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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 4

From जैनकोष



ते पुण वंदउं सिद्धगण जे निव्वाण वसंति ।

णाणिं तिहुयणि त्रसयवि भवसायरिण पडंति ।।4।।

मैं उन सिद्धों को नमस्कार करता हूँ जो सबसे अधिक वजनदार हैं । अर्थात् सर्वज्ञ हैं वही हुए वजनदार । भारी वस्तु नीचे की ओर गिरा करती है यह वस्तु का स्वभाव है किंतु वे इनसे अधिक ज्ञानगुरु होने पर भी संसाररूपी समुद्र में नहीं गिरते हैं । उनके बराबर तीनों लोकों में कोई भारी नहीं । जो गुरु होकर भी भवसागर में गिरते हैं ऐसे सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ । तथा जो हमेशा निर्वाण में विराज रहे हैं तथा जिन्होंने निज स्वरूप को पाकर कर्मों का क्षय कर दिया है, जिन्होंने वीतराग, निर्विकल्पक ज्ञान स्वसंवेदन द्वारा आत्मा को प्राप्त कर लिया है वे तीनों लोकों में गुरू होते हुए भी ऊर्ध्व लोक में ठहरते हैं, अर्थात् तनुवातवलय के अंत में ठहरते हैं, उनसे ऊपर कोई नहीं है । उनके ज्ञान में समस्त द्रव्य आ गये उनके ज्ञान के बाहर कुछ नहीं है । प्रत्येक द्रव्य में अनंतगुण होते है वे भी उनके ज्ञान में आ गये । प्रत्येक गुण की पर्यायें भी उनके ज्ञान में आ गयी । प्रत्येक पर्याय में अनंतानंत अविभाग प्रतिच्छेद होते हैं वे भी उनके ज्ञान में आ गई । सर्व रस भी उनके ज्ञान में आ गया । इस प्रकार दुनियां में जो तत्त्व है वह सब उनके ज्ञान में आ गया । उनसे बाहर कुछ नहीं । ऐसे वे लोक परलोक का प्रकाश करने वाले स्वसंवेदनज्ञान के कारण सिद्धभगवान बहुत गुरु हैं―भारी है । फिर भी संसारसमुद्र में नहीं गिरते ।

निमित्त पाकर होने को भव (संसार) कहते हैं । इस संसाररूपी समुद्र में अनेक खतरे हैं । जैसे लहरों के कारण पानी के, जंतुओं के कारण अगाध होने के कारण, आदि-आदि कारणों से बहुत खतरनाक है ये समुद्र । उसी प्रकार यह संसार भी खतरे की चीज है जन्म, बुढ़ापा, राग, द्वेष, कषाय आदि के कारण यह संसार समुद्र खतरों से परिपूर्ण है । बहुत से प्राणी इस खतरे में भो पड़े हुए हैं बहुत से उभर भी गये हैं । इन खतरों से दूर होने के कारण ही सिद्ध भगवान तीनों लोकों के गुरू हो गये । जिनकी आराधना कर हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । किंतु यह सब विचार करने के लिए हमारे पास समय ही नहीं है, हम तो मोह माया में पड़े हुए हैं, किसी से राग, किसी से द्वेष, किसी से अपनत्व, किसी से शत्रुत्व आदि भावनाओं-कल्पनाओं में बह रहे हैं, जिनकी आराधना करने से डूबते हैं वही सब कर्म करते हैं । इन सबसे कालिमा ही लगती है अन्य कुछ नहीं । घर को चलाने के लिए संबंधियों के प्रति क्या कुछ तन मन धन सेवा करने में कुछ कमी करते, सभी उद्यम कर डालते हैं । ऐसे कला में प्रति तो यह जीव उद्यम करता है किंतु अपनी आत्मा के अनुकूल भाव नहीं करता, उद्यम नहीं करता ।

अब तो कल्याण के लिए प्रधान उपाय सत्संग और स्वाध्याय है । जैनों की अपेक्षा अन्य बंधु सत्संग को बहुत महत्व देते हैं । किसी से भी पूछो कि भाई कहां से आ रहे हो? चाहे वह रामायण सुनकर आ रहा हो, उत्तर यही देगा कि सत्संग से आ रहा हूँ । पुजारी भी तो यही भावना कर जाता है कि शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुति: संगति सर्वदा यै: सद्वृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम् । सर्वस्यापि प्रियहित वचो भावना चात्मतत्त्वे संपद्यंतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गा: । हे प्रभु ! जब तक मुझे मोक्ष न हो, तब तक 1. शास्त्राभ्यास 2. जिनपतिनुति जिनकी स्तुति, प्रणाम, ध्यानादि 3. संगति-सर्वदा आदि पुरुषों के साथ सज्जनों की समागम 4. सदवृत्त कथा, 5. दोषवाद में मौन, 6 सबसे प्रियहित वचन, 7 आत्मतत्त्व की भावना आदि बातें बनी रहे । प्रत्येक गाँव में एक या दो सज्जन होते ही हैं, अत: जैनी भी यदि ज्ञानगोष्ठी बनाकर सत्संग करें अपने स्वभाव की चर्चा करें तो वात्सल्यभाव बढ़ता है ।

