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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 35

From जैनकोष



जेसिं जीवसहावो णत्थि अभावो य सव्वहा तस्स ।

ते होंति भिण्णदेहा सिद्धा वचिगोयरमदीद ।।35।।

अशुद्ध जीवत्व का अभाव―सिद्ध भगवान के स्वरूप के वर्णन में कहा जा रहा है कि जिनके जीवस्वभाव तो नहीं हैं फिर भी उनके सर्वथा अभाव नहीं है । जीवस्वभाव से यहाँ तात्पर्य द्रव्यप्राण और भावप्राण के धारण करने से है । सिद्ध भगवान में जीवत्व नहीं है, क्योंकि द्रव्यप्राण और भावप्राण से अपने स्वरूप को नहीं रखते, फिर भी उनका सर्वथा अभाव नहीं है । यहाँ मुख्य दृष्टि इस ओर देना है कि दुनिया को और कुछ दार्शनिकों को जिन्हें जीवस्वभाव का परिचय है वह है अशुद्ध जीवस्वभाव, रागद्वेष आदिक भाव । और अंतर में चलो तो क्षायोपशमिक ज्ञानादिक भाव इन सब भावों का सिद्ध भगवान में अभाव है और कुछ दार्शनिक भी किन्हीं शब्दों में ऐसा मानते भी हैं ।

दार्शनिकों द्वारा भी अशुद्ध जीवत्व के अभाव का समर्थन―कोई दार्शनिक कहते हैं कि जैसे दीपक बुझ गया, इस तरह से आत्मा बुझ गया । जब तक इसमें जानने समझने की चेतना रहती थी तब तक यह अशुद्ध था, संसार में रुलता था । जब इसकी चेतना बुझ गयी, जानना देखना यह सब दूर हो गया तो उसकी मुक्ति हुई । कुछ लोग तो संसार अवस्था में भी ज्ञान का स्वभाव नहीं मानते । उनके मंतव्य से आत्मा में ज्ञान का संबंध होता है तब यह आत्मा जानता है । ज्ञान का संबंध हट जाय तब आत्मा का शुद्ध स्वरूप समझ पायेंगे ऐसा भी मंतव्य है । इन सबकी दृष्टि से यह कहा है कि ऐसा जीवस्वभाव अब मुक्त अवस्था में नहीं है, फिर भी सर्वथा जीव का अभाव नहीं है । वही शुद्ध ज्ञान दर्शन केवल ज्ञान दर्शन के रूप से वहाँ जीवत्व पाया जा रहा है ।

अशुद्ध जीवत्व की औपाधिकता―यह जीवस्वभाव तो कर्मजनित द्रव्यप्राणरूप और भावप्राणरूप है, इनका तो अभाव हो जाता है, और ज्ञान दर्शन प्राणों का अभाव नहीं होता तब तक सिद्धि भी नहीं होती है, लेकिन ये द्रव्यप्राण नहीं हैं, भावप्राण नहीं हैं, इस कारण सर्वथा जीव का अभाव होगा, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए । वहाँ शुद्ध सत्ता, शुद्ध चेतना, शुद्ध ज्ञान आदिक शुद्ध भावप्राण रहते ही हैं । हाँ, वह देह और देह के संबंध से होने वाले समस्त उपद्रवों से पृथक् हैं । हम आपको जब तक अंतरंग भावना से इस शरीर से न्यारा होने को उत्सुकता न जगेगी तब तक हम आप संसार से पार की बाजी वाले नहीं कहला सकते, उसके पथिक भी नहीं रह सकते।

मनबहलावा व धर्मपालन―जिन पुरुषों में धन वैभव का व्यामोह है, धन को ही महत्त्व दिये हुए हैं और उससे भिन्न अपने आपकी सुध नहीं है, ऐसे पुरुष धर्मपालन करके भी जैसे व्यवहार में कहा करते हैं―क्या अंतरंग में आत्मीय शुद्ध आनंद के पाने की विधि मिल सकती है? मन रमाने का साधन बनाना और बात है, और विशुद्ध शांति की अनुभूति करने की विधि बनाने का काम और है । हाँ, इतना भला अवश्य है कि ये ज्ञानीजन विषयों के, व्यसनों के प्रसंग से अपना मन नहीं बहलाना चाहते, और एक धर्मस्थान में आकर अपने परिचयी जीवों के बीच खड़े होकर अथवा अपने आपके भीतर जो सुख की वासना लगी है उसकी साधना ठीक बनी रहे और वह इस धर्म के प्रताप से ही होती है, ऐसा समझकर जो धर्म करने का श्रम करते हैं वे यद्यपि व्यसनों में दिल बगराने वालों से भले हैं, किंतु यहाँ भी उनका मन बहलावा है, उन्होंने आत्मशांति का द्वार भी नहीं निरखा ।

