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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 76

From जैनकोष



अप्पि अप्पु मुणंतु जिउ सम्मादिटि्ठ हवेइ ।

सम्मादिटि्ठउ जीवडउ लहु कम्मइँ मुच्चेइ ।।76।।

जो आत्मा के द्वारा आत्मा को जानता है वही जीव सम्यग्दृष्टि होता है । सम्यग्दृष्टिजीव क्षणमात्र में कर्मों से छूट जाता है । जो केवल अपने स्वरूपतत्त्व को आत्मा के द्वारा जो अनुभवता है, वह वीतराग सम्यग्दृष्टि है । इस लोक में धन, राज्य, अनाज सोना, चांदी, इज्जत सब चीजें सुगम हैं; इनका कुछ भी मूल्य नहीं है । यों ही मुक्त मिली हैं और योंही चली जायेंगी । किंतु अपने स्वरूप संबंध में और सभी के स्वरूप के संबंध में सच्चा ज्ञान हो जाय, यह बहुत अमूल्य बात है । यह मैं आत्मा स्वरसत: कैसा हूं? ऐसा इस शुद्ध ज्ञानस्वभाव का निर्णय जिसके हो तो उससे बढ़कर कोई शाह नहीं है । मिट जाने वाली विनाशीक वस्तुयें हैं । ऐसा नखरा किया जाना यह मात्र व्यामोह की बात है । ऐसे केवल निज शुद्ध आत्मा को कब अनुभवा जा सकता है जब वीतराग स्वसम्वेदन ज्ञान से ही स्वयं परिणति होती है । सबमें ज्ञान का ही खेल है । ज्ञानमात्र ही यह हम हैं और ज्ञान की ही लीला में सुख-दुःख व आनंददृष्टि है । सब कुछ फैसला इस ज्ञानदृष्टि के ही भरा हुआ है ।

जो जीव केवल अभेदरूप सनातन शुद्ध ज्ञानस्वरूपमात्र अपने को निरखते हैं वे सम्यग्दृष्टि जीव ज्ञानावरणादिक कर्मों से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं । जो समागम मिला है उसमें भी जितना अधिक बाधक अचेतन नहीं है उतना बाधक चैतन्य पदार्थ है । बड़े-बड़े महापुरुषों ने भी अन्य चैतन्य पदार्थों के चक्र में आकर अपनी परेशानी उठाई । अचेतन पदार्थों से तो कोई प्रत्युत्तर नहीं मिलता कि

उतना राग उनमें बढ़ता चला जाय, किंतु इन चेतनपदार्थों की ओर से इसकी प्रेरणा होती है । ये चेतन पदार्थ रागभरे सुहावनी बोली से पेश आते हैं । तो यह भी मूढ़ उनके वचनों को सुनकर उनके लिए ही अपना सर्वस्व सौंप देता है । चेतन पदार्थों के समागम से इस आत्मा का माहात्म्य घट गया है । कुटुंब, परिवार के मोह में यह मिथ्यादृष्टिजीव ऐसा पगा रहता है कि घर के उन चार छ: जीवों से लगाव रहता है; और जीवों में रंच भी दृष्टि नहीं रहती । पर मोह से कुछ पूरा नहीं पड़ती है । इतनी बड़ी जिंदगी व्यतीत हो गई, कोई 50 वर्ष का, कोई 60 वर्ष का है । इन बीते हुए क्षणों में क्या-क्या नहीं स्वप्न सोचा? क्या-क्या नहीं किया? अपने को कुछ न समझकर अपना सर्वस्व सब परिवार के लिए सौंप देने पर उसके फल से आज कुछ लाभ आत्मा में दिख रहा है क्या? इस आत्मा के भीतर कितना वैभव बढ़ गया है? कितना ऊँचा उठ गया है? कुछ निरखो तो सही । कुछ नजर नहीं आता ।

