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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 105

From जैनकोष



अप्पा णाणु मुणेहि तुहुँ जो जाणइ अप्पाणु ।

जीव पएसहिं तित्तिडउ णाणें गयणपमाणु ।।105।।

जो आत्मा को जानता है, जीवप्रदेश से लोकप्रमाण मात्र आत्मा को जो जानता है अथवा निश्चय से लोकमात्र प्रदेश वाला होकर भी जो व्यवहारनय से संकोच-विस्तार वाला हो; ऐसे आत्मा को जो ज्ञान के द्वारा जानता है, व्यवहार से असंख्यात प्रदेशी होकर निश्चय से अखंड अभेद चिन्मात्र जानता है, उसको ही तुम ज्ञान समझो । जगत् में मोहीजीव अपने सुख के लिए क्या-क्या चीजें बाहर में ढूंढ़ते हैं, पर जब सुख होना फिट बैठेगा तो आत्मा के ज्ञान के स्वरूप के जानने से ही फिट बैठेगा । अन्यथा फुटबाल को तरह यहाँ से वहाँ डोलता रहेगा । वे जीव धन्य हैं, वे महाभागी हैं, वे प्रशंसा के पात्र हैं जिनका चित्त संसार, शरीर और भोगों में नहीं रमता है । एक शुद्ध ज्ञानस्वरूप की दृष्टि की हो उत्सुकता रहती है । वे निकट भव्य है और शीघ्र ही मुक्तिगामी जीव हैं । अपने को लक्ष्य बनाना चाहिए मोक्ष जाने का । ‘‘जितना इस भव में मुक्ति के लिए हो सके, कर लो, लक्ष्य होना चाहिए मुक्ति का ही ।’’

लड़कों को हम व्यवस्थित बना दें, हम धन खूब जोड़कर रख दें―ऐसा विकल्प आत्महितकारी नहीं है । संसार में अनंत जीव हैं । सब मेरे समान हैं और सब मेरे से भिन्न हैं । उनमें से 2-4 को अपना मान लिया, यह कितनी अनुदारता की बात है । व्यवस्था के नाते उन्हें संभाल लेना यह तो उचित है, पर उनमें मोह बनाए रखना यह तो उचित नहीं है । देखो अपने ज्ञानस्वरूप को । मोह को हटाओ मिलता भी क्या है मोह से जो है सो है । किंतु मोही जीवों के ऐसा जबरदस्त कलंक लगा है कि जिससे संसार का परिभ्रमण बढ़ता ही चला जाता है । यह आत्मा निश्चयनय से मतिज्ञान, श्रुतज्ञान अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान―इन पांच ज्ञानों से अभिन्न है और व्यवहार से ज्ञान की अपेक्षा लोक और अलोक में व्यापक है और निश्चय से लोक मात्र असंख्यात प्रदेश वाला है । और व्यवहार से अपना देह प्रमाण है । ऐसे आत्मा को हे मुमुक्षुजन ! तुम जानो ।

यहाँ गुणपर्याय और व्यंजनपर्याय, दो प्रकार की दृष्टि दी गई है । गुणपर्याय में यह आत्मा अपने व्यक्त ज्ञान से अभिन्न है, निश्चयनय से । व्यवहारनय से जितने पदार्थों में यह ज्ञान पहुंचता है उतना क्षेत्र में व्यापक है । आपका ज्ञान कितना बड़ा है? जितनी कि आपकी जानकारी होगी उतना वहां यह ज्ञान है, व्यवहार से । निश्चय से तो आत्मा के प्रदेश में जो परिणमन हो रहा है वह तावन्मात्र है । जैसे पूछा जाये कि आपकी दृष्टि कितनी बड़ी है तो निश्चय से तो दृष्टि एक तिल बराबर ही है । जितना कि आंख का तिल बराबर काला होता है उतनी ही दृष्टि है; पर इस दृष्टि के माध्यम से हम जितने पदार्थों को निरखते है, तो व्यवहार से हम कहते हैं कि हमारी दृष्टि उतने मील तक फैली हुई है । निश्चय से देखा जाये तो ज्ञान का आश्रयभूत जो आत्मप्रदेश है उतने में ही वह ज्ञान फैला है और व्यवहार से लोक-अलोक में जहाँ तक व्यापक है, वहाँ तक ज्ञान फैला है । यह हुई ज्ञानपर्याय की बात ।

