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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 60

From जैनकोष



जीवहं कम्मु अणाइ जिय जणियउ कम्मु ण तेण ।

कम्में जीउ वि जणिउ णवि दोहिंवि आइ ण जण ।।60।।

जीव और कर्मों का अनंतकाल से संबंध है । फिर भी जीव ने कर्मों को उत्पन्न नहीं किया, क्योंकि जीव और कर्म परमाणु ये दोनों अनादि सिद्ध हैं । इस जीव को किसने उत्पन्न किया? इससे प्रश्न को उठाने का अवकाश ही नहीं है, क्योंकि जितने सत् हैं वे सब अनादि से हैं । कोई न हो तो फिर हो कैसे जायेगा? किन साधनों से, किस उपादान से बन जायेंगे । यदि बिना उपादान के पदार्थ बनने लगें तो अभी कदाचित् इस हाल में 10-20 सिंह कूद पड़े तो कितनी विपत्तियां आ जायेंगी क्योंकि वे बिना उपादान के स्वयं बन जाया करते हैं । कोई भी पदार्थ न हो और किसी प्रकार बन जाये, ऐसा नहीं हो सकता । जीव और कर्मों का अनादि संबंध बीज वृक्ष की तरह है । जैसे खड़े हुए ये वृक्ष किससे उत्पन्न हुए? बीज से । वह बीज पहिले हुआ कि वृक्ष? कहीं यह उतर नहीं आ सकता कि लो यह बीज बिना वृक्ष के हो गया, अथवा यह वृक्ष बिना बीज के हो गया । यह परंपरा अनादि से है । यदि न होती परंपरा तो कौन चीज बिना उपादान के बनेगी? बिना बीज के कौनसा वृक्ष खड़ा हो जायेगा और बिना वृक्ष के कौनसा बीज बन जायेगा? इसी प्रकार जीव और कर्म का भी अनादि से संबंध है । वर्तमान कर्म जीवों के विभाव परिणाम का निमित्त पाकर बनते हैं और ये जीवों के परिणाम पूर्वबद्ध कर्मों के उदय का निमित्त पाकर होते हैं । इसी तरह परंपरा चलाते जाइए । पिता-पुत्र की तरह हैं। जैसे यह पुत्र पिता से उत्पन्न हुआ, और वह पिता पहले पिता से उत्पन्न हुआ, वह पिता अपने पिता से उत्पन्न हुआ । क्या कोई पिता, ऐसा भी है जो बिना बाप का उत्पन्न हो जायेगा? नहीं । अगर कहीं ऐसा हो गया हो तो बतलाओ । किसी को बता दो कि यह बिना बाप के पैदा हो गया है । ऐसा किसी को कह दों तो वह बुरा मान जाता है । इसे भी लोग गलती समझते हैं । तो जैसे पिता-पुत्र का संबंध अनादि से है इसी प्रकार इस जीव और कर्म का संबंध भी अनादि से है । कर्मों का उदय आता है और आत्मा में संताप होने लगता है । जैसे कहते हैं ना, कि दाढ़ी में आग लग जाना । अभी 5-7 व्यक्ति बैठे हों । सबके बड़ी दाढ़ी हो, सबकी दाढ़ी में आग लग जाये तो पहले वह अपनी दाढ़ी बुझायेगा । यह प्राकृतिक बात है । जरा अपने आपको तो देखो कि यह जीव कितने संकटों से घिरा है?

यह जीव भावकर्म, द्रव्यकर्म और शरीर; इन तीनों के संग में फंसा हुआ है । कितना संकट है इस पर, क्या कोई शांत रह सकता है । कितना ही छोटा संकट हो, अगर बीच में कोई संकट आ पड़े तो इन घिरे हुए संकटों से मुक्त होने का उपाय तो सोचा नहीं और बाहर में पुत्र, मित्र, परिवार व देश के उपकारों से, यह शान मारे तो उपकार तो यह करता नहीं, सर्वत्र अपनी कषायों को शांत करता है । जो कषाय भावों को त्यागकर अपने आपमें शांति का अनुभव करता है उसके निमित्त से अन्य जीव का स्वयमेव उपकार होता है । प्रभुमूर्ति की इस मुद्रा को निरखकर कितने ही जीव, पुण्य भाव कमा लेते हैं, यहाँ प्राण भी नहीं है, उसमें ज्ञान नहीं, चेतना नहीं । हिलडुल नही सकती है एक पाषाण पर निर्मित है । पाषाण पर जिसकी स्थापना की है ऐसे अरहंत देव का स्मरण करके हम सब कितना पुण्यार्जन कर लेते हैं । उपकार करने की कमर कसकर कोई आवे तो उससे वास्तविक उपकार नहीं होता और अपने सत्पथ पर अपने उद्देश्य में लगे हुए पुरुषों के निमित्त से लोगों का सहज उपकार होता है । अपनी सोचो ।

