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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 27

From जैनकोष



जे दिट्ठे सुहति लहु कम्मइं पुव्वकियाइं ।

सो पर जाणहि जोइया देहि वसंतु ण काइं ।।27।।

हे योगी ! जिस कारणपरमात्मा तत्त्व के देख लेने से पूर्वकृत कर्म अंतर्मुहूर्त में ही चूर्ण-चूर्ण खंड-खंड हो जाते हैं उस परमात्मतत्व को, इस देह में बसने वाले निजतत्त्व को ही नहीं जानता हूं? यह परमात्मतत्त्व एक ज्ञानरूप नेत्र से देखा जा सकता है । वह ज्ञान नेत्र समाधि में खुलता है । यह समाधि निर्विकल्प दशा में बनती है । यही निर्विकल्प दशा रागद्वेषरहित होने पर होती है । रागद्वेषरहित अवस्था शुद्ध ज्ञानस्वभावमात्र अपने आपको देखने से प्रकट होती है । भैय्या ! कल्याण के लिये काम बहुत करना है । और कुछ नहीं करना है । केवल एक काम करना है । एक के साधे सब सधते और एक को छोड़ने से सब छूटते हैं । वह एक काम है अपने आपको ज्ञानानंदस्वभावमय तकना ।

प्रत्येक मनुष्य अपने को किसी न किसी रूप तकता रहता है । कोई सोचता है कि मैं धनिक हूँ, कोई सोचता है मैं पंडित हूँ, कोई सोचता है मैं त्यागी हूँ, कोई सोचता है मैं नेता हूँ, नाना प्रकार से अपने को समझते हैं पर इस सर्व मायारूप दृष्टि का छोड़कर इन चर्मचक्षुवों को बंदकर केवल ज्ञाननेत्र से देखा जाय तो यह केवलज्ञानस्वरूप ही प्रतीत होता है । मैं क्या हूँ, इसका उत्तर यहाँ यह आता है कि मैं तो ज्ञानानंदस्वभावी एक चैतन्यतत्त्व हूँ । ऐसा अनुभव करने वाले को सर्वसमृद्धियां मिल जाती है और जो अपने को नानारूप अनुभव करता है उसके हाथ कुछ नहीं लगता ।

एक कथानक में कहते हैं कि दो भाई थे, मानो हिंदू और मुसलमान । एक साथ कहीं जा रहे थे । रास्ते में एक नदी पड़ी, नदी कुछ गहरी थी तो दोनों बोले कि कैसे पार करें? उन्होंने कहा कि अपने इष्ट का स्मरण करके कूद जावो वह पार कर देगा । चले कूदकर तो मुसलमान तो शुरू से अपनी एक ही रटन लगाये चला जा रहा था रे अल्लाह, और हिंदू भाई ब्रह्मा को पुकारा, कुछ देर बाद विष्णु को पुकारा, फिर शंकर को पुकारा । जिसका नाम पुकारे वह आवे और फिर जहाँ दूसरे का नाम पुकारने लगे तहां वह आने वाला देव चला जाये । इस तरह से उसे कुछ सहाय न मिला और वह डूब गया । सारांश यह लेना है कि किसी एक पर श्रद्धा पुष्ट तो करो, क्या चाहिये दुनियां में? धन जोड़कर कुछ लाभ पाया क्या? क्या बूढ़े नहीं होंगे? मरण नहीं होगा क्या? इन मोही जनों ने, जो कि स्वयं संसार के चक्र में फिरने वाले हैं, स्वार्थ में आकर कभी आपके गुणों के, कीर्ति के शब्द बोल दिये तो उससे क्या पूरा पड़ेगा?

