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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 11

From जैनकोष



पुण पुण पणिविवि पंच गुरु भावें चित्त धरेवि ।

भट्टपहायर विसुणि तुहुं अप्पा तिविहु कहेवि ।।11।।

श्री प्रभाकरभट्ट ने अपने गुरु से प्रश्न किया था कि यदि दुनियां के दु:खों से चारों गतियों के दुःखों से कोई छुटकारा दिलाने वाला भगवान् है तो उसे बताओ । तो श्री गुरुयोगेंदुजी पंचपरमेष्ठी को बारंबार नमस्कार करके तथा पंचगुरुओं को चित्त में धारण करके कहते हैं कि हे प्रभाकरभट्ट ! सुनो तुमने जो प्रश्न किया है यह बहुत ही उत्तम है । मैं अब तीन प्रकार की आत्मा का वर्णन करता हूँ । जिस प्रकार आज तुमने पूछा है कि चारों गतियों के दुःखों का दूर करने वाला यदि कोई परमात्मा है तो बताओ । इसी प्रकार का पूर्व में भी भव्यों ने यही प्रश्न किया था । यदि प्रश्न पूछने वाले को अपने प्रश्न का यह पता लग जावे कि मैंने प्रश्न ठीक किया या नहीं तो उसे यह भी श्रद्धान् हो जाता है कि उत्तर भी अकाट्य सच्चा प्राप्त होगा । अत: पहिले श्री योगेंदुजी यही कहते हैं कि हे प्रभाकरभट्ट ! जो तुमने यह प्रश्न किया, इससे पूर्व श्रेणिक भरत आदि ने समवशरण में जाकर प्रश्न किया था । तुम्हारा प्रश्न बहुत ही उचित है । अत: सुनो―

आत्मा तीन प्रकार की है (1) अंतरात्मा (2 )बहिरात्मा (3) परमात्मा । यह बहिरात्मा ज्ञानबल द्वारा बहिरात्मपने को छोड़कर अंतरात्मा बनकर परमात्मा बन सकता है, उसका उपाय है कि जो तेरा सहजस्वरूप है उसका ध्यान कर । गुणस्थानातीत जो आत्मा है उसे भगवान कहते हैं । भगवान होने का जो स्वभाव, परमात्मा बनने का जो स्वभाव वह भी भगवान कहलाता है । अपने अंदर भी भगवान है और बाहर भी भगवान है । अपने अंदर भगवान को पहचानने से पर्याय में भगवान बना जा सकता है । परमात्मा, बहिरात्मा, अंतरात्मा में वही स्वभाव है । स्वभाव कहीं नहीं जाता । यह कारण परमात्मत्व एकस्वरूप ही है ।