आत्मनिर्णय―अपने आपमें अपनी बात सोच लो कि किसी भी दिन, किसी भी क्षण क्या यह तीव्र उत्सुकता हुई है कि मैं इस जन्म मरण और शरीर के संबंध से सदा के लिए छूट जाऊँ, इसी में मेरी भलाई है । मोक्ष तत्त्व के श्रद्धान के संबंध में यह बताया है कि यह अज्ञानी बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि जीव मोक्ष का स्वरूप जो निराकुलता है उसकी बाट नहीं जोहता । कितने सीधे शब्दों में यह बात है―'शिवरूप निराकुलता न जोय ।' बहिरात्मा निराकुलता की बाट नहीं जोहता, यही मोक्ष में विपरीत श्रद्धा है । रात-दिवस के प्रोग्राम―परिजन से मोह करना और धन वैभव से व्यामोह रखना, इसके सिवाय और कुछ है क्या मोही जीवों का प्रोग्राम? हाँ, है और भी थोड़ा-सा प्रोग्राम । खाना, लेटना और मल मूत्र निवृत्ति करना, यह और संग में लगा है । इनके अलावा भी है कुछ प्रोग्राम है । ऐसा ही मौज बनाये रहने के भाव से घंटा दो घंटा भगवान के मंदिर में दर्शन, पूजन कर लेना, इससे आगे भी कुछ प्रोग्राम है क्या? नहीं । इससे परे का प्रोग्राम बन जाय तो उसका अज्ञानी की लिस्ट से नाम हट जायगा । व्यवहारधर्म भी वही करेगा, फिर भी अंत:प्रकाश है ।

वास्तविक धर्मपालन की सुगमता―निज काम कितना सुगम और स्वाधीन है, यह जाननहार बुद्धि जाननहार में ही सीधे रास्ते से पहुंच जाय, कोई कष्ट की बात नहीं है । अरे उसी रास्ते में यह बुद्धि नाच गयी है, कहीं अलग नहीं है । उस ही पंथ से अपने अंतरंग में पहुंच जाय, कोई असुगम काम नहीं है, ये समस्त बाह्य पदार्थ बाह्य ही नजर आयें, इनसे मेरा क्या संबंध? ये मेरे कुछ न होंगे, इनसे मेरा कुछ भला न होगा । व्यर्थ के रागद्वेष के बढ़ावा में बढ़े चले जा रहे हैं । अपनी प्रकृति में जरा भी भंग नहीं डालना चाहते । जो जैसी आदत बन गयी, जिसमें रंगे पगे चले आ रहे उसमें अंतर नहीं डालते, मोह ममता नहीं त्यागना चाहते तो बतावो धर्म की साधना किस ओर से आयगी ।

मुक्तावस्था में विभावपरिणमनों का अभाव―मुक्त अवस्था में शरीर की उत्पत्ति के कारणभूत परिणमन भी नहीं हैं, मन, वचन, काय के योग नहीं, क्रोधादिक कषायें नहीं, उनके तो कैवल्य है । कैवल्य का अर्थ है केवल वही-वही, अन्य कोई नहीं । जहाँ केवल आत्मा का स्वरूप ही रहे, पर संबंध वाली बात नहीं, पर संबंध नहीं, उस अवस्था को कैवल्य कहते हैं । हमें सिद्ध बनना है, ऐसा मन में उल्लास आता है या नहीं या मुझे अपने इन परिजनों को इतना होशियार बनाना, सुखी बनाना और इनके बीच अपने आपको प्रभु बनाकर रखना, और लौकिक यश बढ़े, लोक में मेरा नाम चले, लोग अच्छा कहें, ये सारे खुराफात करना ही इष्ट है या ऐसा भी मानते हैं कि मुझे कोई मत जानो, कोई मत मानो, मैं सबसे विविक्त हूँ। मुझे कोई जानता ही नहीं है । मुझे तो सबसे विविक्त केवल निजस्वरूपमात्र रहना है, और मुझे कुछ न चाहिए, ऐसी अंतरंग में भावना आती है या नहीं । नहीं ऐसी भावना आती है तो आप अपना बड़प्पन न समझिये, और समझिये कि जैसे संसार के और जीव हैं कीड़ा-मकोड़ा, पशु-पक्षी, बस उनकी बिरादरी में ही अभी हमारी गिनती है अर्थात् अज्ञान अवस्था ही बनी हुई है । नफा टोटे का असली हिसाब लगाइये ।