भैया ! यदि अपन सब यह सोचने लगें कि हमें धर्म में लगना है सो व्याख्यान और समारोह करें, उनमें चहल-पहल करें इससे कोई धर्मात्मा नहीं बनता । अगर सब सोच लें कि अपनी शक्ति के अनुसार हमें कुछ धर्मदृष्टि करना है, कषायों का अभाव करना है, अपने आपमें रमण करना है, ऐसा यत्न कर लें तो सभी लोग धर्मात्मा बन सकते हैं । जाड़े के दिनों में कुछ बुढ़ियाएँ अपनी-अपनी गठरी लेकर मथुरा, वृंदावन, चारों धाम की यात्रा करने के लिए निकल जाती हैं । वे सब सतर्क रहती हैं, सो उनकी एक कील भी नहीं गिरती है । तो इसका कारण यह है कि वे सब अपनी-अपनी गठरी सम्हाले रखती हैं, दूसरे की चीज की संभाल नहीं करती है सो उनकी गठरी सुरक्षित रहती हैं । किसी का कुछ भी सामान नहीं खोता है । यदि वे किसी दूसरे के किसी सामान को देखती रहे तो हो सकता है कि उनकी गठरी या कोई सामान गुम जाये । सब अपनी-अपनी गठरी सम्हाले रहती हैं सो कोई भी उनका सामान नहीं गुमता है । इसी प्रकार यदि अपने-अपने धर्म को सम्हाल लें तो शुद्ध आत्मभावना होगी । धर्म यही है कि कषाय न रखें, जगत् के मायारूपी पुरुषों की चेष्टायें देखकर उनके तृष्णा में न बंधे । मैं तो सब जीवों के लिए मानो मर ही गया । मैं हूँ अपने आपमें, अपने लिए, अपना कल्याण करने के लिए हूं; ऐसी अंतरंग में दृष्टि बने ।

यहां कोई कहे कि यह तो आत्मा-आत्मा की ही बात कही जा रही है । लोकसेवा और परोपकार, ये भी सब तो करना चाहिए ना? समाधान यह है कि जिसके अपने आपमें इतना ऊंचा अध्यात्म तैयार होता है उसके पूर्वोदय के अनुसार जो राग है उस राग में उपकार नियम से होगा ही । पर की दृष्टि से तो अनादि से अब तक लगे हुए आये हैं । चाहे पर के संबंध में सेवा उपकार की दृष्टि बनाए, चाहे घर पर दृष्टि हो; पर उससे आत्मज्ञान की वह किरण न जगेगी जिसके प्रताप से भव-भव के बांधे हुए कर्म भी खिर जाते हैं ।

यह जगत् ज्वारियों का अड्डा है । जैसे ज्वारी लोग पैसों का लाभ हो तो जीत मानते हैं और पैसों के चले जाने को हार मानते हैं । तो यहाँ के जीवों ने पुण्य के फल को तो जीत माना है और पाप के फल को हार माना है । ऐसे लोग बहुत कम हैं जो पुण्य के फल में जीत न मानें और पाप के फल में हार न मानें और पुण्य तथा पाप दोनों के ज्ञाताद्रष्टा रहे । प्राय: लोग पुण्य के फल में हर्ष मानते हैं और पाप के फल में खेद मानते हैं । ऐसे ही जगत् के इन ज्वारियों के बीच में पड़े हुए हम सब अपने आपको कितना बरबाद कर रहे हैं । ये जगत् के जीव उन ज्वारियों जैसे ही हो रहे हैं । कदाचित सत्संग के कारण कभी यह बुद्धि जग जाये कि पुण्य पाप से हटकर आत्मशांति के मार्ग पर चलना है तो ये ज्वारी लोग घर के बंधुजन ऐसी चेष्टा करते हैं कि जिससे यह वहाँ से उठ नहीं पाता है ।

