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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 43

From जैनकोष



ण वियप्पदि णाणादो णाणी णाणाणि होंति णेगाणि ।

तम्हा दु विस्सरूवं भणियं दवियत्ति णाणीहिं ।।43।।

ज्ञान की एकरूपता व नानारूपता―यह ज्ञानी जीव, ज्ञानगुण से पृथक् नहीं किया जा सकता । ज्ञानगुण में तन्मय है, तब यही सिद्ध हुआ ना कि यह आत्मा एक ज्ञानस्वरूप है । एक ज्ञानस्वभाव होकर भी इस प्रकरण में ये ज्ञान मतिज्ञान आदिक नाना रूप बताये गये हैं । इस कारण से ज्ञानी पुरुषों ने इस आत्मद्रव्य को विश्वरूप कहा है । ज्ञान की पद्धति ज्ञान के स्वरूप की ओर से देखा जाय तो यह एक स्वरूप है और ज्ञान में क्या जाना गया, ज्ञान ने क्या-क्या ग्रहण किया, उन ग्रहणात्मक रूपों को निरखकर देखा जाय तो यह ज्ञान नानारूप है । दृष्टियों से आत्मा की यह सब विलक्षणता ज्ञात हो जाती है ।

ज्ञान की ज्ञान से अभेदरूपता―यह तो प्रसिद्ध है ही कि ज्ञानी ज्ञान से अलग नहीं है । जैसे अग्नि गर्मी से अलग है क्या? जरा गर्मी को अग्नि से उठाकर दूर रख दो और जब मन में आये तब उस गर्मी को अग्नि में लगा दो, क्या ऐसा भी हो सकता है? अरे अग्नि गर्मी स्वभाव को लिए हुए है । ऐसे ही यह ज्ञानी आत्मा ज्ञान से अलग नहीं है । यह स्वयं ज्ञानस्वरूप को लिए हुए है । दोनों का एक अस्तित्व से निर्माण है, अस्तित्व एक ही है । स्वभाव और स्वभाववान का भेद किया गया है । पर चीज वही एक है । किसी भी एक वस्तु को जब हम व्यवहार में लायें, उसका प्रतिपादन करें तो हम उस एक को एक ही रूप में बताने में असमर्थ हैं । जैसा वह है तैसा ही का तैसा बता दें तो नहीं बता सकते हैं, उसके भेद करके गुणगुणी का भेद करके बतावेंगे ।

अंतस्तत्त्व की अनिर्वचनीयता पर एक दृष्टांत―भैया ! तत्त्व की अनिर्वचनीयता तो है ही लोक में भी। हम आप से पूछें―मिश्री कैसी होती है? तो जैसी है तैसी ही एकदम आप उसी रूप में नहीं बना सकते हैं । उसे कहेंगे बड़ी मीठी है । भाई ! अभी हमारी समझ में नहीं आया, कैसी मीठी है ? तो हम कैसे समझायें? तुमने क्या कभी मिश्री खाई है? नहीं। शक्कर खाई है? नहीं । गुड़ खाया है? नहीं । गन्ना चूसा है? हाँ-हाँ । तो देखो―गन्ने के चूसने में जो मिठास आती है, जितनी मधुरता ज्ञात होती है उससे अधिक मधुरता गुड़ में होती है। इसका कारण क्या? रस को पकाकर उसका बहुत-सा मैल निकालकर फेंक देते हैं। वह मैल मधुरता का बाधक है, जो निकला मैल है, उसको चखकर भी देख लो उसमें मधुराई नहीं है । रस का मैल दूर करके गुड़ बनाया तो अंदाज कर लो कि रस से गुड़ कितना अधिक मीठा होता है, और गुड़ से भी, राब से भी जब मैल और छांट दिया जाता है तो शक्कर बनती है । वह मैल भी शक्कर की मधुराई में बाधक है । उस मैल के निकलने पर जो मिठास प्रकट होती है वह गुड़ से अधिक है । शक्कर की भी चाशनी करके उसका मैल भी निकालकर फेंक दिया जाता है । जब वह समस्त मैल दूर कर दिया जाता, तब उसकी मिश्री बनती है । तब समझ वह मिश्री शक्कर से कितनी अधिक मीठी होगी? समझे ना अब?....हाँ ं, हाँ बातों से तो समझ गये, पर अभी पूरी समझ में नहीं आयी बात । तब मिश्री की एक डली लेकर उसे खिला दो । खाने के बाद पूछो―अब समझ में आया कि मिश्री कितनी मीठी होती है? हाँ-हाँ अब हमारी समझ में आया ।

