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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 63

From जैनकोष



समकित दर्शन ज्ञान अगुरुलघु अवगाहना ।

सूक्ष्म वीरजवान निराबाध गुण सिद्ध के ।।63꠰꠰

सम्यक्त्व में कौनसा सम्यक्त्व होता है सिद्ध भगवान के? क्षायिक सम्यक्त्व । शुद्ध आत्मादिक पदार्थों के विषय में विपरीत अभिप्रायरहित जो शाश्वत परिणाम है उसको क्षायिक सम्यक्त्व कहते हैं । यहाँ 8 गुणों का स्वरूप बताया जा रहा है जो प्रभु का स्वरूप है वही अपना स्वरूप है । भैया ! भगवान् की छाया में जितने मिनट रहने के लिए आये हो उतने समय तो एक ज्ञान बल का साहस बढ़ाकर, अपने आपको केवल अकेला अपने स्वरूप मात्र निरखकर सत्य आनंद तो ले लिया करें । जब प्रभु की छाया में आये हैं तो अपने शुद्ध स्वरूप का शुद्ध आनंद तो ले लें । यदि प्रभु की धर्म छाया में आकर भी मन बाह्य की ओर ही रहा तो भला नहीं होता । पर हो इतना फायदा है कि कम से कम अपनी ओर आने की धुन तो है । आज नहीं तो कल, कल नहीं तो कभी उपयोग अपने में व्यवस्थित बैठ जायेगा ।

पुष्पडाल के यहाँ वारिषेण महाराज का हुआ आहार । आहार कर चुकने के बाद वारिषेण को भेजने के लिए पुष्पडाल चले । पुष्पडाल वारिषेण के परममित्र थे । जाते-जाते एक मील हो गया । पुष्पडाल को घर लौटने की इच्छा थी, पर उनके कहे बिना कैसे लोटे, एक तो मित्र, फिर साधु; फिर महान योगी । कैसे उनसे कहा जाये? सो पुष्पडाल कहते हैं―महाराज ! यह वह बगीचा है जहाँ अपन कभी-कभी खेलने को आते थे । अर्थात् गांव से यह हम एक मील आ गये । मतलब यह था । समझ गए वारिषेण । बड़े पुरुष बात तो हर एक की समझ जाते हैं, मगर व्यक्त नहीं करते । गुरुजी सुनाते थे कि भैया ! जानते तो हम सबकी बात हैं कि कौन कैसा है? किस ढंग का है? मगर कह कर दूसरों को क्यों सतायें? समझ गये वारिषेण, पर आगे चले गए । फिर पुष्पडाल बोले―महाराज यह वही तालाब है जिसमें अपन लोग नहाने आते थे । वह था दो मील पर, इस तरह होते-होते 5 मील तक पहुंचे । जंगल में वारिषेण महाराज ने कुछ उपदेश की बातें कहीं तो उनको सहसा वैराग्य आ गया । वे वहाँ मुनि हो गए ।

पुष्पडाल जी हो तो गये मुनि, पर एक ही दिन बाद कानी स्त्री की खबर आने लगी? त्यागमार्ग भैया ! बड़ा कठिन है । घर की खबर न आये, परिवार का स्नेह न रहे, देश से अपना संबंध न रहे, जन्मभूमि के आसपास अपना निवास न रहे । लेकिन वीरसिंह की नाई यत्र-तत्र विहार होता रहे ते मोह न सताये । उसमें बहुत ज्ञानबल की आवश्यकता होती है । एक दिन में ही कानी स्त्री की याद आने लगी। बड़े पुरुष सब पहिचान जाते हैं । 10-5 दिन के बाद वारिषेण ने मां को खबर दी―आज वे महल में 2 बजे आयेंगे । सभी रानियों को सभी शृंगारों से सजाकर रखना । मां सोचती है कि ऐसी क्या कुबुद्धि आयी? मेरा चरित्र तो जीवन भर उत्तम रहा, पर इस बेटे के क्या कुबुद्धि उपजी कि त्याग के बाद फिर कहला भेजा कि रानियों को सजाकर रखना? खैर; सोचा, कोई राज होगा । जो बड़े दिल के होते हैं वे ऊपर से किसी की ओछी बात देखकर भी उसमें इतना ही देखा करते हैं कि होगी कुछ रहस्य की बात । ‘आ गये वे दो बजे, पुष्पडाल समेत वारिषेण महाराज । माता ने दो आसन लगा दिए थे, एक सोने का और एक काठ का । मां ने सोचा कि यदि बेटे के कुबुद्धि उपजी होगी तो सोने का सिंहासन ही ग्रहण करेगा । सो पहुंचते ही पुष्पडाल को सोने के सिंहासन पर बैठाल दिया और स्वयं काठ के सिंहासन पर बैठ गए । मूल्यवान सिंहासन पर किसी को बैठाने से दोष नहीं होता है, अपने आप बैठने में दोष लगता है । पुष्पडाल देखते हैं कि अहो ! ऐसी सुंदर रानियां और इनको छोड़कर ये साधु हुए, मेरे को धिक्कार है । मैं एक कानी औरत के ही ध्यान में लग रहा हूँ । यह सोचकर पुष्पडाल ने सब कुछ विकल्प छोड़ दिया ।