भैया, कल्याण वह कर सकेगा जो अपने को दुनिया की निगाह में मैं कुछ हूँ नहीं, मैं तो मर ही सा गया; ऐसा जानकर ही अपने मन में, अंतर में अपनी शिव-दृष्टि करने की धुन में लग गया हो । जिससे इतना घनिष्ठ संबंध है ऐसे कर्मों को भी मैंने नहीं पैदा किया; किंतु सहज निमित्त-नैमित्तिक भाव से यह संबंध चला आ रहा है । शुद्ध निश्चयनय से देखा जाये, अर्थात् आत्मा के अस्तित्व के कारण आत्मा में जो तत्त्व हो सकता है उस स्वभाव की दृष्टि से देखा जाये तो जीव के द्वारा कर्म उत्पन्न नहीं होते और इन कर्मों के द्वारा, जो कि शुद्ध आत्मा का संवेदन न होने से इकट्ठा हो जाया करते हैं इन कर्मों के द्वारा ये नर-नारकादिरूप से जीव उत्पन्न नहीं होते, वे वहाँ निमित्त मात्र हैं । किसी के द्वारा कोई उत्पन्न नहीं होता, सब अनादि से हैं । कितना घनिष्ठ एक क्षेत्रावगाही कर्म और शरीर है । उससे भी जब अपना संबंध नहीं है तो घर में जो दो एक पुत्र हैं या स्त्री आदि है उनमें यह जीव इतना तेज क्यों बंध गया है? यह कितनी बड़ी भारी भूल है? सो करने वाले कुछ भी बुरा करते जायें, पर उसकी हानि कौन उठायेगा?

एक किसान था । हल चला रहा था, हल चलाते में एक सांप के ऊपर उसका पैर पड़ गया । सांप ने घबराकर उस किसान को काट लिया । अब किसान के मेड़ फूटने लगे । मेड़ फूटने में मनुष्य अकबक भी बकता है और चेष्टा भी अंट्ट-संट्ट करता है । सो उसने लट्ठ लेकर उस बैल को खूब मारा । लोग कहते क्यों मार रहे हो? किसान ने कहा इस बैल ने मेरे ऊपर पैर रख दिया । ऐसा होने लगता है सांप के काटने पर । सो उसने बैल को बहुत मारा पीटा । जब समझाने पर वह बाज न आया तो एक वृद्ध पुरुष धीरे से उसके कान में कहता है गारी देकर, कि स्वसुरजी अगर बैल को इतना पीटोगे और मर जायेगा तो फिर क्या जोत लोगे? धीरे से कान में कहा तो उसकी समझ में आ गया । इसी प्रकार इन मोही जीवों के मोह के मेड़ फूट रहे हैं, अटपट अपनी हठ बनाते हैं और भाव बनाते हैं । सो कोई आकर धीरे से मानो कान में समझाता है । जैसे आचार्यजन गृहस्थों को चुपचाप समझाते हैं कि अगर पर जीवों को ही सर्वस्व मानते रहोगे तो कष्ट कौन भोगेगा? दुःख कोई दूसरा नहीं उठाने आयेगा । मन अच्छा मिला है तो श्रुतज्ञान बढ़ाने के लिए समझो; ममता बढ़ाने के लिए नहीं । और फिर बालबच्चे बहुत अच्छे हैं तो उनमें अपनी शान बढ़ाए इसके लिए नहीं है । भैया ! कोई आपकी प्रशंसा करता है तो वह प्रशंसा कर ही कैसे सकता है? कोई ज्यादह से ज्यादह यह कह देगा कि ये फलां सेठ साहब हैं, इनके चार लड़के हैं । एक मिनिस्टर है, एक डाक्टर है, एक डाइरेक्टर है और सबको और कोई टर लगा दो । मास्टर हो । सब लड़के बड़ी से बड़ी पोजीशन के हैं, हजार-हजार पांच-पांच सो रुपया तनख्वाह वाले हैं । हो गई सेठजी की प्रशंसा? अरे ! इनके लड़के तो इतने बड़े हो गए, मगर सेठजी कुछ न हुए । सेठजी यह समझते हैं कि मेरी तारीफ की है और खुश हो रहे हैं, पर यहाँ हो गई उनकी बुराई । और देख लो किसी सेठ की हवेली बड़ी सुंदर है । उसको देखकर कोई कहे कि फलां सेठजी की हवेली तो बड़ी सुंदर है । इस हवेली में कितनी अच्छी नक्काशी है । आजकल ऐसी हवेली बन नहीं सकती क्या कहा कहने वाले ने? जड़ पत्थरों में तो कला है, सौंदर्य है, पर सेठजी के रंच भी कला नहीं है । ये सेठजी तो पत्थर से भी गए बीते हैं । मगर सेठजी तो उन शब्दों को सुन-सुनकर खुश हो रहे हैं । कोई क्या प्रशंसा करेगा? यह मैं प्रभु की तरह स्वच्छ ज्ञानानंदस्वरूप हूँ । मेरी कौन प्रशंसा कर सकता है ? मैं ज्ञानानंदनिधान हूँ, सो उसकी अपने आपमें सुध लो । इसकी प्रशंसा करने में कोई समर्थ नहीं है ।

