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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 89

From जैनकोष



अप्पा गुरु णवि सिस्सु णवि णवि सामिउ णवि भिच्चु ।

सूरउ कायरु होइ णवि शणवि उत्तमु णवि णिच्चु ।।89।।

सम्यग्दृष्टि जीव किस प्रकार की भावना को करता है, उसका यह सब वर्णन चल रहा है । उस वर्णन में यह चौथी गाथा है । सम्यग्दृष्टि अपने आपको यों जानता है कि यह मैं आत्मा न गुरु हूँ, न शिष्य हूँ, पहले तो यह बात है कि गुरुपना और शिष्यपना यह एक पर्याय है और कल्पना की चीज है । अर्थात् जो समझाने में निमित्त पड़े उसे हम गुरु कहते हैं और ऐसे उस गुरु के उपदेश के वचन के निमित्त से जो प्राणी अपनी समझ बनाता है उसे शिष्य कहते हैं । सो गुरुपना और

शिष्यपना एक पर्याय है । आत्मा कोई एक पर्यायमात्र नहीं है । फिर दूसरी बात यह है कि परमार्थ से न कोई किसी को समझा सकता है और न कोई किसी से समझ सकता है । किसी भी आत्मा में, पुरुष में ऐसी योग्यता नहीं है कि वह अपनी परिणति दूसरे को दे-दे, या दूसरे की परिणति को कर दे । और न किसी में ऐसी योग्यता है कि दूसरे की परिणति को ग्रहण करले या दूसरे की परिणति से अपना काम बना ले । प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है । पूज्यपाद स्वामी ने कहा है कि ‘‘यत्परैः प्रतिपाद्योऽहं यत्परान् प्रतिपादये । उन्मत्तचेष्टितं तन्मे यदहं निर्विकल्पक: ।।’’

मैं दूसरे के द्वारा समझ रहा हूँ, मैं दूसरों को समझा रहा हूँ, ऐसी जो चेष्टा है, बुद्धि है वह पागलों की चेष्टा है । क्योंकि मैं आत्मतत्त्व तो निर्विकल्प हूँ, शुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ । वह न किसी को समझाता है और न किसी से समझता है । फिर भी देखा तो जाता है कि किसी बड़े विद्वान् के निमित्त से समझा जाता है और दूसरों को समझाने का विषय बनाकर कोई किसी को गुरु बोलते हैं । इस निमित्तनैमित्तिक संबंध के कारण व्यवहार से गुरु शिष्य का व्यवहार है, पर परमार्थ से न कोई आत्मा गुरु है और न कोई आत्मा शिष्य है । यह आत्मा अपने में ही तो कल्याण की बाधा करता है । अपने में ही इष्ट और अनिष्ट का ज्ञान करता है और अपने आप में ही अपने आपको हित में लगाया करता है । इस कारण से यह आत्मा स्वयं ही अपने आप गुरु है । इसी को इष्टोपदेश में भी बताया है कि ‘‘स्वयं सदाभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वत: । स्वयं हितप्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मन:।।’’

इस प्रकार गुरु और शिष्य का व्यवहार एक व्यवहार है, उपचार है । पर परमार्थ से कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष को न तो समझा सकता है और न किसी दूसरे पुरुष से समझ सकता है । इसी प्रकार न यह आत्मा मालिक है और न यह आत्मा नौकर है । प्रत्येक प्राणी अपना-अपना परिणाम लिए हुए हैं । अपने विषयकषाय की वृत्ति है । जैसी भी जिसकी योग्यता है वैसा परिणाम लिए है और अपने-अपने परिणाम के अनुसार वह परिणमता चला जाता है । इसमें क्या यह छांट करना कि मैं स्वामी हूँ, यह दास है; अथवा मैं दास हूँ, यह स्वामी है । सब जीव अपनी-अपनी योग्यता से अपना काम करते चले जा रहे हैं । फिर यह सहज आत्मतत्त्व एक चैतन्यशक्तिमात्र है । यहाँ कौन किसका मालिक हुआ? किसे मालिक करार किया जाय? बल्कि जिसे हम मालिक कहते हैं वह बीसों का दास है तब उसका नाम मालिक है । घर में जो मुख्य पुरुष है, जिस पर सारी जिम्मेदारी है, वह घर के बीसों आदमियों का दास है तब मालिक है ।