इस संसार में आप क्या चाहते हैं? यदि इन कर्मों से, शरीर के बंधन से सदा को मुक्ति हो जाय तो वह स्थिति पसंद है या यह कि परिवार या लोक में स्वार्थवश कभी दो शब्द सुन लिये यह पसंद है? सदा के लिये संकटों से छूटना यदि पसंद है तो जो सदा के लिये संकटों से छूटे हैं ऐसे देव के ध्यान में रहें और जो संकटों से छूटने का उपाय कर रहे हो उनका सत्संग करो । जितना तुम्हारा भवितव्य सुंदर होगा वह श्रद्धा के आधार पर होगी । हम और आपके पास कौनसा ऐसा बल है कि जिस बल से हम आप प्रगति में सफल हो सकें? वह बल है श्रद्धान का बल । हमारा आधार वीतराग सर्वज्ञ है । यथार्थ गुण दिखता है वहाँ सो उन पर मुग्ध होकर उनके अनुरागवश उनके गुणों का अनुराग नहीं है वरन् उस अपने आपके विकास माफिक अपने गुणों का अनुराग है । सो अपने गुणों के अनुराग के कारण प्रभु की ओर ही लगन रहती है ।

चाहिये क्या? शांति । शांति धर्म के प्रसाद से ही मिलती है । एक श्रद्धा मजबूत हो तो हम अपने धर्मक्षेत्र का प्रोग्राम ठीक बना सकते हैं अन्यथा कभी कोई आफत आए परिवार पर, किसी पर तो जिसने जहाँ बहकाया उस देवी में उस देवता में जगह-जगह बोलता फिरता है, फिर उस श्रद्धा हीनता के फल में एक पाप चढ़ा मिथ्यात्व का और अपना वह आत्मबल भी घट गया । आत्महित का अभिलाषी ज्ञानी पुरुष एक व्यवहार में तो जिनेंद्रदेव की भक्ति करता है और परमार्थ से अपने आपमें बसे हुए त्रैकालिक स्वरूप की आराधना करता है । यहाँ कहा जा रहा है कि हे योगी ! जिस परमात्मा का अवलोकन कर लेने से अनगिनते भवों के बांधे हुए कर्म अंतर्मुहूर्त में टूट जाते हैं उस परमात्मा को क्या तुम नहीं जानते हो? भैय्या ! कर्म उदयकाल का निमित्त पाकर जो अपने आपमें रागादिक विकार होते हैं, ये भावकर्म साक्षात् परमात्मा के प्रतिबंधक हैं और निमित्तरूप से ये द्रव्यकर्म परमात्मा के प्रतिबंधक हैं । सो योगी तुम उस आत्मतत्व को देखो जिसके देखने मात्र से कर्म कटते हैं । कर्म कटने का उपाय क्या है? 8 कर्मों का स्वरूप जान लेने से 8 कर्मों की ओर दृष्टि देकर मैं इन्हें जलाऊँ । क्या ऐसा कोई यत्न हो जायगा कि इनको पकड़-पकड़कर जला दूं या खिरा दूं या नष्ट कर दूं? एक ही उपाय है इसका । वह क्या? अपने परमात्मस्वरूप को देखना इस उपाय से जो कुछ होना है, जिस प्रकार से कर्म निकलेंगे उस प्रकार से वे कर्म टूट जायेंगे । अपने को करने का काम एक है । यह परमात्मतत्त्वदेव देह में बस रहा है ।

इस देह में बसने वाले आत्मा में परमात्मतत्त्व ऐसे बस रहा है जैसे घी दूध में बस रहा है । वह यों ही सहज देखने में नही आता, पर यत्नपूर्वक देखने से, विवेकपूर्वक प्रक्रिया करने से दूध से घी आप प्राप्त कर लेंगे तो वह घी किसी अन्य जगह से नहीं आया, मठानी में से निकलकर नहीं आया । वह दूध में गुप्त बस रहा था, पहिचानने वाले जानते थे, दूध को देखकर कह देते हैं ना कि इस दूध में 1।। छ0 घी है, इस दूध में आधी छटांक भी घी नहीं है । यह सब अपने ज्ञानबल से देख लिया । इसी प्रकार देह में जीव बस रहा है और उस जीव में चैतन्यशक्ति ध्रुव चला आ रहा है । उस चैतन्यशक्तिरूप कारणपरमात्मतत्त्व के अवलोकन करने में ये भिन्न-भिन्न उपार्जित कर्म अंतर्मुहूर्त में टूट जाते हैं ।

