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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 53

From जैनकोष



जे णियवोहपरिटि्ठयहँ जीवहँ तुट्टइ णाणु ।

इंदियजणियउ जोइया तिं जिउ जडु वि वियाणु ।।53।।

जिस कारण से अपने शुद्ध सहज ज्ञान में प्रतिष्ठित हुए जीवों का यह इंद्रियज्ञान टूट जाता है, नष्ट हो जाता है । उस कारण से हे योगी, तुम इस जीव को जड़ भी जानो । जैसे अपने ही परिवार में से यदि कोई जीव ज्ञानी हो जाये और घर में ममत्व न रखे, घर को त्याग दे तो उसे फिर परिवार के लोग यही कहते हैं ना कि हमारे लिए तो यह बेकार है । त्यागी हो गया, कोई ममत्व नहीं रहा, वह तो अपने आत्मकल्याण में लगा है । परिवार के लोग सोचते हैं कि हमारे लिए वह बेकार है। हमारा जो प्रयोजन है उस प्रयोजन के लिए घर में रहे तो वह हमारे लिए सब कुछ है, अन्यथा बेकार है । इसी प्रकार हम जो कुछ समझते हैं वह सब इंद्रियज्ञान की ही बात को सही व कार्यकारी समझते हैं । हमारे लिए इंद्रिय प्रेमी हम सब लोगों की समझ में तो जिसके इंद्रियज्ञान नहीं रहा वह तो जड़ है ।

भैया, कोई-कोई भाई यह आशंका करने लगते हैं कि भगवान का समय कैसे कटता होगा? परिवार नहीं, घर नहीं, स्त्री नहीं, बच्चे नहीं, नौकर नहीं । सो वह केवल अकेला कैसे समय काटता होगा? यहाँ लोग अपना समय जैसे व्यतीत करते हैं उसके अनुसार ही अपना दिमाग बनाते हैं । ऐसे ही अपनी बात सोच कर लोग कहते है कि साधन के बिना प्रभु कैसे सुखी है? यदि भगवान का ऐसा स्वरूप बताये कि वह गान तान भी करता है, नाच भी करता है, खेल और लीला भी करता है तो समझ में आयेगा कि वह बड़ा सुखी है । आखिर भगवान ही तो है । और यह स्वरूप बताया जाये कि भगवान तो शुद्ध चैतन्यस्वरूप है, चैतन्यमात्र है, उन्हें न कुछ इष्ट है और न अनिष्ट । उनके न विकल्प है और न संकल्प । उनके न कोई राग है और न कोई द्वेष है, केवल शुद्ध चैतन्यस्वरूप है तो यही समझ में आयेगा कि वह तो भगवान जड़ होगा । लो, इस लौकिक चतुर प्राणी के लिए सिद्धप्रभु भी जड़ हो गये । उनमें कुछ ज्ञान नहीं, चहल पहल नहीं, तो जड़ हो गये ।

ऐसा कुछ मोही लोगों की दृष्टि में नजर आयेगा । और ऐसी ही नाना दृष्टियों से दर्शन भी बने हैं । सांख्य दर्शन वह है जो ज्ञान के संयोग से जीव को ज्ञानी मानता है । यह जीव ज्ञानरहित है ज्ञान तो प्रकृति का विकार है यह जीव केवल चैतन्यस्वरूप है । जब इस चैतन्यस्वरूप में ज्ञान का समवाय होता है तब यह ज्ञानी कहलाता है, इसी दृष्टि ने उस ज्ञान को विकार माना । जिसके चहल पहल है, तर्क वितर्क है, राग-द्वेष की वृत्ति है उसको ज्ञान समझा । वह ज्ञान जब नहीं रहता है तो उसे जड़ माना, चैतन्यमात्र माना । कभी-कभी समाज में ऐसा विवाद हो जाता है तो उसका कारण क्या है कि हमारी बुद्धि में जो बात समायी है वह उन सबकी बुद्धि में समाई है या नहीं? इसका निर्णय नहीं करते । वहाँ ऐसी खोज कर लें कि उनकी बुद्धि इस प्रकार की है और उनकी बुद्धि से ही उनकी बात को समझें तो यथार्थता भी समझमें निर्विरोध आ जायेगी ।

तो भैया, जिस कारण से उन आत्मज्ञानी जीवों में इंद्रियजंय ज्ञान नहीं हैं इस कारण उन्हें जड़ समझो । इसका विवरण यह है कि छद्मस्थ जीव के भी वीतराग निर्विकल्प समाधि का समय है । यह होता है 7 वें गुणस्थान से 12 वें गुणस्थान तक । यह समाधि वीतराग निर्विकल्प समता परिणाम है, उसमें जो रत हैं याने जो स्वसम्वेदन में हैं, उस पुरुष में विकल्पात्मक ज्ञान नहीं है और वह ज्ञान भी सदाकाल नहीं है इस कारण से जड़पना जीव में जानो । इस दृष्टि से केवलज्ञानी तो सदाकाल जड़ है और यहाँ के ज्ञानी जब आत्मा में रत हो जाते हैं तब इस कारण कि उनके इंद्रिय विकल्प नहीं रहता सो तब उन्हें जड़ समझो । इस उपदेश से हमें यह शिक्षा लेनी है कि यह इंद्रियज्ञान तो हेय है और अतींद्रियज्ञान उपादेय है ।