एक बड़ा कारखाना चल रहा है, उस कारखाने में 100 नौकर काम करते हैं । तो एक दृष्टि से यह देखते हैं कि मालिक इसमें एक है और ये 100 नौकर हैं; किंतु एक दृष्टि से यह भी देखते हैं कि उन 100 का पेट पालने के लिए यह एक नौकर है । दृष्टि बदलकर देखने की बात है । कौन किसका मालिक है? कौन किसका नौकर है? ये तो आजीविका और व्यवहार की पद्धतियाँ हैं । व्यवहार दृष्टि में भी कोई समझता हो कि अमुक से कोई काम करा लेता हूँ तो यह सोचना गलत है। मैं नौकर से अपना काम कराता हूँ, यह सोचना भ्रम है । आप किसी से काम नहीं कराते हैं । ‘‘आपका काम है जानना, इच्छा करना और अपने आत्मा के प्रदेश परिस्पंद कर लेना’’ । इन तीनों को छोड़कर आपका कोई काम नहीं है । सर्वत्र बाह्यवृत्तियों में आप जानते हैं या कोई इच्छा कर डालते हैं व अपने प्रदेशों में प्रदेशों का हलन चलन कर लेते हैं । इसके अतिरिक्त आपका कोई काम नहीं है । बाहर में किसी काम को यदि यह मान लेता है कि मैं यह काम करता हूँ तो ‘‘मैं यह काम करता हूँ,’’ इस प्रकार के अभिप्राय मात्र को वह करता है; काम को नहीं करता ।

जैसे एक सुनार सोना-चांदी पीटकर कोई गहना गढता है तो यह बतलाओ कि क्या सुनार बनाता है? यदि आपको चांदी न दिखे कोई ऐसी औषधि लगी हो कि आपको चांदी न दिखे तो आपको वह हाथ चलाता हुआ, पसीना बहाता हुआ, हांफता हुआ वह पुरुष नजर आयगा । उस स्थिति में आप यह देख रहे होंगे कि यह सुनार केवल अपना परिश्रम कर रहा है, गहने को नहीं बना रहा है । और कभी वह सुनार कोई अंजन गुटिका दबाये हुए या कोई ऐसी औषधि लगाए हुए काम कर रहा हो तो आपको सुनार न दिखेगा, पलटती; लेटती बिखरती चांदी की डली ही दिखेगी । स्पष्ट नजर आ रहा होगा कि यह चांदी की डली, इस प्रकार का परिणमन कर रही है । इसको करने वाला कोई नहीं है । और ज्ञानदृष्टि से आत्मा को भी देखते जाओ, कुछ हानि नहीं है । मगर सुनार की चेष्टानुसार में ही हो रही है, गहने में नहीं हो रही है । सुनार अपने श्रम को ही करता है, किसी अन्य को नहीं करता है । इसी प्रकार जिसे हम कहते हैं मालिक, तो वह मालिक केवल अपने श्रम को करता है, वह दास का कुछ नहीं करता । जिसे हम कहते हैं दास; वह लेवल अपना काम करता है, मालिक का काम नहीं करता है ।