अहो ! इस जीव ने केवल शुद्ध आत्मतत्त्व का परिज्ञान न होने से जगह-जगह संकट भोगा है । दृष्टि उदार बताओ । अपना तन, मन, धन, वचन भविष्य समझकर, जब जैसा सामने प्रकरण देखा हो; उत्तम बात उसमें उपयोग करने से मत मुकरो । संभव है अपनी सारी जायदाद भी परोपकार में लगा दी तो पता नहीं कल के दिन कौनसी विधि ऐसी बैठ जायेगी कि वह कोटा पूरा हो जायगा । पर कई दिन तक बासी रोटी झोली में भरे हुए भिखारी की तरह इस मोही जोव को सत्य बात का विश्वास नहीं होता । कोई सेठ इस भिखारी से कहे कि तुम इन बासी रोटियों को कूड़ा में डाल दो, तुमको ताजी पूड़ियां खिलाऐंगे, पर भिखारी को विश्वास नहीं होता है । क्योंकि बड़ा परिश्रम करके तो ये रोटियां कमाई हैं और इन्हें यों ही कूड़े में डाल दें तो पता नहीं यह सेठ जो कह रहा है सो वह खिलाए या न खिलाए । इसी तरह इन मोही जीवों को तन, मन, धन, तथा वचन के कम करने में इतनी मंजूरी होती है कि यह मोही जीव अपने मोह के कुटेव से हटकर साधर्मीजनों में अपना सर्वस्व नहीं सौंप सकता है । सर्वस्व सौंप दिया स्त्री को, पुत्रों को ।

भैया ! जगत के इन अनंत जीवों में ये दो ही प्राणी तेरे कुछ हैं क्या? वे तो अपने स्वरूप से अत्यंत जुदा हैं । पर मोह में जबकि आत्मज्ञान ही व्यवस्थित नहीं रह पाता तो बस, एक-दो में ही अपना अंधेरा बनाए हुए है । अपना वैभव, व्रत, उपवास, संयम सब कुछ आत्मस्वरूप के अनुभव के लक्ष्य से करो । अन्य किस बात के लिए तीन-तीन रत्नत्रय के उपवास कर डालते हो ? किस प्रयोजन के लिए दसलाक्षणी जैसे पर्व में एक बार खाने की उपवास करने की हिम्मत कर डालते हो? किस प्रयोजन के लिए इतने कष्ट सह रहे हो? पर का संग जुड़ भी जाये तो मिलेगा क्या? मान लो करोड़पति हो गये तो इस भव में स्वार्थी, धन के इच्छुक, मायावी पुरुषों के द्वारा कुछ शब्द बोल दिए जायेंगे सो उन बोलने वालों ने उसके परिणामों से शब्द नहीं बोला, किंतु उन्होंने अपने कषायों के वशीभूत होकर शब्द बोले हैं । कोई किसी का कुछ नहीं है? एक निर्णयपूर्वक चित्त को समाधान में कर लो कि अणु-अणु तक भी मेरे कुछ नहीं है ।

यह वीतराग सम्यग्दृष्टि जीव ज्ञानावरणादिक कर्मों से बहुत शीघ्र छूट जाता है । जिस कारण के द्वारा सम्यग्दृष्टि पुरुष कर्मों से शीघ्र मुक्त हो जाता है उस कारण को तो देखो । कैसा अछूता है इस ज्ञायक स्वभावरूप कारण, जिसका ज्ञानी संत जीवों ने उपयोग किया । वे मुक्त होते हैं, जो सम्यग्दृष्टि होते हैं । जिस कारण का उपयोग करके जीव निर्वाण को पहुंच गए हैं उस कारण को तुम उपादेय मानो । जगत् में सब चीजें निस्सार है । एक अपने आपका: जो सहजस्वरूप है उसकी दृष्टि ही एक सारभूत है । बाकी सब असार है । ऐसे कारण के अनुकूल बनो । इस मोह में जिनसे मोह हुआ उनसे कितनी ही तो बातें सुनी, गाली दी, अपमान करते हैं, सब सह लेते हें । उनके अनुकूल ही यह मोही जीव काम करता है । जिस बात में ये खुश हो सकते हैं वैसा ही यह कर रहा है । पर अपने इस चैतन्य महाप्रभु के अनुकूल तो कुछ चलो । यह मेरा भगवान कैसे खुश रह सकता है? कुछ पता हैं? विषयभोगों के प्रसंग में तो यह दुःखी रहता है, क्षुब्ध रहता है, पर इसे कुटेव ने (अज्ञान ने) इस प्रभु की विपदाओं को कुछ नहीं गिना । जैसा मोह का आर्डर हुआ, तैसा ही यह अपने को बना लेता है ।

