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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 101

From जैनकोष



अप्पु पयासइ अप्पु परु जिमि अंबरि रविराउ ।

जोइय एत्थु मु भंति करि एहउ वत्थुसहाउ ।।101।।

यह आत्मा अपने आपको और परपदार्थों को प्रकाशित करता है । जैसे रवि को रवि प्रकाशित करता है और परपदार्थों को भी प्रकाशित करता है । हे योगी ! इसमें तुम कोई भ्रम न करो । यह वस्तु का स्वभाव है । जैसे मेघरहित स्वच्छ आकाश में रवि की छवि, रवि का प्रकाश अपने को और पर को प्रकाशित करता है उसी प्रकार वीतराग, निर्विकल्पसमाधिरूप कारण समयसार में स्थित होकर मोहरूपी मेघपटल के नष्ट होने पर यह परमात्मस्वभावमय आत्मा उच्चस्थ वीतराग भावना के ज्ञान से अपने को और पर को प्रकाशित करता ही है । जो अपने आपकी ओर झुके उसको सर्वसिद्धि होती है और जो परपदार्थों की ओर झुकता है उसका सर्व आत्मबल समाप्त हो जाता है । सो जैसे मेघपटल के नष्ट होने पर सूर्य सबको प्रकाशित करता है; इसी प्रकार मोह के दूर होने पर यह आत्मा सर्व अर्थ को प्रकाशित करता है और यह ही आत्मा पश्चात् अरहंत अवस्थारूप कार्य समयसाररूप में परिणम करके केवलज्ञान के द्वारा अपने को और पर को प्रकाशित करता है । ऐसा आत्मवस्तु का स्वभाव है । इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिये ।

भैया ! ध्यान को अच्छा जमाने के लिए सीधा काम यह है कि जो जानन होता है उस जानन के जानने में लग जायें । यह जानन किस ढंग का है? यह जानन किस रूप का है? उस जानन के स्वरूप में ही उपयोग को लगा दें तो यही कल्याण का प्रधान उपाय है और ऐसा करने के लिए अपने जीवन में यह लक्ष्य बनाओ कि हमें तो ज्ञान का संचय करना है । ज्ञान के पीछे पड़ जाओ, आर्थिक पोजीशन कैसी ही रहे, उस पर आत्मोद्धार का निश्चय नहीं है, आत्मोद्धार निर्भर नहीं है । किंतु ज्ञानबल जगे, अपना आत्मस्वभाव न्यारा हो, केवल ज्ञानस्वरूप जंचे तो उससे निस्तारा होगा । इसलिये अनेक उपाय करके इस ज्ञान की साधना करिये । ज्ञान की साधना, ज्ञान के आश्रयों की सेवा करने में होती है। विद्या को पढ़ना, शास्त्र-सभाओं का आयोजन करना, त्यागीव्रती वर्गों से अपना संपर्क रखना; ये सब ज्ञानवृद्धि के लिये साधन की बातें हैं । ईर्ष्या से ज्ञान नहीं बढ़ता, कन्जूसी से ज्ञानवृद्धि नहीं होगी । बहुत क्या कहें? ज्ञान हो तो सदा आत्मा में निराकुलता है और ज्ञान न हो तो जहाँ हैं, वहीं इसको आकुलताएँ होती हैं ।

एक गांव में एक आदमी था । वह तनिक क्रैक माइन्डेड था । लोगों ने उसका नाम मूरखचंद रखा था । तो जो आए वही मूरखचंद कहे । सो वह परेशान हो गया और खीझ करके गांव को छोड़कर चल दिया । हमें नहीं रहना है इस गांव में । सबके सब हमें मूरखचंद कहते हैं । गांव छोड़कर गांव से बाहर तीन मील दूर पहुंचा । तो कुछ आराम की सांस ली और जनाब एक कुएँ पर बैठ गए । बैठे ऐसे कि कुएँ की ओर पैर डाल दिया और मेड़ पर बैठ गया । इतने में एक मुसाफिर आया तो बोलता है कि कहो मूरखचंद, कैसे बैठे हो? वह था अपरिचित पुरुष, उसकी शकल भी न देखी थी । तो झट वहाँ से उठकर उस मुसाफिर के गले लगकर कहा―मेरे यार ! यह तो बतलाओ कि किसने मेरा नाम बतलाया है कि यह मूरखरंद है । मुसाफिर कहता है कि मुझे किसी ने नाम नहीं बताया, किंतु तुम्हारी करतूत ने नाम बताया ।

