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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 23

From जैनकोष



वेयहिं सत्थहिं इंदियहिं जो जिय मुणहुण जाइ ।

णिम्मल झाणहं जो विसउ सो परमप्प अणाइ ।।23।।

यह मेरा परमात्मा अनादिकाल से है अर्थात् जब से मैं हूँ तब से ही यह मेरा भगवान है । मेरा भगवान् याने मेरा चैतन्यस्वरूप वेदों से जानने में नहीं आता, शास्त्रों से जानने में नहीं आता, इन इंद्रियों से भी जानने में नहीं आता । यह तो निर्मल ध्यान का विषयभूत है । रागद्वेषरहित निर्मल ध्यान बन जाय तो परमात्मा का अनुभव हो सकता है । उस परमात्मा के अनुभव में केवल ज्ञान ही ज्ञान का प्रकाश दिखता है । वहाँ कोई परपदार्थ न इष्ट दिखता, न अनिष्ट दिखता बल्कि अपने उपयोग में कोई पदार्थ विशेषता का अनुभव कराता हुआ आता ही नहीं है । रागद्वेषरहित समतारस का पूर्ण ध्यान बन जाय तो वहाँ परमात्मा का ज्ञान होता है । यह परमात्मा एक ध्यान का ही विषय है । कैसा ध्यान बने? उत्कृष्ट, नित्य आनंद का स्वाद लेता हुआ ध्यान बने, जिसमें शुद्ध आनंद का अनुभव हो रहा है ऐसे ध्यान का विषय ही यह परमात्मा है । वह शुद्ध आनंद कैसे प्रकट होता है? अपने शुद्धआत्मा का सम्वेदन हो अर्थात् रागद्वेषों को छोड़कर केवल शुद्ध ज्ञाता दृष्टा रहने की स्थिति

का अनुभव हो तो उससे आनंद प्रकट होता है ।

इस आत्मा में किसी प्रकार का आस्रव नहीं लगा हुआ है । आस्रव 5 प्रकार के होते है । जैसे कि सूत्रजी ने कहा है । मिथ्यात्वावरतिप्रमादकषाययोगाबंधहेतव: मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग इनसे कर्म आते हैं बंधते हैं । मिथ्यात्व का अर्थ है मिथ्यापरिणाम होना । अपने से भिन्न वस्तुओं को अपना स्वरूप मानना सो मिथ्यात्व है । परवस्तुओं से अपना हित समझना मिथ्यात्व है । परवस्तुओं में अपनी रुचि उत्पन्न होना मिथ्यात्व है, सो सबका मूल आस्रवमिथ्यात्व है ।

अविरति कोई प्रकार का व्रत न हो, न हिंसा का त्याग हो, न झूठ का त्याग हो, न चोरी का त्याग हो, न कुशील का त्याग हो, न परिग्रह का त्याग हो । 5 प्रकार के पापों में लगना उनसे विरक्त न होना सो अविरति नाम का आस्रव है । ऐसी तीव्र कषाय होना है, जिन तीव्र कषायों के वेग में यह जीव संसार की ओर ही झुका रहता है, मुक्तिमार्ग के द्वार से दूर रहता है ऐसा जो भाव है उसका नाम प्रमाद है, और फिर चौथा आस्रव है कषाय । क्रोध, मान, माया, लोभ हो उससे कर्म आते हैं । जिसे कर्म न चाहिये उसे कषाय के भावों का त्याग करना चाहिये । सो चौथा आस्रव है कषायभाव और 5वां आस्रव है योग । मन का चंचल होना काय की चेष्टा करना वचनों को प्रकृति होना सो योग है । जब मन, वचन, काय को योग होता है तो कर्मों का आस्रव होता है ।

इन 5 प्रकार के आस्रवों से रहित निर्मल जो शुद्ध आत्मा है उसका सम्वेदन होने से एक नित्य अविनाशी आनंद प्राप्त होता है । उस आनंदरूप अमृत स्वाद से चुका हुआ जो ज्ञानपरिणमन है उसमें ही परमात्मा का स्वरूप जाना जाता है । कष्ट सह रहे हैं, चिंतन कर रहे हैं विकल्प मचा रहे हैं, केवल आकुलताएँ ही आकुलताएँ बसी हैं और चाहें कि परमात्मा का दर्शन हो तो परमात्मा का दर्शन नहीं हो सकता । जब शुद्ध हृदय हो, ज्ञान से परिपूर्ण हो किसी वस्तु में मोह न हो, अपने शुद्ध ज्ञान का प्रकाश अनुभव में आता हो तो ऐसी स्थिति में परमात्मा का दर्शन होता है । यह परमात्मा अपने आपमें अनादि काल से है, अपने ही घट में विराजमान है । जहाँ शुद्ध चैतन्यस्वरूप को देखा गया कि परमात्मा के स्वरूप का अनुभव हो जाया करता है । इसलिये हे प्रभाकर भट्ट ! तुम अपने आपके स्वरूप का ध्यान करके परमात्मा को जानो ।

