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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 38

From जैनकोष



भूतव्रत्यनुकंपादानसरागसंयमादियोग: क्षांति: शौचमिति सद्वेद्यस्य ।

सो देखो उस तत्त्व का प्रकरण था अत: वह एक छत्र में बता दिया किस वहाँ भी यह उपदेश नहीं दिया कि तुम क्षमा करो, दया करो, संयम पालो । इसमें यह कहा है कि क्षमा, दया आदि भाव साता वेदनीय के बंध करने वाले हैं । करना चाहो कर लो । शास्त्रों में सम्यग्ज्ञान में भी मुख्यतया वस्तुस्वरूप का ज्ञान बताया है । कोई स्रोत ऐसा मिल जाय चाहे वह 10 वर्ष में मिले जिससे कि फिर जल की धारा नहीं टूटे । ऐसा ज्ञान मिल जाय चाहे 10-12 वर्ष में मिले पर जिस ज्ञान के बाद हमारी सद्वृत्ति की परंपरा नहीं टूटे उसमें आचार्य महाराज की दृष्टि थी और ऐसी ही दृष्टि भक्त को अपने मन में रखनी चाहिये । भैया अपने आपमें ही कोई तत्त्व ऐसा है कि जिसके दिख जाने पर मोह ठहर नहीं सकता । वह तत्त्व क्या है उसका वर्णन इस परमात्मप्रकाश ग्रंथ में है । जैसे हड्डी का फोटो लेने वाला एक्सरा कपड़े को छोड़कर, चमड़े को छोड़कर खून मांस को छोड़कर सीधा हड्डी का फोटो ले लेता है उसी प्रकार यह प्रजा, वैभव को छोड़कर परिवार को छोड़कर, शरीर को छोड़कर, कर्म को छोड़कर, राग, द्वेष भावों को छोड़कर, अपूर्ण ज्ञान को छोड़कर, विकारों को छोड़कर अनादि अनंत शुद्ध चैतन्यस्वभाव का अपने उपयोग में ले लेता है ।

यह सब ज्ञान का ही तो प्रताप है । आपकी दुकान की तिजोरी में बक्स है, उस बक्स में भी बक्स, बक्स में डिबिया, डिबिया में कपड़ा, कपड़े में एक हीरे को अंगूठी है । आपको जब उस अंगूठी का ख्याल आ जाता है तो आपका ज्ञान न तो दुकान के किवाड़ से अड़ता, न तिजोरी से अड़ता, न डिबिया से, न कपड़े से अड़ता, सीधा हीरा जड़ी अंगूठी को जान जाता है । ज्ञान की गति सर्वपदार्थों की गति से विलक्षण है । सम्यक्ज्ञानी पुरुष ही ऐसा कर सकता है उसका ज्ञान किसी में नहीं अटकता, सीधा जो अपना शुद्ध सहजस्वरूप है, पावन है, उद्धार करने वाला सर्वस्व है उसकी शरण में पहुंच जाता है । वह परमात्मतत्व क्या है? इसका वर्णन इस ग्रंथ में है कि जो देह में रहता हुआ भी शरीररहित है, कर्म से भिन्न है उसको ही तुम परमात्मा जानो । जो बात कई प्रकार से सुनी जाती है, परिचय में आती है, अनुभव में आती है उससे लगाव झट हो जाता है । जो कभी सुनने में नहीं आये, परिचय में नहीं आये, अनुभव में नहीं आये उसका लगाव कैसे हो? कम से कम इतना तो ज्ञान सामने रख करके इस मुझ पर्याय को गुजर ही जाना है । कभी और यह सारा संगम छूट जाना है, कभी वियोग हो ले कुछ समय लगे वियोग तो होगा ही फिर मेरा जो मैं: रहूंगा उसका क्या होगा? उसका मुझे क्या करना है? इतना सामान्य बोध सामने रखकर इसकी उत्सुकता बना ले कि हम अपने आपके रहस्य को समझते, मर्म को समझ लें जिसके लिये बड़े-बड़े तीर्थंकरों ने बड़ी विभूतियों का त्याग किया और अपने आपके स्वरूप में मग्नता की । देखो―प्रभु सर्वोत्कृष्ट हैं तभी तो हम मूर्ति बनाकर पूजते हैं । मूर्ति बनाकर पूजने का अर्थ यह हैकि यह महान् पूज्य हैं । यहाँ भी भैया आप लोग हाथ जोड़ते रहते हैं, ब्रह्मचारी के, पड़ोसियों के जज के पर किसी की मूर्ति बनाकर भी आपने हाथ पैर जोड़े ।