भैया ! जो लोग प्रशंसा करते भी हैं वे इस मुझ आत्मतत्व की प्रशंसा नहीं करते । उनकी चर्म चक्षुओं से जो दिखता है उसकी प्रशंसा करते हैं । जो मैं वास्तविक हूँ उसे दुनिया में कोई प्राणी जानता ही नहीं । मैं सबकी दृष्टि में अगोचर हूँ । ऐसा यह मैं आत्म तत्त्व सबसे निराला हूँ । ऐसा भीतर में अपूर्व साहस बनाओ । घर के उन 4 जीवों के लिए अपना आत्मा न लुटाओ । अपने को बरबाद न कर दो । लोक व्यवस्था के नाते उदय के अनुसार जो कुछ थोड़े यत्न से आता है उससे पालन-पोषण करो । तृष्णायें बढ़ाते गए, दुःखी होते गए तो इससे क्या पूरा पड़ेगा । परिवार के कोई भी लोग आपकी सहायता न करेंगे । थोड़े में गरीबों का जैसा गुजारा है होने दो । उदय सबका ऐसा ही है । गृहस्थधर्म के नाते कर्तव्य तो हम करते हैं, कई घंटे व्यवसाय में लगते हैं, अब जो होना है होता है । अपने आत्मा की करुणापर बल दो कि हे प्रभो ! स्वप्न में भी मेरे परिणामों में मलिनता न आये । यही है अपनी रक्षा ।

भैय्या ! छल-बल करके, अटपट व्यवहार करके यदि कुछ जड़ वैभव को घर में रख लिया तो उससे क्या आत्मा की महत्ता है? विशुद्ध कल्याण की दृष्टि से देखो तो सही । ये बड़े-बड़े करोड़पति लोग दुनिया की दृष्टि में धनिक हैं । पर यदि उनकी दृष्टि बाह्य में उलझी है तो उन जैसा गरीब, उन जैसा दुःखी अन्य कोई नहीं । यहाँ यह बतलाया जा रहा है कि जीव और द्रव्य कर्म का संबंध अनादि से है । ऐसा नहीं है कि कोई सदामुक्त सदाशिव अलग से हो और वह जीवों की सृष्टि बनाता हो । सभी आत्मा हैं, कर्म सहित हैं । जो कर्मों का विनाश करते हैं वे मुक्त होते हैं । अब अनादि की बात सोचो । मैं अनादि से शुद्ध ही था और सभी कर्मों से मुक्त था तो फिर अशुद्ध होने को, कर्मसहित होने का क्या कारण है? बताओ । यह तो द्रव्य कर्म की व भावकर्म की अनादिपरंपरा है । वहाँ भी एक दृष्टि से देखो तो हम आपकी यह आत्मा सदा से मुक्त है और सदाशिव है । स्वरूप पर, स्वभाव पर दृष्टि दो तो कल्याणमय है इसलिए सदाशिव है और इसी कारण सदामुक्त है व चैतन्य तत्त्व ।

