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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 48

From जैनकोष



णाणी णाणं च सदा अत्थंतरिदो दु अण्णमण्णस्स ।

दोण्हं अचेदणत्तं पसजदि सम्मं जिणावमदं ।।48।।

ज्ञानी और ज्ञान में पृथक्त्व मानने पर आपत्ति―इस प्रकरण में यह बात चल रही है कि आत्मा से ज्ञान जुदा नहीं है । ज्ञानस्वरूप ही आत्मा है । केवल समझने और समझाने के लिए गुणगुणी का भेद किया है तो केवल व्यवहार के लिए भिन्नता है, किंतु वस्तु में उससे अभिन्नता है । इस गाथा में यह बताया जा रहा है कि द्रव्य और गुण को यदि भिन्न-भिन्न मान लिया जाय तो उसमें क्या दोष आता है? यदि यह ज्ञानी अर्थात् आत्मा और यह ज्ञान सदा भिन्न ही चीजें हों तो ज्ञान रहा अलग, और आत्मा रहा अलग, तो आप यह बतलावो कि ज्ञानरहित आत्मा की स्थिति क्या होगी? क्या वह चेतन माना जा सकता है? ज्ञान है नहीं, मात्र आत्मा है तो वह अचेतन बन गया । इसी प्रकार यह ज्ञान जो कि आत्मा से भिन्न माना गया है, ज्ञान का आधारभूत कुछ रहा नहीं, बिना किसी आधार के कोई शक्ति हुआ भी करती है क्या? तो आधारभूत द्रव्य न होने से यह ज्ञान भी नहीं रहा अथवा आधारभूत द्रव्य तो चेतन था । उसका अब संबंध रहा नहीं तो यह ज्ञान भी अचेतन हो गया । यह सिद्धांत जिनेंद्र भगवान के शासन में सम्मत नहीं है । उसको अवमत के रूप में देखा गया है ।

दृष्टांतपूर्वक ज्ञानी और ज्ञान में अभेद का प्रतिपादन―जैसे अग्नि से उष्णता यदि भिन्न मान ली जाय, आग अलग चीज है और गर्मी अलग चीज है, ऐसा यदि भेद कर दिया जाय तो इसका क्या अर्थ होगा? गर्मी नहीं है और आग है । तो क्या ऐसी आग जिसमें गर्मी नहीं है ईंधन को जलाने में समर्थ हो सकती है ? नहीं । वह तो गर्मी शून्य है, शीतल है । इसी प्रकार ज्ञान गुण से अत्यंत भिन्न यदि यह आत्मा है तो यह जीव किसी पदार्थ को जानने में समर्थ हो सकता है क्या? नहीं । तब यही तो निश्चय हुआ कि आत्मा जड़ है ।

भिन्नकारणिक में भी अभिन्नकारता की खोज―कदाचित् कोई ऐसा कहे कि जैसे देवदत्त कुल्हाड़ी से काठ काटता है, तो देवदत्त जुदा है, कुल्हाड़ी जुदा है । तो करण जिसके द्वारा कार्य किया जा रहा है वह है कुल्हाड़ी, कुल्हाड़ी जुदी चीज है, देवदत्त जुदी चीज है । जुदे-जुदे होने पर भी कुल्हाड़ी के द्वारा देवदत्त ने काठ काट ही तो दिया है । यों ही यह आत्मा ज्ञान के द्वारा जानता है । ज्ञान जुदा रहे, आत्मा जुदा रहे, फिर भी यह आत्मा ज्ञान के द्वारा जान लिया करेगा, कौनसी आपत्ति आती है? एक यह आशंका भिन्नवादी ने रक्खी है । समाधान यह है कि जैसे देवदत्त के दृष्टांत में बतलाया कि देवदत्त ने कुल्हाड़ी के द्वारा काठ को छेदा, ठीक है, पर देवदत्त के हाथ का व्यापार न होता तो क्या काठ छेदा जा सकता था? देवदत्त के हाथ देवदत्त से अभिन्न हैं और इस अभिन्न अंशिक का व्यापार ही मूल में प्रेरक हो रहा है। ऐसे ही आत्मा का ज्ञान आत्मा से अभिन्न है, वह ही मूल में जानन के लिए प्रेरक हो रहा है ।