इस आत्मा के स्वरूप में इतनी अमूल्य निधि है कि एक बार यह लौकिक सब कुछ बर्बाद करके पा भी तो लेवे, देख तो लेवे उस निधि को । अनंतकाल में अनंतभवों में भटक कर पाया हुआ यह दुर्लभ मनुष्य जीवन सफल हो जायेगा । समस्त संकटों से दूर होने की एक ही औषधि है, दूसरी औषधि नहीं है । व्यापार से, सेवा से या विधान से, समारोह से शांति पा लें; सो नहीं हो सकता । ये शांति प्राप्त करने की औषधियां नहीं हैं । ये सब छोटे बुखार हैं । जैसे 105 डिग्री के बुखार से 103 डिग्री रह जाये तो पूछने वालों को घर वाले यह कहते हैं कि अब तो तबीयत ठीक है । ठीक कैसे है? इसी प्रकार ये सब धर्म की धुन के काम ये संकटों के मिटाने की औषधि नहीं हैं । ये छोटे बुखार आ गये हैं तो बड़े बुखारों का संताप तो नहीं रहा । सब संकटों को मिटाने की औषधि तो शुद्ध सहज ज्ञान स्वभाव की दृष्टि है । उसी को परमात्मा कहते हैं । उसके ही ध्यान से दुःख दूर होंगे ।

सिद्धों में 8 गुण प्रकट होते हैं । उनमें पहिले सम्यक्त्व गुण बताया कि सिद्धों के आत्माधिक पदार्थों के विषय में विपरीत अभिप्रायरहित परिणामरूप क्षायिक सम्यक्त्व होता है । सम्यक्त्व के अनेक प्रकार से लक्षण किए गए हैं । उनमें यह लक्षण निवृत्तिरूप है जो सिद्धों में भी घटित होता है । देवशास्त्र गुरु का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है । यह कैसे सिद्ध में घटित होगा? तत्त्व का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है, यह भी घटित न होगा । किंतु, सर्वपदार्थों के संबंध में विपरीत अभिप्रायरहित परिणमना यह सिद्धों में भी घटित होता है । यह विपरीत अभिप्राय ही तो है कि अमुक मेरे हैं, अमुक मैं हूं―ऐसा आशय रखना, विषयकषायों के परिणामों की ओर झुकना, किसी पदार्थ से हित मानना, किसी से हित समझना―ये सब विपरीत अभिप्राय हैं । इससे रहित परिणाम चौथे गुणस्थान वालों के भी हैं और सिद्ध भगवान् के भी है ।

