हूँ, इससे आगे मेरी कोई कला ही नहीं है । यह आत्मा कर्ता भोक्ता है―किसका, इसका निर्णय तो कर लो । यह आत्मा भोक्ता है निश्चय से तो अपने शुद्ध आनंद परिणाम का भोक्ता है, जो अपने सत्त्व के कारण और अगुरुलघुत्व गुण के कारण स्वयं में जो सहज बीत सकती है, ऐसी स्थिति का यह भोक्ता है, अनुभवन करने वाला है । अशुद्ध निश्चयनय से पुण्य पाप कर्मों का निमित्त पाकर जो जीव में सुख दुःख परिणाम हुआ करते हैं उन सुख दुःख परिणामों का यह भोक्ता है और व्यवहार से इष्ट अनिष्ट विषयों का भोक्ता है। जैसे कि लोग कहते हैं कि मैंने भोजन भोगा, मैंने अमुक चीज भोगी, संपदा भोगी, यह व्यवहारनय से कहा जाता है । वस्तुत: यह जीव जो अपने में बात गुजरती है उसका ही भोगने वाला है, अन्य किसी का नहीं । भोजन करते समय जो कल्पना में यह बात आयी यह बड़ा मीठा है, यह बड़ा स्वादिष्ट है, और कल्पनाएँ जगने से मौज मानता, वहाँ कल्पनाओं का सुख आ रहा है, वह भोजन में से सुख नहीं आ रहा है । भोजन में जो रस पड़ा हुआ है उस रस का ज्ञान तो यह कर रहा है, निश्चय से उस रस का भी यह ज्ञान नहीं कर रहा है, किंतु उस रस को विषयभूत बनाकर अपने आपके ज्ञान में जो परिणमन कर रहा है उसको ही जान रहा है ।

स्वयं का ही ज्ञातृत्व और भोक्तृत्व―जैसे कहते हैं ना भगवान सर्वज्ञदेव परमात्मा निश्चय से आत्मा को ही जानते हैं और व्यवहार से सबको जानते हैं । उसका अर्थ क्या है? परमात्मा सब पदार्थों में तन्मय होकर जैसे कि अपने जानन परिणमन में तन्मय होता है, इस तरह तन्मय होकर पदार्थ को नहीं जानता, वह तो अपने आपमें तन्मय होकर अपना जानन बनाता है । इस कारण जैसे परमात्मा को हम कहते हैं कि निश्चय से वह अपने आत्मा को जानता है और व्यवहार से सबको जानता है, ऐसी ही बात हमारी आपकी सबकी है । निश्चय से तो भोजन आदिक प्रसंगों में भी हम अपने को जानते हैं । अपने को जाना इसने विभावरूप में, पर जाना अपने को और व्यवहार से उस भोजन को जाना । निश्चय से इस जीव ने अपने आनंदरस का स्वाद लिया, व्यवहार से उस भोजन मिठाई का स्वाद लिया, यों कहा जाता है । मैं वस्तुत: अपने ही परिणामों का भोक्ता होता हूँ, यह श्रद्धा अमृत है, इसको जो पीवेगा, जो इस श्रद्धा को रखेगा उसका जीवन सफल है । वह प्रभु अंतरंग में निराकुल रहता है । प्रभु की भक्ति के एवज में हमको यही बड़ा प्रसाद मिलता है, जो अंत: निराकुल रह सकता है, यह मैं आत्मा अपने परिणामों का ही अनुभवने वाला हूँ ।