किसी की मूर्ति बनाकर हाथ जोड़ने का तात्पर्य यह है कि वह महान् पूज्य है । किसी-किसी से कोई बात अटक गई तो उसके हाथ जोड़कर पैर तक भी पकड़ लेते हैं पर उसकी मूर्ति बनाकर एक अंगुली से भी जैसे आजकल परंपरा में सलाम किया बताते हैं, इतना भी करते हैं, क्या? और जाने दो पिता की भी आप फोटो बनाते हैं । उस फोटो की जानकारी भी औरों को कराते हैं, देखकर सुखी होते हैं पर क्या कभी उस फोटो के भी हाथ जोड़े हैं ? किसी की मूर्ति बनाकर पूजना बहुत बड़ा महत्व रखता है । हमारी प्रभु में बहुत बड़ी श्रद्धा है जिसको हम संकुचित नहीं रख पाते और मूर्ति बनाकर हम उसके दर्शन में रहते हैं । यह सम्यक्दर्शन की एक विशेषता बताने वाली बात है । मूढ़ लोग नहीं जानते, न जाने । ज्ञानीपुरुष भी दो चार ही जानते हैं जानें । यह कोई प्रजातंत्र निर्णय नहीं है कि बहुत से लोग जानें तो बहुत तत्त्व की बात है और कम लोग जिसे जानें वह असत्य की बात है । यहाँ यह बात नहीं चलती । जैसे प्रजातंत्र राज्य में ऐसे कई समूह होते हैं कि जिसमें प्रजा के वोट से काम नहीं होते हैं । लोग यह देखते हैं कि समझदार कौन है? ज्ञानी कौन है? योग्य कौन है? किसे मिनिस्टर बना दें । मिनिस्टर बना देना प्रजाजनों की वोट से नहीं होता होगा, विचार से होता होगा । यह तत्त्व की बात है अनंते जीव इस तत्त्व की निंदा करने वाले हैं और गिने चुने पुरुष इस तत्त्व को पसंद करने वाले हैं । तो गिने चुनों की ही बात सही है । एक भिल्लनी को एक जंगल में गज मोती मिल जाये और उसे वह पत्थर मानकर अपने पैरों का मैल छुटाया करे तो वह मूर्ख है, रहे मूर्ख । किंतु वे गजमोती क्या रानियों के गले में हार बनकर शोभा नहीं दिया करते? यह तत्त्व अज्ञानीजन चूंकि उन्हें पता नहीं है उनकी दृष्टि में यह पत्थर के समान है, रहे । किंतु ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में यह तत्त्व परम शरण ज्ञात हुआ कि जिससे हम प्रभु बन सकें तो बनने की तैयारी करें । इसके जानने से वीतराग समाधि बना सकें तो बना लें । भैया, रागद्वेष से प्रभु के दर्शन नहीं होंगे । रागद्वेष नहीं है, सर्व में ममता का परिणाम है निजस्वरूप में भी विश्राम मिलता है तो प्रभु के दर्शन हो जायेंगे । एक साथ दो बातें न होंगी कि रागद्वेष भी किये जायें व प्रभु के दर्शन भी पा लें । एक टीका में एक कथानक है । दो चींटी थीं । एक तो चींटी नमक के बोरे पर थी और दूसरी चींटी घर शक्कर के बोरे पर रहा करती थी । दोनों नमक और शक्कर में रहा करती । एक बार शक्कर वाला चींटी नमक वाली चींटी के पास आकर बोली―मेरी बहिन यहाँ क्या करती है? यह तो तुम खारा-खारा खा रही हो । तुम हमारे साथ चलो ना, हम आपको मीठा-मीठा खिलायेंगी । बहुत आग्रह करनेपर कि तुम को तो हमारे घर पर चलना ही पड़ेगा, चली किंतु उसने यह ख्याल करके कि वहाँ कुछ नहीं मिला तो भूखा रहना पड़ेगा सो एक दिन के लिये भोजन तो ले चले तो अपनी चोंच में नमक की डली लेकर वह चली शक्कर की चींटी के साथ और वह वहाँ पहुंची और शक्कर खाया तो शक्कर वाली चींटी ने पूछा बहिन कैसा स्वाद आया? हमें तो वैसा ही स्वाद आया जैसा पहिले था, उसे मधुर स्वाद नहीं आया । शक्कर वाली चींटी के लिये तो मीठा-मीठा स्वाद था तो वह कहती है कि हमें तो मीठा-मीठा स्वाद आता है उसने गौर से देखा कि यह नमक की डली चोंच में लेकर आयी है । अरे बहिन इसे छोड़, चोंच से निकाल यदि हमारे यहाँ भोजन करने पर यह विश्वास नहीं है तो पास में ही इस डली को रख लों । उसने चोंच से डली निकालकर डली को हटा दिया और उसने शक्कर के दाने खाये । बोली बहिन, तुम ऐसा मजा कब से ले रही हो? यह तो बड़ा मीठा लग रहा है । सो भैय्या ! हमारे मन में मोह, रागद्वेष ममता का भाव भरा है तो हम प्रभु के दर्शन शुद्धात्मतत्व का अलौकिक अनुभव कैसे कर सकते हैं ? ज्ञानी पुरुष में ही ऐसा साहस होता है जो बच्चों के घर की तरह तुरंत बनावे और तुरंत बिगाड़ दे । जैसे बच्चे बरसात की रेतीली जमीन पर पहुंचकर पैर के ऊपर धूल डालकर थोपकर घर बना लेते हैं इस प्रकार उन्हें घर बनाने में समय नहीं लगता घर को बिगाड़ने में भी एक लात की देरी है । इस प्रकार ज्ञानी जीव दुकान में रहता है, दुकान का काम खूब करती है और परिवार का पोषण भी खूब करता है किंतु समय-समय पर जड़ चाहे उन सब बातों को बिल्कुल भूलकर एक अपने सहजस्वरूप को भी देख लेता है । बाहिरी काम करने में भी उसके पास कला है और उन बाहिरी बातों को छोड़कर अपना अनुभव कर ले ऐसी भी कला है । ऐसा योग्य पुरुष ज्ञानी पुरुष है । प्रभु के दर्शन करने की पद्धति यह है कि अपने आपको निर्विकल्प स्पष्ट बना लिया जाय तो प्रभु का दर्शन हो सकता है । एक बार दो चित्रकार राजा के पास आये, उन्होंने कहा महाराज हम बड़ा अच्छा चित्र बनाना जानते हैं । राजा ने कहा अच्छा तुम दोनों के चित्र हम मुकाबले में बनवायेंगे । राजा ने एक ही हाल के बीच में एक पार्टीशन कर दिया तो एक भीत एक चित्रकार को दे दी और दूसरी भीत दूसरे चित्रकार को दे दी और उनको चित्र बनाने के लिये राजा ने 6 माह का समय दे दिया । दोनों में से जिसका चित्र बढ़िया होगा उसको भरपूर पुरस्कार मिलेगा । हो गई तैयारी । एक चित्रकार ने जिसको अपनी कला पर गर्व था बढ़िया रंग मंगाकर अच्छी चित्रकारी करना शुरू किया । जो दूसरा चित्रकार जो कि विवेकी था उसने अपनी भीत को घोटना शुरू किया । 6 माह हो गये तब राजा ने कहा तुम लोगों के बनाए चित्र अब देखते हैं । उस पार्टीशन को अलग कर दिया । राजा चित्र देखने पहुंचा तो गर्वीले चित्रकार के चित्रों को देखने लगा तो चित्र तो बहुत सुंदर था । क्योंकि कलाकार था लेकिन उसमें विशेष कांति नजर नहीं आयी और दूसरी भीत को देखा जो घुटी थी तो वे सारे के सारे चित्र चमकने लगे । राजा ने उसको पुरस्कार दिया । इस प्रकार हम धर्म के नाम पर 4-6 घंटा श्रम तो करते हैं । जाड़े में भी सुबह नहा धोकर मंदिर में आते हैं भक्ति करते हैं, पूजा करते हैं, स्वाध्याय करते हैं, गुरुओं की सेवा भी करते हैं । बड़ा श्रम करते हैं । धर्म की धुनि भी इतनी सही है, कोई काम आ पड़े धर्म पर तो व्यय करने में भी नहीं चूकते । क्या कर रहे हैं? धर्म का काम कर रहे हैं । ऐसे धार्मिक काम को तो एक विवेकी पुरुष भी करता है और जिसके विवेक नहीं है और धर्म की धुनि है तो वह भी ऐसा किया करता है । काम में अंतर नहीं पड़ता है किंतु जिसने अपनी उपयोगरूपी भीत को मांझ लिया, साफ किया, सुथरा किया है उसको उस स्वच्छ ज्ञान में आ टिका कि इसका स्वरूप यह है । व्यवहार धर्म से भी लाभ लूटता है । भैय्या ! जानों तो सही इस आत्मा का ढंग क्या है? किससे बना है? कैसा आकार है? क्या इसको जाना नहीं जा सकता? उत्तर सही मिलना चाहिये कि यह ज्ञानमात्र है । यह मैं मात्र प्रतिभास का कर्त्ता हूँ । यह मैं अमूर्तिक जानन मात्र हूँ । उसका अन्य पदार्थ से भी संबंध नहीं । यह स्वयं अपने स्वरूप में स्वतंत्र है । यह बात अनुभव में आ जाय तो ऐसी स्वच्छता हो जायेगी कि हमारे फिर यही सब काम व्रत के तप के स्वाध्याय के ये सब चमक जावेंगे, शृंगार होंगे । 