सिद्धों में दूसरा गुण कहा है केवलज्ञान । तीनलोक तीनकाल में रहने वाले पदार्थों का एक साथ वस्तुपरिच्छेदन करना, ज्ञान करना तो केवलज्ञान कहा जाता है और उन्हीं पदार्थों के जाननहार आत्मपदार्थ का प्रतिभास हो सो केवल दर्शन कहा जाता है । यह अपने वैभव की चर्चा चल रही है । सिद्धों में यह सब है । मात्र उतनी ही दृष्टि करके रह जाये तो इसने अपने लिए क्या पाया? जितना भी वर्णन आगम में है उस सबसे अपने आत्मा के हित की बात जान ली जाये तो जानना सार्थक है । जैसे वर्णन चलता है कि यह लोक कितना बड़ा है? 343 घन राजू प्रमाण है, बहुत बड़ा है । तो इससे हमें क्या शिक्षा लेनी है कि इतने बड़े लोक में कोई प्रदेश ऐसा नहीं बचा जहाँ मेरा अनंत बार जन्ममरण न हुआ हो । ऐसे अनंत जन्ममरण हुए । उसका कारण है आत्मज्ञान का अभाव । तो जिस निर्विकल्प अखंड एक चैतन्यस्वरूप आत्मतत्व के अनुभव के बिना जगत् में डोलते अनंतकाल व्यतीत हो गए वह निर्विकल्प अनुभव ही इस लोक में सारभूत काम है, अन्य कोई काम इस लोक में सारभूत नहीं है, जिसमें कि आप बड़ी बुद्धिमानी समझते हो । जैसे अपने इतनी सुंदर व्यवस्था बना ली है कि अब मैं निश्चित होकर धर्म साधन कर सकता हूँ, वह भी बेकार बात है । व्यवस्था बनाओ अथवा न बनाओ । जब भी चित्त में आया हो कि धर्मधारण करना है तब ही धर्म कर लिया जाये । सभी प्राय: सोचते हैं कि अभी मेरी ऐसी परिस्थिति नहीं बन पायी है कि निश्चिंत होकर धर्म साधूँ । वर्तमान में कमजोरी है तो भावी आशा क्या सफल होगी? इसको संतोष किसी भी जगह नहीं होने का ।

भैया ! कैसी भी स्थिति हो, धर्मसाधन में अटक किस पदार्थ की है? धर्मसाधन को लोगों ने यदि यह मान रखा हो कि सब कुछ धंधा छोड़ दें और किराये की आमदनी अथवा ब्याज की निश्चित आमदनी बना लें और अपन स्वतंत्र होकर रहें, कोई झगड़ा न रहेगा तो वह धर्मसाधन है या कुछ और? खर्च बढ़ाकर धर्म में प्रगति कर लेते हैं क्या? भैया ! धर्मसाधन का अवसर किसी भी स्थिति में अटकता नहीं है । कुछ भी स्थिति हो अपने ज्ञान स्वभाव पर दृष्टि लगना यह ही धर्म साधन है । यदि आर्थिक परिस्थिति भी व्यवस्थित हो जाये तो और बात सामने आयेंगी और कहीं यह अन्यत्र जा गिर पड़ेगा । फिर कोई बंधन बना लेगा । किसी भी परवस्तु की धर्मसाधना के लिए अटक नहीं है । जैसे मरने की बात को किसी भी परिस्थिति की अटक नहीं होती । अभी दो चार वर्ष ही विवाह के हुए । छोटा बच्चा है, सो इस ख्याल से वह बड़ा मरना नहीं चाहता है, सो वह मरण अटक जाये, ऐसा नहीं होता । सो जैसे मरण में अटक की गुन्जाइश नहीं है, उसी प्रकार धर्मधारण में कोई अटक नहीं हैं । कोई अपने आप धर्म नहीं करता है, व अटक बना लेता है यह उसकी मर्जी है ऐसा तो यह जीव कर ही रहा है । तभी तो यह अनादि से भटकता चला आया है ।