अब व्यंजनपर्याय को देखो । आत्मा कितना बड़ा है? निश्चय से तो आत्मा असंख्यातप्रदेशी है । निश्चय क्या होता हैं कि जहाँ किसी दूसरे द्रव्य को विषय न किया जाये । जब हम देह को तो देखें नहीं, केवल आत्मप्रदेश को ही निरखें, तब क्या उत्तर आयेगा? हम कितने बड़े हैं? बस, असंख्यात प्रदेशी हैं; किंतु जब शरीर पर भी दृष्टि दें और उत्तर देना चाहे तो क्या कहेंगे? जब जीव जिस देह में है तब जीव उस देहप्रमाण है । सो ऐसे आत्मा को तुम जानो । किस प्रकार जानो कि विकल्पकल्लोलों के समूह को त्यागकर जानो । आत्मा का सही जानन निर्विकल्प होकर ही हो सकता है । जैसे कोई मिठाई सामने रख दे; मान लो पेड़ा रख दें और आपसे कहें कि जरा इन पेड़ों को भी तो समझो, जानो, देखो । तो क्या पेड़ों को हाथ में लेकर देखा जायेगा या मुँह में धर कर देखा जायेगा? नहीं । उसके जानने की तरकीब ही इसी ढंग की है । पेड़े का रूप देखने को नहीं कहा गया, रस जानने को कहा गया । तो रखो मुख में और पेड़ों को समझलो ।

एक ऐसा ही चुटकुला है कि माँ ने बनाये रसगुल्ले । अपने लड़के को पावभर रसगुल्ले देकर कहा, बेटा इन्हें ऐसी जगह रख आओ जहाँ चींटियाँ न चढ़ सकें । मतलब तो यह था कि कहीं पिटारे या सींकचे पर रख आओ । सो वह धर आया ऐसी जगह पर, मतलब पेट में । दूसरे दिन माँ ने कहा―बेटा ! रसगुल्ले ले आओ, अपनी बहिन को भी दे दो । तो लड़का बोला, माँ मैं तो उन रसगुल्लों को ऐसी जगह धर आया कि जहाँ चींटियाँ चढ़ ही नहीं सकतीं हैं; मतलब पेट में । खैर, पेड़े का जानना कैसे बनेगा? खा करके बनेगा । इसी प्रकार आत्मा का जानना कैसे बनेगा? निर्विकल्प होकर बनेगा । सो जो पद्धति है उसका तो यत्न नहीं करना चाहते और परेशानी उत्पन्न होती है कि महाराज सामायिक में बैठते हैं तो मन नहीं लगता । पूजा में भी चित्त नहीं लगता । ठीक है, मन नहीं लगता, उसका, कारण है विकल्प ।