10 गुने फायदे देंगे । एक के अंक के ऊपर अगर हम एक बिंदी रख दें तो वह 10 गुना संख्या हो जाती है । बिंदी 10 गुने का प्रभाव डालती है । इस तरह अपनी आत्मा का बोध सम्यक है तो यह सब कार्य 10 गुने क्या कई गुने फैला करते हैं और एक का अंक पहिले न हो तो क्या उससे एक केला भी खरीदा जा सकता है । उससे कोई काम निकल सकता है? कुछ भी नहीं निकल सकता, व्यर्थ है । हां बिंदियां धरी हैं और कोई चुपचाप आकर कोई उनके पहिले एक लिख जाय तो वह बात अलग है । इस तरह जो व्रत तप किया जाता है उस स्थिति में चुपचाप कभी किसी को आत्मतत्व दीख जाय तो वह बात अलग है । तो वह सब काम ऐसे हो जायेगा जैसे एक धनी कंजूस कोई है, इस समय तो कंजूस है, पैसा खर्च नहीं कर सकता और कदाचित् उसके सद्बुद्धि हो जाय तो पैसा खर्च करने में एक मिनट भी देर नहीं लगती । इसी प्रकार ये सब व्यवहार धर्मपालन के संस्कार हैं तो ठीक काम तो अच्छा है पर आत्मज्ञान बिना हित में कंजूस है जिसके कारण उसे आत्मसंतोष नहीं है । किंतु धर्म के काम में सद्उपयोग है सो यद्यपि इस समय कर्म का संवर व निर्जरा तनिक भी नहीं होता फिर भी कदाचित् इन कामों को करने में कभी आत्मज्योति की झलक आ जाय तो कल्याण हो जायेगा । इसलिये बिना आत्मज्ञान के ये हमारे धैर्य के कार्य कंजूस के धन की तरह हैं । इस काल में तो कंजूस अपने आराम के लिये भी कुछ व्यय नहीं कर सकता किंतु आगे कभी कर तो सकता है । धन तो है उसके पास । इस प्रकार इन कार्यों में हमें शांति जरा भी नहीं रह पाती । देखो ना, विधान करते हुए विह्वलता क्यों रहती है? कोई हमारा विधान बिगड़ नहीं जाय । ये लोग यह कह न जायें कि इनका विधान अच्छा नहीं हुआ । कितने प्रसंगों में तो गुस्सा आ जाता है । उसका लाभ नहीं ले पाता इसका कारण क्या है कि हम आत्मबोध पूर्वक कार्य नहीं करते हैं । पहिले समय में तो बड़ी साधारण रीति से विधान होता था, बड़ी भक्ति से, शांति से विधान होते थे, खर्च भी अधिक नहीं होता था । बिना विविध व्यय व आडंबर के कितना उत्तम होता था । जो बूढ़े आदमी हैं वे सब जानते हैं कि उस समय भक्ति शांति कितनी मात्रा में रहती थी । आज हमारे कुछ लोग इसकी विधि को इतना बढ़ाते हैं कि एक विधान में 5-6 हजार सभी खर्च करा है । जब इस विधान के करने वाले की समझ में यह न आये कि इस विधान के करने में 5000) खर्च हुआ तब तक कराने वाले को 500) कैसे मिला, यदि वह देखता है कि मेरे विधान में 100) खर्च होते हैं तो पंडितजी को क्या मिलेगा? कितना आडंबर व श्रम बन गया विधान में, सो विधान करने वाले जानते होंगे कि हम कितनी भक्ति में अपना समय गुजारते हैं । जब तक आत्मज्ञान नहीं है और यह उद्देश्य नहीं बना है हमारी इस शुद्ध पूजा में कि प्रभु का स्वरूप ऐसा है और ऐसा ही मैं हो सकता हूँ उस एक भाव में भरने के लिये मैं पूजा कर रहा हूं―यह उद्देश्य नहीं आये तब तक शांति का उद्योग नहीं बन सकता । एक पुरुष साधु के पास गया बोला महाराज मुझे कुछ उपदेश दीजिये । साधु बोले―सुनो मैं ब्रह्म हूँ । फिर―मैं ब्रह्म हूँ । दो चार बार दिया यह उपदेश और महाराज और क्या? और बतलाओ । साधु बोला, कि अच्छा तुम यहाँ से चले जाओ । अमुक गांव में पंडितजी रहते हैं उनसे कुछ सीखो अध्ययन करो । वह गया और पंडितजी से प्रार्थना की । उन्होंने कहा जैसा कि पहिले यह रिवाज था कि कुछ काम करना पड़ता था गुरु का तब उससे कुछ शिक्षा मिलती थी । गुरु ने कहा कि गाय भैंस की शाला में गोबर को उठाने वाला कोई है नहीं सो तुम गोबर को फैंक आया करो और कुछ गोबर के कन्डे बना लिया करो । काम मिल गया और वह पढ़ने लगा 