ये विकल्प, ये विभाव सब जंगल हैं । इनमें भटका हुआ प्राणी लोक में क्लेश ही पाता है, सो वीतराग निजज्ञान स्वभाव के अनुकूल शुद्धआत्मा के अनुभव के अविनाभावी इस वीतराग सम्यक्त्व की भावना करो । श्री कुंदकुंदाचार्यदेव ने भी मोक्षप्राभृत ग्रंथ में निश्छल चारित्र का लक्षण कहा है कि जो उत्तम निजद्रव्य में रहता है; वह नियम से सम्यग्दृष्टिजीव है । यह जीव कुछ न कुछ अपना उपयोग बनाए रहता हैं । मैं शुद्ध सहज ज्ञायकमात्र हूं―इस प्रकार का जिसने उपयोग बनाया वे तो कुछ पार पायेंगे और जिसने पर्यायों को ही यह मैं हूँ ऐसा उपयोग बनाया वह संसार में ही रुलता रहेगा । जो सम्यक्त्व से परिणत पुरुष हैं वे आठ कर्मों का क्षपण करते हैं ।

भैया ! एक कहावत हैं कि कुम्हारी से न जीते तो गधी के कौन मरोड़े । कोई कुम्हार था तो उसकी कुम्हारिन बहुत बातूनी और काम में चतुर थी । कुम्हार की उसके आगे कुछ नहीं चला करती थी । एक बार बातों-बातों में ही दोनो में झगड़ा हो गया । कुम्हार कुम्हारिन से जीत न सका । गुस्सा तो तेज आ ही रहा था सो पास में बंधे हुए गधे के कान जाकर ऐंठ दिया । आखिर अपना गुस्सा तो भजाना ही था । कुम्हारिन पर बस न चला तो गधी के कान मरोड़े । इसी तरह इस मुग्ध आत्मा का अपने आप पर बस नहीं चलता है । जैसा मन ने बहकाया वैसा ही यह बहक जाता है । परपदार्थों की हठ, विकल्प कर रह जाता है । मन में आया कि हमें तो अभी आज ही उड़द की दाल के पापड़ खाना है । तो झट घर में हल्ला मचा दिया कि अभी बनाओ, जल्दी बनाओ । ऐसी ही परद्रव्यों में हठ किए हुए है । अपने आपके मन पर वश नहीं चलता है । किस बात पर गुस्सा हो रहे हो? जरा अपने मन को वश में कर लो । फिर दुनियां में गुस्सा के लायक कोई बात ही न मिलेगी । दूसरों को कुछ सुधारने (परिणमाने) के विचार के एवज में अपने प की अंधार लेने का यत्न करो ।

