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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 92

From जैनकोष



आगासं अवगासं गमणट्ठिदिकारणेहिं देदि जदि ।

उड्ढंगदिप्पधाणा सिद्धा चिट्ठंति किध तत्थ ।।92।।

गतिस्थिति का कारण आकाश को मानने की आशंका―इस प्रकरण में एक यह शंका की जा सकती है कि धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य को इनकी गति और स्थिति का कारण कहा है । हमें तो यही आकाश जीव और पुद्गलों के गमन का और ठहराने का कारण मालूम होता है ।देखिये यह शंका बहुत कुछ जंच सकने वाली हो रही है । दुनिया को ऐसा ही मालूम पड़ रहा है कि यह आकाश है । इसमें पदार्थ गमन करते हैं, इसमें ही ठहरते हैं, गमन करना चाहें तो गमन कर लें, ठहरना चाहे तो ठहर लें, इस गमन करने और ठहराने दोनों का कारण यह आकाश है । सो आकाश को गति और स्थिति का कारण बताना चाहिये । धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य के मानने की क्या जरूरत है? इस ही शंका के समाधान में यह गाथा कही जा रही है ।

आकाश में गतिस्थितिहेतुता मानने पर अनिष्टप्रसंग―यदि आकाश नाम का द्रव्य गति और स्थिति के कारणभूत धर्म अधर्मद्रव्य के उपग्रह की बात करने लगे, तो ऊर्द्ध गति वाले सिद्ध जो जीव हैं वे सिद्ध क्षेत्र पर ही क्यों ठहर जाते? इसका कारण बतावो धर्मद्रव्य और अधर्म-द्रव्य तो माना नहीं, ऐसी स्थिति में आकाश तो है असीम अनंत, फिर तो ये चलते ही रहें, ठहरने की कहीं नौबत ही क्यों आये? यह शंका समाधान की दृष्टि में नई नहीं है, मगर शंका रखने की शैली नई है । यदि यह आकाश ही अवकाश में आने वाले अवगाह का कारणभूत जिस प्रकार है उस प्रकार गमन और ठहरने वाले पदार्थों के गमन और ठहरने का कारण भी हो जाये तब सर्वोत्कृष्ट स्वाभाविक ऊर्द्ध गति से परिणत हुए भगवान सिद्ध लोक के अंत में ही क्यों ठहरते हें अथवा फिर तो एक भगवान् सिद्ध की ही क्या बात रही, सभी पदार्थ फिर एक सीमा तक ही क्यों पाये जाते हैं, क्रियावान पदार्थ तो इससे आगे भी चले जायें ना । क्यों यहीं रह गये? यह दूषण आता है ।

दोषापत्ति देकर समाधान―कभी शंकाकार समाधान देता है, आपत्ति देकर भी और फिर उस दोषापत्ति के बाद स्थिति पक्ष रक्खा जाता है । शंकाकार ने यह शंका की थी कि धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य मानने की कुछ जरूरत नहीं है, क्योंकि जीव और पुद्गल की गति एवं स्थिति का कारण आकाशद्रव्य है । उसके उत्तर में यह कहा गया कि यदि आकाश ही गमन करने और ठहरने का कारण होता तो आकाश तो सर्वत्र है, जीव व पुद्गल सर्वत्र क्यों नहीं चले जाते? उनकी गति में तो रुकावट न होनी चाहिए थी ।

समाधान में सिद्धों का उदाहरण देने का कारण―भैया! कोई अन्य पदार्थों के लिए कुछ और बहाना ला सकते हैं । ये पुद्गल पिंडरूप हैं, इनको इससे ऊपर जाने योग्य वातावरण नहीं मिलता, नहीं जा सकते। संसारी जीवों के भी इस तरह के कर्म नहीं हैं, ये अशक्त हैं,ये नहीं जा सकते । अन्य द्रव्यों में कुछ बहाना लाया जा सकता है, किंतु जो शरीर से कर्मों से मुक्त हो गए हैं, जिनमें स्वाभाविक ऊर्द्ध गमन का स्वभाव व्यक्त हो गया है उन सिद्ध भगवान के चलते ही रहने में कोई बहाना नहीं मिल सकता । इस कारण दोषापत्ति देते समय भगवान सिद्ध का ही दृष्टांत दिया है कि यदि धर्म अधर्मद्रव्य न होते तो भगवान सिद्ध निरंतर आगे चलते ही रहते। ठहरने का तो वहाँ कोई काम ही न था । क्योंकि सिद्धों में तो विशुद्ध ऊर्द्धगमन स्वभाव है ही, इससे बात क्या सिद्ध हुई । उस सिद्ध की जाने वाली बात को अगली गाथा में रख रहे हैं ।


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