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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 56

From जैनकोष



को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैस्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ।

दोषैरूपात्तविविधाश्रयजातगर्वै: स्वप्नांतरेपि न कहाचिदपीक्षितोऽसि ।।56꠰꠰

हे नाथ, तुममें सब ही गुण भर गये । सब गुणों ने आपका सहारा लिया तो इसमें आश्चर्य कुछ नहीं । तुम्हारी तारीफ भगवान् हम क्या करें? वे गुण बेचारे बहुत दौड़े इस तलाश में कि उन्हें कहीं ठौर मिल जाये पर कहीं ठौर न मिला । कहीं-कहीं संसारी पुरुष के पास वे गुण गये और बोले कि हमें तुम अपनी आत्मा में जगह दे दो तो वे सब जगह से ललकारे गये । जैसे रेल में लोग ललकारते हैं कि यहाँ जगह नहीं है, दूसरी जगह जावो । ये सब कुछ भी इस शुद्ध आत्मा में नहीं है । हां, वहाँ उनकी शांति, उनका चैतन्य, उनका ज्ञान, यह तो है; पर ज्ञानावरणादिक द्रव्यकर्म रागादिक भाव प्राण, इंद्रिय प्राण, द्रव्यप्राण ये कुछ भी वहाँ नहीं हैं । संसारी जीव के भी निश्चय से शक्तिरूप से रागादिकरहितपना है । वैसे तो प्रत्येक पदार्थ शून्य है क्योंकि किसी पदार्थ में कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं । तो आत्मा शून्य है । इस प्रकार इस प्रश्न का उत्तर भी प्रश्नकर्ता के स्वीकारात्मकरूप में किया ।

एक बार राजा ने सभासदों की बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए कहा । एक सीक थी 8 अंगुल की, वह उनको दो और लोगों से कहा कि इस सींक को छोटी कैसे करें? तो एक चतुर सभासद उठा और बोला महाराज हम छोटी कर देंगे । उसने 12 अंगुल की एक सींक उठा ली और उसे 8 अंगुल वाली सींक के पास रख दी, बोला महाराज अब यह 8 अंगुल वाली सींक छोटी हो गई कि नहीं? देखो यह अपेक्षा की बात है । स्वत: कोई पदार्थ कैसा है; क्या कहें? सब अपेक्षा व्यवहार चलता है । तो यहाँ शून्यपना बताया जा रहा है कि मेरी आत्मा में कोई दूसरा पदार्थ नहीं, इसलिए यह आत्मा शून्य है । कोई लोग तो ज्ञानादिक गुणों से भी शून्य आत्मा व परमात्मा को मानते हैं । पर ऐसा नहीं है ।

वे रागादिक भावकर्म से, शरीर से शून्य हैं, पर अपने गुणों से तो वे परिपूर्ण हैं । अपने आपको भी ऐसा निरखो कि मैं सूना हूँ । सबकी बात है यह । जो अपने आपको यों सूना निरख लेगा, वह सम्यक्त्व प्राप्त कर लेगा और जो अपने को पर व परभावों से भरापूरा देखेगा वह सम्यक्त्व नहीं पा सकता । अपने को सूना देखो । मेरे अन्य कुछ नहीं है, घर ईंट, द्वार, परिवार शरीर, कर्म, राग कुछ नहीं हैं । जो कुछ देखे, मांगे अपने में; उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा और जो कुछ न देखेगा, न चाहेगा अपने में; तो उसको ज्ञानादिक से परिपूर्ण स्वरूप प्राप्त हो जायेगा ।

एक सेठजी की नाई ने हजामत बनाई । सेठजी डरपोक थे और बहमी थे । जब सेठजी के गले पर छुरा चले तो सेठजी डरे कि हमारे प्राण तो इस नाई के हाथ में है । तो सेठजी ने नाई से कहा कि देखो बढ़िया-बढ़िया हजामत बनाना हम तुम्हें कुछ देंगे । हजामत बन जाने पर सेठजी ने नाई को आठ आने पैसे निकाल कर दिए । नाई ने कहा कि हम तो ये नहीं लेंगे । हम तो कुछ लेंगे । दो रुपया दिया, पाँच रुपया दिया, अशर्फी दी; पर नाई ने नहीं ली । उसने कहा कि हम तो ये नहीं लेंगे हम तो कुछ लेंगे । सेठ तो अब परेशान हो गया । बोला―अच्छा, हम तुम्हें कुछ देंगे । पर उस गिलास में कुछ दूध रखा है तो उसे उठा लावो । हम दूध पी लें, फिर तुम्हें कुछ दें । वह गया । बड़ी जल्दी से उठाया । देखा कि उस दूध में कुछ काला-काला पड़ा हुआ है, सो वह बोल उठा कि सेठजी इसमें तो कुछ पड़ा है । हर एक की प्रवृत्ति होती है कि अगर कोई चीज एकाएक देखे तो उसके मुख से कुछ न कुछ निकल ही जाता है जब सेठजी ने सुना कि वह कहता है कि इसमें कुछ पड़ा हुआ है तो सेठ बोला―‘‘तो अपना कुछ ले-ले’’ तू कुछ ही तो मांगता था । नाई ने उठाकर देखा तो वह निकला कोयला का टुकड़ा । नाई कुछ के लिए अड़ गया तो उसको मिला क्या? कोयले का टुकड़ा । जो कुछ मानता है कि यह मेरा घर है, ये मेरे लोग हैं तो उसके हाथ कोयला ही लगता है । कोयला मायने पाप । पाप को साहित्य में काला बताया है साहित्य में पाप का रंग काला कहा है ।

भैया ! जो पर व परभावों से शून्य है ऐसा परमात्मतत्त्व ही है । रागादिक विभाव सब हेय हैं, इस मर्म को बताने वाले तीन प्रकार की आत्मा का प्रतिपादन करने वाले इस प्रथम अधिकार में यह बताया है कि जो आत्मा ज्ञान की अपेक्षा व्यवहार से लोक और अलोक में व्यापक बताया है वह ही परमात्मा निश्चयनय से असंख्यात प्रदेशी होते हुए भी अपने स्वभाव के बीच ठहरता है और भी बताया है कि जो आत्मा इंद्रियजज्ञान से शून्य होने के कारण जड़ है वही आत्मा रागादिक दोषों से रहित होने के कारण शून्य है इस प्रकार इन 6 दोहों में उनके द्वारा कहे गये चार प्रश्नों का उत्तर दिया गया है आत्मा कैसा है? सब उत्तर दे दिये, पर मुख्य बात यह जानो कि यदि आत्मा की शीघ्र पहिचान करना है और अपने उपयोग में लाना है तो इस तरह निरखो कि आत्मा जाननमात्र, ज्ञानमात्र है । जो जानन है, प्रतिभास है, जो सामान्य ज्ञानज्योति है; वही मैं हूँ । ऐसा अनुभव न करना कि अपन तो बाल बच्चों वाले हैं, पोजीशन वाले हैं, घर वाले हैं । अरे भैया, कोई करोड़पति है और वह ममता वाला हैं तो वह गरीबों से भी गरीब है ।

अब इस आत्मा को द्रव्य, गुण, पर्याय निरूपण की मुख्यता से वर्णन करेंगे ।


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