12 वर्ष तक उसने गोबर का काम किया और 12 वर्ष बाद जो कहते हैं दक्षिणा का समय तो उस समय कहने लगा कि गुरुजी मुझे सब उपदेशों का सार बता दो तो गुरु ने कहा सुनो । ‘अहं ब्रह्म अस्मि’ मैं ही ब्रह्म हूँ । शिष्य कहता है कि इतनी बात तो हमें एक साधु ने बता दी थी तो क्या मैंने 12 वर्ष गोबर मुक्त में उठाया? गुरु ने कहा कि अब तक तुमने जो अध्ययन किया उस सब अध्ययन की बात का सार है, इसको अध्ययन किये बिना नहीं जान सकते थे । एक राजा था तो घोड़े पर सवार हुआ । वह मंत्री के घर के सामने से निकला तो उसने मंत्री से कहा कि हमें आत्मा और परमात्मा दिखा दो । तो महाराज घोड़े से उतरी, राजा बोला हमें जल्दी है । हम को तो 5 मिनट में ही दिखा दो । मंत्री बोला महाराज अपराध क्षमा करो तो आपको पाव मिनट में दिखा दूंगा । मंत्री ने राजा के हाथ से कोड़ा लेकर राजा में 3-4 कोई मारे तो जो उन कोड़ों के पड़ने से राजा के मुँह से निकला अरररे भगवान् ! मंत्री बोला यही तो परमात्मा है, आत्मा है । जिसे तुम पुकारते हो वह भगवान् है जिसमें अरे कहा वह आत्मा है, जल्दी समझने का तो यही तरीका है, पर इस तरह कोई स्थाई बोध नहीं हुआ । आत्मज्ञान करना सबका काम है और उसके लिये हमें विधिपूर्वक अध्ययन में जुटना चाहिये । यह कमाई आपकी सच्ची कमाई होगी । आपका कमाया हुआ धन जब तक साथ है तब तक आकुलता है मगर यह आत्मज्ञान ही आपकी शांति का कारण है । उसही परमात्मतत्व को इस ग्रंथ में विशदरूप से बताया जा रहा है ।

जैसे इस अनंत आकाश के बीच में कोई एक नक्षत्र शोभायमान रहता है । इस ही तरह इस केवलज्ञानरूपी अनंत आकाश के बीच में यह समस्त तीन लोक और अलोक, तीनों लोक ये सब नक्षत्र के समान प्रकाशित होते हैं । यह प्रभु के ज्ञान की महिमा बताई गई है । यह प्रभु के ही ज्ञान की महिमा नहीं है, हमारे आपके ज्ञान की भी महिमा है । तुम अपनी असली महिमा को नहीं जान रहे और व्यर्थ में जो नष्ट हुए जाने वाले हैं, जिनसे हमारा कोई संबंध नहीं रहेगा उनमें उपयोग बढ़ाए हुए हैं । जैन शासन को पाकर भी यदि पुरानी रफ्तार से तनिक भी नहीं टला तो किसलिये यह जैन शासन है? यह लोकालोक इतनी जगह में पड़ा है जैसे अनंत आकाश के बीच में एक नक्षत्र जितनी जगह में पड़ा है । वस्तु के नापने के अविभाग प्रतिच्छेद होते हैं । डिग्रियां भगवान के ज्ञान के अविभाग प्रतिच्छेद इतनी हैं कि थोड़े से अविभाग प्रतिच्छेद ही सारे विश्व को जान लेते हैं । देखो मोटी चीज में बहुतसी चीज समाती है या पतली चीज में बहुत चीज समाती है । उत्तर मिला पतली में बहुतसी चीज आया करती है मोटी वस्तु में नहीं आया करती । दुनियां में देख लो जमीन मोटी है या पानी मोटा है । उत्तर मिला जमीन मोटी है तो जमीन का हिस्सा बड़ा है अथवा पानी का हिस्सा बड़ा है? पानी का हिस्सा बड़ा है । पतले में अनेक मोटी वस्तुएं आया करती हैं । जैन सिद्धांत के हिसाब से भी जितना विस्तार स्वयंभूरमण का है उसका प्राय: आधा विस्तार सारे द्वीप समुद्रों का है, तो जमीन का हिस्सा अपने इस मध्यलोक में कितना है तो पानी के मुकाबले में उसका 8वां हिस्सा हो सकता है । पानी पतला होता है या हवा? हवा पानी से पतली होती है । इस पानी और पृथ्वी का जितना विस्तार है वह सब हवा के अंदर में है । हवा का विस्तार जमीन और पानी से बड़ा है । हवा पतली है कि आकाश पतला है? आकाश हवा से पतला है । यह हवा पानी जमीन सब कुछ आकाश के अंदर समाया हुआ है और आकाश जैसी पतली चीज भी एक ज्ञान के कोने में