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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 98

From जैनकोष



अप्पा णियमणि णिम्मलउ णियमें वसइ ण जासु ।

सत्थपुराणहँ तवचरणु मुक्खु विकरहिं किं तासु ।।98।।

आत्मा की निर्मलता जिसके चित्त में नियम से नहीं ठहरती, उसके चित्त में शास्त्र, पुराण, तपस्या आदि भी निरर्थक हैं । वीतराग निर्विकल्प समाधिरूप शुद्ध आत्मा की भावना जिसके चित्त में नहीं है उसके शास्त्र, पुराण, तपस्या; ये निरर्थक होते हैं । आनंद मिलता है तो वह अपने परिणामों से मिलता है और आनंद भी किसी दूसरे को क्या विदित हो सकता है । खुद को खुद ही अनुभव करता है । जैसे किसी के बेटे का विवाह हो तो विवाह के अवसर में लड़के की माँ बहुत व्यस्त रहती है । उसे सोने तक का भी समय नहीं मिलता है । अब यह करना है, अब वह करना है । मारे श्रम के पसीने से लथपथ हो रही है । उस मौके पर पड़ौस की स्त्रियाँ गाने के लिये बुलाई जाती है ना, सो वे बड़ी तेजी से गाती हैं और हँस-हँस कर, मुँह से मुँह मिलाकर वे परस्पर में गाती हैं । मेरे दुल्हा सरदार, राम-लखन सी जोड़ी, आदि खूब चिल्ला-चिल्लाकर हंस-हंस कर गूँज देती हैं । मगर यह तो बतलाओ कि भीतर में आनंद उसकी माँ को है कि उन पड़ौस की स्त्रियों को है? उसकी माँ को है । यदि दुल्हा घोड़े से गिर जाये और टाँग टूट जाये तो उन पड़ौस की स्त्रियों को क्या अपार दु:ख होगा? नहीं । वे तो 1।। छटांक पतासे के लिए आई हैं । दुःख होगा तो लड़के की माँ को होगा ।

भैया ! ऊपरी व्रत, तपस्या और भेष से यह निर्णय नहीं हो सकता कि यह पुरुष आध्यात्मिक है, मोक्षमार्गी है, मोक्ष को जाने वाला है । जो आध्यात्मिक है, जिसकी दृष्टि अपने स्वभाव को छू सकती है उस पुरुष के जौहर का लोगों को पता क्या? पता हो या न हो । उस दिखावे से लाभ क्या? अपना मन पवित्र है, अपनी चर्या शुद्ध है, अपने आपके स्वभाव की दृष्टि है तो यह आत्मा मोक्षमार्गी है । अब उसे किसी बात की चिंता नहीं । और एक अपने आपका ही मन शुद्ध नहीं है, तो वहाँ ये सब तपस्यायें व्यर्थ हो जाती हैं ।

एक जंगल में लकड़हारे को एक साधु मिला । सो लकड़हारे ने कहा, महाराज हमें कोई शिक्षा दे दो । कहा, तू हर जगह ‘णमो अरहंताणं’ बोला कर । या णमो अरहंताणं में बहुत मर्म और रहस्य है । अरहंत किसी व्यक्ति का नाम नहीं है । जो आत्मा रागद्वेषरहित हो गया, उसको अरहंत कहते हैं । उन्हें ही पूज्य, उत्कृष्ट व योग्य कहते हैं । तू हर जगह ‘णमो अरहंताणं’ बोला कर । लकड़हारा घर चला गया । स्त्री कहती है कि आज लकड़ी नहीं लाए तो वह कहता है णमो अरहंताणं । अब कल तो लाओगे? बोला, णमो अरहंताणं । फिर दूसरा दिन आया, वह अपनी धुन में मस्त था । नहीं गया लकड़ी लाने । स्त्री बोली, लकड़ी लाने नहीं गये? बोला, णमो अरहंताणं । बच्चों को क्या खिलाओगे? णमो अरहंताणं । दो दिन हो गए । तीसरा दिन हुआ । अब उसने खीर बनाई थी । खीर बनाकर वह बुलाती है । खीर बन गई है । आओ, खाओ । पहुंच गया । स्त्री ने फिर पूछा, तुमने सब काम छोड़ दिया? तो बोला―णमो अरहंताणं । उसके आया गुस्सा तो चूल्हे की जलती हुई, अधजली लकड़ी मारी सिर पर । भाग्य की बात कि उस लकड़ी के टूटने से 10-20 मोती खिर गए । अब वह मालामाल हो गया । उसके घर से लगा हुआ घर था, सेठ का । उस घर की सेठानी ने लकड़हारे की स्त्री से पूछा कि तुम्हारे पति तो लकड़ी बीनते थे । मालामाल कैसे हो गए? कहा―सुनो कहानी । दो-तीन दिन न जाने क्या बात हो गई थी कि उनसे काम करने को कहें तो वे कहें णमो अरिहंताणं । मैंने एक दिन खीर बनाई । स्त्री बहुत धीरे स्त्री से बात करती है तो समझो कि कोई बहुत बड़ी बात होगी । उसने बहुत धीरे से कहा―अच्छा सुनो, मैंने एक दिन खीर बनाई । वे खीर खाने आए और बैठ गए । तब हमने कहा कि तुमने सब काम छोड़ दिया । सो उन्होंने कहा ‘णमो अरहंताणं’, तो मैंने एक अधजली लकड़ी सिर पर मारी । वह लकड़ी टूट गई और उससे मोती खिर गए । सेठानी ने सोचा कि यह तो धनी होने का बड़ा सुगम उपाय है । सो सेठानी ने सेठ से कहा कि सुनो सेठजी, तुम धन कमा-कमाकर मरे जा रहे हो । हम तुम्हें ऐसी अक्ल बताएं कि तुम्हारे दो दिन में करोड़ों रुपये हो जायेंगे । कहा―अच्छा बतलाओ । कहा―कल के दिन हम बनायेंगी खीर । सो तुम्हें खाने के लिए बुलायेंगी कि आओ खीर खा जाओ और तुम आ जाना । हम तुमसे कुछ भी कहें तो यही कहना ‘णमो अरहंताणं’ । फिर देखना मोती ही मोती बरसेंगे । दूसरे दिन सेठानी ने खीर बनाई । सेठजी खीर खाने आ गए । सेठानी ने कहा―देखो, तुमने हमें करधनी नहीं बनवाई? तो सेठजी कहते ‘णमो अरहंताणं’ । सिखा दिया था । सो अधजली लकड़ी उठाई और सिर पर दे मारी । लकड़ी टूट गई पर मोती एक भी न गिरा । सेठानी ने बड़ा अफसोस किया । सेठ से कहा कि देखो पड़ोसिन ने ऐसे ही किया था सो मोती बरसे थे और हमने वैसे ही किया तो एक भी मोती नहीं बिखरा ।

