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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 89

From जैनकोष



विज्जदि जेसिं गमणं ठाणं पुण तेसिमेव संभवदि ।

ते सगपरिणामेहिं दु गमणं ठाणं च कुव्वंति ।।89।।

धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य की गति और स्थिति में उदासीन हेतुता―धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य जीव तथा पुद्गल की गति और स्थिति में उदासीन कारण हैं, इसकी सिद्धि में इस गाथा में एक मुख्य हेतु दिया गया है । देखो जिन जीवों का गमन हो रहा है उन ही द्रव्यों की स्थिति भी होती है । ये जीव पुद्गल जो गमन कर रहे हैं वे अपने परिणमन से गमन करते हैं और वे ही जब गमन करके ठहरते हैं तो अपने परिणमन से ठहरते हैं । उस गमन और ठहरने में ये दोनों द्रव्य बहिरंग निमित्त कारण हैं । यदि यह धर्मद्रव्य जीव पुद्गल को किसी को चलाता होता और अधर्मद्रव्य ठहराता होता तो जिनकी गति होती है उनकी गति ही होती रहती और जिनकी स्थिति होती उनकी स्थिति ही होती रहती, क्योंकि धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य को एक बलाधान का बल मिल गया ना ।

धर्म व अधर्मद्रव्य को प्रेरक कारण मानने पर आपत्ति―यदि धर्मद्रव्य व अधर्मद्रव्य को प्रेरक मान लीजिए तो धर्मद्रव्य अपना पूरा बल लगाकर अपना काम करेगा, अधर्मद्रव्य अपना बल लगाकर अपना काम करेगा । सो कभी तो यह स्थिति हो जायेगी कि इस जीव पुद्गल की गति स्थिति में झगड़ा बन जायेगा । धर्मद्रव्य किसी को चला रहा है तो अधर्मद्रव्य उसका मुकाबला करेगा । अधर्मद्रव्य किसी को ठहरा रहा है तो धर्मद्रव्य उसे ढकेला करेगा अथवा कभी थोड़ी सभ्यता आ जाये, कोई किसी के काम में बाधा न डाले तो किसी का काम रुकेगा ही नहीं, धर्मद्रव्य जिसे चलाता है वह चलाता ही रहेगा और अधर्मद्रव्य जिसे ठहरा रहा है उसे वह ठहराता ही रहेगा, किंतु दिखता तो यों है कि जब चलना है तो चलता है, जब ठहरता है तो ठहर जाता है, इसके चलने और ठहरने में इतनी स्वतंत्रता बनी हुई है । यह धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य की उदासीनता का ही फल है ।

स्वरूपदृष्टि से वस्तुव्यवस्था―स्वरूपदृष्टि से निरखें तो कोई भी निमित्त किसी दूसरे पदार्थ पर जबरदस्ती नहीं करता, किंतु ये परिणमने वाले उपादान ही स्वयं अपने आप में ऐसी कला रख रहे हैं कि वे किसी योग्य निमित्त का सन्निधान पाकर अपनी शक्ति से विभावरूप परिणम जाते हैं, ऐसी सब उपादानों में कला पड़ी हुई है । यह चर्चा बड़े काम की है ।धर्मपालन के लिए इस सम्यग्दर्शन की सुलझ पा लेना अनिवार्य है । यह मैं आत्मा जब जिस रूप परिणमता हूँ किसी रूप परिणमता हूँ । कभी मैं धनी बन गया, कभी मैं गरीब बन गया क्या परमार्थ से इस रूप हूं? नहीं। धनी होना, गरीब होना यह अपने आत्मा में है ही नहीं, किंतु इस प्रकार के भावों का परिणमन यह हो रहा है । जीव अपने में केवल भावों का ही तो करने वाला बन रहा है । किसी अन्य पदार्थ में क्या करता है? तो यह जीव जब जिस प्रकार के विभाव भावों का परिणमन करता है अपनी शक्ति से, किंतु वह परिणमन किसी अन्य को विषय में लेकर हुआ है, अतएव कोई परपदार्थ हमारे इस विभाव परिणमन में निमित्त है फिर भी इस निमित्तभूत, आश्रयभूत पदार्थ का कुछ भी द्रव्य गुण परिणमन इस उपादान में नहीं गया । इस कार्य के बनने में उपादान की कला देखिये कि इसमें ऐसी योग्यता है कि ऐसे निमित्त को पाकर यह अमुक रूप परिणम जाता हैं । जरा इस वस्तुस्वातंत्र्य के दृष्टिरूपी अमृत का पान तो कीजिए, फिर देखिये कितना संतोष आता है?