जीवपरिमाण―हूं मैं कितना निश्चय से? तो मैं असंख्यातप्रदेशी होने के कारण लोकप्रमाण हूँ और यह लोकप्रमाणपना जीव में शाश्वत रहता है । भले ही विस्तार में लोकप्रमाण नहीं है, पर इसके अंत:प्रदेश को निरखकर लोकप्रमाणता ही शाश्वत रहती है, और व्यवहार से जैसा शरीर पाया, जैसी अवगाहना का परिणमन पाया, नामकर्म के द्वारा रचा हुआ छोटा और बड़ा शरीर पाया, उसमें रहता हुआ वह जीव देह मात्र है । इस समय ऐसा ही तो लग रहा है कि मैं देह प्रमाण हूँ, लेकिन एक ध्यान और दीजिए । देहप्रमाण होकर भी अपने उस शुद्ध चैतन्यस्वभाव में मग्न होता है तो उसे देह प्रमाण की खबर नहीं रहती है । अनुभव चलता है आत्मप्रदेशों में ही, पर अनुभवन की सीमा का विकल्प नहीं रहता । जैसे कि लौकिक सुख दुःख भोगने के समय अपनी सीमा याद रहती है, मुझे बड़ा दुःख हो रहा है । कहाँ हो रहा है हाथ में कि पैर में कि सिर में? इतना तक भेद डाल देते हैं, पर स्थान भेद के समय चैतन्यस्वभाव के उपयोग के समय इसके उपयोग में देहप्रमाणता का भी विकल्प नहीं है, केवल एक चित्स्वरूप का अनुभव है, कोई दूसरी बात ही नहीं है, ऐसे शुद्ध ध्यान के समय जो अद्वैत की स्थिति होती है उसी स्थिति को लक्ष्य में लेकर कुछ लोगों ने सर्वथा अद्वैत मान लिया है । मैं सर्वदा एक हूँ, एक ही मैं आत्मा हूँ, सर्वव्यापक हूँ, यों मान्यता हो गयी । स्वभाव के उपयोग में चूंकि द्वैत का, दो का विकल्प नहीं रहता है, इस स्थिति को सर्वथा के रूप में कुछ लोगों ने मान लिया है । यह मैं आत्मा शरीर प्रमाण हूँ, फिर भी निश्चय से लोकप्रमाण असंख्यातप्रदेशी हूँ ।

उपाधिबंधन―भैया ! जीव की कथनी जब चले तब कहीं दूसरे जीव की ही बात कही जा रही है, ऐसी दृष्टि न लायें । मेरी ही यह बात है, यों इसको अपने आप पर घटित करते हुए ही निरखना चाहिए । यह मैं आत्मा व्यवहार से कर्मों के साथ एकमेक चल रहा हूँ, बड़ा विचित्र बंधन है कर्मों का और जीव का । सोचने में यों आता है कि आत्मा तो रूप, रस, गंध, स्पर्श रहित है, अमूर्त है, और ये कर्म मूर्तिक हैं । अमूर्त का मूर्त के साथ बंधन कैसे हो गया? इसमें गांठ नहीं लग सकती, इसमें प्रतिघात नहीं हो सकता, फिर यह बंधन कैसे हो गया? आश्चर्य होता है और बंधन इतना तीव्र है कि उस बंधन की दृष्टि से जब देखते हैं तो यों भी कह दिया जाता कि जीव और कर्म का एकत्व परिणमन हो गया । इतना कठोर बंधन है ।

उपाधिबंधन में अमूर्त जीव की मूर्तता―जीव का बंधन निमित्तनैमित्तिक भाव में शुरू होता है और परवशता इतनी बढ़ जाती है कि यहाँ तक नौबत आ गयी है । यह जीव शरीर में भी इतना बँधा हुआ है, एक क्षण भी शरीर से अलग हटकर हम किसी जगह बैठना चाहें तो नहीं बैठ पाते हैं । कहीं जाये तो इस शरीरीपिंडोला को लिए-लिए जायेंगे । जब बहुत तेज गर्मी पड़ती है और प्यास से व्याकुल होते हैं, पीते जाते हैं पानी, गले तक भर गया फिर भी प्यास लगी है । दो घूँट पानी भी नहीं जा सकता, बेचैन हो रहे हैं । अपना ही शरीर अपने को दु:खद मालूम पड़ने लगता है, पर इस शरीर से पृथक् स्वरूप का चिंतन भी जब महान संकटों को टाल देता है तो जो प्रभु उस शरीर से सर्वदा के लिए पृथक् हो गये हैं, केवल ज्ञानपुंज आनंदघन अपने स्वरूप में अवस्थित हैं, उनका तो नि:संकट स्वरूप है । यहां के संकटों को कभी-कभी टालने का श्रम किया जाता है । ये सब व्यर्थ की बातें हैं । कोई मूलत: संकट टालने का उद्योग बने । सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्ररूप उपयोग बने तो इस प्रकार संकट टलेंगे, फिर आगामी काल में संकट आयें ही नहीं । इस प्रकार से नि:संकट अवस्था बने तो वह है वास्तविक नि:संकट स्थिति । यह मैं आत्मा व्यवहार से कर्मों के साथ एकमेक होने के कारण मूर्त बन गया हूँ, फिर भी निश्चय से देखा जाय तो रूप, रस, गंध, स्पर्श का मुझ में स्वभाव नहीं है, इस कारण मैं मूर्त नहीं हूँ, अमूर्त हूँ ।