यह इंद्रियज्ञान पूर्ण नहीं, अधूरी चीज है । थोड़ा जानने वाला यह ज्ञान है और तिस पर भी यह आकुलता का कारण है । मनुष्य तो ऐसी आकुलता करता है कि मेरे जीवन में क्या-क्या होगा? इसको समझने की आकुलता रहती है । सारा ज्ञान यदि हो जाये, यह पता हो कि मेरा बुरा बहुत होगा, किंतु पता हो जाये तो इतनी आकुलता नहीं हो सकती । ज्ञान की कमी में बड़ी बैचेनी होती है । सो भैया, या तो जानने में सब कुछ आये या जानने में कुछ भी न आये, दोनों स्थितियों में भला है । सब कुछ जानने में आये वह तो है भगवान की स्थिति, क्योंकि उनका वह ज्ञान तो सब जगह फैला ही है । और कुछ भी पर जानने में नहीं आये यह है साधक ज्ञानी की स्थिति । सो इसमें उनका ज्ञान आत्मा में केंद्रित है । पर जो कुछ थोड़ा जान रहा है उन्हें बेचैनी है कि क्या होगा, यह क्या है । सो भैया, यह इंद्रिय जान आकुलता का साधन होने से हेय है ।

किसी अज्ञानी जन को संभव है कि आंखों से कम दिखने लगे और कभी बिल्कुल ही न दिखे तो हाय मेरा जीवन बेकार हो जायेगा, मेरा कोई सहारा नहीं है, इस प्रकार बेचैन होगा, और जिसमें ज्ञानबल है ऐसा कोई गृहस्थ है या साधु है, वह तो समता परिणाम की साधिका स्थिति उस अवसर को समझेगा । किसी ज्ञानी गृहस्थ को यह संभावना हो जाये कि मेरी आंखें खतम होने वाली हैं तो वह वीरता का परिणाम करता है कि हो जाने दो, चलो सब किस्सा निपट जायेगा । वहाँ भी वह अपनी सही प्रोग्राम की स्थिति चुन लेता है । तो जानने की उत्सुकता है वह एक आकुलता का कारण है । और यह जानने की उत्सुकता तब होती है जब हमें ज्ञान कम होता है । तो इंद्रियज ज्ञान की यह स्थिति ऐसी होती है जिसमें ज्ञान कम होता है ।

देखो हम लोग किन बातों का गर्व करते हैं? कोई धन पर गर्व करता है, वह धन तो असार है । कोई अपने शरीर के बल पर गर्व करता है तो शरीर का बल हम से ज्यादह भैंसा में है । कभी भी हम इतनी भारी गाड़ी नहीं-खींच सकते और वह 50 मन का बोझ खींच देगा । सो देख लो वह भैंसा बल में आपसे कितना बड़ा है, कोई शरीर के ऊपर गर्व करते हैं, कोई रूप पर गर्व करते हैं । रूप क्या अच्छा है? अरे किसी शरीर का रूप सफेद पीला हो जाये किंतु दुर्गंध होना, मांस रक्त का होना; हड्डी का होना यह तो वही की वही बात है । तिस पर भी क्षणिक है, सो वह कुछ दोपहर में और किस्म का है और सोते समय कुछ और ही किस्म का है । उस रूप पर क्या गर्व करना ।

भैया; कोई ज्ञान पर गर्व करते हैं । ज्ञान पर गर्व होता है तब, जबकि उसमें थोड़ा ज्ञान होता है । जिसके अधिक ज्ञान हो तो वह गर्व नहीं कर सकता । अधिक ज्ञान वाला जानता है कि यह ज्ञान तो कुछ नहीं है । और थोड़े ज्ञानवाला तो यह जानता है कि यह ज्ञान तो मेरे पास सब कुछ है । दुनिया में डेढ़ अकल है । एक अकल तो हममें और आधी अकल इस सारी दुनिया में है । हम जो करते हैं वह बुद्धिमत्ता की बात है और जो दूसरे करते हैं वह अज्ञानता की बात है । छोटे-छोटे बच्चे आपस में व्यवहार करते हैं तो उनके व्यवहार को देखो । इन बच्चों को अपने ज्ञान में देखो कि इनमें कितना विश्वास है, कितना गर्व है । वे भी अपने पाये हुए ज्ञान में पूरा गर्व करते हैं । अपने ज्ञान के विरुद्ध कोई दूसरा कुछ कहे तो उसका खंडन कर देते हैं ।

