• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 18

From जैनकोष



णिच्चु णिरंजणु णाणमउ परमाणदसहाउ ।

जो एहउ सो संतु सिउ तासु मुणिज्जहि भाउ ।।18।।

वह परमात्मा नित्य है, अविनाशी है और यह मैं ज्ञानस्वभावी नित्य हूँ, अविनाशी हूं । निर्मल जल और जल का स्वभाव इन दोनों के वर्णन में अंतर नहीं है । इसी प्रकार परमात्मा का स्वरूप और अपना स्वभाव इन दोनों के स्वरूप में अंतर नहीं है । प्रभु नित्य है, सदा प्रभु रहेगा । यह आत्मा भी नित्य है, सदा ज्ञानमात्र रहेगा । द्रव्यदृष्टि से भगवान नित्य है और द्रव्यदृष्टि से ही हम आप सब आत्माएँ नित्य हैं, निरंजन हैं, रागादिक कर्ममलरूप अंजन से रहित है । एक आत्मपदार्थ को निरखा जा रहा है । वे स्वयं अपने किसी अस्तित्व में विराजमान हैं । वे तो स्वयं केवल चैतन्य प्रकाश है । उनमें न राग है और न कर्म हैं । कर्म हैं सो प्रकट भिन्न पदार्थ हैं और राग हैं सो कर्म विपाकवश होने वाली तरंग हैं । इस आत्मा में अपना जो स्वरूप है, स्वभाव है उसमें न विकार पाया जाता है न उपाधि पायी जाती है, वह तो निरंजन है ।

वह भगवान् केवल ज्ञान करके रचा हुआ है । केवल ज्ञान में सम्मिलित दो शब्द है केवल और ज्ञान । केवलज्ञान दो भावों में ध्वनित रहता है । भगवान् केवलज्ञान से रचा हुआ है, और सभी आत्माएँ हम आप केवलज्ञान से रचे हुए हैं । इस कारण परमात्मा ज्ञानमय है और हम आप भी ज्ञानमय हैं । परमात्मा परमानंद स्वभावी है, उनके उत्कृष्ट आनंद है । हम और आप भी आनंदस्वभावी हैं । भगवान् का आनंद एकदम पूर्ण प्रकट है क्योंकि शुद्धआत्मा की भावना उन्होंने की थी । इस कारण ये वीतराग आनंदमय परिणत हुए हैं । शुद्ध आत्मतत्त्व स्वरूप स्वयं में है । कोई देख सके तो सम्यक्त्व प्रकट हो जाता है । उस शुद्धात्मा को देखने का सुगम एक ही उपाय है कि सर्वपर से अपने को भिन्न जानो । इतना ही नहीं कोई कर सका तो धर्म के लिये कुछ नहीं कर सका ।

भैया ! अपने को जहाँ पर में मिला हुआ देखा कि मिथ्यात्व और मोह का परिणाम हुआ । इसमें धर्म प्रकट नहीं होता । इसलिये यह शिव शांत परमात्मा है । शांत क्यों है कि वह वीतरागी है अशांति रागों के कारण होती है । जो भी पुरुष आपको अशांत मिलेंगे, दु:खी मिलेंगे उसका कारण केवल राग है । किसी के भी दुःखों की कहानी सुनने बैठो, सुनते जावो और परखते जावो, अंत में तुम्हें यही मिलेगा कि उसके किसी चीज का राग है । उससे कहो कि यह राग छोड़ो और सुखी हो जावो तो कहेगा कि और कोई उपाय बतावो राग तो नहीं छोड़ सकते । ये राग और बढ़िया बन जायें ऐसा कोई उपाय बतलावो । परंतु जैसे खून का दाग खून से नहीं धुल सकता इसी प्रकार राग से राग का क्लेश नहीं मिट सकता । सर्व क्लेश मात्र राग से है, नहीं तो सब अपने-अपने घर में भगवान् हैं । जैसे कहते हैं ना कि तुम सब अपने घर के बादशाह हो तो हम भी अपने घर के बादशाह हैं । सो सब जीव परमात्मा हैं । पर राग बीच में ऐसा बड़ा हुआ है कि ये सब जीव परेशान हो गये हैं ।