भैया ! सर्वत्र देख लो । कोई पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ का काम नहीं कर सकता । जब यह स्थिति है तो आप किसे तो मालिक कहेंगे और किसे दास कहेंगे? यह कल्पना की बात है । मान लिया कि मैं स्वामी हूँ, पर स्वामी बन नहीं गए । किसी ने मान लिया कि मैं दास हूँ, भृत्य हूँ, पर वह आत्मा दास नहीं हो गया । यह तो एक परिणति को अपेक्षा बात कहीं है । अब जरा आत्मा के स्वभाव की दृष्टि करके देखो । यह मैं खालिस आत्मा, केवल आत्मा अर्थात् मात्र में ही होऊँ, मेरे साथ दूसरा कोई नहीं लगा हुआ है । ऐसी स्थिति में यह मैं किस प्रकार का हूं? इस पर दृष्टि डालो। यह तो अभी शरीर लगा है । मन वचन काय की चेष्टा करते हुए में अपनी कुछ बात बताना यह तो संयोगदृष्टि की बात है । ‘‘केवल खालिस, प्यौर अपने को देखो कि मैं कैसा हूं? मैं शुद्धज्ञानस्वरूप हूँ ।’’ इसमें कर्मों का लगाव नहीं है । शरीर का इसमें लगाव नहीं है । फिर रागादिक का भी लगाव नहीं है । यह तो अपने सत्व के कारण अपने स्वरूप की वजह से स्वयं ही एक चित्स्वरूप है । इसमें न स्वामी का भेद है और न दास का भेद है । स्वामी का भी कौन भृत्य होता है और भृत्य का भी कौन स्वामी होता है? आज यह स्वामी है मरण के बाद कहो, ऐसी पर्याय पाये कि उस भृत्य का भी दास बनना पड़े, तो अगले भव में यह दास हो गया । अगले भव की बात छोड़ो, इस ही भव में दास हो सकता है ।

कोई पुरानी घटना है कि एक अंग्रेज था । तो उसने बहुत बार लाट्री डाली । 10 रुपये की लाट्री डालो 2 लाख देते हैं, 1 लाख देते हैं । ऐसा एक तमाशा बना हुआ था । इस तरह से वह बहुत से रुपये खो चुका, पर उसको मिला कुछ नहीं । एक दिन ऐसी धुन बन गई कि जो यहाँ का चपरासी है उसके नाम लाट्री डाल दें । सो चपरासी के नाम से 10 रुपये डाल दिए । कुछ समय बाद ऐसा हुआ कि उसके नाम लाट्री निकल आई 2 लाख रुपये की । अब वह अंग्रेज सोचता है कि इस तुच्छ विचार वाले को यदि दो लाख रुपये दिए देते हैं तो देखते ही हर्ष के मारे अपने प्राण गँवा देगा । तो उस अंग्रेज ने चपरासी को बुलाया और उसके कुछ बेंत लगाए, उसे दु:खी किया, पीड़ित किया और दुःख की स्थिति में बताया कि तेरे नाम 2 लाख रुपये की लाट्री आई है । उसको देने लगा । वह चपरासी कहता है मालिक मैं इस रुपये को क्या करुँगा? मैं इसकी व्यवस्था करना, धरना जानता नहीं । तो आप ही इन्हें संभालिए, सो उसने 2 लाख रुपये की कोई कंपनी खोली, उस कंपनी में ही वह काम करने लगा । अब बतलाओ स्वामी कौन है? वह चपरासी मालिक है या वह स्वामी मालिक है? अरे ! वह स्वामी तो हो गया दास और वह चपरासी हो गया मालिक ।

भैया ! यहाँ तो किसी माने हुए काम को मिल-जुल कर करने की बात है किसी काम को मालिक कर सकता है, किसी काम को दास कर सकता है । पर किसी उद्देश्य के लिए दोनों का सहयोग आवश्यक है, सो मिल कर अपना काम करते हैं । तो वास्तव में यह आत्मा न स्वामी है, और न भृत्य है । इसी प्रकार यह आत्मा न शूर है और न कायर है । आत्मा के स्वभाव में यह काल्पनिक बल नहीं है । दो मन का बोझ उठा लिया तो उसे लोग क्या कहेंगे? बलवान कहेंगे और अगर 3 मन का बोझ उठा लिया तो उसे लोग क्या कहेंगे? बलवान । और अगर 10 मन का बोझ उठा लिया तो उसे लोग क्या मानेंगे? बलवान । तो यह मनुष्य बेचारा बीस सेर का भी बोझ नहीं ले जा सकता है और भैंसा कई मन का बोझ ढोता है । तो उससे बलवान हो गया भैंसा । बलवान होना, श्रेष्ठ होना, उत्तम होना एक ही बात है । तो स्वभाव में शरीर का बल नहीं है । शरीर का बल तो आत्मबल का विकार है । वह शरीर बल के रूप में फूट निकला है ।