जीव और कर्मों का विकट संबंध होने पर भी जीव की सत्ता जीव में है । यह जीव दूसरे की सत्ता से नहीं बंधा हुआ है इसलिए सदा मुक्त है । यदि यह जीव सदा से कर्मों से मुक्त है तो बंधा तो था ही नहीं; फिर मुक्त नाम किसका है? मुक्त शब्द ही निरर्थक हो गया । तीसरी आपत्ति यह है कि यदि अनादि से यह जीव मुक्त है, किंतु पीछे से कर्मों का बंध होता है, तो फिर हम मुक्ति का उपाय ही क्यों करें । हम मुक्त हो जायेंगे तो फिर पीछे कर्मबंध लिपट जायेगा । थोड़े समय को मुक्ति का आनंद लेने के लिए क्यों उपाय करें? इंद्रियजंय सुखों को क्यों न भोगें? इस कारण जीव और कर्म का अनादि संबंध है । किंतु ज्ञानपौरुष के अनुसार यह जीव सदा के लिये कर्मों से मुक्त हो जाता है । वह उपाय क्या है? इसी समय अपने आपमें उस शुद्ध ज्ञानज्योति का दर्शन कर लें ।

वह ज्ञानज्योति टंकोत्कीर्णवत् स्वत:सिद्ध है । जैसे यह प्रतिमा बनी है तो यह अटपटे बड़े लंबे-चौड़े पत्थर से बनी है । बड़ा पत्थर रख दिया । कारीगर को बुलाया, नमूना दिखाया कि इस नमूने की मूर्ति हमें बनवाना है । कारीगर ने सूक्ष्मदृष्टि से उस पत्थर के अंतर में देखा । ज्ञान बल से देखने पर कहता है―हाँ, बन जायेगी । अब वह क्या करता है कारीगर? मूर्ति नहीं बनाता है । उसको तो मूर्ति उस पत्थर में पहिले ही दिख गई । जिसके देखने पर दम भरकर कहा था―हाँ, ऐसी मूर्ति बन जायेगी । वहाँ मूर्ति का अवयव जो प्रकट होता है वह ज्यों का त्यों उस बड़े पत्थर के भीतर पड़ा हुआ है वह कोई चीज अलग से नहीं लायगा । कोई बाहर की चीजें उसे में न चिपकाई जायेगी, किंतु उस बनी-बनाई स्वयंसिद्ध मूर्ति के अवयव के आवरण करने वाले जो पत्थर चिपके हुए हैं; छैनी से उन पत्थरों को वह हटायेगा । वह उन पत्थरों को बड़ी ही सावधानी से हटायेगा, क्योंकि यह डर है कि मूर्ति पर कोई चोट न पड़ जाये । बड़े पत्थर हटाने के बाद छोटी छेनी और छोटे हथौड़े से बड़ी ही सावधानी से गुपचुप हो, यदि पास में कोई व्यक्ति खड़ा हो तो वह भी न सुन सके इस तरह से, वह उन बारीक आवरणों को भी निकाल देगा । वे आवरण हट गए । बस, मूर्ति प्रकट हो गई । वैसी की वैसी ही मूर्ति उस समय भी उसके अंदर थी जबकि पत्थर पड़ा हुआ था। उस पत्थर में वह मूर्ति न दिखती थी, पर उस बनाने वाले को उस पत्थर में वह मूर्ति दिख गई थी । इसी प्रकार जो आत्मा सम्यग्दृष्टि है, जिसे परमात्मा बनना है उसे अपने आत्मा में वह शुद्ध ज्ञायकभाव ज्ञानमूर्ति, जिसे परमात्मतत्व कहते हैं अभी ही दिख गया । न दिखा होता तो परमात्मा को बनने का प्रश्न ही नहीं हो सकता है ।

सो भैया ! परमात्म को हमें पैदा नहीं करना है । कहीं से बाहरी चीज लाकर, जोड़कर परमात्मा को खड़ा नहीं करना है । यह परिपूर्ण स्वयं सिद्ध अपने आप में है । देखने वाला चतुर कारीगर सम्यग्दृष्टि है । इसे दिख गया । वह क्या करेगा कि इस सुरक्षित परिपूर्ण परमात्मस्वरूप के बाधक जो आवरण लगे हैं, क्या-क्या हैं वे? शरीर है, कर्म हैं, रागादिक भाव कर्म हैं । ये जो आवरण लगे हैं, उनको हटायेगा । ये आवरण हटाये नहीं हटते, किंतु भावना में विश्वास में यह आ जाये कि यह मैं तो शरीर से अत्यंत पृथक् हूँ । लो शरीर का उपयोग हट गया । अब निकट में बहुत जल्दी दो एक भवों में ही सर्व अंजन हट जायेगा । सो शरीर को आत्मा से न्यारा करने के लिए आपको कुछ पर का नहीं करना है, केवल ऊपर के आवरणों को हटाने का काम है ।