सिद्धों का अनंत प्रताप―यह प्रभु मुक्त जीव, जिनका किसी से भी वास्ता नहीं है, अपने आपमें विशुद्ध निराकुलता को भोग रहे हैं, निराकुलता स्वरूप है । ये सिद्धप्रभु यद्यपि सांसारिक द्रव्यप्राण और भावप्राण से रहित हैं तो भी ये बड़े प्रभावशाली हैं । आत्मा का क्या प्रताप है? इसे लोग अशुद्ध प्रताप से कूतते हैं । पुण्य के उदय से स्थिति अच्छी हुई, कुछ राज्यपाट हुआ, समागम अच्छा मिला, शरीर में बल मिला, लोग पूछने लगे, कहते कि यह बड़े प्रताप वाला है । अरे इस आत्मा का अनंत प्रताप तो इसके शुद्ध स्वरूप में पड़ा हुआ है । यह प्रताप तो उस प्रताप का बिगाड़ है, विकार है, खुरचन है । जैसे किसी बड़े हांडे में खिचड़ी पकाई जाय । पचासों आदमियों को जिमा दी जाय, उसके बाद दो एक भिखारी आये, वे मांगने लगें तो उस बर्तन को खुदेड़-खुदेड़ कर जो बचे उसे दे दी जाती, उतने में भी उनका पेट भर जाता है, ऐसे ही संसार के ये जितने प्रताप हैं ये आत्मा के अनंत प्रताप की खुरचन हैं । वास्तविक प्रताप तो इस आत्मा के स्वरूप में पड़ा हुआ है।

अंतःपुरुषार्थ का संदेश―भैया ! किसी दूसरे पर दृष्टि ही मत दो, नहीं तो धर्म के लिए जो कुछ रचना बनायी वह सबकी सब फेल हो जायगी । किसी से कुछ मत चाहो । ये लोग मुझे अच्छा कह दें, ऐसी रंच भी बात किसी से मत चाहो । दूर से जान लो । संसार में अनंत भव पाये थे ना? यदि मैं आज मेढक मछली होता तो इस लोक की निगाह में मैं कुछ कहलाता क्या? मान लो मैं ऐसा ही होता अथवा गर्भ में ही मर जाता या जन्मते समय मर जाता या कुछ छोटी उम्र में ही मर जाता, और ऐसे मौके हम आप सबके आये भी हैं कि जिस समय प्राणांत हो जाने को था । अब बच गये तो यह मुक्त का जीवन मान लो अर्थात् लोक में हमें कुछ भी अपना प्रताप नहीं करना है, केवल एक आत्मकल्याण के लिए हमें अपनी दृष्टि रखना है । ऐसा ही अवसर मान लो । इतनी बात सदा नहीं बन सकती है तो जब धर्मपालन का हम कार्यक्रम रचते हैं उस समय तो रहने दें यह बात । यदि इतनी उत्सुकता हममें नहीं आती तब अपनी एक त्रुटि महसूस करें । और इस धर्मपालन की विधि में संतोष न माने जैसा कि आजकल किया जा रहा हो, अपने आप में अपने प्रताप का अनुभव करें ।

शुद्ध विकास की वचनागोचरता―ये सिद्ध प्रभु जिनकी हम पूजा करने आते हैं, उपासना करने आते हैं, ये अनंत प्रताप से युक्त हैं, तीन लोक के विजयी हैं । इनका वर्णन वचनों से नहीं किया जा सकता । आत्मा में इतने अनंत गुण हैं कि हम आप चाहे उन अनंत गुणों का अनुभव कर लें, पर उनका वर्णन और उनकी गिनती नही कर सकते । जैसे रत्नों से भरे समुद्र में कदाचित् कोई ऐसी बाढ़ आ जाय, उथल-पुथल हो जाय कि पानी कहीं का कहीं पहुंच जाय तो वे सारे रत्न आपकी निगाह में आ गये, पर उनकी गिनती नहीं कर सकते । आप रत्नों की जगह रेत रख लें । पानी के उथल-पुथल से कहीं पानी अगल-बगल हो जाय, रेत का एक ढेर सा दिख जाय तो दिखने में तो वह ढेर आ रहा है, पर क्या कोई उन रेत के कणों की गिनती कर सकता है? नहीं कर सकता । ऐसे ही आत्मा में जो चमत्कार है, प्रताप है, अनंतगुण हैं इन सबका आप अनुभव तो कर लें निर्विकल्प स्थिति बनाकर, पर उन गुणों की गिनती आप नहीं कर सकते । ऐसे अनंत गुणो से सहित ये सिद्ध प्रभु हैं ।