यदि कहा जाय भैया ! 5 मिनट को तो राग छोड़ दो तो उत्तर मिलता है कि राग कहां से छोड़ दें? कहां से निकालकर फेंक दें? रागों के छूटने का उपाय ही एक है कि अपने को केवलज्ञानमय देखो । मात्र ज्ञानमय, जाननस्वरूप यही जानता रहे, राग छूट जायेंगे । परपदार्थों का स्मरण हट जायगा, पर और उपायों से चाहो कि राग छूट जायें तो नहीं छूट सकते । शांति का उपाय वीतरागता है । सो यह परमात्मा शांत है । यदि अपने आपके ज्ञानस्वभावी देख रहा हूँ तो मैं शांत हूँ । परमात्मा शिवस्वरूप है, परमानंदमय है, परमकल्याणमय है तो यह आत्मस्वभाव भी परमकल्याणमय है ।

लोक में सगुन परम ज्ञानस्वभाव का दर्शन है । बाहर में इंजिन पदार्थों को देखकर कहते हो कि यह सगुन है वह पदार्थ तुम्हारे आत्मा का ध्यान कराने में कारण है इसलिये सगुन है । जैसे कोई जल भरा घड़ा ला रहा हो तो कहते हैं कि सगुन मिला । क्या सगुन मिला? अरे वह पीतल तांबे का हंडा सगुन है क्या? वह पानी सगुन है क्या? उस पानी भरे हुए हंडे को देखकर यह ख्याल आया कि जैसे इस हंडे में पानी लबालब भरा है, उसके बीच में एक सूई की नोक बराबर जगह ऐसी नहीं है कि जहाँ पानी न हो । गेहूं का बोरा भरा हो तो उसमें बीच में जगह खाली रह जाती है पर घड़े में पानी भरा हो तो जितने में पानी है उतनी जगह में कोई स्थान खाली है क्या? जैसे यह हंडा पानी से लबालब भरा है ऐसा यह मैं आत्मा भी ज्ञान व आनंद से लबालब भरा हूं ! ऐसा ध्यान में माना है । ऐसा वह ध्यान सगुन है । इसी तरह सबका यही अभिप्राय है कि वह सगुन माना जाता है । जो पदार्थ हमारे धर्म का ख्याल करायें ये सब सगुन हैं । बछड़ा गाय का अगर दूध चूसता हुआ देखा जाय तो उसे कहते हैं सगुन । उसने ख्याल कराया है कि गाय का अपने बछड़े पर निष्कपट प्रेम है । वैसा ही प्रेम पुरुष को करना चाहिये । यह मुझे शिक्षा देने का कारण है इसलिये सगुन है । जो पदार्थ हमें आत्मा का ध्यान करायें वे सब सगुन हैं ।

भगवान शिव हैं क्योंकि वह परमानंदमय हैं, कल्याणमय है, सो यह आत्मा भी शिवस्वरूप है, कल्याणमय है, इसलिये हे प्रभाकर तुम अपने आत्मतत्त्व की भावना करो । किसको भावो, किसको ध्यान में लावो? अपने आपमें बसे हुए शुद्ध बुद्ध एक ज्ञानस्वभाव की भावना की भावना करो । सीधा निर्णय रखो । धन को परिवार को, मित्रजनों को समागमों में महत्व न दो । ये विनाशीक हैं, परद्रव्य हैं । इनसे मेरे में कुछ नहीं आता है । अपने आपमें नित्य कालिक रहने वाले चैतन्यस्वभाव को महत्व हो । झट-झट इस-इस स्वभाव पर दृष्टि लगावो, इसको ही

चित्त में बसाओ । इसकी ही शरण जावो इसका ही आश्रय लो । परपदार्थों से मोह तजो, ऐसी वृत्ति से आत्मा का कल्याण है जैसा परमात्मस्वरूप है जैसा ही निज आत्मस्वरूप है । सो परमात्मस्वरूप की उपासना करके निज, आत्मस्वरूप को विकसित करो ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश_-_गाथा_18&oldid=81613"
Categories:
  • परमात्मप्रकाश
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 17 May 2021, at 11:56.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki