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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 92

From जैनकोष



पुण्णु वि पाउ वि कालु ण हु धम्माधम्मुवि काउ ।

एक्कुवि अप्पा होई णवि मेल्लिवि चेयण भाउ ।।92।।

यह आत्मा पुण्यरूप भी नहीं, पापरूप भी नहीं काल, आकाश, धर्म, अधर्म और शरीर इत्यादि रूप भी यह आत्मा नहीं । यह अपने चैतन्यस्वरूप को छोड़कर इन अन्य रूपों में नहीं जाता है । कितनी चीजों को मना किया है । पुण्य, इसका भी संबंध आत्मा से कितना निकट है । एक तो पुण्य आत्मा के निकट है और पुण्य के उदय से उत्पन्न हुए जो भी विभाव हैं वे विभाव भी इस जीव के निकट हैं । किंतु केवल जीव के स्वरूप को देखो तो जीव के दोनों भी पुण्य नहीं है । जैसे 10 सेर पानी में पाव भर मिट्टी का तेल डाल दो तो वह मिट्टी का तेल उस पानी में खूब फैल जाता है । तब भी तेल में पानी नहीं गया और पानी में तेल नहीं गया । उन तेल और पानी दोनों में सम्मिश्रण नहीं हो पाता है । ये पुण्य भी उसी क्षेत्र में है और यह जीव भी उसी क्षेत्र में है फिर भी

पुण्य का और जीव का पर में सम्मिश्रण नहीं होता है । इसी प्रकार पाप कर्म की बात है ।

आकाश आदिक द्रव्य रूप भी यह आत्मा नहीं है । जिस जगह आत्मा है उस जगह समस्त द्रव्य हैं न लोक का कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं बचा जहाँ छहों द्रव्य न हों । जीव भी मिलेगा, पुद्गल धर्म-अधर्म आकाश काल भी वहीं मिलेगा । बाहर कुछ नहीं है । फिर यह जीव द्रव्य उनमें संकर नहीं होता है, मिलता नहीं । प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप में आकर अपना अस्तित्व लिए हुए हैं । यह जीव बाहर में दृष्टि न डाले तो सुरक्षित ही है । समुद्र के अंदर रहने वाले जलचर जीव सब सुरक्षित हैं । अपनी तह से ऊपर उठकर समुद्र के ऊपरी हिस्से पर आते हैं या पानी से ऊपर मुँह निकालते हैं तो उन्हें अन्य जीव उपद्रवित करते हैं । उन उपद्रवों से बचने का एकमात्र सुगम उपाय यह है कि वह समुद्र में डूब जायें ।

‘‘यह आत्मा अपने ज्ञानसरोवर में ही डूबा रहे, अपने उपयोग को अपने स्वरूप में पाता रहे तो वहाँ एक भी संकट नहीं है ।’’

सम्यग्दृष्टि जीव अपने को निर्भार अनुभव करता है । उसमें इतना साहस है कि वह कितना भी कमा ले पर सबको छोड़ने में उसे 2 मिनट का भी विलंब नहीं होता । और न भी छोड़ सके तो वह अपनी श्रद्धा में जब भी ज्ञान संभाले तब समस्त पदार्थों को अपने उपयोग से वह तुरंत छोड़ सकता है । ऐसा ज्ञान में अद्भुत बल है, जिस बल के प्रताप से सारी स्थितियों में यह अपने आनंदस्वरूप का अनुभव करता है । व्यवहारनय से आत्मा से अभिन्न ये सब पुण्य-पाप की बातें हैं, किंतु शुद्ध निश्चयनय से ये भिन्न है, हेयभूत है । पुण्य पाप, धर्म-अधर्म आदि भावों को यह बहिरात्मा जो राग में रंगा हुआ है, अपना मानता है और उन्हीं का यह अंतरात्मा त्याग करता है। इनसे मैं रहित हूँ, इस प्रकार की भावना करके अपने शुद्ध आत्मद्रव्य में अर्थात् केवल आत्मा के स्वरूप में अपना विश्वास किए हुए है कि यही मैं हूँ । अपना ज्ञान और रमण किए हुए है ऐसा अभेदरत्नत्रयरूप स्वयं परम समाधि में स्थित होता हुआ यह अंतर आत्मा, कार्य समयसाररूप शुद्ध आत्मा हो जाता है ।

भैया ! यह जो महाधिकार चल रहा है इसमें तीन प्रकार की आत्माओं का वर्णन है । बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा? जो शरीर और आत्मा को एक समझता है, वह बहिरात्मा है । जब शरीर को समझ लिया कि यह मैं हूँ, तो इस रिश्ते के मूल पर सर्व जड़ पदार्थों को भी समझता है कि यह मेरा है । जो देह को भी अपना न मानता हो वह पर को कैसे समझ लेगा कि यह मेरा है? देह मैं नहीं हूँ, इसे अंतरात्मा ही जानता है । अर्थात् आत्मा को सहज शुद्ध चैतन्यस्वरूप का जिन्हें अनुभव हुआ है और जानते हैं कि यह मैं एक हूँ और उस एक के लिए ही सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं । एकस्वरूप आत्मा में जिसका श्रद्धान है वह अंतरात्मा कहलाता है । अंतरात्मा होना एक ऐसा उपाय है, माध्यम है कि जिसके बाद बहिरात्मापन का त्याग स्वयं हो जाता है और परमात्मा बनने का उपाय चालू हो जाता है । सार किन्हीं भी बाह्य पदार्थों के झुकाव में नहीं है । किन पदार्थों में हम झुके? कौन पदार्थ मेरे लिए शरण हैं? ‘‘किसी जीव का भरोसा रखा तो क्या वह पूरा पाड़ देगा ? वे अपने विषय-कषायों के स्वार्थ के साथी हैं । जैसा कि मैं भी स्वार्थी हूँ । इसी प्रकार जगत के सब जीव स्वार्थी हैं।’’

दो मित्र थे । साथ-साथ स्वाध्याय करते थे । उन दोनों में यह तय हुआ कि जो भी पहले मरे और मरकर देव बन जाय तो वह दूसरे को संबोधने के लिए अवश्य आए । उनमें एक मर गया, देव बन गया, तो उस मित्र को आया संबोधने, देखो ! हम देव हो गए हैं । हम तुम्हें संबोधने आए हैं । मोह न करो, आरंभ परिग्रह से दूर होओ, अपनी आत्मसाधना में ही लगो । तो वह कहता है कि वाह ! मेरे बड़े आज्ञाकारी पुत्र हैं, बड़ी विनयशील स्त्री है, माता-पिता मुझे हृदय से प्यार करते हैं, कैसे इनका छोड़ना होगा? क्यों छोड़ा जाय? तो वह देव बोलता है कि अच्छा कल के दिन 12 बजे तुम बीमार पड़ जाना, पेट दर्द का बहाना कर लेना―फिर हम सब बता देंगे । वह दूसरे दिन बीमार पड़ गया । सो यहाँ के वैद्य बुलाए गए । पर किसी से ठीक न हुआ । वह देव भी वैद्यरूप रखकर सड़क पर डोलता हुआ यह कहता है कि मेरे पास अमुक-अमुक रोग की पेटेंट दवाएँ हैं । उसे भी बुलाया । कहा―हमारे भैया को अच्छा कर दो । कहा बहुत ठीक । यहां-वहां कुछ देखकर बोला―एक कांच का गिलास लाओ और उसमें स्वच्छ पानी लाओ । कांच के गिलास में स्वच्छ पानी आ गया । उसमें थोड़ी राख मिलाकर कुछ मंत्रसा पढ़ दिया और माँ से बोला कि तुम इस दवा को पी जाओ । माँ कहती है यह दवा तुम उस रोगी को क्यों नहीं पिलाते? हमारे पी लेने से उसका रोग मिटेगा क्या? तो वह देव बोला कि यह दवा तंत्र-मंत्र सिद्ध है । इसको जो पी लेता है वह तो मर जाता है और रोगों बच जाता है । माँ सोचती है कि मेरे तो चार लड़के हैं । यदि एक न रहा तो न सही । यदि मैं ही मर गई तो अभी जो तीन बच्चे हैं उनका सुख न देख सकूंगी । उसने मना कर दिया । पिता से दवा पीने को कहा तो उसने भी यही कहा । स्त्री से कहा तो वह सोचती है कि मेरे तो 5 लड़के हैं । यदि यह पति मर गया तो इन 5 बच्चों का सुख देखूंगी और यदि मैं ही मर गई तो मेरे लिए तो सब स्वाहा है । उसने भी मना कर दिया। तब वह वैद्य कहता है, तो क्या मैं दवा पी लूँ? सब बोले हाँ, हाँ पीलो । घर के सभी लोग खुश हुए और बोले वैद्यजी आप तो दया के निधान हो । वैद्य ने सबसे कहा जाओ, मैं पी लूँगा । जब चले गए, तब, उसके कान में फूंका । क्या कहते थे आप, कि मेरी स्त्री बड़ी विनयशील है, माँ, बाप बड़ा प्रेम करते हैं, बच्चे आज्ञा का पालन करते हैं? तब उसने कहा, हाँ, हुआ ज्ञान ।