ज्ञान के बाह्योपकरणता का अभाव―चेतन कार्य के प्रति जैसे वह कुल्हाड़ी बाह्य उपकरण है ऐसे ही आत्मा का बाह्य उपकरण ज्ञान नहीं है । वीर्यांतराय का क्षयोपशम होने पर उत्पन्न हुआ जो आत्मा का वीर्य विशेष है, शक्ति है वह आभ्यंतर उपकरण है । यदि यह शक्ति न प्रकट हो तो यह आत्मा कैसे जान सकता है? हाँ कुल्हाड़ी के दृष्टांत की जगह ज्ञान के बाह्यसाधन अथवा गुरु आदिक बहिरंग कारण दार्ष्टांत समझ लीजिये । जैसे गुरु के द्वारा हम ज्ञान सीखते हैं तो गुरु तो कुल्हाड़ी की तरह भिन्न है, पर यह ज्ञान जो एक आत्मा का शक्ति शेष है वह भिन्न चीज नहीं है । अपना बहिरंग कारण भी हो और ऐसा अंतरंग कारण का अभाव हो तो क्या कार्य हो जाता है? जैसे बहिरंग कारण कुल्हाड़ी तो रखी है, पर देवदत्त अपने हाथ का व्यापार न करे तो क्या काठ छिद जायगा? ऐसे ही गुरु शास्त्र प्रकाश सब कुछ सामने मौजूद हों और एक स्वयं का ज्ञान विशेष शक्ति विशेष का प्रयोग न हो तो क्या ज्ञान हो जायगा? तो जिस ज्ञान के अभाव से यह जीव जड़ हो जाता है उस ज्ञान पर दृष्टि देना अपना कर्तव्य है।

आत्मा और ज्ञान की विभक्तता में दोष का विवरण―ज्ञान जीव से भिन्न चीज नहीं है । ज्ञान यदि ज्ञानी से भिन्न हो तो ज्ञान को कुछ कर्ता का संपर्क नहीं मिला । आत्मा है कर्ता । इस ज्ञान को कर्ता का संबंध नहीं रहा तो भला बतलावो कि कुल्हाड़ी पड़ी हुई है, काटने वाला कोई पुरुष न हो देवदत्त आदिक तो क्या वह कुल्हाड़ी स्वयं काठ को काटने की सामर्थ्य रखती है? नहीं । इसी तरह इस शंकाकार ने ज्ञान को भी माना है, आत्मा को भी माना है, पर जुदा-जुदा माना है । तो आत्मा जुदा रहा, ज्ञान जुदा रहा । आत्मा कर्ता है, ज्ञान कारण है । क्या यह ज्ञान आत्मा के बिना कुछ जानने में समर्थ हो सकता है? नहीं हो सकता है । तब ज्ञान को और आत्मा को जुदा-जुदा मानने पर आत्मा भी अचेतन बन गया और ज्ञान भी अचेतन बन गया ।

आत्मा में ज्ञान गुण की उत्कृष्टता―कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि यद्यपि यह आत्मा और ज्ञान जुदी-जुदी चीज हैं लेकिन आत्मा का व ज्ञान का संयोग हो जाता है । संबंध हो जाने से फिर ज्ञान भी चेतन हो गया, आत्मा भी चेतन हो गया । किंतु बात यह घटित हो नहीं सकती, क्योंकि कोई भी द्रव्य अपना विशेष लक्षण लिए बिना, अपना कुछ स्वभाव किए बिना द्रव्य ही क्या है? जो अपने असाधारण लक्षण से रहित है ऐसा द्रव्य तो असत् है । है ही नहीं । नाम ही लेना बेकार है । इसी तरह ऐसा गुण जिसका कोई आश्रय नहीं है, निराश्रित गुणों का भी अभाव है । यों आत्मा और ज्ञान जुदे-जुदे ठहर ही नहीं सकते । आत्मा ही स्वयं ज्ञानस्वरूप है ।