पड़ी है । यद्यपि अमूर्ति के होने के कारण आकाश सूक्ष्म है पर आकाश सारा अनंत आकाश ज्ञान के कोने में पड़ा है तो इस ही युक्ति से अर्थ लगाया जाता है कि यह ज्ञान आकाश से भी सूक्ष्म है । ऐसे ज्ञान होने की चर्चा सुनकर कुछ इच्छा हो जाया करती है कि मेरा भी ज्ञान बड़े, अवधिज्ञान बड़े, केवलज्ञान हो, बहुतसी बातों को जाना करें और उस ज्ञान के लिये इतनी उत्सुकता होती है और इस विशाल ज्ञान की उत्सुकता तो है ही । उस ज्ञानस्वभाव पर हम दृष्टि दें तो हम भी इस ज्ञानविकास को, प्रभुता को पा सकते हैं । इस जीवन में निर्णय तो यथार्थ रखो । सत्यज्ञान करने में भी दिक्कत होती है क्या? घर है रहने दो, दुकान है रहने दो, काम करना है तो काम भी कर लो, पर सत्यज्ञान करने में कोई भी दिक्कत है? सर्वपदार्थ अपना सत्व लिए है । मेरी आत्मा का दूसरे पदार्थों में कुछ भी नहीं लगता, ऐसा सत्य निर्णय करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये । बहुत अधिक त्याग तो सच्चा ज्ञान करने में ही आ जाता है । बाहर में चीजों को छोड़ना, अब इस चीज को अपने पास न रखना, यह तो उस ज्ञान की उत्कृष्टता का ही फल है । जिस समय आपकी दृष्टि में यह समा जाए कि मेरा स्वरूप मुझमें है अन्य जीव अपने-अपने सत्व में हैं । उनमें गुण पर्याय का असर कुछ भी मुझमें नहीं आता ऐसा जिसमें सत्य का निर्णय है, वहाँ त्याग हो जोता है अंदर से । अब राग जो सता रहा है उसको त्याग करने की आवश्यकता है । अंदर श्रद्धा में त्याग हो गया है । जैसे दो पड़ोसियों ने एक धोबी के यहाँ अपनी-अपनी चद्दर धुलने डाली । उनमें एक आदमी पहिले धोबी के घर जाकर एक चद्दर ले आया लेकिन धोबी ने धोखे से चद्दर दूसरे की दे दी । अब वह यही जानता है कि यह मेरी चद्दर है तो चद्दर उसके घर से लाकर और ओढ़कर सो गया उसे नींद भी आ गई । अब दूसरा गया चद्दर लेने को जो कि धोबी के पास थी । जब धोबी ने उसे चद्दर दी तो कहता है कि यह मेरी चद्दर नहीं है, अहो ! तुम्हारी चद्दर उसके पास पहुंच गई है दो ही तो चद्दर थी । वह अब उस चद्दर ओढ़ने वाले के पास जाता है और चद्दर खींचकर उसे जगाता है कि यह चद्दर मेरी है, तुम्हारी नहीं है । वह जागा और इतनी बात सुनकर कि यह चद्दर मेरी नहीं है वह उन चिन्हों को देखने लगा जो उसके पहिचान के थे । वह उसे न मिले तो झट ज्ञान हो गया कि यह चद्दर मेरी नहीं है । उस चद्दर का भीतर से त्याग हो गया क्योंकि यह देनी पड़ेगी । यह मेरी नहीं है । कितना त्याग हो गया? जितना वह हाथ से देवेगा इतना त्याग । कितना समझो उसको? बहुमान त्याग हो गया । अब समझ लो कि ज्ञान द्वारा वस्तु के भिन्न-भिन्न होने के निर्णय में भी बहुभाग त्याग हो जाता है । अल्प त्याग करने को रहता है । जैसे राग कम होगा वैसे ही त्याग हो जायेगा । मगर केवल कहने से त्याग नहीं होता, गप्प से त्याग नहीं होता । यदि श्रद्धा में यह जम जाय कि यह पदार्थ मेरे से अत्यंत भिन्न है तो उसका त्याग हो गया । अब वह चद्दर वाला सब कुछ समझ सकता, उस चद्दर से मोह भी कम हो गया । अब चद्दर उतारने में उसे कुछ विलंब तो होगा । बस ज्ञानी जीव को बाह्य वस्तु के अलग करने में कितनी देर है जितनी कि इस शरीर से निकालकर देने में देर है । थोड़ा और अधिक समझ लो कि वह बनावट करके झूठ मूठ बोले कि यह चद्दर मेरी है ताकि मेरी चद्दर तो मिल जाय । भले ही उसको देने में 4-6 घंटे लगें तो उसका भीतरी ज्ञान तो यह कह रहा कि यह मेरी चद्दर नहीं है और वह बनावट कर के कह रहा है कि यह मेरी चद्दर है ।