भैया ! चेत लो, ‘‘जब लो न रोग जरा गहे, तबलों झटिति, निजहित करो ।’’ जब तक कोई कठिन रोग न आये, बुढ़ापा न आये तब तक सर्वप्रकार से धर्म का उद्गम कर लो, यह बुढ़ापे में भी काम देगा । यह आत्मा के वैभव का प्रकरण चल रहा है । भगवानसिद्ध का स्वरूप गाने के बहाने हम अपनी ही विभूति का वर्णन कर रहे हैं―ऐसा मन में ध्यान रखिये । भगवान् में अनंत शक्ति है । केवलज्ञान के विषय में, जिसमें कि अनंत पदार्थों के जानने की शक्ति है वही तो अनंतवीर्य है । यह हम आप आत्मा मात्र ज्ञानमय हैं । दूसरी बात यहाँ नजर ही नहीं आती । खूब देख लो, परख लो, जो जान रहा है, जो जानन रूप परिणम रहा है उस आत्मा की याद कर लो । वह मात्र ज्ञान मय है, सबसे न्यारा है । अपने स्वरूप है । इसका ज्ञान समस्त लोक में व्याप्त हो जाये―ऐसा इसका स्वभाव है । परंतु कोई लाखों रुपयों का लाभ और एक तुच्छ व्यक्ति के हठ करने पर रुक जाये तो वह कितनी मूढ़ता है । इसी प्रकार उन अनंत चतुष्टयों का लाभ इन अनंत जीवों में से दो चार प्राणियों के मोह की हठ से अटक जाये, वंचित हो जाये तो यह कितनी मूढ़ता की बात है? खुद डाक्टर रोगी हो जाये तो वह अपना इलाज नहीं कर पाता, उसकी बुद्धि मारी जाती है। इसी तरह खुद पर मोह का रोग लगा है तो खुद की समझमें नहीं आता । अभी पास में बैठे हुए किसी के प्रति भी आप सोच सकते हों कि यह अपना व्यर्थ ही दिमाग अटकायें है, घर में, परिवार में इन्हें क्या पड़ी है? इस प्रकार से दूसरे के प्रति तो सोचते सभी हैं; पर अपने प्रति किसी को भी नहीं, समझ में आता है । एक तुच्छ अटक में सर्व अनंत विकास रुका हुआ है। सिद्ध भगवान् के मुख्य गुणों का वर्णन करके अब और भी गौणभूत गुणों का वर्णन करते हैं। उनमें सूक्ष्मता है । अतींद्रिय ज्ञान के विषयभूत हैं। उनमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है । कैसा अद्भुत है यह चैतन्य पदार्थ? कुछ भी तो इसमें पिंड नहीं है । अब भी तो इसमें पकड़ की बात नहीं है, आकाशवत् अमूर्त है । जो चैतन्य रस से घन है, भरा हुआ है । गगरी में जैसे रखा हुआ पानी । जितना पानी है उतने में ठोस है । एक सूत भी जगह उसमें खाली नहीं है, घन है । इसी प्रकार इस आत्मा में वह चैतन्यस्वरूप घन है अथवा कहिए चिन्मात्र ही आत्मा है । कोई पक्षी का जो छोटा बच्चा होता है उसे क्या कहते हैं―चेनुवा । अरे चनुवा हैं इसमें हाथ न लगाओ । वह चेनुवा है क्या? अरे शरीर तो है ही नहीं, चिन्मात्र है । खाली चैतन्य स्वरूप है । इसे बढ़कर कह दिया, जिसका शरीर पूरा न हो उसको शरीर ही नहीं माना । और कहते हैं खाली एक चेनुवा है । जरा भिन्न इन पर्दों की अटक छोड़कर अंतर में प्रवेश करके चलें तो दृष्ट शरीर को पार करके इन हड्डियों को भी पार करते हैं । उन सबका ख्याल भी छोड़कर द्रव्यकर्म, विकल्प व छुटपुट ज्ञान इनको भी पार करते अभी चले जाइए । दर्शन करिये उस चित्प्रतिभास मात्र का, महा प्रभु को देखो । मेरे नवाब साहब यहाँ आनंद से पड़े हैं । हम उनका आदर नहीं करते इसलिए दर-दर की ठोकरें खाते हैं । सिद्ध प्रभु में अवगाहनत्व भी है । एक जीव जितने में फैला है वहाँ सिद्ध लोक में सिद्धों में अनंत जीवों को अवगाह देने की सामर्थ्य है । हम लोगों के साथ यह शरीर लग बैठा सो हमारे में सामर्थ्य अब नहीं रही । सिद्धजीवों में ऐसी निराबाधता है कि जिस जगह एक सिद्ध विराजे उस जगह अनंत सिद्ध पहुंच जायें तो वहाँ बाधा नहीं है । पूजा के अंत में स्तुति में बोलते हैं ना? ‘‘जो एक माहीं एक राजे एक मांहि अनेकनों । एक अनेकन की नहीं संख्या नमो सिद्ध निरंजनो । एक मांहि एक राजे एक मांहि अनेक ।’’ एक में एक ही रह रहा है और एक में अनेक रह रहे हैं । देखो सिद्धस्वरूप । ज्ञानदृष्टि ही अमृत है । जगत में संतोष देने वाली वस्तु अन्य कुछ नहीं है । सब विडंबना है । पर जिस उपयोग में ज्ञान का स्वरूप समाया है प्रतिभास क्षेत्र निज ज्ञेय हो रहा है वह उपयोग विजयी है, धन्य है, अमर है । यहाँ सिद्ध का स्वरूप देखा जा रहा है । एक में एक ही सिद्ध है । उसी जगह अनंत सिद्ध पड़े हैं, मगर एक जीव के स्वरूप को तो देखो । उस जीवस्वरूप में वही एक है । यह तो बहुत अंदर घुसकर देखने की बात है । इतने अंदर प्रवेश करने में बडे बल चाहिए । कोई थम जाये और कुछ-कुछ थोड़ा, सो उसी जगह वहीं ठहरा हुआ वहीं बाहर देखने लगे एक में अनेक सिद्ध दिखते हैं । उन सिद्धों की क्या संख्या है? अनंत नमों सिद्ध निरंजनो । ऐसे निरंजन भाव कर्म, द्रव्य कर्म, नोकर्म समस्त अंजनों से रहित सिद्ध भगवान को नमस्कार है । उन प्रभु में अवगाहनत्व प्रकट हुआ और उनमें अगुरुलघुत्व प्रकट हुआ । किसी अगुरुलघुत्वगुण से गुरुत्व और लघुत्व का अभाव हो गया । न वहाँ कोई बड़ा है और न कोई छोटा है । भगवंत ऋषभदेव भी विराजे हैं और अंतिम केवली श्रीधर भी विराजे हैं और पंचमकाल के गये मुक्त भी विराजे हैं, पर वहाँ छोटा-बड़ा कोई नहीं है सब अनंत चतुष्टय के स्वामी हैं । उनमें गुरुत्व और लघुत्व का बिल्कुल अभाव हो गया है । उनमें अव्याबाध गुण भी प्रकट है । वेदनीय कर्म के उदय से होने वाली कोई भी बाधा न रही, अत: बाधारहित है । ऐसे ये सम्यक्त्व आदिक 8 गुण संसारी अवस्था में किसी प्रकार कर्मों से प्राच्छादित हुए ठहरे हैं । कर्म एक पृथक् द्रव्य है, आत्मा पृथक् वस्तु है । कर्म अपनी शक्ति से गुणों को ढांकते नहीं हैं । कर्म अपने में परिणमन करते हैं । विपाक ने कर्मों का निमित्त पाकर यह जीव अपने ही परिणमन से विकार रूप होता है । सम्यक्त्व को तो मिथ्यात्व नामक कर्म ने तिरोभूत कर दिया । कहा जायेगा उसी को । जैसे अभी इंगलिश में शब्दों को तिरोभूत बना लें । आपसे कहें कि ‘चाय’ की संस्कृत बनाओ । ‘चाय’ की संस्कृत बनाने को यह कहते हैं―हां साहब, दुग्धशर्करासहितविशिष्टपत्ररसम् । अभी तुम्हारे सिर में दर्द है और ऐसा कहने में दोष लगता है ना कि हमारे सिर में दर्द है । कोई क्या कहेगा कि ये बड़े धर्मात्मापुरुष और सिर की कहानी कह रहे हैं और बता रहे हैं मेरे सिर में दर्द है । तो इस तरह बोलें―एक अज्ञान भाव का निमित्त पाकर बंधे हुए कर्मों के उदय से प्राप्त हुए इस असमानजातीय पर्याय की इस ऊपर वाले पिंड की नसें तड़क रही हैं । अरे इतनी देर कहने में लगाओगे तो दवा लाने में कितनी देर लगेगी? तो व्यवहार में तो सीधा बोला जाता है, पर ज्ञानी लोग उसका अर्थ सही लगाते हैं । भगवान रामचंद्रजी के तो सीता के वियोग में इतना विह्वल होने पर भी सम्यक्त्व नहीं मिटा । हमारे आपके सिरदर्द है, बुखार है―इतना कहने से सम्यक्त्व मिटेगा क्या? अरे सम्यक्त्व मिटाने वाली जो भीतर में विष की गाठें हैं उन्हें तो तोड़े नहीं और धर्म का रूपक ऊपरी-ऊपरी सुहावना बनाना चाहते हैं तो धर्म का ऊपरी रूप सुहावना बना लेने से सिद्धि न हो जायेगी । इन 24 घंटों में कभी तो सबकी उपेक्षा करके एक आध सेकंड तो ज्ञानस्वभावमात्र आत्मतत्व को तो निरखिये । किंतु इतनी हठ हो गई है अंतर में कि घर के दो-चार जीव ही मेरे सब कुछ हैं बाकी गैर । अरे । उनके तो इससे भी अधिक पुण्य हैं और वे इससे, अधिक सुकुमार हैं इससे भी अधिक गुणवान हैं; मगर यह मोह की बलिहारी है ।