अधिकार गाथा का दर्शन―जीव के संबंध में जीव की इन विशेषतावों को निरखा जा रहा है । इस गाथा में जीव का स्वरूप बतलाया जा रहा है और साथ ही यह भी घोषित हो रहा है कि इस-इस प्रकरण को लेकर आगे विस्तार से वर्णन किया जायगा । यह जीव है, यह चेतयिता है, यह उपयोग सहित है, प्रभु है, कर्ता है, भोक्ता है, देहमात्र है, मूर्तिक है, कर्मसहित है । इन सभी प्रकरणों पर अलग से कभी-कभी कथन में वर्णन किया जायगा और इन सबको स्पष्ट किया जायगा । इस प्रकरण को सुनकर हमें अपने आपके सही स्वरूप का निर्णय रखना चाहिए ।

जीव की कर्मसंयुक्तता―यह जीव कर्म से संयुक्त है । यहाँ अनेक दृष्टियों से इस कर्मसंयुक्तता को देखने पर जीव की अनेक परिस्थितियाँ समझ में आती हैं । परमशुद्ध निश्चयनय से तो यह जीव कर्मसंयुक्त नहीं है । यह शुद्धनय केवल सहजस्वभावरूप अपने को दिखाता है । शुद्ध निश्चयनय से यह जीव अपने ज्ञान दर्शन आदिक गुणों की जो शुद्ध क्रियाएँ हैं उन क्रियावों से संयुक्त है । क्रिया और कर्म दोनों का एक ही अर्थ है । सिद्ध और अरहंत प्रभु की जो उन ज्ञानादिक गुणों की परिणतियाँ हो रही हैं वे परिणतियाँ ही परमात्मा के कर्म हैं । कर्म का अर्थ है जो किया जाय, जो हो जाय, जो परिणति बने । ऐसे शुद्धनिश्चय से शुद्ध चैतन्यपरिणामात्मक कर्मों से संयुक्त है यह जीव । इसमें जीव की उत्कृष्टता प्रसिद्ध होती है अशुद्धता नहीं । अशुद्ध निश्चयनय से यह जीव पुद्गल परिणामों के अनुरूप, निमित्तभूत कर्मोदय के अनुरूप जो चैतन्यपरिणमन होता है, गुणों की परिणतियाँ होती है, तदात्मक भावकर्म से संयुक्त है, यों कर्मसंयुक्त है । व्यवहारनय से यह जीव इन अशुद्ध चैतन्य परिणामों के अनुरूप जो पुद्गलकर्म का बंधन हुआ है, जो-जो भी स्थितियाँ हुई हैं उन पुद्गल परिणामात्मक कर्मों से संयुक्त है । यह जीव इस प्रकार कर्मसंयुक्त है ।

विशेषणों की खंडनमंडनात्मकता―जीव की विशेष व्याख्या में 9 विशेषण दिये हैं । इन 9 विशेषणों से जीव का ज्ञान तो कराया गया है, साथ ही साथ जो जीव के संबंध में किसी एकांत स्थान का हठ करते हैं उनके एकांत का खंडन भी हो जाता है । प्रत्येक शब्द खंडनमंडनात्मक होता है । शब्द का क्या अर्थ है? जो है वह तो मंडन हुआ, इसके अलावा और कोई दूसरा अर्थ नहीं है यह खंडन हुआ । प्रत्येक शब्द खंडनमंडन स्वरूप को लिए हुए है । हम प्रयोजनवश खंडन पर दृष्टि नहीं डालते हैं, पर जो कहा गया है वही तो कहा गया, अन्य तो नहीं । हम मंदिर जाते हैं, मंडन हो गया मंदिर जाने का । हम और किसी अन्य जगह नहीं जाते, यह भी तो साथ-साथ उसमें भरा हुआ है ।

