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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 108

From जैनकोष



णाणिय णाणिउ णाणियेण णाणिउं जा ण मुणेहि ।

ता अण्णाणिं णाणमउँ किं पर बंमु लहेहि ।।108।।

हे ज्ञानी ! ज्ञानवान् आत्मा सम्यग्ज्ञान के बल से ज्ञानमय आत्मा को जब तक नहीं जानता तब तक अज्ञान होने से उस ज्ञानमय परमब्रह्म को, आत्मस्वरूप को क्या पा सकता है? कभी नहीं पा सकता है । जो कोई आत्मा को पाता है वही ज्ञान को पा सकता है । परमब्रह्म क्या? ब्रह्म शब्द का अर्थ है ‘स्वगुणै: वृहणाति इति ब्रह्म ।’ जो अपने ज्ञान से बढ़ता हुआ रहे उसे ब्रह्म कहते हैं । आत्मा पर कोई आवरण हो और इसका ज्ञानगुण दब जाये, दब जाये; मगर आवरण हटते ही ज्ञान एकदम दृष्टिगत हो जाता है । जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य में पड़ा है, उसके ऊपर बादल आ जायें तो भले ही प्रकाश नहीं आ सकता, पर बादल हटते हैं तब प्रकाश के आने में कुछ विलंब है क्या? जहाँ बादलों का आवरण हटा, तुरंत प्रकाश आयेगा । इसी प्रकार इस ज्ञानमय आत्मा को रागद्वेषादि विकार दाबे हुए हैं, तिस पर भी यह प्रकाश को लिए ही तैयार रहा करता है । जैसे ही रागद्बेष कम हुए, ज्ञान का विकास बढ़ेगा । यह आत्मा अपनी आत्मा के द्वारा ही जाना जाता है और ज्ञानलक्षणरूप में ही जाना जाता है ।

भैया ! जब तक मिथ्यात्वरागादिक विकल्परूप अज्ञानभाव से यह जीव रहता है तब तक क्या उत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त कर सकता है? नहीं । जितने काल आत्मा अपनी आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा, अपनी आत्मा के लिये, अपनी आत्मा से, आत्मा में रहने वाली आत्मा को जब तक नहीं जानता रागादिक विकल्पसमूहों को छोड़ करके जब तक अपने को नहीं जानता; तब तक परमब्रह्मस्वरूपी, शुद्ध आत्मा को नहीं प्राप्त कर सकता । वस्तु के शुद्धस्वरूप को समझने के लिये बड़ा ज्ञानबल चाहिये, अर्थात् रागद्वेष रहित वृत्ति चाहिये । उससे ही शुद्ध निर्दोष परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं । और ऐसे परमात्मस्वरूप की दृष्टि ही हम आपका हित कर सकती है । अत: सर्व उपाय करके इस शुद्ध आत्मा के ज्ञान में ही हम आपको जुटना चाहिए ।

‘‘आत्मा को जानने का उपाय आत्मा से भिन्न नहीं है’’ । आत्मा ही जानता है, आत्मा को जानता है, आत्मा के ही द्वारा जानता है, आत्मा ही के लिए जानता है; पर ऐसी स्थिति तब प्राप्त हो सकती है जब समस्त रागादिक विकल्पजालों का यह त्याग कर सके । रागादिक भाव तब त्यागे जा सकते हैं जब मोह न रहे, मोह कहते हैं अज्ञान को । सर्व पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं और उनका अपने को स्वामी समझना इसको ही मोह कहते हैं । यह मोह मिटेगा वस्तुस्वरूप के यथार्थज्ञान से । प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप से है, पररूप से नहीं है । अपने में ही बदल रहा है दूसरे में नहीं बदल रहा है । प्रदेशवान् है और किसी न किसी के द्वारा गम्य है । यों प्रत्येक पदार्थ को स्वतंत्र-स्वतंत्र समझ लिया जाये तो वहाँ मोह नहीं रहता । जैसे मान लिया कि यह घर मेरा है तो यह मोह है; अगर घर के स्वरूप, घर के चतुष्टय को जान लिया जाये और अपने स्वरूप चतुष्टय को जान लिया जाये तो फिर मोह नहीं रहता है । मोहराग को त्याग कर अपने आप में स्थित आत्मा को जो जानता है वही निर्दोष परमात्मतत्त्व को प्राप्त कर सकता है ।

अब इसके बाद परलोक शब्द की उत्पत्ति द्वारा परलोक कौन है? इस बात को कहते हैं: ―


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