एक सेठानी के यहाँ एक नौकरानी लगे हुए थी, चार-पांच दिन हुए थे । सेठानी का बच्चा एक स्कूल में पढ़ता था और नौकरानी का भी बच्चा उसी स्कूल में पढ़ता था । एक दिन सेठानी का लड़का जल्दी स्कूल चला गया । दोपहर का कलेवा नहीं ले पाया तो सेठानी ने नौकर से कहा कि यह ले जाओ डेढ़ पाव मिठाई और स्कूल में जाओ सो हमारे बच्चे को दे दो । नौकरानी ने कहा―सेठानी जी ! हम तो तुम्हारे बच्चे को पहिचानती ही नहीं । सेठानी तो बड़े गर्व में थी । बोली―अरे उसे क्या पहिचानना? उस स्कूल में जितने भी बच्चे हैं, सब बच्चों में जो सबसे बढ़िया, सुंदर, गुणवान, प्यारा, कांतिमान हो, वही तो मेरा लड़का है । उसको तो गर्व था कि मेरे लड़के से बढ़कर तो कोई है ही नहीं । सारे स्कूल में जो सबसे प्यारा और सुहावना लगे वही तो है मेरा लड़का उसे दे आवो । नौकरानी कलेवा लेकर चली । लड़कों को देखा तो सबसे सुहावना जो लगा उसे दे दिया, और चली आई । छुट्टी के बाद सेठानी का लड़का मां से बोलता है―मां ! आज तुमने खाने को कुछ नहीं भेजा । सेठानी बोली नौकरानी के हाथ तो भेजा था । नौकरानी आयी तो सेठानी बोली―‘तुमने मेरे लड़के को कलेवा नहीं दिया । बोली मैं दे तो आयी ।’ बच्चा बोला ‘हमें तो नहीं मिला ।’ नौकरानी कहती है कि आपने यही तो निशानी बताई थी कि जो लड़का सबसे प्यारा लगे, सुहावना लगे, उसे मिठाई दे आना । मुझे तो सबसे