भैया ! हमारी मूर्खताओं पर हंसेगा कौन? अगर हंस सकता है कोई अपनी मूढ़ताओं पर, तो केवलज्ञानी भगवान् हँस सकता है । वे सिद्ध हो गए हैं सो हंसते हैं और जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई हैं इसी प्रकार ये मोही, मोही, मोही हैं, एक दूसरे का समर्थन कर रहे हैं । और परस्पर में प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं । तुम्हें चाहिये क्या? तुम अपने ऐसे धन का संचय करो जो साथ में जाए । सब सही बात सिखाई जा रही है, पर ऐसा कोई नहीं मिलता जो अपनी गर्दन को झुकाकर जरासा अपने आपको निहार तो ले । तू स्वयं आनंद अमृत से भरा हुआ है । किंतु सब एक दूसरे को सपोर्ट करते चले जा रहे हैं । जो पुरुष अपने आत्मा का ज्ञान करते हैं उनका ज्ञान चारों ओर असीम बढ़ जाता है । यह आत्मा अपने को और समस्त परपदार्थों को प्रकाशित करता है । जैसे आकाश में सूर्य की किरणें सबको प्रकाशित कर देती है । हे योगी ! तुम भ्रम मत करो । यह वस्तु का स्वभाव है ।

जैसे मेघरहित आकाश में सूर्य अपने को प्रकाशित करता है और पर को भी प्रकाशित करता है । उसीप्रकार वीतराग निर्विकल्प समाधिरूप निज ज्ञायकस्वरूप में स्थित होकर [समयसार में स्थित होकर] मोहरूपी मेघ-पटल के विनष्ट होने पर यह परमात्मा छद्मस्थ अवस्था में भी वीतराग भेदभावना के ज्ञान के बल से आत्मस्वरूप की दृष्टि से अपने को और पर को प्रकाशित करता है । यही पीछे अरहंत अवस्थारूप कार्यसमयसार से परिणम कर, अर्थात् अरहंत बनकर केवलज्ञान के द्वारा अपने को और पर को प्रकाशित करता है । पहले तो समझलो कि यह मैं हूँ और इसके अतिरिक्त सर्व पर हैं । इन परपदार्थों को भिन्न-भिन्न जानने की क्या जरूरत है? जान लो एक स्वभाव में, कि ये सब पर हैं । फिर केवलज्ञान होने पर स्व और पर समस्त पदार्थों को एक साथ प्रकाशित करता है । यह आत्मवस्तु का स्वभाव है । इसमें कोई संदेह न करो ।

इस दोहे में यह बतलाया गया है कि जो केवलज्ञानादिक अनंत चतुष्टय के व्यक्तिरूप कार्यसमयसार है वही हम और आप सबको उपादेय है । पाने योग्य चीज क्या है, ढूँढ लो । सब जगह ढूँढने के बाद अंत में खुद में ही लो, यह नवाब साहब बैठे हैं । यह है चैतन्यस्वरूप परमात्मतत्त्व । उस पर दृष्टि हो तो सर्वसंकट दूर हो सकते हैं । संकट है कुछ नहीं । बाहर में दृष्टि लगाई तो संकट बन गए । यह जीव चाहता कुछ है और होता कुछ है । इसकी बात न चल सकेगी । जैसा यह चाहता है वैसी पूर्ति इसकी न हो सकेंगी, अब यहाँ यह भी बतलाया ना, कि कार्यसमयसार उपादेय है और उसका मूल उपाय है कारणसमयसार की दृष्टि । वह कारणसमयसार खुद है इस ओर आओ, मोह के फंद को तोड़ो । मोह के फंद में पड़कर कई वर्ष बाद भी हाथ कुछ न आयेगा, बल्कि गांठ से जायेगा । इसलिए ज्ञानसाधना द्वारा अब से ही अपने पर दया करो । अब इसी बात को और व्यक्त करने के लिये एक दृष्टांत में कहते हैं कि―


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