अंतस्तत्त्व की अनिर्वचनीयता―यह आत्मदर्शन की बात भी अनिर्वचनीय, किंतु अनुभवनीय है । बातों से तो बहुत समझ में आया है, आत्मा ज्ञानात्मक है, आनंदात्मक है, सबसे निराला है और युक्तियों से भी देखो―जब आदमी मर जाता है तो शरीर यहीं पड़ा रह जाता है । जो छोड़कर गया है बस वही तो आत्मा है और देखो ये हाथ पैर कुछ जानते नहीं हैं । जो जानने वाला है वह कोई विलक्षण ही पदार्थ है, समझे ना ? हां बातों से तो कुछ-कुछ समझ गया । तो पूर्ण समझ तो तुम्हारे ही पुरुषार्थ से आयगी । जब भेदविज्ञान करके परवस्तुवों की उपेक्षा करें और अभेद निज अंतस्तत्त्व की ओर झुकें, इन बाह्य विकल्पों को त्याग दें, शुद्ध विश्राम पायें तो आपके ही पुरुषार्थ से आपको अपने आत्मा का दर्शन होगा ।

उत्कृष्ट वैभव―इस लोक में सर्वोत्कृष्ट वैभव है तो आत्मानुभव है । क्यों जी ! तुम्हें चाहिए क्या? आनंद । किसी से पूछो तो वह अपनी चाह बतावेगा, आनंद । और इसके बाद खूब ज्ञान । ज्ञान और आनंद दो इच्छायें सबके होती हैं । मुझे खूब ज्ञान मिले और आनंद मिले, ये दो प्रकार की इच्छाएँ सब जीवों में पायी जाती हैं । ज्ञान बढ़ाने की भी इच्छा आनंद के लिए है, इसलिए मूल में तो एक आनंद की इच्छा है, अब आनंद जिस विधि से मिले उस विधि से तो मुख न मोड़ा जाना चाहिए । परीक्षा करके देख लो । आनंद किस विधि से प्रकट होता है? आचार्यदेव यहाँ आत्मानुभव को ही शुद्ध परम सहज आनंद का उपाय बता रहे हैं । श्रद्धान निर्मल हो, आत्मतत्त्व का झुकाव हो, परमविश्राम मिले तो स्वयं ही वह ज्ञानानुभव जग जाता है जिस आत्मानुभव में उत्कृष्ट आनंद बसा हुआ है । ऐसे ज्ञानदर्शनसामान्यात्मक आत्मा के उपयोग से सर्व प्रकार का आनंद प्रकट होता है । धर्मपालन में हमें एक यही यत्न करना योग्य है ।

ज्ञानी और ज्ञान का अभेदपना―ज्ञानी और ज्ञान में अभेद है, क्योंकि ये दोनों एक ही अस्तित्व से निर्मित हैं । अस्तित्व 4 दृष्टियों से निरखा जाता है―द्रव्यदृष्टि, क्षेत्रदृष्टि, कालदृष्टि और भावदृष्टि । द्रव्य तो ये दो हैं नहीं, फिर भी चूँकि शंकाकार ने अपनी कल्पना में ये दो पदार्थ सामने रक्खे हैं―ज्ञानी और ज्ञान । तो द्वैत तो हो ही गया ना? अब इन दो में बताया जा रहा है कि अस्तित्व एक ही है । यह तो हुआ द्रव्य से एकत्व, व्यक्ति से एकत्व कह लीजिए । शंकाकार की दृष्टि में चूंकि ये दो आये हैं, अत: कहना पड़ा है, अन्यथा यह कहना भी क्या शोभा देता है कि ज्ञानी और ज्ञान ये दोनों एक अस्तित्व से बने हैं । अरे वह एक चीज ही है । उसमें इस प्रकार का विकल्प बनाना शोभा नहीं देता, लेकिन जो घी का घड़ा है यही जानता है उसे समझाने के लिए यह कहना ही पड़ता है कि देखो ना जो यह घी का घड़ा हैं वह वास्तव में घी का नहीं है, किंतु मिट्टी का है, तो जो व्यवहारी जन हैं उनकी भाषा का पहिले आलंबन लेना ही पड़ेगा । नहीं तो उसे समझायेंगे कैसे?