नास्तिकता का परिहार व अचित्स्वभाव का परिहार―जो जीव के ये विशेषण कहे गये हैं उनसे क्या मंडित होता है और क्या निराकृत होता है? इसे सुनिये । सर्वप्रथम विशेषण तो जीव की सिद्धि के लिए है । जीव है, अनेक लोग तो ऐसे हैं चारर्वाक आदिक कि जीव की सत्ता ही नहीं मानते । जीव है इतना कहने में अपने आप यह सिद्ध हो गया कि जीव का अभाव नहीं है इससे नास्तिकवाद का निराकरण हो जाता है । इनके बाद कहा है कि चेतन है यह जीव । अनादिकाल से यह जीव चैतन्यस्वरूप को लिए हुए हें । कुछ लोग जीव को मानते भी है, पर उसे चैतन्यरूप से नहीं मानते । ये अनेक के संयोग होने से जीव की यह परिस्थिति बन गयी है ।एक ऐसी बिजली पैदा हो गयी कि यह चलता है, फिरता है, खाता है, इसमें चैतन्य का काम नहीं है । चेतना क्या अलग से है ये? ऐसा भी मानने वाले कुछ लोग हैं ।

उपयोगस्वरूपता―तीसरे विशेषण में यह प्रकाश दिया है कि यह आत्मा अनादिकाल से चैतन्यस्वरूप को लिए हुए है, यह तो ठीक है अथवा सामान्य चेतना का तो वर्णन प्राय: सभी मत करते हैं । उन मतों में भी साधारण रूप से पाया जाता है । उसके बाद विशेषण दिया है, यह उपयोग से विशेषित है । यह विशेषण आत्मा के जानन-देखन के उपयोग का मंडन करता है और साथ ही सर्वज्ञ की सिद्धि भी करता है । मोक्ष का और मोक्ष के साधन का भी संकेत करता है । इस जीव का जो कुछ भविष्य है वह उसके उपयोग पर निर्भर है इस बात को प्रकट करते हैं । है भी यह बात । हम जैसा उपयोग करें वैसा ही हममें प्रभाव होता है । हम जब दुःख के अनुरूप अपनी कल्पना बनाते हैं तो उन तात्कालिक ज्ञानों के परिणाम में दुःख मिलता है । ऐसी ही सुख की बात है । जब हम शुद्ध ज्ञानपरिणति को निहारते हैं तो हममें आनंद प्रकट होता है । यों हमारा सारा भविष्य हमारे उपयोग पर निर्भर है ।

प्रभुता के मर्म―इसके बाद विशेषण दिया है कि यह जीव प्रभु है, समर्थ है । इस प्रभुता का विशेषण कहने से हमारी शिक्षा के लिए दो बातें आती हैं । एक तो मैं प्रभु हूँ अर्थात् संसार में रुलूँ, मोक्षमार्ग में लगूँ, इन सब बातों के लिए मैं समर्थ हूँ । दूसरी बात―परमात्मा भी प्रभु है और इसी कारण प्रभु की ध्वनि में प्रकट हुए प्रत्येक वचन प्रामाणिक हैं, क्योंकि वह प्रभु हैं । जिनेंद्र भगवान के वचनों में कहीं भी कुछ शंका के योग्य बात नहीं है । यह आत्मा प्रभु है, इस प्रभुता के विशेषण से जो लोग अपने को पराधीन मानते हैं, दूसरों की दृष्टि में हमारा जैसा नंबर आये तैसा ही होनहार है, इस प्रकार के जगत् कर्तृत्व का खंडन होता है ।