जब ज्ञानी पुरुष में कोई तीव्र राग होता है तो उसको वर्षों लग जाते हैं । ज्ञान तो यह स्वयं कर चुका कि अपनी आत्मा में मैं हूँ दूसरा कोई नहीं । भैया! जिनेंद्रदेव का कितना उपकार है? हमारे लिये कितनी सरल चिकित्सा बताई है जिसमें कोई कष्ट न हो । इस सरल चिकित्सा को हम स्वयं नहीं करना चाहते तो आपरेशन जैसी? चिकित्सा में तो सोचता है रोगी कि चाहे मैं मर जाऊँगा पर आपरेशन नहीं करवाऊँगा । यहाँ आपरेशन जैसी चिकित्सा तो नहीं की जा रही है । हम बैठे सुनें, जानें, वस्तु के स्वरूप को परखो । उसमें भूखे नहीं मरना पड़ता, उपवास नहीं रखना पड़ता । घर छोड़ने की बात नहीं कह रहे, दुकान के लिए मना नहीं कर रहे, उस गृहस्थ धर्म का पालन करो, पर वस्तु के सत्यस्वरूप को समझ लो । कितनी सरल चिकित्सा हमारे आचार्यदेव की है । आत्मा का यथार्थ मर्म जान जायेंगे तो हम इसकी सही व्यवस्था बना सकते हैं अन्यथा लक्ष्य बिना भटकते रहेंगे । नाव चलाने की तरह, कुछ पूर्व की ओर चलाई और उसका मन हुआ तो दक्षिण की ओर चलाई, कभी पूर्व की ओर चलाई तो कभी पश्चिम की ओर चला दी, फिर नाव चलाई, मगर वह पार नहीं जा सकता । इस तरह सत्य लक्ष्य हुए बिना आत्मसेवा के भाव बिना प्रेम की रीति में लगो, इज्जत की नीति में लगो, कुटुंब की इच्छा की पूर्ति में लगो और रूढ़ि धर्म की रीति में कितना भी श्रम करो तो भी परम विश्राम को नहीं पा सकते । इतने बड़े भारी रोग लगे हैं और कैसी आगम की यह चिकित्सा की जाती है? कुछ नहीं करना, तुम इस निज के पाटले में बैठ जाओ अपने आपका राज जानो । ऐसा आराम व आरोग्य का उपाय, उसको भी यह भ्रमी रोगी स्वयं नहीं करना चाहता और वह वैभव में गंदे शरीर में ही सनना चाहता है । ओह ! प्रभु का स्वभाव जैसा है वैसा ही मेरा स्वरूप है―ऐसा जानने में एक अंदर में महान् उत्साह जगता है । अपना तुच्छ वृत्तियों में मन नहीं लगता । कोई जान जाये कि मैं तो राजा का पुत्र हूँ तो उसके अंदर तुच्छ कल्पनायें नहीं आयेंगी । यदि हम जान जायें कि हम पूजा करते हैं अरहंतदेव भगवान् की वैसे ही मैं शुद्धस्वभाव वाला हूं तो उसका इस विषय कषाय में चित्त नहीं लगेगा । जो अपने ज्ञानस्वभाव की महिमा की ओर उपयोग करता है वह ‘‘हम सब, हम समझ चुके, हम जान चुके’’ ऐसा ख्याल नहीं कर सकता । उसे यह विदित हो जाता है कि अहो ज्ञान का बड़ा विस्तार है । जितना जानो उतना मानोगे कि मैंने कुछ नहीं जाना । यह तो ज्ञान वाले की वृत्ति है । अज्ञानी थोड़ा जान जाता है तो समझ लेता है कि मैं बहुत जानता हूँ । जैसे कोई तालाब में पैर डालता चलता है कि तालाब कितना गहरा है तो वह समझ जाता है कि वह बहुत गहरा है । गहराई में चले भी नहीं और पैर डाले भी नहीं और उसकी गहराई का अनुमान करना चाहे तो कैसे कर सकता है? और जो तालाब की गहराई को जान चुका है वह तो बिना चले ही मालूम कर सकता है । परमावधि, सर्वावधि, मनःपर्ययज्ञान जैसे विशाल ज्ञान के धारी पुरुष भी ज्ञानी नहीं हैं । केवलज्ञान ही एक परिपूर्ण ज्ञान है और उस ज्ञान का मेरा स्वभाव है । एक नया पढ़ा लिखा जवान बी0 ए0 पास लड़का पास होकर आया और खुशी में वह समुद्र की सैर करने के लिये चला । समुद्र तट पर जाकर एक नाविक से बोला । वह 20-22 वर्ष का लड़का था, हमें समुद्र की सैर करा दो । नाविक कहता है बैठिये एक रुपया किराया है । अच्छा लो । वह बढ़ गया समुद्र की सैर करने । कुछ दूर नाविक गया वहाँ उस नाविक से वह बी. ए. बोलता है । क्यों ? भाई तुम कुछ पड़े हो? नहीं मालिक मैं कुछ भी नहीं पढ़ा हूँ । तू ए. बी. सी. डी. नहीं जानता, नहीं साहब । अच्छा तू अ आ इ ई हिंदी जानता है नहीं साहब । तेरा बाप भी जानता है नहीं साहब । यह तो हमारी परंपरा का काम चला आ रहा है तो वह लड़का बोला कुछ गर्म होकर कि बेवकूफ, नालायक ऐसे ही लोगों ने तो भारत को गारत किया है । वह नाविक विचारा सुनता गया । जब वह नाव आधे मील पहुंची और वहाँ ऐसी तेज भंवर आई कि नाव भी डगमगाने लगी । नाविक बोला बाबूजी यह नाव नहीं बच सकती, यह तो डूबेगी और हम तो तैरकर निकल जायेंगे और आप कैसे निकलोगे? लड़का बोला मुझको बचा ले, 100 ले लो 1000 ले लो, मुझे बचा लो तो नाविक कहता है कि बच नहीं सकते । अच्छा बताओ तुमने तैरना सीखा है या नहीं? बाबू बोला―नहीं तो नाविक उतनी ही गालियों को फिर से दुहरा कर कहता कि नालायक बेवकूफ ! ऐसे ही लड़कों ने तो भारत को गारत किया है ।

सोचो तो भैया ! अगर भारत में सबके सब हाईस्कूल शिक्षित हो जायें तो खेती व्यापार आदि का कार्य कौन करेगा? अगर यह किसान नहीं रहे जो कि अन्न पैदा करता है, तो भुखमरी बढ़े कि नहीं? तो किस ज्ञान को पूर्ण कहोगे? अगर सबके सब जीव ज्ञानी हो जायें तो भुखमरी नहीं बढ़ेगी । तो ज्ञान में क्या गर्व करना? केवलज्ञान में ही सर्वज्ञान आते हैं । ‘‘मम स्वरूप है सिद्ध समाने । अमित शक्ति सुख ज्ञाननिधान ।। किंतु आसवश खोया ज्ञान । बना भिखारी निपट अजान ।।’’ यह मेरा स्वरूप सिद्ध भगवान् की तरह है, देख लो भीतर में अपने आपके स्वरूप को यहाँ कुछ घट जैसा पिंड मिलेगा नहीं, यहाँ स्वाद मिलेगा नहीं, यहाँ गंध आयेगी नहीं, इसे छुआ जा सकता नहीं, बेधा जा सकता नहीं, जलाया जा सकता नहीं, बहाया जा सकता नहीं तो एक विलक्षण जाननस्वरूपमय चैतन्यशक्ति है । इसका काम जानन है । स्वरसत: जानन में यह वृद्धि करता है, जानता जाये, देखता जाये । यह सम्यक्ज्ञान ही हम और आपको संकटों से मुक्ति दिलाने वाला है । पर अज्ञानी जीव इस ज्ञान के बजाय आशा को महत्व देता है तो आशा के वश होकर हमने ज्ञान खो दिया और निरे मूर्ख निपट अज्ञानी बन गए, यहाँ बीच में मिलना जुलना कुछ नहीं । सट्टे के व्यापार से भी गंदा काम केवल एक भाव कर रहा है । जब भाव ही हम कर सकते हैं तो उत्कृष्ट भाव क्यों न करें? क्यों जो गंदे भाव के लिये बढ़े, बढ़कर अन्यत्र क्या कर सकता है? जैसे बच्चे लोग कभी प्रीतिभोज का खेल खेलते हैं, उनके पास है तो कुछ नहीं, पर वे अपने साथियों को बुलाकर एक-एक बड़ा पत्ता परस देते हैं कि यह थाली परस रहे हैं और एक-एक छोटासा पत्ता परस देते हैं कि यह रोटी परस रहे हैं । एक-एक ककड़ी भी परस देते हैं कि यह चना परस रहे हैं । गरीब बच्चे तो उस पत्ते को रोटी कह कर परसते हैं । और बच्चे ! उसे कचौड़ी कहकर क्यों नहीं परसते । एक छोटे कंकड़ को पर से तो उसे बूँदी कहकर क्यों नहीं परसते? बड़े-बड़े घर के बालक तो उन कंकड़ों को केवल बूँदी कहकर ही परसते हैं । ऐसे ही यहाँ देखो―करते कुछ नहीं बाहर में । अंतर में ही अपने रागादि विकल्पों में रहते हैं । हम अपने केवलज्ञान स्वभावमात्र स्वरूप को देखेंगे तो हम में भी वही प्रभुता प्रकट हो जायगी । यदि यह एक केवलज्ञान प्रकट हो जाये तो यह इस जीव में फिर कोई संकट नहीं रहेगा । यह शुद्धविकास जिस ज्ञानस्वभावी परमात्मतत्व के दर्शन के प्रसाद से प्रकट होता है उसी परमात्मस्वरूप का विवरण इस परमात्मप्रकाश ग्रंथ में किया गया है।


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