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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 115

From जैनकोष



अतिसंक्षेपाद्विविध: स भवेदाभ्यंतरश्च बाह्यश्च ।

प्रथमश्चतुर्दशविधो भवति द्विविधो द्वितीयस्तु ।।115।।

परिग्रह के प्रकार―समस्त अनर्थों का मूल परिग्रह है । परिग्रह दो प्रकार के हैं―एक अंतरंग परिग्रह और एक बाह्य परिग्रह । अंतरंग परिग्रह 14 प्रकार के होते हैं । अंतरंग परिग्रह कहलाता है आत्मा का परिणाम । आत्मा का जो विकारी परिणाम है वह तो है अंतरंग परिग्रह और आत्मा से अलग जो बाहर में चीजें पड़ी हैं यह है बाह्यपरिग्रह । तो अंतरंग परिग्रह 14 प्रकार का बताया गया है । 14 प्रकार का अंतरंग परिग्रह और 10 प्रकार का बाह्य परिग्रह । इस तरह परिग्रह के 24 भेद हैं । अंतरंग, परिग्रह मायने विकार परिणाम । जीव का जो विकारपरिणाम है उसे अंतरंग परिग्रह कहते हैं । बहिरंग परिग्रह का संक्षेप करें तो वह दो प्रकार का है एक चेतन और एक अचेतन । आत्मा के विकार परिणाम तो अंतरंग परिग्रह हैं और चेतन-अचेतन परिग्रह बाह्य परिग्रह हैं ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
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