अरे भैया, वह तो भावों की बात थी । बनावट से धर्म नहीं होता है । स्वस्थ निर्मलपरिणाम हो तो धर्म होता है जिसकी आत्मा निर्मल नहीं है उसके तपस्या, शास्त्र, पुराण सब निरर्थक हैं । क्या सर्वथा निरर्थक हैं? नहीं । वीतराग सम्यक्त्वरूप निज शुद्ध आत्मा ही उपादेय है―ऐसी भावना सहित वही शास्त्र, पुराण, तपस्या हो तो ये मोक्ष के बहिरंग सहकारी कारण होते हैं और यदि निज शुद्ध आत्मा के उपादेयपने की भावना नहीं है तो वह कुछ पुण्य का कारण बन जाय और मिथ्यात्व रागसहित हो तो पापबंध का कारण होता है ।

कमठ रुष्ट होकर घर से चल दिया और उसने सन्यासियों के बीच जाकर एक तपस्या करने का ढोंग बना लिया था । एक मन की शिला अपने ऊपर धरे हुए तपस्या कर रहे थे । तो वह तपस्या है क्या? नहीं । कोई दूसरे का नाश करने के लिए प्रभु की पूजा करने आए तो वह पूजा होगी क्या? नहीं । बहुत से पुष्य-चढ़ाता जाय और यह भी कहता जाय कि यह भाई हमें बहुत हैरान करता है । इसका कुल नाश हो जाय तो क्या वहाँ भगवान् के दर्शन हो गये क्या? नहीं हो गए । जैसे ऊपर से बड़ा चिकना व सुंदर घड़ा है और उसमें मल भरा है तो जो उसकी दशा है, वही मायाचारी, असदाचारी और मलिन चित्त वाले पुरुषों की दशा है ।

भैया ! कुटुंब के लोग तुम्हारा कुछ भला न कर देंगे, इसलिए अपने आपकी बात सोचो कि हमें धन-वैभव तथा परिवार में नहीं फंसना है । अपने आपको यही समझो कि मैं अकेला हूँ, मेरा कोई साथी नहीं है । जैसा परिणमूँगा वैसा ही भोगना पड़ेगा । सो जो मलिन चित्त वाले हैं, वे विद्यानुवाद नामक दशमश्रुत को पढ़कर भी मोक्षमार्ग से च्युत हो जाते हैं, दुर्गति के पात्र हो जाते हैं । इस कारण अनेक श्रम करके भी आत्मा को जान लो । आत्मज्ञान कितना बड़ा है? कुछ अंदाज कर सकते हो? संगमरमर जड़े हुए मकान से बड़ा है क्या? घर के पुत्र, स्त्री और परिवार में बड़ा है क्या? अरे ! आत्मज्ञान की तुलना तो किसी से भी नहीं की जा सकती है ।

भैया ! यह तो स्वप्न है, व्यर्थ की चिंता की बात है । किसी बात से क्षोभ होता हो तो लो लात मारो, कुछ प्रयोजन ही नहीं है । तुम तो सुख पूर्वक अपना गुजारा कर सकने की हिम्मत रखते हो या नहीं? नहीं रखते । तो जाओ, तुम्हारा रास्ता अलग है, हमारा रास्ता अलग है । क्या झंझट है और क्या चिंता है?

‘खीर से संग, महेरी से न्यारे ।’ यह एक कहावत है । भैया ! इसका मतलब जानते हो क्या? दूध की खीर बनती है और मट्ठा की महेरी बनती है । सो दूध की खीर में तो झट शामिल हो गए और मट्ठा की महेरी से अलग हो गए । इसी प्रकार परिवार के लोग हैं । जब तक सुख है तथा कुछ स्वार्थ निकलता है तब तक तो संग देते हैं और जहाँ स्वार्थ न सिद्ध हुआ, कुछ सुख न मालूम हुआ तो वे अलग हो जाते हैं । उनमें पड़कर अपने को ही दुःख उठाना पड़ता है । यदि कुछ अवधिज्ञान ठीक बना तो नरक में जाकर सही पता पड़ेगा कि अब हम नरक में आ गये हैं, अब इस विपत्ति में मुझे कोई पूछने वाला नहीं है । दुःख क्या? संकट क्या? क्यों चिंता करते हो? जैनशासन को पाकर भी चिंता करते हो तो डूब गये । वस्तुस्वरूप की यथार्थता बताने वाला सिद्धांत पाया तो वस्तु को उल्टा-उल्टा मानकर दुःखी क्यों होते हो? आत्मा का ज्ञान करो । इस आत्मा के जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है इसी बात को इस दोहे में बताते हैं―


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