इसी प्रकार आत्मा कायर भी नहीं है । कायरता, डरपोकपना, भयमीतता; ये सब विकार हैं । ये आत्मा के स्वभाव नहीं हैं । आत्मा तो शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप है । यह न वीर है, न कायर है । इसी प्रकार यह आत्मा न उत्तम है और न नीच है । आत्मा के स्वभाव को देखो । पर्याय को निरख-निरख कर तो अब तक हम संकटों से सुलझ नहीं पाये । जगत् के जीवों को पर्यायदृष्टि से निरखा कि ये अमुकचंद हैं, ये अमुक प्रसाद हैं, ये अमुक दास हैं, ये ऐसे हैं, मैं ऐसा हूँ । ऐसा निरखने से तो वह बूटी नहीं पाई जा सकती, वह कला नहीं पा सकते, जिस कला के प्रसाद से कर्मनिर्जरा होती है । सम्यग्ज्ञान का बड़ा महत्त्व है । ये सब ऐसे समागम मिले हैं जिन्हें कह सकते हैं कि इनसे मूंड़ मार रहे हैं, सिर पीट रहे हैं, उनमें ही चिपट रहे हैं, इनके फल में कुछ मिलेगा नहीं । अंत में यह अहाय अकेला का अकेला ही रहेगा । विकल्प पाप भावों को करके कर्मबंध और किया, और अंत में यह अकेला ही चला जायगा । जिसको दिखाने के लिए अपनी धन कमाने की कला खेली, और-और प्रकार की कलाएं खेली वे एक भी साथी न होंगे । वे इस जीवन में ही साथी न होंगे । मरकर तो साथी होंगे ही क्या?

भैया ! विवेक यह है कि दुनिया को देखकर बह न जाना । ‘‘अपने हित का साधन बनाना’’ । मुझे जरूरत नहीं है कि 10 आदमी कहें कि यह लखपति है । हां, भगवान् आकर कह दें मुझे कि तुम लखपति हो तो मैं अपने को धन्य मानता हूँ । पर पापी मोहीमलिन संसारचक्र में भ्रमण करने वाले लोगों के मुख से मैं ऐसा लखपति हूँ, अमुक हूँ, इतनी बात सुनकर अपने को धन्य मानना चाहते हो तो समझ लो कि पूरा कुछ न पड़ेगा । रास्ता चलते-चलते यदि कहीं यह ख्याल आ गया कि मालूम होता है कि हम रास्ता भूल गए हैं तो उस समय हमारा कर्त्तव्य है कि उसी जगह बैठ जाएँ, आगे न बड़े, बल्कि कुछ पीछे मुड़े । और संशय हो तो उसी जगह बैठ जाएं । बाट देखें, कोई मुसाफिर मिले तो उससे बात पूछें । यदि हम पूछेंगे नहीं और बढ़ते ही चले जावेंगे तो परिणाम क्या होगा कि भूल बढ़ती चली जावेगी । हम-आप सबका हाल यह है कि वन टू आल सभी तो विपत्तियों में फंसे हैं । इतना सुंदर क्षण व्यतीत कर डाला है और अपने आत्मस्वरूप का परिचय नहीं किया है । उस आत्मस्वरूप की कोई परवाह नहीं करते ।