प्यारा, सबसे सुहावना मेरा ही बेटा लगा, सो मैं उसे ही देकर चली आई । तो मोह में देखो हड्डी निकल आई है, जुखाम हो गया है, नाक बह रही है, दस्त भी हो रही है, पल-पल में साड़ी बदलना पड़ रहा है, फिर भी वह बेटा ही उसे विश्व में एकमात्र दिखता है, अन्य जीवों पर दृष्टि नहीं है ।

एक बार की बात है कि सागर में हम और गुरुजी एक बगीचे में शहर से दूर ठहरे थे । सुबह प्रवचन को जाते थे । तो उस दिन उपवास का दूसरा दिन था । सुबह चले आये तो रास्ते में एक स्त्री मकान के बाहर चबूतरे पर छोटी खटिया पर बच्चे को बिठाये खिला रही थी । बच्चा कैसा था? हड्डी निकली, नाक बह रही, मैला तन पर लगा, जरा-जरासा कपड़ों पर लगा और मां भी करीब-करीब उस बच्चे की जैसी थी । वह बच्चे को हाथ में उठाकर उचका कर कहती―अरे बंदरिया ! हम और गुरुजी जा रहे थे तो हमने महाराज से कहा―महाराज जी देखो, यह पुलिंग से स्त्रीलिंग हो रहा है । वह कहती है―अरे बंदरिया । उनको भी हंसी आयी और एक आध शब्द कह दिया । अब उनकी हंसी न सधे । महाराजजी ने धीरे से हमारे एक थप्पड़ मारा और कहा ऐसे ही हंसते-हंसते प्राण निकले जा रहे हैं । तो मोह में ऐसी लीला निसर्गत: होती है, विवेक नहीं रहता है । लोक व्यवस्था के नाते सम्यग्दृष्टि सबका पालन करते हैं । मगर यह मेरा है, इस नाते से पालन नहीं करते हैं । यह जीव कभी सूकर हुआ तो सूकर के बच्चों से प्रेम करने लगा । कभी गधा हुआ तो गधे के बच्चे को अपना मान लिया । कभी चूहा हुआ तो चूहे के बच्चे को अपना मान लिया । कोई चूहा यहाँ बैठा तो नहीं है? (हंसी) नहीं । मगर यह जीव अब भी बाज नहीं आता है । मनुष्य हुआ तो मनुष्य के बच्चे को अपना मान लिया । सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन जगे बिना जीव को शांति नहीं मिल सकती । यह सम्यक्त्व गुण मिथ्यात्व नामक कर्मों के उदय का निमित्त पाकर रुक गया है । विकास को प्राप्त नहीं हो सकता है । यह एक स्थिति बताई है । पर उसे तो कोई कर्म दिखते ही नहीं है बड़ा भार लदा है ज्ञानावरणादिक 8 कर्मों का । यहाँ अपना एक दाना भी नहीं नजर आता, ठीक है नहीं आता, पर इसे अपने रागद्वेष विकार तो नजर आ रहे हैं । हाँ, वे तो नजर आ रहे हैं, तो इन रागद्वेष विकारों से परपदार्थों में आत्मीयता की मुख्यता के विकल्प ने सम्यग्दर्शन गुण को ढांक दिया है । उन विकल्पों को हटाओ और, देख लो एक बड़ा तालाब एक चद्दर की ओट से ढका है, उस ढकने वाली चद्दर को हटाकर उस समुद्र में प्रवेश कर अपना संताप मिटाओ भैया ! इन विकल्पों की चादर ने इस ज्ञान समुद्र को ढक दिया । इन विकल्पों की चादर को हटाओ तो अपना ज्ञानसागर अपने समक्ष है । इसी ज्ञानसागर में डुबकी लगाओ और सुखी होओ । जमुना नदी में कछुवे बहुत रहते हैं । बहते-बहते कभी उन्हें विश्राम लेना होता है तो पानी के ऊपर अपनी चोंच निकालकर उस पानी में बहते हैं । चोंच निकालते ही पक्षी चारों ओर से उस कछुवे को पकड़ने के लिए झपटते हैं ।

और झपटने में पानी के नजदीक आ जाते हैं । पचासों ही पक्षी झपट रहे हैं, और कैसा उड़ उड़कर श्रम कर रहे हैं । वहाँ उस कष्ट के बचने का सीधा उपाय क्या है कि वह पानी में थोड़ा नीचे डुबकी लगा ले । इतने में ही जो पचासों पक्षी उपर मंडरा रहे हैं उनका श्रम निरर्थक जायेगा । करो श्रम, जितना करना हो कर लो; कछुवा को आफत दिखेगी तो चार अंगुल नीचे पानी में आ जायेगा और सब आफतें खतम हो जावेंगी । पक्षियों ने कितना श्रम किया पर कछुवे ने एक लीलामात्र से अपना बचाव कर लिया । इसी तरह इस ज्ञान पर, इस उपयोग पर संकट आ रहे हैं । आवे संकट, जितने आना है । इस उपयोग को जरासा काम करना है कि लगना तो है यही; पर जरासा भीतर सरक जाये । अपने ज्ञानस्वभावमय आत्मतत्व में आ जाये । लो, सब संकट समाप्त हो जावेंगे । कर्म क्या चीज कहलाते हैं इसका वर्णन चल रहा है । उत्थानिका में कहते हैं कि विषयासक्तजनों के, जीवों के जो कर्म परमाणु बंध को प्राप्त हो जाते हैं उनको कर्म कहते हैं ।


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