बच्चे लोग बरसात के दिनों में रेत का भदून बनाते हैं, घर बनाते हैं । उसे बनाकर खेलकर, लात मार कर मिटा भी देते हैं! इसी तरह सम्यग्दृष्टि जीव के इतना साहस होता है कि कितनी ही चीजें बनाएँ, कितनी ही चीजों को पास में रखें, पर सबको अपने उपयोग से हटाने में कुछ देर नहीं लगती । यह ज्ञान का बल है तो समस्त विकल्पकल्लोलों को छोड़कर ही आत्मा को जान सकते हैं । आहार, भय, मैथुन और परिग्रह संज्ञा आदि समस्त विकल्पकल्लोल हैं । उनको छोड़कर कोई पुरुष यदि जानता है आत्मा को, तो वही पुरुष ज्ञान से अभिन्न है । वही ज्ञान कहलाता है । आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञान ही आत्मा है । आत्मा के स्वरूप को यदि जानते हैं तो जानने के स्वरूप को जानते हैं । आत्मा झट जानने में आ जायेगा । आंखों से देखने से आत्मज्ञान नहीं होता । जानन क्यों प्रतिभास? एक प्रकाश ज्ञानमात्र और कोई तरंग नहीं । ऐसे निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप को जानने पर यह आत्मा ज्ञात होता है । ‘‘निश्चय से 5 ज्ञानों से अभिन्न आत्मा को जो जानता है, वही ध्याता है, ज्ञानस्वरूप है । उस ही ज्ञानस्वरूप को तुम उपादेय जानो ।’’

और भी देखो भैया ! आप बतलावें कि खालिस अंगुली आपने देखी है क्या? सीधी अंगुली को हम नहीं कह रहे हैं, टेढ़ी अंगुली नहीं, गोल नहीं, किंतु खाली अंगुली जो न सीधी हो, न टेढ़ी हो, न गोल हो, जो अंगुली मिट जाय उसको हम नहीं पूछ रहे हैं । जो सदा रहने वाली हो बहुत काल तक, ऐसी अंगुली देखी है किसी ने? आप अंगुली खड़ी करके बतला देंगे कि यही तो है । हम इसको नहीं पूछ रहे हैं । यह तो सीधी अंगुली है, यह तो मिट जायेगी । ऐसी अंगुली कहां मिलेगी जो सीधी, टेढ़ी दशाओं में हो और फिर वही का वही सत् हो, वही तो शुद्ध अंगुली है । प्योर मनुष्य किसी ने देखा है? हम बच्चों की बात नहीं करते, जवान, बूढ़ों को नही पूछते । खालिस मनुष्य देखा है किसी ने? किसी भी बालक या जवान को ले आओ । सब तरह के मनुष्य सामने धर दो और समझाओ कि जो बालक, बूढ़े और जवान, सेब में एक बस रहा हो, वही तो मनुष्य है।

इसी प्रकार आत्मा का लक्षण है ज्ञान । ज्ञान रहता है 5 अवस्था में―मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, और केवलज्ञान । इन पांचों में से कोई भी एक परमार्थ जीव नहीं है, किंतु जो वह एक इन पांचों ज्ञानों में पहुंचता है वही आत्मा है । किसी ने शुद्धरूप देखा है? नहीं । कुछ हरी चीज धर दोगे । हम हरी की बात नहीं कर रहे हैं, हम पीले, नीले सफेद की बात नहीं कर रहे हैं । खाली रूप की बात बता दो । कैसे बताओगे? इन पांचों को बतलाओ । फिर समझोगे कि इन पांचों रूपों में रहने वाला जो एक तत्त्व है उसको ही रूप गुण कहते हैं । यों ही आत्मा के 5 ज्ञानों में एक रूप से रहने वाला जो ज्ञानस्वभाव है उसको तुम परमात्मा जानो ।

उस परमपारिणामिक भावमय आत्मा के आश्रय से ही मोक्ष होता है । लगता होगा कि ऐसा कहाँ ज्ञान पहुंचवा रहे हैं जहाँ कुछ मिलता भी नहीं है, न पिंडरूप है, न पकड़ सकते हैं । ऐसा कहाँ उपयोग पहुंचता है कि इसको हम परमात्मा मानें । अरे ! ठीक है, मगर ऐसी अटपट जगह में पहुंचाया कि जहाँ कुछ हाथ नहीं लगता तो भली बात है । किसी भी प्रकार मोह का छूटना होना चाहिए । और भी उस ज्ञान के संबंध में

कहते हैं ।


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