भैया ! ऐसी अपनी अंतःज्ञानकला तो पा लो कि इन 24 घंटों में दो मिनट तो अपने सहज शुद्ध ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व की दृष्टि कर लें । एक आध मिनट भी अपना यह काम कर सकें तो बाकी 23 घंटे और 59 मिनट का जो उपयोग बिगड़ता है उस पर भी काबू पा लिया जाता है । अनंतकाल से कर्म बनते चले आए हैं और एक सेकंड के खोटे परिणाम में ही कहो 70 कोड़ाकोड़ी सागर का मोहनीय कर्म बंध जाय; कितना लंबा काल होता है जिसका बयान नहीं किया जा सकता है । एक सेकन्ड के दुर्भाव की गलती में 70 कोड़ाकोड़ी सागर कर्म बन गए हैं । कितना होता है 70 कोड़ाकोड़ी सागर का समय? इसकी जानकारी में मूल से चलिए । कल्पना करलो कि 2 हजार कोस का लंबा-चौड़ा गड्ढा है (कल्पना से ही जाना जा सकता है, कोई गिन नहीं सकता है) इसे कल्पना में बता रहे हैं । कल्पना करो, इतने बड़े गड्ढे में बालों के छोटे-छोटे टुकड़े जिनका दूसरा हिस्सा न हो सके, उस गड्ढे में ठूंसकर खूब भर दो और फिर बाद में उस पर हाथी चला दो (यह समझाया जा रहा हैर कि इतना लंबा काल होता है) और जो बाल उस गड्ढे में भरे जायें वे कौन हों? 7 दिन के जन्मे हुए मेंढ़ेके हों । वे भी उत्तम भोगभूमि के जन्म के हों । उस गड्ढे में उन बिल्कुल बारीक बालों के नन्हें-नन्हें टुकड़े भर दो । कर्म-भूमि से भोगभूमिज के बाल पतले होते हैं । इसे मनुष्य के माध्यम से सुनें । कर्मभूमि के मनुष्य के बाल जितने मोटे होते हैं उसका 8वां हिस्सा पतला पड़ेगा जघन्य भोगभूमि के मनुष्य का बाल । मायने जघन्य भोगभूमि के मनुष्य के 8 बाल बराबर हमारे आपके बाल हैं । और उसका भी 8वां हिस्सा पड़ेगा मध्यम भोगभूमि के मनुष्य का और उसका भी 8वां हिस्सा है उत्तम का और उसमें भी और पतला बाल होगा मेंढ़े का । मेंढ़े का बाल बहुत बारीक होता है ।

तो कल्पना भी ऐसी करो कि जो तनिक सुहाती जाय । विषय रूक्ष है । अब 100 वर्ष में 1 बाल निकालो । उस गड्ढे में जितने बाल पड़े हैं उन सबको निकाल सको जितने समय में उतने वर्षों का नाम है व्यवहार पण्य । फिर उसका असंख्यातगुणा समय है उद्धारपल्य । फिर उसका असंख्यातगुणा समय कहलाता है 1 अद्धापल्य । ऐसे 10 करोड़ अद्धापल्य हो जाएं तो उसे कहते हैं एक सागर काल । ऐसे एक करोड़ सागर में एक करोड़ सागर का गुणा किया जाय, वह जितना हो उसे कहते हैं एक कोड़ाकोड़ी सागर । ऐसे ही 70 कोड़ाकोड़ी के सागर की स्थिति को लिये हुए कर्म बंध जाते हैं आधे सेकंड के तीव्र मोह में । यह तो आधे सेकेंड की बात बताई । यहाँ तो 24 घंटे यही कमाई हो रहीं है । लाखों कोड़ाकोड़ी सागरों के कर्म बांधते चले जा रहे हैं । इतना कर्मों का भार लद गया ।

अब घबड़ाओ नहीं, देखो―जैसे कूड़ा कागज कपड़ों का एक 20-25 फुट का ढेर लग गया है और उसको कहा जाय इसे फेंको, साफ करो तो कितना समय लगेगा? लगभग 1 महीना लगेगा । और चतुर आदमी क्या करेगा कि एक सींक जलाकर छुआ देता है―तीन चार दिन में ही जलकर सब स्वाहा हो जाता है । ऐसे ही करोड़ों भवों के बांध हुए कर्मजाल हम आप पर लदे हैं, उन्हें उठा-उठाकर कैसे फेंके? इसे धीरे-धीरे कैसे निकालें? इनके विनाश का तो एक ही उपाय है कि शुद्धज्ञानरूप आग की कण छुआ दें तो करोड़ों जन्मों का यह कर्मों का ढेर क्षणमात्र में ही भस्म हो जायगा । ऐसी है अपने सत्य ज्ञान की कला ।