जीव की निष्कर्मता―प्रभुता के विशेषण से आत्यंतिक शुद्धता का समर्थन होता है। कोई इस प्रकार का विचार लिए हुए है कि यह जीव तो सदैव रागी रहेगा ही । भले ही किसी क्षण राग मंद हो जाय, इतना मंद हो जाय कि वह वीतराग जंचने लगे । इतना होने पर भी कुछ समय के बाद चाहे वह चिरकाल का समय हो, राग आयगा, उसे संसार में आना होगा, जन्म मरण करना होगा, रुलेगा । ऐसी ही मुक्ति का नाम वैकुंठ है । जीव तपस्या करके वैकुंठ में पहुंच जाता है और वहाँ चिरकाल तक खरबों वर्षों तक रहता है, पर कुछ समय बाद ईश्वर के मन में आया, राग पैदा कराकर ढकेल दिया, ऐसा भी कोई लोग मानते हैं । यह वैकुंठ क्या है? नवग्रैवेयक, जो जैन सिद्धांत में ग्रैवेयक कहा गया है; उसकी ऐसी ही स्थिति होती है । ग्रीवा मायने भी कंठ है, और ग्रीवा से ग्रैवेयक बना है, और बैकुंठ भी कंठ से बना है । लोक की जो रचना है उस रचना में जो मनुष्याकार लोक रचना है उसके कंठ का जो स्थान है वह ग्रैवेयक है । ग्रैवेयक का लाभ अपनी उग्र तपस्या से और व्रत समता आदिक परिणामों से उत्पन्न हो जाता है । वहाँ 31 सागर पर्यंत भी देव रहते हैं । इन वैकुंठवासियों के मंद कषाय है, कषाय नहीं के बराबर अर्थात् शुक्ल लेश्या है । एक इस ही को दृष्टि में लेकर यों कह दिया कि राग नहीं है । वह भगवान हो गए हैं, लेकिन जब आयु का क्षय होता है तो उन्हें आकर जन्म मरण के चक्र में फंसना ही होता है । ऐसा तो फंसाव अब भी है उनके । वे ग्रैवेयक तक उत्पन्न हो जाते हैं, पर राग अभी भी नहीं छूटता । जीव कभी रागी नहीं होता, इस बात का खंडन इस विशेषण ने किया है । जीव प्रभु है ।

स्विपरिणामकर्तृत्व―वीं बात बतायी है जीव के संबंध में कि अपने आपके परिणामों का यह जीव कर्ता है । अपनी जितनी भी यह दृष्टियाँ करेगा उसका यह स्वयं ही परिणमयिता है । अन्य पदार्थ केवल निमित्तमात्र हैं । इस कर्तृत्व के विशेषण से मंडन यह किया कि शुद्ध अथवा अशुद्ध जो भी परिणमन होता है उसका यही जीव कर्ता है । साथ ही जो सिद्धांत जीव को अकर्ता कहता है और उस अकर्तृत्व का एकांत हठ करता है उसका निराकरण होता है । कुछ बंधु ऐसा मानते हैं कि यह जीव अकर्ता है, पुण्य पाप शुभ अशुभ यह कुछ नहीं करता । यह तो सदाकाल शुद्ध रहता है । फिर पूछा जाय तो यह सुख दुःख का अनुभवी कैसे होता है, करता तो कुछ नहीं है, तो उनका उत्तर यह है कि बुद्धि के मार्फत जो कि प्रकृति का विकार है जीव की चीज नहीं है । बुद्धि में आये हुए अर्थ को यह भ्रमवश चेतने लगता है । बहुत बातें करने के बाद तो बात टिक नहीं सकती इस सिद्धांत की । भ्रमवश चेतने लगना तो यह भ्रम किसमें जगा? प्रकृति में जगा । तो प्रकृति ही कुछ अनुभव करे । फिर यह चेतन किसे अनुभव करता है, यह सिद्धांत उन्हें बताया जा रहा है जो जीव को अकर्ता तो मानते हैं? लेकिन भोक्ता साथ-साथ मानते हैं । अकर्ता और अभोक्ता दोनों माने तो एक नय से यह बात उनकी घटित हो जाय, पर अकर्ता तो माना, अभोक्ता नहीं माना । भोगने वाला यह जीव है, किंतु कर्ता नहीं। उस मत का इसमें निराकरण होता है ।

स्वयं भोक्तृत्व―यह जीव भोक्ता है, ऐसा कहने से यह सिद्ध हुआ कि अपनी करनी अपनी भरनी । ऐसा स्वच्छंद मत हो कि जो मन में आये सो करो । अरे जो करोगे उसे भोगोगे। इस विशेषण में उस मंतव्य का खंडन होता है जो मंतव्य जीव को भोक्ता नहीं मानते । कर्ता तो मान लेते हैं और भोक्ता नहीं मानते । जैसे क्षणिकवाद में इस जीव ने पाप किया, अब वह जीव पाप करके नष्ट हो गया । क्षणिक सिद्धांत है । नया जीव उत्पन्न हुआ । तो जिसने किया उसने तो नहीं भोगा । भोगने वाला कोई दूसरा बन गया, किंतु ऐसा तो नहीं है, जो कर्ता है वही भोक्ता होता है ।

जीव की देहप्रमाणता―यह जीव देहप्रमाण है । कुछ लोग मानते हैं कि यह जीव बट के बीज की तरह, अत्यंत छोटा है और यह सारे देह में चक्कर लगाता रहता है । इससे मालूम पड़ता है कि मैं देह बराबर हूँ । कुछ लोग यह मानते हैं कि यह आत्मा तो एक समस्त लोक में फैला हुआ व्यापक है । ये दोनों परस्पर में विपरीत सिद्धांत हैं । किसी को अणुमात्र मान लेना और किसी को सर्वव्यापक मान लेना―इन दोनों बातों का निराकरण अथवा मंडन इसमें हुआ है । अणुमात्र का मंडन तो नहीं होता, पर कदाचित् यह जीव अत्यंत छोटे शरीर में पहुंच जाय, तो वहाँ उस देहप्रमाण रहता है । यह जीव असंख्यातप्रदेशी है । इसमें वह योग्यता है, शक्ति है कि किसी समय एक क्षण जैसे कि लोकपूरण समुद्घात में होता है, आत्मा का एक-एक प्रदेश पर विरल होकर विस्तृत हो जाता है।

जीव की अमूर्तता―यह जीव अमूर्त है । कुछ लोग इस जीव को अमूर्त नहीं मानते । नैयायिक, मीमांसक, कपिल आदि मंतव्य में जीव का वर्णन करके भी जीव की ऐसी अमूर्तता जो देह से अत्यंत विविक्त निर्मल आकाशवत् निर्लेप सहज स्वरूप समर्थ एक द्रव्य है, इस प्रकार की स्पष्टता नहीं आती । अमूर्त कहने से यह सिद्ध किया गया है कि जीव शरीर के बंधन में रहकर भी नाना परिणतियों से विचित्र परिणाम करके भी यह सदैव रूप, रस, गंध, स्पर्श रहित रहता है ।

निष्कर्मता और कर्मसंयुक्तता―यह जीव कर्मसंयुक्त है । द्रव्यकर्म और भावकर्म इसके साथ लगे हुए हैं । ऐसा न जानना कि यह जीव अनादिकाल से ही कर्मरहित है, इस पर कभी कर्मों का लेप ही नहीं है । देखिये―आखिर ये सभी सिद्धांत जिन एकांतों का निराकरण किया है वे सभी बातें जीव में पायी जाती हैं और अपनी-अपनी दृष्टि से वे सब बातें सच हैं । यह जीव सदा मुक्त भी है । हम आप अनादिकाल से मुक्त हैं । कोई एक अलग से प्रभु की बात नहीं कही जा रही है । जरा स्वभाव तो देखो―क्या जीव के स्वभाव में कर्मों का लेप रहना पड़ा हुआ है । जैसे जल के ऊपर मिट्टी का तेल गिर जाय तो वह मिट्टी का तेल जल में सब ओर फैल गया है, पर जल का स्वभाव क्या मिट्टी के तेल को ग्रहण कर लेना है? पृथक् रहना है । और देखते ही हैं कि तेल तैरता रहता है । यहाँ का वहाँ डोलता रहता है, जल उसे आत्मसात् नहीं करता । तो भले ही लेप है, पर जल का स्वभाव तेल से अलग बना रहने का है । ऐसे ही यह निरखो कि भले ही इस जीव में रागद्वेष का विभाव आ गया, कर्म और शरीर का बंधन हो गया, इतने सब उपद्रव होने पर भी यह जीव स्वभाव से अपने स्वरूपमात्र है । कुछ भी हो जाय, स्वभाव नहीं बदलता । उस स्वभावदृष्टि से देखने पर यह जीव सदाशिव है सदामुक्त है ।