मिथ्या ज्ञान में आनंद का घात―यह मोही जीव मोहवश अपने स्वरूप से चिगकर बाह्यपदार्थों में, बाह्य तत्वों में आत्मीय दृष्टि करके उलझ गया है और न जानें कितनी-कितनी प्रकार की इसने कल्पनाएँ बनायी हैं और उन कल्पनावों का यह जीव क्लेश भोग रहा है ।अपना आनंद अपनी दृष्टि के अधीन है, किसी अन्य पदार्थ के अधीन आनंद नहीं है । तो यह आत्मा स्वयं सहज परम आनंदस्वरूप अपनी इस स्वरूपदृष्टि से चिगकर, इस विशुद्ध अनुभूति से चिगकर जितना बाह्यपदार्थों में चले जाने का अपराध किया है उस अपराध का प्रायश्चित्त है । आनंदस्वरूप तो यह स्वयं है, प्रत्येक पदार्थ अपने आपके स्वरूप से अपने आपमें परिणत हुआ करता है । कोई द्रव्य किसी दूसरे द्रव्य पर जबरदस्ती नहीं करता । कोई मास्टर पढ़ाता है और बीसों बालक पढ़ते हैं तो यह मास्टर किसी बालक को जबरदस्ती ज्ञान पैदा नहीं कराता, किंतु वे बालक स्वयं अपना हित विचारकर गुरु के वचनों का निमित्तमात्र पाकर अपने आपमें अपनी समझ का बल लगाते हुए यत्न कर रहे हैं और उस यत्न में वे बालक स्वयं अपने में ज्ञानप्रकाश पा लेते हैं । देखने में तो ऐसा लगता है कि यह अमुक मास्टर देखो कितना कर्मठ है? इन बच्चों को घोट-घोटकर ज्ञान पिला रहा है, किंतु कोई पदार्थ किसी अन्य पदार्थ में कुछ कर नहीं सकता है, व्यर्थ यह जीव मिथ्याज्ञान में आनंद का घात करता हैं।

धर्मद्रव्य व अधर्मद्रव्य की उदासीनहेतुता का वर्णन―यह धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य भी जीव और पुद्गल की गति एवं स्थिति में उदासीन निमित्तमात्र है । धर्मद्रव्य किसी की गति का कारण बनने का प्रयास नहीं कर रहा, यत्न नहीं कर रहा, वह निष्क्रिय अवस्थित है, ऐसे ही अधर्मद्रव्य भी स्थिति के हेतु बनने का श्रम नहीं कर रहा । ये दोनों पदार्थ गमन और स्थिति में मुख्य कारण नहीं है । यदि ये गमन के और ठहराने के मुख्य कारण होते तो जिनकी गति शुरू हुई है, हो रही है उनकी गति ही होती और जिनकी स्थिति ही हो रही है उनकी स्थिति ही होती । लेकिन देखा यह जा रहा है कि जैसे किसी भी एक पदार्थ का अभी गमन हो रहा है तो उस समय बाद में उस ही पदार्थ का ठहरना हो रहा है । इससे यह सिद्ध होता है कि धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य जीव और पुद्गल की गति में और स्थिति में कारण नहीं हैं, प्रेरक कारण नहीं हैं, किंतु ये उदासीन कारण हैं, और यह भी कथन व्यवहारनय का है । निश्चयनय में तो अन्य पदार्थों की दृष्टि ही नहीं रहती है ।

व्यवहारनय से हेतुता का वर्णन―निश्चयनय के विभाग में निमित्त उपादान की व्यवस्था नहीं है, वह तो जो कुछ है एक ही को निरख रहा है । यहाँ फिर एक जिज्ञासा हो सकती हैकि यदि ऐसी उदासीनता है अथवा व्यवहारनय से ही व्यवस्था है कि धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य जीव पुद्गल की गति और स्थिति में उदासीन कारण हैं तो फिर चलने वाले ठहरने वाले पदार्थ का गमन और ठहरना किस प्रकार होगा ? समाधान यह है कि सभी चलने वाले और ठहरने वाले पदार्थ निश्चय से अपने ही अपने परिणमन से गति और स्थिति को किया करते हैं, व्यवहारनय से देखने पर उसमें निमित्त धर्म अधर्मद्रव्य हैं । निश्चय एक ही पदार्थ को निरखता है, व्यवहार अनेक पदार्थों को निरखता है । निमित्तनैमित्तिक व्यवस्था उपादान निमित्त की चर्चा व्यवहार में ही संभव है । निश्चयनय तो केवल एक वस्तुस्वरूप को देखा करता है । इस दृष्टि में निमित्त लखा भी नहीं गया । यहाँ तक धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य का वर्णन हुआ है ।

धर्म अधर्मद्रव्य के अवगम से शिक्षा―धर्म अधर्मद्रव्य के इस वर्णन में हम सारभूत शिक्षा क्या लें? निर्विकार चिदानंदस्वरूप शाश्वत आनंदनिधन अहेतुक एक स्वभाव से भिन्न ये धर्म अधर्मद्रव्य हैं, ये हेय तत्व हैं, यह मैं शुद्ध आत्मतत्व उपादेय हूँ और ये धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य हेय हैं और इतनी ही बात नहीं,धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य के विषय में जो चर्चा की गई है उस चर्चा में जो विकल्प बने हैं ये विकल्प भी इस शुद्ध आत्मतत्त्व में नहीं हैं । यों समझिये कि सब कुछ गुजर रहा है, पर उस गुजरते हुए के भीतर गुप्त सुरक्षित मैं एक शुद्ध आत्मतत्त्व हूं। यहाँ तक धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य अस्तिकाय का व्याख्यान समाप्त हुआ, अब आगे आकाश नामक अस्तिकाय का व्याख्यान किया जा रहा है । उसमें सर्वप्रथम आकाशद्रव्य के स्वरूप की प्रसिद्धि करते हैं ।


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