क्षेत्र व कालदृष्टि से ज्ञानी व ज्ञान का अभेदपना―क्षेत्रदृष्टि से देखो तो इन दोनों के अभिन्न प्रदेश हैं । ज्ञानी अपने प्रदेश जुदे रखता हो, ज्ञानतत्त्व अपने प्रदेश जुदे रखता हो, ऐसा नहीं है । दोनों ही एकक्षेत्र प्रदेशी होने के कारण एक क्षेत्री है । फिर भेद कैसा? कालदृष्टि से देखिये―तो दोनों ही ज्ञानी और ज्ञान एक ही समय से निर्वृत्त हैं, अत: एक काल है, एक काल का अस्तित्व है ज्ञानी में और ज्ञान में याने अनादि से ज्ञानात्मक है आत्मा ।

भावदृष्टि से ज्ञानी व ज्ञान का अभेदपना―क्या बात कही जा रही है? यह जो मैं हूँ सो ज्ञानस्वभाव हूँ । मेरा स्वभाव है ज्ञान । ऐसा सुनकर कहीं यह न जान लेना कि मैं एक पदार्थ हूँ और ज्ञान कोई मेरा स्वभाव है और वह अलग चीज है । कुछ लोग ऐसा सोचते होंगे कि ऐसा तो कोई नहीं सोचता । या तो उसके संबंध में कोई विचार ही नहीं उठाता और विचार उठाता है तो सीधा यों ही उठाता है कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है, आत्मा जुदा है, ज्ञान जुदा है, फिर उनका संबंध होता है, ऐसा तो कोई नहीं सोचता । अरे भाई हम आप कोई न सोचें पर कुछ दार्शनिक ऐसे हो गए हैं जिन्होंने इस दर्शन का विस्तार किया है कि आत्मा जुदी चीज है, ज्ञान जुदी वस्तु है । आत्मा में ज्ञान का जब समवाय होता है तब आत्मा ज्ञानी होता है । उस संबंध में यह प्रकरण चल रहा है कि आत्मा और ज्ञानस्वभाव ये कोई दो अलग-अलग नहीं हैं । द्रव्य एक है, क्षेत्र एक है, काल एक है और स्वभाव वही है, एक है । अत: भावदृष्टि से भी यह एक है, इसमें भेद है नहीं ।