छोटे लोग, देहाती लोग, चलते-फिरते लोग भी कह देते हैं कि शरीर न्यारा है और जीव न्यारा है । प्राय: हम सबको बोध है कि आत्मा न्यारा व शरीर न्यारा है । इसके बाद सूक्ष्म दृष्टि करके द्रव्यकर्मों को जब हम इस आत्मा से अलग करते हैं तो कुछ ज्यादह चिंतन करना होता है, इसमें अधिक सावधानी करते हैं और जब राग द्वेषों से भी अपने को अलग समझते चलते हैं तो वहाँ अत्यंत अधिक यत्न होता है । यह मैं इस उपादान में अवस्थित हूँ । सो अत्यंत सावधानीपूर्वक इन-सब आवरणों से परे शुद्ध ज्ञानमात्र अपने आपका अनुभव बन जाये तो सर्वसिद्धि हो जायेगी । यथार्थ ज्ञान होने पर शांति पाने के लिए यह बेहताश बाहर में न भागेगा ।

जैसे एक बालक को किसी ने मजाक में कह दिया कि तेरा कान कौवा लिए जा रहा है । तो वह कौए के पीछे दौड़ लगाने लगता है, रोता है । कहता है कि मेरा तो कान कौवा लिए जा रहा है । कोई पूछता है अरे बेटा ! कहां रोते हुए भगे जा रहे हो? वह कहता है बोलो मत, अभी फुरसत नहीं है, मेरा कान, कौवा लिए जा रहा है । वह समझता है भाई सुनो तो, जरा, अपने कानों को तो टटोल लो । तब बालक सोचता है कि मुझे अपने कान टटोलने में श्रम तो पड़ेगा नहीं भागता हुआ भी टटोल सकता हूँ । वह कान टटोलता है तो देखता है कि कान तो कौवा नहीं लिए जा रहा है । उसका श्रम समाप्त हो गया, उसे आराम मिल गया । इसी प्रकार इस संसार में हम आप जीवों को ये चिकने चुपड़े वैभव बहका रहे है । कि तेरी शांति को ये लिए जा रहे हैं । उनके पास दौड़ो, उनको पकड़ो । तेरी शांति को ये सब लिए जा रहे हैं । पुत्र, मित्र, परिवार; इन सबके पास तेरी शांति है । ऐसा बहक जाने के कारण हताश अपने को छोड़ कर, भूलकर पर पदार्थों में ही ये जीव भागे जा रहे हैं

गुरुराज समझाते हैं अरे भाई ! कहां भागे जा रहे हो? अरे ! अभी बोलो नहीं, अभी फुरसत नहीं है । मैंने तो नियम ले रखा है स्वाध्याय करने का सो स्वाध्याय कर रहे हैं । और कुछ सोचने को अभी फुरसत नहीं है । हमारी शांति इन बाह्य पदार्थों में है वहाँ शांति लेने जायेंगे, अभी फुरसत नहीं है । फिर भी गुरुराज समझाते हैं कि अरे भाई ! कुछ तो हमारी बात को समझ लीजिए । कुंदकुंदमहाराज, जयसेन आचार्य, योगेंद्रदेव आदि ये सब कह रहे हैं कि―अरे भव्य ! अपने काम को तो टटोल लो, अपनी शांति को तो देख लो, तुम्हारी शांति तुममें है कि नहीं । घर गृहस्थी में रहते हुए भी, बातचीत के प्रसंग में रहते हुए भी तो तुम अपनी निगाह कर सकते हो कि मेरे स्वभाव से शांति है कि नहीं । टटोल तो लो, संकल्प-विकल्प छोड़कर अपने आपमें शांति मिलेगी, विश्राम मिलेगा । निज सार का पता पड़ने पर ही बाहर में यह विश्वास हो जाता है कि जगत में कोई भी चीज सार की नहीं है । केवल ज्ञानमात्र निजतत्त्व का अनुभव ही सार है ।


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