धनी होने को दुनियावी प्रयोजन तो यह है कि दुनियां को बताना है कि हम ऐसे हैं । लौकिक विद्याओं के पढ़ाने का प्रयोजन तो यह है कि लोगों को बता दो कि मैं ऐसा हो गया हूँ । पर धर्मधारण करने का क्या प्रयोजन निकलता है? दूसरों को यह जाहिर करना है कि देखो मैं ऐसा व्रती हूँ, पुजारी हूँ, धर्म में लगा हुआ हूँ । नहीं, धर्मधारण करने का फल अंतर में गुप्त ही गुप्त होना है । जब हमें कोई बात धर्म के फल में गुप्त ही प्राप्त रहेगी तो फिर धर्म की बनावट-दिखावट से क्या कुछ सिद्धि है? कुछ भी सिद्धि नहीं है । पर पुण्य का उदय है, ठाठ बाट सामने है, सारी व्यवस्थाओं की सुविधा है तो अपनी ही बुद्धि अपनी ही स्वार्थ की साधना में रहते हैं और जैसा मन ने चाहा तैसा दूसरों पर सितम ढाते रहते हैं । कौन समझाने वाला है, इस मोही जीव को? यह अपने आपके मदरस में मतवाला होकर स्वच्छंद, तथा उद्दंड चल रहा है, इसे कौन समझाने वाला है ?

एक कूजड़ी थी । कूजड़ी जानते हो कौन जड़ी? भिंडी की जगह भिंडी, तुरई की जगह तुरई । एक से फल एक जगह रखे हैं । इन्हें किसने जड़ा ? जिसने जड़ा हो वही कूजड़ी । वह बाजार में बैठी थी । साग-भाजी बेच रही थी । कूजड़ी की लड़की भी उसके पास बैठी थी । वहाँ से एक बादशाह निकला तो उसका चित्त हुआ कि शादी तो इस लड़की से होनी चाहिये । बादशाह ने मंत्रियों से कहला भेजा कि कूजड़ी अपनी लड़की की बादशाह से शादी करावे । मंत्रि ने उसे समझाया तो वह कहती है अबे भडुवे के भडुवे ! जा । भड़वा क्या कहलाता है, हमें नहीं मालूम । अगर कोई बुरी बात हो तो हम नहीं समझा सकते । फिर बादशाह ने किसी और मंत्री को भेजा । कहा उस कूजड़ी को समझा दो कि बादशाह तेरी लड़की से शादी करना चाहता है सो कर दे । उस मंत्री के लिये भी उसकी भडुवा-भडुवे की बोली थी । बड़े-बड़े लोगों ने समझाया पर न मानी । एक सिपाही बोला महाराज ! हम तुम्हारा काम बना देंगे । बादशाह ने कहा अच्छा बना दो । सिपाही गया । जाकर कुछ बोला नहीं । कूजड़ी की चोटी पकड़कर घसीटा और लात, घूंसा, मुक्का मारा । कूजड़ी कहती है कि बताओ तो क्या बात है ? जब मरम्मत हो गई तो कहा कि तुझे अपनी लड़की की शादी बादशाह से करानी है । कूजड़ी कहती है कि कोई ‘भडुवा का भडुवा’ ऐसा समझा जाता तो पहले शादी कर देती । मर मुझे यों किसी ने नहीं समझाया । तो नम्र शब्दों में वह कूजड़ी समझने वाली थी क्या ? पुण्य ठाठों से, अच्छी सुविधाओं से क्या यह मन समझने वाला है? इसको तो संकट चाहिए, तकलीफ चाहिए, तब जाकर मन ठिकाने लग सकता है ।

भैया ! सुख से रहें, पैर पसार कर सोवें, दूसरों का उल्लू बनाएं, हमारे तो ठाठ-बाट आराम पूरा है । मरे गरीब । ऐसे आराम से मन को रखा तो यह मन समझने वाला नहीं है । इसको चाहिए काम और काम में आते हैं संकट और संकटों को सहने की हिम्मत हो तो वह पुरुष उन्नति कर सकता है । अन्यथा जो जहाँ है वहाँ से भी नीचे पहुंच जायगा । जो सर्वविकल्पों को भूलकर अपने प्रशस्त आत्मतत्त्व में ही रत रहता है, ऐसा संयम नियम से सम्यग्दृष्टि होता है और निश्चय सम्यक्त्व की परिणति होने से यह सम्यग्दृष्टि जीव इन दुष्ट 8 कर्मों का क्षय कर देता है । इस प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव का वर्णन करके अब मिथ्यादृष्टि जीव का लक्षण बताते हैं―


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