ज्ञान के उपयोग―ज्ञान का ज्ञान से भेद नहीं किया जा सकता । यह तो एक आंतरिक दृष्टि से बात हुई, निश्चयदृष्टि से बात हुई । अब जब हम इसके उपयोग में आते हैं, प्रयोग में जब हम इसका एक व्यावहारिक रूप निरखते हैं तब यह प्रतीत होता है कि एक होने पर भी और स्वभावदृष्टि से एक होने पर भी आभिनिबोधिक आदिक ये 5 प्रकार के ज्ञानपरिणमन हैं, इनका विरोध नहीं होता, यह भी सिद्ध होता है, क्योंकि यह द्रव्य विश्वरूप है, समस्तरूप है । जो इस जीव में गुण है और जो इस जीव की प्रवृत्तियाँ हैं उन समस्त प्रवृत्तियों रूप यह आत्मा है । क्या वह परिणमन जुदा-जुदा है? जैसे स्वभाव को निरखो, स्वभाव एक है और वह ज्ञान से अभिन्न है, ऐसे ही उस ज्ञानस्वभाव की जब प्रवृत्ति निरखते हैं तो क्रमभावी विशेष तो होंगे ही । वह शक्ति ही क्या, जिसका कोई व्यक्तरूप न हो, कोई परिणति नहीं है तो शक्ति की कल्पना का श्रम करना बेकार है । शक्तियों का कोई न कोई परिणमन प्रतिसमय होता ही है, चाहे किसी शक्ति की डिग्रियाँ कम हों कि उनका काम व्यक्त न हो सके, लेकिन कुछ भी जिसका परिणमन न हो सके ऐसी कोई शक्ति नहीं है । उनका अविभागप्रतिच्छेद बढ़ने से शक्तियां प्रकट व्यक्त हो जाती हैं, फिर भी ऐसी शक्ति कोई नहीं है जिसका त्रिकाल व्यक्त परिणमन न हो । प्रथम तो ऐसी शक्ति नहीं है जिसका किसी भी समय परिणमन रुक जाय । लेकिन कल्पना में यह बात लाई जाती है कि शक्तियों की डिग्रियां स्वभावत: कम हो जाये तो उनसे व्यक्त परिणमन नहीं होगा । तो जैसे यह स्वभाव यद्यपि एक है, लेकिन व्यक्तियां तो हैं ना । उन व्यक्तियों की दृष्टि से यह ज्ञान अनेकरूप हो गया और यह ज्ञानी उन अनेक परिणमनों में तन्मय है ।

द्रव्य की गुणपर्यायभाजनता―द्रव्य सहभावी गुण और क्रमभावी पर्याय का आधारभूत है, इसलिए अनंत रूप है । प्रत्येक द्रव्य एक होते हुए भी अपने गुण और पर्यायों से सहित होने के कारण विश्वरूप है । यहाँ यह बात बतायी गयी है कि जिस प्रकार परमाणु से रूप अलग नहीं है, पुद्गल से रूप, रस, गंध, स्पर्श कोई भिन्न चीज नहीं हैं इन चार प्रकार की शक्तियों का पुद्गल में त्रिकाल निवास है, और इन शक्तियों के जितने भी परिणमन हैं काला, पीला आदिक उन सब परिणमनोंरूप ये पुद्गल हैं, ऐसे ही इस जीव द्रव्य के जो गुण हैं, यह जीवद्रव्य उन गुणों में शाश्वत तन्मय है और गुणों के जितने भी अतीत काल के, भविष्यकाल के, वर्तमान काल के परिणमन हैं उन समस्त अनंत परिणमनों में तन्मय है, इसलिए यह ज्ञान एकरूप होकर भी विश्वरूप है, यह जीव की सामान्य व्याख्या है।

शुद्ध ज्ञाता व ज्ञान में अभेदपना―अब शुद्ध जीव की अपेक्षा निरखिये तो यह शुद्धजीव शुद्ध एक अस्तित्व से निर्वृत्त है मायने रचा हुआ है । लोकाकाश प्रमाण असंख्यात किंतु अखंड शुद्ध प्रदेशों में हैं । जहाँ केवल एक शुद्ध स्वाभाविक विकास ही रहा करता है । यह प्रभु की बात कही जा रही है । परमात्मा का क्या स्वरूप होता है, उनकी विभूति का वर्णन है । वह निर्विकार चैतन्य चमत्कार मात्र परिणति रूप से वर्तमान समयों में रचे हुए चले जा रहे हैं । ज्ञान ने समस्त लोकालोक को जाना, आनंद से पूर्ण निराकुलता का अनुभव किया, ऐसे शुद्धपरिणमन रूप वे बराबर चलते जा रहे हैं । तो काल की अपेक्षा भी वह अनंत काल तक भी एक-सी परिणतिरूप रहा करते हैं । निर्मल एक चैतन्य ज्योतिस्वरूप होने से वह एकस्वभाव हैं । अब उन शुद्ध प्रभु का क्या भेद किया जाय, वहाँ पर भी उनके गुण और पर्याय से कैसे भिन्नता की जाय?