यदि कोई मास्टर किसी बच्चे से पूछे कि 4 में से 6 गये तो बाकी क्या रहेगा ? जब प्रश्न ही गलत है तो उत्तर क्या सही दे पावेगा, उसी प्रकार जब यह पता लग जावे कि मैंने जो प्रश्न किया वह उचित है तब यह भी विश्वास हो जाता है कि उत्तर भी सही ही मिलेगा । हे प्रभाकरभट्ट ! जो तुमने प्रश्न किया वह उचित है । ऐसा प्रश्न पहले भी भगवान के समवशरण में जाकर, भेदरत्नत्रय व अभेदरत्नत्रय जिन्हें प्रिय हैं ऐसे भरत श्रेणिक आदि ने पूछा था कि यदि कोई संसार के दु:खों से बचाने वाला भगवान है तो उसे बताओ यह प्रश्न जानने योग्य है । जिन्होंने ऐसा प्रश्न किया था वे परमानंद सुधारस के प्यासे थे । जो जिस चीज का प्यासा होता है उसे उसी की लगन लग जाती है । जिसको जिस बात की रुचि होती है वह उसके पीछे लग जाता है जब तक प्राप्त नहीं कर लेता । वे भव्यगण परमात्म सुधारस के प्यासे थे और वह सुधारस परमात्मा की भक्ति से ही प्राप्त हो सकता है । भगवान की भावना से अलौकिक आनंद आता है । वीतराग अमृत रस के प्यासे उन भव्यों ने भी यही बात पूछी थी । जब आकुलता होती है तभी ऐसी बातें पूछी जाती है । वे भी संसार के दु:खों से दु:खी थे अत: आत्मा की खोज में लगे । बताओ कहां तो आत्मा का आनंद और कहां ये संसार के दु:ख ? वह आनंद मुझमें है, में आनंद का सागर हूं किंतु जब वह वीतराग की समाधि होवे तभी यह आनंद मिल सकता है । जब मैं ज्ञाता दृष्टा रहूं तभी वह सुख मिल सकता है । उन सबकी भरत श्रेणिक आदि की भीतरी भावना यही थी कि संसार का दु:ख न रहे अत: वे भी इस बात को पूछने के लिये परिवार सहित सर्वज्ञ तीर्थंकरों के समवशरण में पहुंचे, नमस्कार कर बाद में यही प्रश्न किया था कि दुनिया के दु:खों से छुटकारा दिलाने वाला यदि कोई भगवान है तो बताओ । आगम में तीन लोक तीन काल आदि का वर्णन तथा किन परिणामों से कर्मबंध कट जावें ? यह सब पूछ लेने पर यही प्रश्न किया था, जो आज तुमने पूछा है इसका उत्तर ले लेना बहुत आवश्यक है ।

श्री प्रभाकरभट्ट भी संसार के दुःखों से दुःखी थे । आत्मा के स्वभाव को पहिचानने के लिये लगन लगी हुई थी । अत: जो यह प्रश्न पूछा कि वह परमात्मा बताओ जो हमें छुटकारा दिलाये, कितना सारगर्भित प्रश्न है । सबका सब निचोड़ भरा है और बातों की पृच्छना से क्या लाभ है? सारा का सारा सार तो इसी प्रश्न में भरा हुआ है । इस प्रकार ढाढस दे श्री योगेंद्रदेव आत्मा को तीन प्रकार का बता रहे हैं―(1) अंतरात्मा (2) बहिरात्मा (3) परमात्मा । परपदार्थों में दृष्टि जावे कि यह मेरा पुत्र है, यह मेरा बंधु है, यह मेरी पौत्री है, मकान है, धन है, माता है, पिता है आदि आदि यह हुआ बहिरात्मा तत्त्व । भीतर के मर्म को जानना सो अंतरात्मा तत्त्व, अपने को पहिचानना कि मेरा स्वरूप ज्योतिपुंज है, चेतना है चैतन्यस्वरूप है आदि सो अंतरात्मा है । जो चैतन्यस्वभाव को ही आत्मा मानता है वह अंतरात्मा कहलाता है । भैया, संसार में रुलना न रुलना यह सब अपने आप पर है । कहीं भी रहे कैसी भी परिस्थिति में क्यों न रहे किंतु यही विचार करता रहे कि मैं तो चिद्स्वभाव हूँ मेरा लक्षण चेतना है । इसके अतिरिक्त कुछ नहीं । मैं रूप रस गंधरहित अरूपी हूँ । आत्मा की लक्ष्य करनेवाले को अंतरात्मा कहते हैं । भैया किसी से कुछ मिलना जुलना तो है नहीं इसे, किंतु व्यर्थ ही बाह्य पदार्थों में पड़कर अपने स्वभाव से, अपनी आत्मा से दूर होता जा रहा है और जिसकी श्रद्धा सही है अटल है, समझो कि उसका कदम मोक्ष के मार्ग में जमकर है, स्थिर है।