हे योगी ! सर्वार्थसिद्धि के लिये नित्यानंद स्वभावी स्वआत्मा को क्यों नहीं जानते हो? इस दोहे में यह तात्पर्य बताया है कि उपादेय है तो वह परमात्मस्वरूप है । जैसे कहा था कि प्रत्येक मनुष्य अपने को किसी न किसी रूप अनुभव किए रहता है! मैं पंडित हूँ, मैं त्यागी हूँ, मैं अमुक हूँ, मैं बाबू हूँ, मैं सर्विस वाला हूँ, मैं बाल बच्चों वाला हूँ, किसी न किसीरूप में अपने को समझते रहते हैं । पर किस अपने को समझें तो ये कर्म टूट जायेंगे इसका वर्णन इस दोहा में किया गया है । अपने प्रज्ञाबल से अंतर्मर्म की दृष्टि करके जानो कि मैं नित्य एक ज्ञानस्वभावी हूँ । यह ऊपरी बात या परिस्थिति को देखकर नहीं देखना है । परिस्थिति है, परिणति है, उसही परिस्थिति वाला मैं साधु हूँ ऐसा मान लिया तो यह धोखा है । पर परिणति को यह ज्ञान छुवे नहीं हैं, वे पर उनकी उपेक्षा करो याने मध्यस्थता रखकर अपने आपकी जो चैतन्यशक्ति है उसकी श्रद्धा करो और उसको लक्ष्य में लेकर मानो कि यह मैं परमात्मस्वभाव हूँ तो जैसा अपने को अंतर विश्वास में माना है वैसा ही अपनी चेष्टा व फल होगा ।

बच्चे लोग दोनों हाथ पैरों से चलते हुए मान लेते हैं कि मैं घोड़ा हूँ । वे आपस में थोड़े की बोली बोलते हैं और इतना दृढ़ संकल्पसा कर लेते हैं कि अपने को घोड़ा रूप अनुभवने लगते हैं । वे आपस में घोड़ों की तरह हिनहिनाते हैं और फिर हाथापाई भी कर डालते हैं । और इस हाथापाई में घूसे बाजी भी हो जाती है और फिर लड़ भिड़कर अपने घर चले जाते हैं । तो उन्होंने जैसा ख्याल किया तैसी ही अपने में चेष्टा कर ली । हम मानते हैं कि हम मनुष्य हैं तो मनुष्यपर्याय के रूप में हमें प्रवृत्ति करनी पड़ती है । हम मनुष्य हैं, बंधन हैं तिस पर भी यदि हम अंतर में यह मान सके कि मैं तो एक ज्ञानमात्र चैतन्य वस्तु हूँ, ईमानदारी से, सच्चाई से, कहने मात्र से नहीं, तो मेरे अंतर में एक ज्ञान परिणति बन जायगी, रागद्वेष विकल्पों के भाव हट जायेंगे ।

हम अपने को किस रूप विश्वास में लें यह बात धर्म के लिये सबसे प्रथम जानने योग्य है । दो ही तो बातें हैं । हम किस उत्कृष्ट आत्मा को शरण मानें? एक तो यह निर्णय करना है और उस अपने आपको किस प्रकार से देखूं यह निर्णय करना है । इन दोनों निर्णयों के आधार पर हमारी धार्मिक प्रवृत्ति चलती है । फिर इन दोनों निर्णयों के पश्चात् चूँकि बंधन और स्थिति तो यही हैं ना, कहां तक उनके उपयोग में डट सकेंगे? थोड़ी देर बाद फिर व्यवहार से काम पड़ता है, तब ऐसी स्थिति में हमारी प्रवृत्ति कैसी हो उसके लिये गृहस्थ धर्म और साधु धर्म दो प्रकार से खूब बताया है ना?