भैया ! यह? जीव कर्मोदय का निमित्त पाकर कोई लोकमान्य कुल वाला कहलाने लगेगा तो कोई निंद्य कुल वाला कहलाने लगेगा । ? इसलिए हम अपने आत्मा की उत्तम नींव की व्यवस्था करें । यह तो कर्मविपाक का नाटक है । इस नाटक के अंदर भी यह आत्मा शुद्ध चैतन्यस्वरूप शाश्वत विराजमान है, उसकी दृष्टि नहीं की जाती है और ईंट-पत्थर के पुद्गलों में ही सब बस गए हैं । कितना बड़ा संकटों का मार इस जीव पर लद गया है । यह व्यर्थ का भार एक मिनट को भी इससे नहीं हट सकता है । यह आत्मा न उत्तम है और न नीच है । यह तो शुद्ध चैतन्यमात्र है ।

अच्छा भैया ! एक यही बात बतलाओ कि यह आत्मा रागसहित है कि रागरहित है? आत्मा को रागसहित तो कह नहीं सकते, क्योंकि डर लग रहा है कि कहीं राग चिपटन बैठे? रागसहित तो आप बोल नहीं रहे हैं । राग जीव का स्वरूप नहीं है, स्वभाव नहीं है । ऐसा आत्मा रागसहित नहीं है । मगर आत्मा रागरहित भी नहीं है । अर्थात् रागरहित कह दिया तो इससे क्या बिगड़ गया सो बतलाओ? दृष्टि में आए क्या? रागरहित आत्मा में राग नहीं है, राग नहीं है आत्मा में । इस कथन में इसको अपनी दृष्टि में विधिरूप क्या लिया गया, क्या ग्रहण किया गया? इसलिए आत्मा का स्वरूप न रागरहित है और न रागसहित है किंतु वह तो चैतन्यस्वरूप है । यह दृष्टि वस्तु के स्वरूप को ग्रहण करती है । यह भींत है ना, सामने, बताओ यह भींत काली है या कालेपन से रहित है? यह भींत कृष्णता से सहित है या रहित है? पदार्थों को विधिरूप से जानो, निषेधरूप से पदार्थों को जान नहीं सकते । निगेटिव और पोजिटिव । निषेध से कुछ ग्रहण न आयगा, विधि से ग्रहण आयगा । आत्मा में मल नहीं है, तो आत्मा को मलरहित देखो । रागसहित और रागरहित देखने में तुम्हारे हाथ कुछ आयेगा नहीं, किंतु एक चैतन्यमात्र निरखने में, ज्ञानमात्र निरखने में आपको एक ज्ञान का अनुभव जगेगा । जहाँ ऐसे स्वरूप की बात चलती हो वहाँ ऊँच-नीच की बात कहें, यह तो कोई दमदारी की बात नहीं है । सो गुरु शिष्य आदिक संबंध यद्यपि व्यवहारनय से जीवस्वरूप हैं तो भी शुद्ध निश्चय से देखा जाय तो परमात्मद्रव्य से भिन्न हैं, हेयभूत हैं ।

‘‘ये जीव शुद्ध निश्चयनय से केवल अपने स्वरूपमात्र हैं,’’ चैतन्यस्वरूप है, किंतु अपने इस शुद्ध आत्मस्वरूप की दृष्टि से चिगे हुए हैं तो अपने को नानारूप रागादिरूप अनुभव करते हैं और जिस चाही अवस्था को अपने से संबद्ध कर लेते हैं । अज्ञानी जीव अपने को गुरु माने, शिष्य माने, स्वामी माने, नौकर माने, शूरवीर माने, कायर माने; ‘‘पर सम्यग्दृष्टिजीव अंतरात्मा, चूँकि उसे अपने शुद्ध एकाकी ज्ञानज्योतिस्वरूप आत्मतत्त्व का’’ अनुभव हो चुका है, इस कारण वीतराग निर्विकल्प समाधि में स्थित होते हुए इन सभी बातों को परस्वरूप जानता है । अब आगे यह बतलाते हैं कि यह मिथ्यादृष्टि जीव अपने का और किस-किस प्रकार रूप में मानता है?


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