भैया, कुछ परख तो करो, जो हममें आकुलता होती है उस आकुलता का मूल कारण क्या है? वह कहाँ से उठा? इसका विचार तो करो । यह इंद्रियज्ञान हुआ कि राग द्वेष को बढ़ने का मौका मिलता है । राग द्वेष हुआ तो आकुलता हो जाती है । यदि मूल में कोई कारण बना है तो यह इंद्रियज्ञान कारण बना है । जैसे किसी बच्चे के हाथ में कोई खेल की चीज है या खाने की चीज है, उसके दूसरे साथी बच्चे झपटते हैं और जब वह समझ लेता है कि मेरे हाथ में से यह चीज निकलने वाली है तो वह उसे मरोड़कर तोड़कर फेंक देता है । पीछे कोई पछतावा नहीं आता चीज मिट गई; हमारी इज्जत पोजीशन भी रह सकती है क्या? यत्न करने पर भी नहीं रहती तो अपने में एक भावना ऐसी बना लो कि रही सही पोजीशन इज्जत को लो हम तोड़ मरोड़कर फेंक देते हैं, इनसे कुछ सिद्धि नहीं, मुझे तो शुद्ध चैतन्यस्वरूप में रत होना चाहिए ।

इस प्रकार दूसरे प्रश्न के समाधान में शिक्षा दी गई है कि जिस इंद्रियजंय ज्ञान के कारण हम अपने को चतुर समझते हैं वह इंद्रियजंय ज्ञान दुःख का हेतु है । ऐसी अंतर में आवाज होना चाहिए । यह सब अच्छाई अपनी कही जा रही है । भैया, मेरे अति निकट रहने वाली वस्तु है कोई तो वह है इंद्रियजंय ज्ञान । सो वह भी मेरा हितू नहीं है । तो फिर घर परिवार और अन्य लोगों में क्या विश्वास रखा जावे कि यह मेरी चीज है, साधक है । इस इंद्रियजंय ज्ञान के वश होकर मोही पुरुष कुछ अवनति की ओर झुकता, कुछ असत्य आचरण की ओर लगता है अन्याय की ओर जाता है, कपट की ओर जाता है, धोखा देता है । ये सारी बातें इंद्रियजज्ञान की प्रीति के कारण होती हैं सो यहाँ यह समझो कि यह इंद्रियजज्ञान मेरा कुछ नहीं है । इंद्रियजज्ञान की पर्याय के द्वार से जबरदस्ती बना करके सदाचार करता है वह इस प्रकार का है जैसे कि तेज वर्षा में जो तेज पानी का प्रवाह आ रहा था तो उसे बांधने की कोशिश कर रहे थे । तो उसे कुछ तो यहाँ बांधे रहा पर कहीं से फूट गया सो बांध नहीं सकता । इसी तरह कोई सोचे कि इंद्रियज्ञान ठीक करके अमुक जाति का आचार ठीक कर लें, किंतु वहाँ यह भी तो संभावना है कि वहाँ से गिर भी पड़ेगा । कुछ लोगों के साथ अच्छा व्यवहार किया तो फिर कभी अन्य बातों में कुछ गिर गया ।

अतींद्रिय स्वरूप के परिचय बिना अनेकों विकट स्थितियां बनती रहती हैं । कहीं ऐसी परिस्थिति को सम्हालो, एक को सम्हालो तो दूसरी परिस्थिति आ जाती है । यदि इंद्रियजंय ज्ञान से प्रीति नहीं रहे, केवल शुद्ध अपने आपकी स्थिति की चाह है तो आचरण हमारे में मूल में पुष्ट होकर उठ सकते हैं । सो इस दोहा में इस शिक्षा से गर्भित दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया गया । अब तीसरा प्रश्न था कि क्या यह जीव देहप्रमाण है? तो कहते हैं कि हां, यह जीव देहप्रमाण है । जब लोकपूरणसमुद्धातगत केवली है तब तो लोकप्रमाण जीवप्रदेश हैं व अन्य समुद्धातों में भी कुछ देह से बाहर प्रदेश रहते हैं, बाकी समय संसारीजीव देह प्रमाण है और जब मुक्त अवस्था हो जाती है तो जिस देह से मुक्त हुआ है उस देह के प्रमाण हुआ है मुक्त अवस्था में ।

केवली समुद्धात में क्या होता कि 13 वें गुणस्थान के द्विचरम अंतर्मुहूर्त में पहिले दंडाकार प्रदेश चौदह राजू फैला फिर कपाट के आकार फैल जाता है । जैसे कोई धोती को निचोड़ता है और ऐसी ही धर दे तो उसे दो तीन दिन सूखने में लग सकते हैं और अगर उसे फैला दिया जाये तो आधे घंटे में सूख जायेगी । इस तरह केवली भगवान के मनुष्यायु के कर्मवर्गणायें बहुत ज्यादह स्थिति के थे सो जब उनके आत्मप्रदेश लोक में फैलकर इकहरा हो गये और एक क्षेत्रावगाह में वह कार्माण शरीर भी इतना विस्तृत फैल गया तो इकहरी फैली हुई धोती जैसे जल्दी शुष्क हो जाती है इसी तरह ये कर्म भी सब जल्दी शुष्क हो जाते हैं फिर मुक्त होने पर आत्मप्रदेश चू कि जीवप्रदेश के घटने बढ़ने का कोई कारण नहीं रहा इस कारण चरम शरीर प्रमाण ही आत्मा विस्तृत रहता है, । इसी तथ्य को अगले दोहा में कहा जा रहा है:―


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