गृहस्थ धर्म में 8 मूल गुणों का पालन सर्वप्रथम बताया है । वे 8 मूलगुण क्या हैं? (1) मधु त्याग (2) मांस त्याग (3) मदिरा त्याग और (4) पंच उदंबर फलों का त्याग, (5) रात्रि भोजन त्याग (6) जीवदया, (7) जल गालन (8) देवदर्शन । इनमें से प्रथम तीनों जल्दी निभ जायेंगे, मधु, मांस और शहद त्याग । रात्रि का भोजन न करना कुछ कठिनसा हो गया आजकल के फैशन में । कुछ तो त्याग करते हैं । रात्रि भोजन त्याग करो तो कम से कम इतना पालन करो कि जिससे जघन्यरूप में भी रात्रि भोजन त्याग में शामिल कहलाने लगे ।

प्रतिमाओं के बिना अविरत श्रावक रहकर भी रात्रिभोजन त्यागियों में तुम भी कहला सको, कम से कम ऐसा त्याग तो हो । लड्डू पेड़ों का तो रात्रि में खाने का त्याग होगा ही, थोड़ा और साहस करो औषधि और जल को छोड़कर रात्रि में कुछ न लो, क्या कोई यह बात कठिन है? यह कम से कम रात्रिभोजन के त्याग की बात है । और देखो इसमें किसी को संकट नहीं आ सकते हैं । प्यास की वेदना के लिये पानी हो गया और कोई रोग हो तो औषधि हो गई और क्या चाहिये? खाने की तो चाहे जितनी लिप्सा बढ़ा जावो, बारातों में भी समूहरूप में कहीं-कहीं रात्रि को खाने लगे और जो नहीं खाते उनकी लोग मजाक उड़ाने लगते हैं । यह बहुत ही गलत प्रथा चलने लगी है । दृष्टि दो, समाज भी मिल कर इस पर प्रतिबंध करे ।

छठा गुण है जीवदया, संकल्पी हिंसा का त्याग । यह भी निभाया जा सकता है । और 7वां मूलगुण है छानकर पानी पीना । 24 घंटे में जब भी जल पीवें तो छानकर पीवें । जल में कितने ही जीव पड़े रहते हैं । अनछना जल पीने से रोग भी हो जाते है, हिंसा तो होती ही है, सो जल को छानकर ही पीना चाहिये । दबा गुण है देवदर्शन करना । देवदर्शन करना भी नियम से प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है । ये 8 मूलगुण श्रावक के मूल काम हैं । सो अपने सर्व आचारों पूर्वक रहो और ज्ञानाचार का उद्योग करो और शुद्ध परमात्मदेव और अपना शुद्ध आत्मस्वभाव इन दोनों की परख में, निर्णय में अपना उपयोग लगावो । इन्हीं बातों से अपने दुर्लभ नरजीवन की सफलता है ।

हम लोग अब पड़े तो बहुत हैं पर जो करें उन्हें लाभ है । एक बाबू साहब मानो दिल्ली जा रहे थे । एक पड़ोसिन आई बोली हमारे मुन्ने को खिलौने ले आना, दूसरी आकर बोली हमारे मुन्ना को मिट्टी का जहाज ले आना, इसी प्रकार से 10-20 बहुवों ने कहा । किसी ने कुछ कहा किसी ने कुछ । बाद में एक बुढ़िया आई, बोली बाबूसाहब मेरे पास दो पैसे हैं सो लो और मेरे मुन्ना को एक मिट्टी का खिलौना ला देना । तो बाबूसाहब बोले बूढ़ी मां, मुन्ना तेरा ही खेलेगा और 10-20 बहुवें रईसों के यहाँ से आयीं पर किसी ने कुछ दिया नहीं तो बातें ही बनाने से काम न चलेगा, जो अपनी शक्ति माफिक धर्म करेगा उसका काम चल सकता है ।


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