जीवस्वरूप की दृष्टि―इस गाथा ने हम को जीव के मंडन की दृष्टि दी व जो बात जीव में नहीं है अथवा एकांत है उसके निराकरण की दृष्टि दी, और इस प्रकरण में आगे जो वर्णन चलेगा वह वर्णन इन 9 बातों को पुष्ट करता हुआ चलेगा । इस प्रकरण में इतने प्रकरण और गर्भित हैं । यों भूमिका के बाद जो ग्रंथ में प्रायोजनिक स्वरूप कहा जा रहा है उसमें यह प्रकरण गाथा की तरह माना जाता है । इससे सीधा हम यह समझें कि यद्यपि कर्मउपाधि के कारण मिथ्यात्व रागादिक विभावरूप परिणमन हो रहा है लेकिन इनका त्याग कर स्वभावदृष्टि कर के उनको श्रद्धा से हटाकर ये मैं नहीं हूँ ऐसा मानकर मैं तो एक निरुपाधि केवलज्ञानदर्शन आदिक गुणों से तन्मय शुद्ध जीवास्तिकाय हूँ, ऐसी भावना करना चाहिए ।

धर्मी का लक्ष्य―जब तक धर्मी का सद्भाव हमारे उपयोग में न होगा तब तक हम उसमें धर्म सिद्धि नहीं कर सकते । कैसा इस जीव के वर्णन में आदान-प्रदान है, पर इसको किस शब्द से कहा जाये? इसको बताने वाला कोई शब्द नहीं है । हम जो शब्द बोलेंगे वह धर्म बन जाता है । धर्मी को बताते वाला तो केवल अनुभव है, जो शब्द में कह दिया वह उसका एक अंश होगा, धर्म होगा । हां उस एक धर्म को हम इस रूप में ग्रहण करते हैं कि हम धर्मी का ज्ञान कर लें ।

उपेक्षासंयम से स्वरूपलाभ―अपने आपका ज्ञान करना हो तो बहुत सीधा तरीका यह है कि कम से कम इस ज्ञान का तो उपयोग रखें ही कि जगत में जितने भी समागम मिले हैं―धन, वैभव, घर, परिजन, यश, ये सब असार और भिन्न चीजें हैं, इतनी बात जाने बिना तो जीव अनुभव करने का पात्र ही कोई नहीं होता । पर के संबंध में यथार्थ हमारा जैसा ज्ञान हुआ, दृढ़ता में इस ही प्रकार जानकर विश्राम से बैठ जाये । मुझे इन भिन्न असार परपदार्थों को ख्याल में नहीं लेना है । क्या करना है? हमें कुछ पता नहीं । हम तो इतना जानते हैं कि जो भिन्न चीजें हैं, असार हैं, जिनसे कुछ संबंध नहीं है उनको हम अपने ख्याल में न लें । परवस्तुवों को अपने ध्यान में न रक्खें, उन्हें अपने ज्ञान में स्थान न दे, ऐसा शुद्ध विश्राम करें तो यह जीव स्वयं सहज ही अपने आपके स्वरूप का परिचय पा लेगा, प्रतिभास प्रकाश और शुद्ध विशिष्ट आनंद अनुभव कर लेगा, और तब स्पष्ट समझ जायगा कि ऐसा ज्ञानानंदमात्र मैं आत्मा हूँ ।



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