इस आत्मा का ज्ञान एक असाधारण लक्षण है, और है क्या? आत्मा में अस्तित्व भी है, वस्तु भी है । अनेक साधारण लक्षण हैं, अमूर्तपना भी है, सो और सब तो मानते जावो, उसमें ज्ञान भर मत मानो, आत्मा में ज्ञानस्वभाव है ऐसा न मानो । उस ज्ञानस्वभाव को अलग कर दो तो बुद्धि में आत्मा कुछ चीज रही क्या? आत्मा का प्राण अर्थात् जिससे आत्मा का अस्तित्व रहता है वह लक्षण तो चैतन्य है । ऐसा चैतन्यस्वरूप यह मैं आत्मतत्त्व हूँ । इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हूँ, शरीर नहीं हूँ । वैभव परिजन धन ये कुछ मैं नहीं । जितने विकल्प के तरंग हैं वे सब मैं कुछ नहीं हूँ । मैं तो केवल एक चैतन्यस्वरूप तत्त्व हूँ । यही है निज शुद्ध आत्मतत्त्व ।

कैवल्य―शुद्ध का अर्थ केवल होता है, सिर्फ उस चीज को रहने दे उसका नाम शुद्ध है । प्योर किसे कहते हैं, उसको जो केवल हो । कैवल्य हुए बिना पवित्रता नाम किसका? कोई चीज दूसरी चीज से मिलकर गंदी हो गयी तो उसे कैसे शुद्ध करते हैं? उसे धो-धाकर अलग कर देते हैं । जो है उसे वही रहने दिया जाता है । इसी तरह व्यक्त रूप में यह आत्मा अशुद्ध हो गया तो उसे शुद्ध कैसे करना है? जितने भी अन्य तत्त्वों का संबंध हो गया है उनको हटाकर केवल आत्मा ही आत्मा रहने दिया जाय उसको कहते हैं आत्मा का शुद्ध करना । ऐसे ही शुद्ध सिद्ध भगवान हैं, और उस ही उपाय में अपने आप में निरखा जाय तो हम आप भी सिद्ध बन सकते हैं, क्योंकि हम आपका भी स्वरूप वही है जो सिद्ध का है ।

आत्मा का सहज स्वरूप―यह मैं आत्मा जो कुछ मैं हूँ, स्वयं अपने आप स्वतःसिद्ध अपनी सत्ता के कारण क्या हूँ, कितना हूँ, कैसा हूँ, इस पर दृष्टि दी जाय तो यह विदित होगा कि यह तो केवल चित्स्वभावमात्र है । किसी पर के संबंध पर की अपेक्षा लगाये बिना पर के निमित्त से जो कुछ होता है उसे भी निरखे बिना केवल अपने सत्त्व के कारण जो इसमें हो वह भाव क्या है? वह भाव मिलेगा चित्स्वभाव । यह चित्स्वभाव शुद्ध है अर्थात् किसी पर की अपेक्षा रखकर न देखो । केवल एक अपने आपको स्वभावमात्र है, ऐसा इस शुद्ध आत्मा का जो अनुभव है, उपयोग है, ज्ञान है वह वीतराग सहज उत्तम आनंद को झराता हुआ प्रकट होता है । सारी करामात ज्ञानकला की ही तो है । हम अपने ज्ञान का जिस प्रकार से प्रयोग करेंगे वैसा ही हम पर सुख दुःख अथवा आनंद बीतेगा । हम विकल्पात्मक पद्धति से इसे प्रयोग में लायें तो दुःख होगा, विकल्प होगा, और निर्विकल्पता की पद्धति से देखेंगे तो निर्विकल्प दशा होगी ।


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