तो कौन किसका क्या कर सकता है? सब अपने-अपने स्वार्थ-विषय की वासना में रहकर अपनी-अपनी चेष्टा करते हैं । यह अंतरात्मा अपने अंतरतत्त्व को जान रहा है और उस सम्यग्ज्ञान के प्रताप से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ रहा है । मिथ्यादृष्टि की और सम्यग्दृष्टि अर्ंतवृत्ति में बड़ा अंतर है । ‘‘सम्यग्दृष्टि तो पिंड छुड़ाने के लिए भोग भोगता है और मिथ्यादृष्टि भोगों को चाह करके भोगता है । जैसे घर में स्त्रियां चक्की पीसती हैं तो बड़े प्यार से पीसती हैं, गा, गा करके पीसती हैं, और कोई स्त्री अगर जेल चली जाय तो वहाँ क्या वह प्यार से पीसती है? नहीं । भैया ! स्त्रियां भी तो जेल जाती हैं । क्या पुरुष ही जेल जाते हैं? स्त्री, पुरुष सभी जेल जाते हैं । तो वहाँ चक्की पीसने को दे दी जायतो क्या प्यार से पीसती हैं? नहीं । वहाँ तो भुगतना जानकर पीसेगी।

भैया ! सम्यग्दृष्टि की जेल में रहने वाले कैदी की जैसी हालत है । सम्यग्दृष्टि बुरी हालत में भी फंसा रहे तो भी उसका ज्ञान जाग्रत रहता है । और मिथ्यादृष्टि जीव वासना से विषयों को भोगता है, प्रीतिपूर्वक विषयों को भोगता है। ‘‘सम्यग्दृष्टि अपने अंतर में अपना पोषण करते हुए संवर और निर्जरा करता जाता है’’ और मिथ्यादृष्टि जीव अपनी पर्यायों को लपेटता हुआ पर्यायबुद्धि करके अपने आपको कर्मबंध से लिप्त करता है । तो अंतरात्मा ही ज्ञानभावना के बल से कर्मों को दूर करता है और यही शुद्ध दशा अंगीकार करके ज्ञानभावना में रत होकर अपने को मुक्त कर लेता है और वहाँ अनंतकाल तक के लिए शाश्वत, स्वाधीन, सहज आत्मानंद को भोगता है ।

भैया ! सम्यग्दृष्टि की भावना शुद्ध भावना होती है । पंडित बनारसीदास ने तो सम्यग्दृष्टि की ऐसी उज्ज्वलता का वर्णन करके आत्मसमर्पण किया है, उन्हें जिनेश्वर का लघुनंदन बताया है । वह ज्ञानी पुरुष न योगी है, न गृहस्थ है, न भोगी है, न त्यागी है; उसकी कला को कौन समझे? कोई मिथ्यादृष्टि, सम्यग्दृष्टि की होड़ करके तप, व्रत, कायक्लेश आदि में बहुत ऊँचा वर्त करके चले तो क्या सम्यग्दृष्टि की होड़ हो सकती है? नहीं । तो यह ज्ञान ही हमें संकटों से दूर करता है और परमात्म रस के निकट ले जाता है । इस कारण अंतरात्मा बनकर बहिरात्मत्व को छोड़ो और परमात्मत्व को धारण करो ।

यहां तक इस प्रथम महाधिकार में बहिरात्मत्व के त्याग के कारणभूत व परमात्मत्व की प्राप्ति के कारणभूत अंतरात्मत्व को बताया गया है । इस अंतिम दोहे में मिथ्यादृष्टि की भावना से विपरीत सम्यग्दृष्टि के विचार को कहा है और इस बोध के साथ यह प्रथम महाधिकार समाप्त होता है । इसके बाद इसी का विशेष विवरणरूप कथन अब आगे चलेगा ।


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