अपनी बात―यह जीव पदार्थ ज्ञानानंदस्वभावी एकस्वरूप है, इतने पर भी जब हम इसके प्रयोग को देखते हैं तो इसके नानारूप हो जाते हैं । यह प्रकरण किन्हीं की समझ में न आये तो इतना श्रद्धान तो बनाया ही जा सकता है कि अपने वैभव की हमारी बात कितनी गहराई से जैनसिद्धांत में बतायी गयी है । किस्सा कहानी का मनगढंत इतिहास तो बहुत सरल होता है और उसमें दिल भी लगता है और यह तात्क बात गहन की है जो कि एक जैन दर्शन में बड़ी सावधानी और नयवाद के साथ बतायी गई है । उसका चमत्कार कितना अद्भुत विलक्षण है? मैं उस ही स्वरूप हूँ । जो चीज मेरे में गुजरना चाहिए, अनुभव में आना चाहिए जिस रूप हमारा परिणमन हो जाना चाहिए उस रूप होता नहीं और उसकी बात भी बड़ी कठिन और समझ से कुछ बाहर बनी हुई है । तब जानो कि हम अभी कितनी गिरी हुई जगह पर हैं । हमें मोह को नष्ट करके इस ज्ञानप्रकाश में बढ़ने का काम पड़ा हुआ है।

ज्ञान के भेद प्रभेद―यह आत्मा एकस्वरूप होकर भी नानारूप हो रहा है । इस ज्ञान की विवक्षावश कितने ही भेद करते जाइये-यह मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, केवलज्ञान और तीन कुज्ञान, इस प्रकार 8 ज्ञानों की पर्याय में रहता है और उसमें भी मतिज्ञान तीन प्रकार से गुजरता है―भावना, उपयोग और उपलब्धि । उपलब्धि तो प्रथम होती है―इसे कहते हैं लब्धि । किसी पदार्थ को जानने की योग्यता, अर्थ ग्रहण करने की शक्ति की प्राप्ति होना। फिर जाना, यह हुआ उपयोग और उसका कुछ देर तक चिंतन चला, यह हुई भावना । श्रुतज्ञान के तो बहुत भेद हैं । श्रुतज्ञान दो रूपों में निरखा जाता है-एक तो शास्त्रज्ञान के रूप में और एक जीवों में मतिज्ञान के बाद जो विशेष विकल्प करके ज्ञान होता है उस रूप में । दोनों ही रूप इसके अनेक हैं । अवधिज्ञान भी कोई देशावधि, परमावधि व सर्वावधि यों तीनरूप हैं अथवा कुछ ज्ञान ऐसे होते हैं, अवधिज्ञान जिस जगह पैदा होता है उस जगह रहा आये, अवधिज्ञान चलता रहेगा । उस क्षेत्र को छोड़कर दूसरे नगर में गया तो अवधिज्ञान समाप्त, ऐसा भी अवधिज्ञान होता है । ऐसा भी होता है कि दूसरे क्षेत्र में जाय तब भी वही का वही बना रहता है, मरकर जाय तब भी बना रहता है और मरकर जाय तो न भी अवधिज्ञान बना रहे, ऐसा भी होता है । जितने रूप में अवधिज्ञान पैदा होता है उससे बढ़ता हुआ चला जाय, ऐसा भी अवधिज्ञान है, घटता हुआ चला जाय ऐसा भी अवधिज्ञान है । कभी घटे, कभी बड़े, यों अनवस्थिति में होता है जिस रूप में हुआ उसी रूप में रहे ऐसा भी होता है, यों भेद अवधिज्ञान के भी बहुत हैं । ऐसे ही मन:पर्ययज्ञान के भी भेद हैं । भेद करना चाहें तो उसके सहभावी भेद भी अनंत हो जाते हैं । जितने पदार्थों को जाना उतनी ही ज्ञान की कलायें हैं । इस प्रकार ज्ञान के यों अनेक भेद होते हैं ।

