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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 72

From जैनकोष



छिज्जउ भिज्जउ जाउ खउ जोइय एहु सरीरु ।

अप्पा भावहि णिम्मलउ जिं पावहि भवतीरु ।।72।।

शरीर चाहे छिद जाय अर्थात् चाहे टूक-टूक हो जाय, भिद जावे, अर्थात् इसमें छिद-छिद हो जावे अथवा क्षय को प्राप्त हो जाये, बिल्कुल ही मिट जाये फिर भी हे योगी ! तुम वीतराग, चिदानंदस्वरूप उस एक ज्ञानस्वरूप निजआत्मतत्त्व की भावना ही करते रहो । जो तत्त्व निर्मल है, अर्थात् भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म से रहित है, इस भावना से क्या होगा? इस परमात्मतत्त्व के ध्यान से तुम संसार का तीर प्राप्त कर लोगे । अर्थात् संसारसागर से पार हो जाओगे । यहाँ आत्मतत्त्व की भावना के लिए कहा जा रहा है ।

मोहीजन विषयसाधनों की प्राप्ति के लिए इतनी हिम्मत करते हैं कि चाहे शरीर थक जाये, पसीने से लथपथ हो जाय, भयानक जंगल में, समुद्र में जहाजों में कहीं भी आना-जाना पड़े; समय पर चाहे भोजन भी न मिले पर जो विषय चाहा गया उस विषय की प्राप्ति कर ली ही जाय―ऐसी हठ करते हैं । मोहीजन इस अज्ञानतापूर्ण आग्रह पर तुले रहते हैं । तो ज्ञानी जन इस आग्रह पर दृढ़ रहे कि चाहे शरीर छिद जावे, भिद जावे, हम तो इस निजज्ञायकस्वभाव की भावना में रहेंगे । सुकुमार स्वामी को बाघ ने नोच-नोचकर खाया, तिस पर भो उनकी यही परिणति थी कि चाहे यह शरीर छिद जाये, भिद जाये, क्षय की प्राप्ति हो जावे; फिर भी उस आत्मदेव की भावना में ही रहेंगे।

भैया ! शरीर तो मिलता रहता है और शरीर का क्यों चाहते हो? शरीर का मिलना बड़ा कठिन उपद्रव है । यह शरीर मिला, तब अहंबुद्धि हुई, यह मैं हूँ । और जब माना कि यह मैं हूँ तो मोही पर शरीर को मानता कि यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है इत्यादि, और फिर उन सबको राजी रखने ने लिए धन का संचय किया । फिर उस धन में जो बाधक होने लगा, उनसे लड़ाई लड़ने लगा, और तरह रागद्वेषमय क्षोभ की वृत्ति बनाई । किस बात पर? एक शरीर मिला है इस बात पर । क्या शरीर चाहिए अपने को? नहीं चाहिए ना? तो वर्तमान में भी इस शरीर के अनुरागी न बना ।

इस मन को पापों से बचाने के लिए इस शरीर से अधिकाधिक उपकार करो । जैसा होना हो, शरीर छिदता हो छिदे, भिदता हो भिदे, किसी भी हालत को प्राप्त होता हो; पर अपने शुद्धज्ञानस्वरूप की भावना न छोड़ो ।

ये बड़े राजपुत्र लोग जिन्हें साधु अवस्था में बैरियों ने और सिंहादिक क्रूर जीव जीवों ने उपसर्ग से उपद्रुत किया, क्या उनमें यह सामर्थ्य न थी कि उन्हें हटा दें? पर इस हटाने का विकल्प करने का फल संसार था और कुछ समय तक रुलना था, इस कारण शरीर अवस्था को प्राप्त हुआ था, पर उसका विकल्प नहीं किया; उसे इष्ट नहीं समझा । यहाँ यह बतला रहे हैं कि जो पुरुष देह के छिदने की नौबत आने पर भी रागद्वेष आदि क्षोभ परिणामों को न करते हों, एक शुद्धज्ञानस्वरूप आत्मा की भावना करते हों, वे यथाशीघ्र मोक्ष को प्राप्त होते हैं । कुछ तो निर्णय बना लो ।

भैया ! इस शरीर को आराम से अर्थात् प्रमाद में न रखो । इससे मोह न करो । दूसरों के कुछ उपकार में शरीर न लगे ऐसी दुर्बुद्धि न बनाओ । खुदगर्जी का फल खुद के लिए अच्छा नहीं होता है । यह शरीर तो मिटेगा, जलेगा, सड़ेगा । यहाँ अपवित्र दुर्गंध शरीर जिससे परमार्थत: रंच भी इस ज्ञानस्वरूपी आत्मा का संबंध नहीं है, ऐसे शरीर में मोह करना यह मोही और तुच्छ पुरुषों का काम है । शरीर का मोह छोड़ो । संयम के लिए जीना और आत्मरमण के लिए संयम करना, ये बातें अलग हैं और अलक्ष्य स्वाद का लेना, मोह करना, ये बातें दुर्गति में ले जाने वाली हैं । इसलिए अपनी ओर एकचित्त होओ । दूसरों का ख्याल कर-करके अब तक भी तो कुछ नहीं मिला, आगे क्या मिलेगा?

अब तो बड़े लड़के हो गए, क्या लड़कों से सुख देखा होगा? आकुलताएँ और आपत्तियां ही पाई होंगी । लड़कों के लड़के हो गए तो आशा करते हैं कि लड़कों ने तो सुख नहीं दिया । अब लड़कों के लड़के सुख देंगे । उनसे भी सूख नहीं मिला तो अब पंतियों की आशा बनायेंगे । यह मोह बड़े खोटे परिणाम वाला है । जंगल के सब जीव एक समान हैं । उनमें प्रभुता का स्वरूप है । ऐसे अमृत का पान करने में बाधा डालने वाला यह मोहपरिणाम है । ये मोही जन दो-तीन जीवों को अपना मान रहे हैं । ये दो-तीन भी तो एक दिन विदा हो जायेंगे । यह मानने वाला भी न रहेगा । यह भी विदा हो जायगा । सारा स्वप्न का तो काम है । अहो, इस मोह की नींद के स्वप्न में कितनी लोटापाई की जा रही है? हे कल्याणार्थियों ! देह के मोह को छोड़ो । हे योगी पुरुष ! कर्मकृत भावों को और अन्य चेतनद्रव्यों को हम निश्चय से भिन्न ही समझें ।


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