लोक में जितने भी जीव हैं वे तीन प्रकारों में से किसी न किसी प्रकार के हैं । (1) बहिरात्मा (2) अंतरात्मा (3) परमात्मा । बहिरात्मा तो उसे कहते हैं जिसकी बाहर में आत्मीय दृष्टि है कि यह मैं हूँ, यह मेरा है, शरीर मैं हूँ, धन मेरा है ऐसी जिसकी दृष्टि है उसको बहिरात्मा कहते हैं और अपने अंतर में ज्ञानमात्र मैं हूँ ऐसी जिसकी दृष्टि है उसे अंतरात्मा कहते हैं । और अंतरात्मा बनकर और ज्ञान तपस्या करके कर्मों का नाश कर देते हैं और केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनंतसुख, अनंतशक्ति जिसके प्रकट हो जाती है उसे परमात्मा कहते हैं । और तीन प्रकार के आत्मा में जो ध्रुव तत्त्व है चैतन्यस्वरूप है उसे कहते हैं कारणपरमात्मा । तो अब चार चीजें समझना चाहिये । कारणपरमात्मा, बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा । कारणपरमात्मा तो सब जीवों में मौजूद है, चाहे वह मिथ्यादृष्टि हो, चाहे सम्यग्दृष्टि हो । सब आत्माओं में कारणपरमात्मा मौजूद है । कारणपरमात्मा का अर्थ है आत्मा का चैतन्यस्वभाव । जिसके चैतन्यस्वभाव पूर्णविकास में प्रकट हो गया है उसको कहते हैं परमात्मा । और जिसके चैतन्यस्वभाव की पहिचान तो हो गई है पर पूर्ण विकसित नहीं हुआ है उसको कहते हैं ज्ञानी जीव अंतरात्मा और जिसे चैतन्यस्वभाव की खबर नहीं है बाहर-बाहर डोल रहा है उसको कहते हैं बहिरात्मा । और जीवों का जो स्वभाव है चैतन्यभाव है उसको कहते हैं कारणपरमात्मा ।

भैय्या ! इन जीवों ने सबका तो ज्ञान किया, सबका लाभ लिया पर अपने आपमें विराजमान जो कारणपरमात्मा है उसकी पहिचान नहीं की याने स्वभाव की पहिचान नहीं की, वह कितना ही वेद में पंडित बन जाय उसकी पंडिताई व्यर्थ है, शास्त्र में पंडित बन जाय उसकी पंडिताई व्यर्थ है और कितना ही बड़ा तप करले तो भी वह तप करना व्यर्थ है, अपने आपको भीतर जो एक ज्ञानस्वभाव मौजूद है, जिसका काम केवल जानन है उस ज्ञानस्वभाव को न जान सके तो धर्म के नाम पर कितना ही कुछ उत्सव मनावों पर वह व्यर्थ । भैय्या ! कुछ मोह ऐसा पड़ा हुआ है कि धर्म के नाम पर भी और और बातों में बहुत खर्च कर डालते हैं और स्वयं को ज्ञान मिले, शांति मिले ऐसा उपाय नहीं करते हैं ।

जैसे मान लो विधान ही किया तो विधान में 5 हजार दस हजार का खर्चा किया । इतने में ही एक विद्वान् अच्छा सा रख लेते तो ज्ञान मिलता । यदि कुछ ज्ञान मिलता तो उससे लाभ था । भक्ति तो करो, किंतु ज्ञान का अनादर मत करो । वैसे यह भी भक्ति का काम है मगर ज्ञान का काम भक्ति के काम से बड़ा है क्योंकि ज्ञानरहित भक्ति में अपना श्रम अपना धन खर्च करने के बाद भी कुछ साथ में न रहा, पर ज्ञानसाधना से गांठ में कुछ रहा,जिसके उपयोग से वह किसी भी समय सुखी हो सकता है । इसने अपने आपके अंतर में बसे हुए कारणपरमात्मा का परिचय नहीं किया तो वेद शास्त्र तप ये सब क्लेश ही रूप हैं । इनसे व्यग्रता ही बढ़ती है इसलिये सब उपाय करके एक अपने आपके ज्ञानस्वभाव का परिचय कर लो ।