अपने हितकारी लक्ष्य का कर्तव्य―भैया ! अनेक भेद होकर भी हम आपको निर्विकार अभेदरूप चैतन्यस्वभावमात्र आत्मतत्त्व को निरखना है जिसके आलंबन से यह महान् विस्तार वाला ज्ञानविकास प्रकट होता है । जैसे प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी ओर लगन रहती है । किसी को घर की लगन है, किसी को स्त्री की लगन है । जिसका नया विवाह हुआ है वह अपनी स्त्री के ही गुण गाता है । किसी को अपने पुत्र की लगन है । प्रथम बार पुत्र हुआ तो वही-वही दृष्टि में बसा हुआ है । किसी को धन से लगन है तो वह जहाँ बैठेगा वहाँ धन के प्रयोजन की ही बात करेगा । वही एक धुन रहती है । किसी को यश नामवरी की धुन है तो जगह-जगह भ्रमण, यहाँ वहाँ उपयोग करने की धुन में रहता है । प्रत्येक मनुष्य अपने आपके बारे में किसी न किसी रूप अपनी प्रतीति बनाये रहता है, जिस प्रतीति के कारण उसकी धुन बना करती है । तो ये सारी धुन बेकार हैं, अहितरूप हैं, दुःख के हेतु हैं । अपनी प्रतीति क्या बनाये, अपनी धुन कैसी बनाये? इस ओर कुछ हितबुद्धि से दृष्टि दीजिए।

अनात्मप्रतीति में हानि―मैं अपनी प्रतीति उस रूप करूं, जो रूप मेरा कभी रहने का नही, मिट जायगा तो उस प्रतीति से लाभ और स्थिरता नहीं हो सकती । मैं अपने को लड़कों का बाप मानूँ तो यह बापपना सदा निभ नहीं सकता । खुद मरेगा और कोई लड़का मरेगा तो वह क्लेश पायगा । अपने को इस दुनिया में नेता के रूप में माना तो उससे भी पूरा नहीं पड़ने का है । कौनसी लौकिक कीर्ति ऐसी है जिससे इस आत्मा का पूरा पड़ जाय? कौनसी धुन ऐसी है जिसकी धुन लगाने से आत्मा शांति में ही सदा बसा रहा करे? वह प्रतीति है अपने सहजस्वरूप की । मैं स्वरसतः चैतन्य भावमात्र हूँ । मैं केवल एक चित्प्रकाश हूँ । किसी ने नाम लेकर पुकारा तो मेरी इसकी ओर खिंचने की क्या जरूरत, यह अंतर्जल्प से बोलिये । मैं इस नाम वाला ही नहीं हूँ । ये सब लोग अमुक नाम बताया करते हैं । इस नाम का न मुझमें कोई लेप है, न लेख है, न संबंध है । मैं तो एक यह पदार्थ हूँ । कोई मुझे अन्य-अन्य विशेषणों से पुकारे―सफल व्यापारी, पुरुषार्थी, लोकनाथ का धर्मात्मा, श्रावक, गृहस्थ, साधु, त्यागी किन्हीं नामों को कहकर पुकारे तो क्यों उसकी ओर मेरा आकर्षण हो? मैं इस रूप हूँ ही नहीं ।

नानात्मकता की प्रतीति में असारता―मैं तो एक शुद्ध चित्प्रकाशमात्र हूँ, सबसे न्यारा देह से भी जुदा केवल ज्ञानस्वभावरूप यह मैं आतमतत्त्व हूँ, इस प्रतीति में कितने ही गुण भरे हुए हैं । नाना प्रतीति में कोई सार नहीं है । काहे का यहाँ सुख है? लड़कों का सुख भी माना जा रहा है । वे आज्ञा न माने तो जी छोड़कर उनको डाटते भी जा रहे, बड़ी गुस्सा में भी रहना पड़ता है, यह कोई सुख है क्या? परिजन के बीच में अनेक-अनेक अकुलाहट चलती रहती हैं । फिर भी मान रहे हैं कि यह मैं हूँ, ये मेरे हैं, इनसे ही सुख मानते हैं तो यह कोई सुख में सुख है क्या?

सांसारिक सुखों का धोखा―अरे भैया ! ये सांसारिक सभी सुख ऐसे ही दुःखों से भरे हुए हैं । बिना बुना हुआ कोई पलंग हो और उसके ऊपर केवल चादर बिछा दी जाय तानकर के और कच्चे सूत से पाया से चादर की छोर कस दी जाय । कोई मजाकिया ऐसा कर भी सकता है और किसी से कह बैठे कि आइये साहब विराजिये । वह उसमें विराज जाय तो उसकी क्या दशा होगी? अरे वह गिर पड़ेगा, हाथ, पैर, सिर सब इकट्ठे हो जायेंगे । तो ऐसे ही तने हुए चादर की तरह ये सब समागम लग रहे हैं, इनमें सारतत्त्व कुछ नहीं है । आत्मा को ये संतुष्ट कर सकें, ऐसी बात यहाँ एक भी नहीं है । कल भी खाया था, आज भी वही खायेंगे, संतोष तो कुछ भी नजर नहीं आया । वैभव में, धनोपार्जन में इतना तेजी से जुते जा रहे हैं । किन के लिए? मोह में जिनको अपना मान रखा है उनके लिए । हैं सब जुदे । जिनको समझ लिया कि यह मेरा है, बस उसके ही लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किए जा रहे हैं । यह क्या है? यह अज्ञान का ही तो नाच है ।

प्रभुभक्ति का स्थान―ये समस्त विपत्तियां अपने प्रभु की प्रभुता को पहिचाने बिना हो रही हैं । अपने प्रभु की प्रभुता को पहिचान जाय तो इस जीव को एक भी संकट नहीं रह सकता है । इस प्रभु को अपने आप में बैठालने के लिए ही प्रभुभक्ति, सत्संग और ज्ञानार्जन हैं । ये तीन बातें न भूलिए । किसी न किसी दिन अपने अंतर्मुख में अंतःप्रकाशमान हो जायगा । प्रभुभक्ति को मत छोड़िये । देखो प्रभुभक्ति का कोई समय निश्चित नहीं है कि हम इस समय प्रभु की भक्ति करें। प्रभु सर्वोत्कृष्ट तो आप ही हैं, यह ही उत्कृष्ट परिणमन है, चमत्कार तो यही सर्वस्व है । भक्ति कर लेंगे । वह प्रभुभक्ति तो योग्यता होने पर अचानक ही हो जायगी । हां उद्यम जरूर करना है ताकि अन्य प्रसंगों में चित्त न लुभा जाय । कहो आपको प्रभुभक्ति की झलक रास्ता चलते हो जाय, घर बैठे हो जाय, कोई जगह हो जाय । ऐसी अंतरंग में अनुभूति हो जाय सारभूत तो यही पद है, और साथ ही अपनी असारता, अपनी अनुत्कृष्टता को ध्यान में देकर विषाद पश्चात्ताप उत्पन्न हो तो भगवान के गुणों को निरखने से उत्पन्न हुआ हर्ष और अपने वर्तमान क्षण में अवगुणों को निरखने से उत्पन्न हुआ खेद ऐसी हर्ष और खेद की जहाँ जुहार भेंट हुआ करती है वह है प्रभु दर्शन का एक क्षोभनीय रूप ।

सत्संग व ज्ञानार्जन की वृत्ति―जो विषय पिपासा से अत्यंत दूर हों, संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हों, जिनकी धुन एक आत्महित के लिए बनी हुई हो, ऐसे पुरुषों के संग में समय बीते तो वहां भी उन जैसी दृष्टि बनाने का अवसर मिलेगा । सत्संग भी उपादेय है, और कुछ न कुछ थोड़ा बहुत ज्ञानार्जन करते ही रहें, उपयोग निर्मल रहेगा । युवक व बूढ़े होकर भी आप जितनी देर हाथ में पुस्तक लेकर बस्ता लेकर पढ़ते जा रहे हैं―हम अब पढ़ेंगे, ऐसा परिणाम होता है उस समय बालकवत् निर्विकारता की झलक तो आप लोग पा ही लेते हैं । ये तीन चीजें―प्रभुभक्ति, सत्संग और ज्ञानार्जन करके हम अपने आशय को निर्मल बनायें, यही सुखी होने का उपाय है।


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