यह संसार का समागम तो नष्ट होना ही है इसमें तो कुछ सार ही नहीं है । यह धन समान भी नष्ट ही होना है । 1. या तो किसी को दान देने से 2. या मृत्यु हो जाने पर छूट जाय 3. या सामने बरबाद हो जावे । चोर चोरी कर लें आदि । फिर क्यों जीवन के ये थोड़े से क्षण इस आकर्षण में लगाये जावें । अत: यही विचार करना चाहिए कि हे प्रभु ! मुझे ऐसी शक्ति दो ताकि मैं न्यायपूर्वक अपनी आजीविका कर सकूं तथा धर्मध्यान कर सकूं । क्योंकि जिन परिणामों से पाप संचित किया जाता है वह तो अवश्य ही भुगतना पड़ेगा । अत: सबसे बड़ी बात यह है कि अपने भावों को मलिन न होने देवें । ऐसा विचार करने से अपना जाता ही क्या है कि सब जीव सुखी होवें, सब पर मेरा क्षमाभाव रहे । और फिर ऐसे परिणाम रखना कि मैं इसका अनिष्ट कैसे करूं? ये क्लेश को ही देने वाले हैं । अत: सब जीवों पर सुखी होने की भावना करना, अपने ऊपर ही करुणा करना है । अगर किसी के द्वारा कुछ अपने को ठेस भी पहुंचे तो भी यही सोचे कि इसका कल्याण हो, सम्यग्दृष्टि जीव संग्राम करते हुए भी यही सोचते हैं कि इसका भी कल्याण हो जाये, इसे सद्बुद्धि हो जाये । अगर किसी प्रकार इसका समृद्धि आ जाती है तो तुरंत मित्रता भी हो जाती है ।

भैया ! किसी का बुरा न सोचने से अपनी आत्मा पवित्र होती है और फिर मान लो अपने बुरा सोचने से उसका अनिष्ट हो ही गया तो अपने में क्या वृद्धि हो गयी । यदि ईर्ष्या ही करनी है तो मोक्षरूपी लक्ष्मी से ईर्ष्या करो । इसमें ईर्ष्या करने से क्या लाभ कि मैं इससे अधिक रुपये वाला हो जाऊं । जो सबसे बड़ी वस्तु मोक्ष हैं उसके प्रति ईर्ष्या करो । यदि मैं किसी को शत्रु मानकर उस पर ईर्ष्या करूं तो यह तो निश्चय है कि मैं संसार के दुःखों को भोगता रहूंगा । यदि किसी के प्रति बहुत पहिले से बुरा भाव बनाया हो तो उसे इसी क्षण छोड़ दो, जैसी बुद्धि हम मकान आदि को पूरा न बनने तक करते हैं कि इसे तो पूर्ण करना ही है । इस प्रकार परमार्थ में नहीं करते, भैया यह भावना बनाओ कि मैंने किसी के प्रति बुरा भाव बना रखा है तो उसे किस प्रकार जल्दी से जल्दी छोड़ दूं । किंतु इससे विपरीत हो मोहीजन सोचते हैं कि जिसको पाल-पोषकर बड़ा कर दिया उसका राग मैं कैसे छोड़ दूं । आचार्य कहते हैं कि परपदार्थ में राग द्वेष की बुद्धि छोड़ने योग्य है । अपने अंदर के क्रोध, मान, माया, लोभ आदि बुरे भावों को अपने से दूर कर दो । इनमें न तो सुख ही है और न ही अपने आत्मा का कल्याण ही है ।

तीन लोक में गुरु होते हुए भी जो संसार समुद्र में नहीं गिरते, ऐसे वे जो निर्वाणपद पर ठहर रहे हैं, उन्हें मेरा, नमस्कार हो । वे निर्विकाररूप हैं, समाधानरूप हैं, चैतन्यस्वभावमय हैं तथा शुद्धरूप हैं इस प्रकार का परिणमन का पूरा अनुभव तो उसी स्थिति को प्राप्त कर लेने पर होता है । स्वरूपाचरण श्रद्धा, ज्ञान ठीक हो तो विकल्पों से ज्ञान हो जाता है । उसका वैभव फिर भी नहीं जाना जा सकता है । वह तो उसी अवस्था में होकर यथार्थ जाना जा सकता है । यही निर्वाण पद उपादेय है कल्याणकारी है, मुक्ति का साधक है । सम्यग्दृष्टिजीव यही विचार करता है कि जो सिद्ध स्वरूप है वह मुझे कब प्राप्त हो? उसी की बाट जोहता रहता है ।

जो तीर्थंकर परमदेव भरत राघव पांडव आदिक पूर्वकाल में वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन ज्ञान के बल से शुद्ध आत्मस्वरूप को पाकर कर्मक्षय करके निर्वाण में ठहर रहे हैं उन सबको नमस्कार करता हूँ । यह निर्वाणपद क्या है―परमात्मस्वरूप का शुद्ध पूर्णविकास है । यह निर्वाणपद उपादेय है यह अब इस दोहा से लेना चाहिये । अब इसके बाद व्यवहार से व निश्चय से दोनों प्रकार से जो शुद्ध हैं वे सिद्ध हैं, वे निर्वाण में बसते हैं परंतु निश्चयनय से शुद्धात्मस्वरूप में ही ठहरे हैं इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं ।


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