आत्मनिधि की सुध―जैसे किसी सेठ का बालक, 5-6 वर्ष की उम्र का था । सेठ जब गुजर गया तो सरकार ने उसकी लाखों की जायदाद अपनी निगरानी में ले ली । अब क्या हुआ, उसकी एवज में 500) रु0 महीना खर्च के लिए उसे मिलने लगे । बालक बड़ा हो गया 19-20 वर्ष का । जब तक वह नाबालिग था, गैर समझ था तब तक वह सरकार के बड़े गुण गाता था मुझे घर बैठे सरकार 500) रु0 महीना भेज देती है । जब उसकी समझ में आया कि मेरी तो लगभग 10 लाख की जायदाद सरकार के अन्डर में है तो वह 500) रु0 महीना का लेना मना कर देता है, मुझे न चाहिए ये 500) रु0 । मुझे तो मेरी निधि दी जाय । ऐसे ही इस नाबालिग संसारी जीव की यह अनंत प्रताप वाली निधि कर्म सरकार ने मानो जब्त कर ली है, उसकी एवज में यह थोड़ा-सा विषयसुख बांध रखा है, सो यह अज्ञानी जीव पुण्य सरकार के बड़े गुण गाता है, मेरे तो बड़ा ठाठ है, मेरे को बड़ा मौज है, पुण्य के यह जीव बड़े गुण गाता है । जब यह बालिग बन जाता है अर्थात् सम्यग्दृष्टि हो जाता है, यथार्थ ज्ञानी हो जाता है तब इन मौजों को मना कर देता है, मुझे न चाहिए थे ये जड़ वैभव, मुझे तो मेरी आत्मनिधि चाहिए।

निराकुलता का प्रबंध―भैया ! अनंत प्रताप है इस आत्मा में । निराकुलता से बढ़कर और कुछ भी नहीं है जीव का सर्वस्व । निराकुलता जिस विधि में मिले वही तो सबसे बड़ी बात होगी ना । अब खूब सोच लो निराकुलता कहां है और कैसे मिलती है? निराकुलता है मोक्ष में अर्थात् परसंबंध से छूट जाने में केवल रह जाने में, निराकुलता है, और उसका उपाय है इस केवलस्वरूप की भावना करना । मैं सबसे न्यारा केवल चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ, इतनी उदारता तो लाइये । यदि कुटुंब में ही ज्यादा मोह होता है तो औरों से मोह करने लगिये कुछ फायदा मिलेगा । यदि जड़ वैभव से प्रीति है, आसक्ति है तो उसे दूसरी के उपयोग में लगाइये कुछ लाभ मिलेगा । परवस्तुवों में आसक्ति न होना चाहिए । जब मैं इस देह से भी अत्यंत न्यारे स्वरूप वाला हूँ तब फिर इस विविक्त आत्मतत्त्व का अन्य कुछ होगा ही क्या?

चिच्चमत्कारप्रताप की भावना―ये मुक्त भगवान अनंत महिमावान हैं । केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनंत आनंद, अनंत शक्ति संपन्न हैं । उन्हें इस प्रकार न देखें कि इंद्रिय आदिक नहीं रही, शरीर नहीं रहा तो वहाँ कुछ रहा ही नहीं । अरे अशुद्ध जीवत्व नहीं रहा, पर शुद्ध जीवत्व का तो सद्भाव है । चीज तो वह निखर गयी । जो कुछ सहज है स्वतःसिद्ध है वही रह गया है, ऐसी ही हमारी स्थिति हो, हम केवल रह जाये तो हमारी वह आखिरी मंजिल समझिये यही पूर्ण विश्राम का स्थान है, ऐसा निर्णय करके अंत:शुद्धतापूर्वक अपने स्वरूप के अतिरिक्त समस्त बाह्यपदार्थों को न्यारा कर दें । मैं सबसे जुदा केवल ज्ञानानंदस्वरूप मात्र हूँ । इन लौकिक प्राणों के धारण के बिना, शरीर के संबंध के बिना, समस्त उपाधियों के बिना अपने सहज चैतन्य चमत्कार ज्ञान दर्शन प्रतिभास स्वरूप से सदैव प्रतिभाशाली है, बस सब कुछ जानने में आ रहा है, पूर्ण निराकुलता बनी है । अब अपने विकास से रंच भी डगमग नहीं हो पा रहे ऐसी अत्यंत शुद्धता प्रकट हो जाती है सिद्ध प्रभु में । वह हमसे कुछ जुदी जाति के नहीं हैं । हमारी ही तो चर्चा है । ऐसा ही मैं होऊँ, ऐसी भावना में ही अपनी भलाई है ।


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