भैय्या ! अपने आपमें बसे हुए प्रभु के दर्शन के लिये एक सरल काम है । करते बने तो आज करके देख लो । उसमें बहुत पढ़ने लिखने की भी आवश्यकता नहीं है । जो पुरुष यह समझते हैं कि धन वैभव मेरा कुछ नहीं है, ये न्यारी चीजें हैं । इनको छोड़कर जाना पड़ेगा । यह शरीर भी मेरा कुछ नहीं है । इसको भी छोड़कर जाना होगा । संसार में जितने भी दृश्यमान पदार्थ हैं वे सब असार है, विनाशीक हैं, इसमें आत्मा का हित नहीं है । इतनी बात जिसने समझ लिया हो, कैसी भी स्थिति हो, हठ करके बैठ जावो कि मुझे तो अपने ज्ञान में किसी दूसरे पदार्थ को सोचना ही नहीं है । किसी पदार्थ का हमें ख्याल नहीं करना है । अगर स्त्री ख्याल में आ गई, हट जावो, तुम मेरी बर्बादी के ही कारण हो । धन वैभव का ख्याल आ गया, हठ जावो, मैं तुम्हारा ख्याल नहीं करता क्योंकि तुम से मेरा पूरा नहीं पड़ेगा । ऐसे सब पदार्थों का ख्याल छोड़कर हट जावो, तब हटते-हटते किसी समय ऐसा विश्राम अपने आत्मा के छूने से मिलेगा कि खुद जान जावोगे कि यह प्रभु का स्वरूप है, यह है कारणपरमात्मा ।

वह कारणपरमात्मा सबके अंदर मौजूद है । जो दर्शन कर लेता है वह कर्मों को नष्ट कर लेता है और जो अपने आपके परमात्मस्वभाव को नहीं जान पाता वह कर्मों का विनाश नहीं कर पाता है । इसलिये ये चार चीजें जानने की हैं । वेदांत ने भी चार चीजें कहीं हैं । जिसमें यह कहा कि ब्रह्म के चार पाद हैं । एक तो जागृत दशा, दूसरी सुप्तदशा, तीसरी अंतःप्रज्ञदशा और चौथी का नाम नहीं कहा । चौथी को तुरीयपाद कहते हैं । जागृतदशा उसको कहते हैं कि जहाँ व्यवहार है, व्यवहार में लग रहे हैं । सुप्तदशा उसे कहते हैं जहाँ व्यवहार सोया हुआ हो अर्थात् ज्ञानदृष्टि है । अंतःप्रज्ञदशा उसे कहते हैं कि जहाँ परमात्मा की दशा बन गई है । चौथा है तुरीयपाद, जो सबमें बसा हुआ है ।

ज्ञानी समझता है कि आत्मा के जानने से क्लेश नहीं आते हैं, आत्मा का स्वभाव ज्ञान है, आनंद है । ज्ञान और आनंदमात्र के अनुभव द्वार से आत्मा का परिचय होने से कर्म दूर होते हैं । धर्म का पालन सही रूप में तब बनता है जब मोह रंच भी न हो । अगर मोह है तो धर्म रंच भी नहीं होता । कहीं ऐसा नहीं होता कि हाथ जोड़ने से कर्म डर जाते हों और वे भाग जाते हों । किसी ने पैदल चलकर हजारों मील की यात्रा कर ली है और अपने ज्ञानप्रकाश का अवलोकन नहीं किया है तो इससे कर्मों का क्षय नहीं होता है । जिसने अपने आपको समझ लिया कि मैं ज्ञानमात्र हूँ । इससे आगे मेरा कहीं कुछ नहीं है ज्ञानप्रकाश को ही मैं करने वाला हूँ और ज्ञानप्रकाश को ही मैं भोगने वाला हूँ । इस ज्ञानप्रकाश के अतिरिक्त न मेरे कुछ आधीन हैं और न मैं कुछ किसी में करता हूँ । ऐसा जिसका विश्वास है उसके कर्मों की बात नहीं आती है । तो इस गाथा में प्रयोजनभूत बात यह बताई है कि अपना जो निजी शुद्ध आत्मा है वह ही उपादेय है और बाकी सब हेय चीजें हैं ।

यह आत्मा वेद का विषय नहीं है किंतु समाधि का विषय है । परमात्मा की भेंट आंखों से न होगी, किसी प्रकृति से न होगी, किंतु जो उपाय अभी कहा था कि सब परवस्तुओं को हटाओ । हटाते-हटाते अपने आप आत्मा में समाधि का परिणाम पैदा होगा और वह विश्राम का परिणाम एक सेकेन्ड को भी होगा, मगर उतने समय में जो आनंद मिलेगा उसमें इतनी शक्ति हैं कि अनगिनते भवों के बांधे हुए कर्म खिर जाते है कर्म कष्टों से नहीं खिरते । कोई कहे कि पर्वत पर गर्मी के दिनों में तपस्या करने से कर्म खिरें सो नहीं, किंतु तपस्या में लगे हुए भीतर ही भीतर ज्ञानस्वभाव में प्रवेश हो रहा हो, उससे जो आनंद आ रहा है उस आनंद से ही कर्मों का क्षय होगा । ऊपरी कितने ही क्लेश हों उनसे कर्म नहीं कटते । अब जो परमात्मा वेद का, शास्त्र का, इंद्रियों का विषय नहीं है किंतु समाधि का विषय है, समता परिणाम का स्वरूप के अनुभव का विषय है उस परमात्मा के स्वरूप को व्यक्त करते हैं ।


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