भैया ! तीन प्राणी थे, एक बूढ़ा, एक जवान, एक बच्चा । तीनों ने विचार किया कि हमें अब आत्महित करना चाहिये । अच्छा ऐसा किया जावे कि जिसे वैराग्य हो जावे पहिले वह सबको चेतावेगा । सबको उपदेश देगा । यह विचारकर रहने लगे । कुछ दिनों बाद बूढ़े ने सोचा कि अब तो मैं बहुत बूढ़ा हो गया अत: आत्मकल्याण करना चाहिये । अंत: उसने अपने घर की संपूर्ण व्यवस्था सुव्यवस्थित करके सब काम लड़कों को समझा दिया और स्वयं तपस्या हेतु चल दिया । रास्ते में पड़ती थी जवान की दुकान । उससे जाकर बूढ़ा बोला कि भैया हमने घर छोड़ दिया अब आत्मचिंतन हेतु जा रहा हूँ । घर की सब व्यवस्था ठीक कर दी है । जवान ये बातें सुन खुली दुकान छोड़ उसके साथ हो लिया और बोला कि चलो मैं भी चलता हूँ । वह बूढ़ा बोला कि तुम तो सब कुछ ऐसे ही अव्यवस्थित छोड़ चल दिये, कम से कम जहां-जहां सब सामान रखा है, रुपया पैसादि जो भी जिस पर है यह सब अपने लड़कों को संभला दो अच्छी तरह, कोई अधिक समय न लगेगा । जवान बोला कि जिस चीज को छोड़ना है उसमें दूसरों का क्या लगाना ? फिर मेरे लिए तो सब समान हैं क्या घर के क्या बाहर के, अत: किसको संभला दूं मैं ये सब । इस प्रकार सब कुछ उसी प्रकार छोड़ चल दिया । कुछ दूर पर उन्हें वह बच्चा मिला खेलता हुआ । उन्होंने उसको अपना समाचार कहा कि हम अब जा रहे हैं आत्महित करने । वह लड़का यह सुन खेल छोड़ साथ हो लिया । तब वे बोले कि हमारा जाना, तो ठीक है किंतु तुम अभी क्यों जाते हो? अभी तो तुम्हारी सगाई ही हुई है, शादी हो जाने दो, कुछ दिन गृहस्थी में रह लो तब चलना । वह लड़का बोला जो बात हित की न हो उसमें फंसकर फिर छोड़े यह क्या बात क्या पता फिर छोड़ भी सके या नहीं ? इस प्रकार समाधान कर वह भी चल दिया । अत: हे मुमुक्षुजनों ! इन सब बातों में मत फंसो । यह क्या कि पहिले तो कीचड़ में पैर देवे जान बूझकर, फिर धोवे, इससे तो यह अच्छा है जब यह जानता है कि इसमें पैर देने से धोना होगा अत: उसमें पैर ही न देवे । देकर धोना यह कहां की बात हुई ?

श्री प्रभाकरभट्टजी उसी प्रकार विनती कर रहे हैं जैसे कि कोई बच्चा रोकर कहता है कि मुझे तो मां के पास जाना है, इस प्रकार जिद करता है । वह जानता है कि मां के पास जाने से उसे शांति मिलेगी । तीनों अवस्थाओं में ही तुम्हारे अंदर भगवान् बस रहा है । जब नहीं पहिचाना तब भी है और जब पहिचाना तो दर्शन कर लिये और जब भगवान बन गये तो कहना ही क्या है और जहाँ मोह माया है वहां भगवान् का दर्शन कैसे हो सकता है? अत: गुरु श्री योगेंद्रुदेवजी बता रहे हैं कि सब प्रकार से उपादेय जिसमें असारता का नाम नहीं ऐसा जो परमात्मतत्त्व उसे कहूंगा । तीन प्रकार का जो आत्मा है उसमें जो आत्मा का शुद्धस्वरूप बताया है, चैतन्यस्वरूप है, वह सदाकाल रहता है चाहे आत्मा उल्टा ही क्यों न परिणम रहा हो । वह ग्रहण करने योग्य ऐसा मैं हूँ । इस प्रकार विचार करना चाहिये ।


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