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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 130

From जैनकोष



रागाद्युदयपरत्वादनिवृतिर्नातिवर्तते हिंसा ।

रात्रिंदिवमाहरत: कथं हि हिंसा न संभवति ।।130।।

अहर्निश भोजन करने वालों के तीव्रराग होने से हिंसा का दोष―रात्रि भोजन का त्याग न कर सकना अर्थात् अत्याग भाव असंयम भाव यह रागादिक का उदय विशेष हो तब हुआ करता है । चीजों को न छोडना, असंयम से रहना, रागादिक की तीव्रता रहना इन सबका नाम हिंसा है । अभी जो हिंसा का लक्षण कहा था वह यही तो बताया गया कि रागादिक भाव उत्पन्न हों उसका नाम हिंसा है । रागादिक न रहें उसका नाम अहिंसा है । रात्रिभोजन का त्याग नहीं कर सकता है कोई तो क्यों नहीं कर सकता कि राग विशेष है । रागादिक भावों की विशेषता होने से जो रात दिन खाता रहता है उसके हिंसा होती है । इस कथन में अभी बाहरी हिंसा की बात पर दृष्टि नहीं दी गयी, किंतु अपने परिणामों में रागादिक भाव विशेष रहते हैं तो उसे हिंसा है और रात दिन अनेक बार खाता ही रहता है, उसके रागादिक विशेष हैं ही, इस कारण उसमें हिंसा है ऐसा एक प्रारंभ में सामान्य कथन किया है । जिस जीव के तीव्र रागभाव होता है वह त्याग नहीं कर सकता । तो जिसको भोजन में अधिक राग होगा वही तो रात दिन खायेगा, दिन में भी खायेगा, रात में भी चैन नहीं । तो राग की विशेषता है तब ऐसा किया जाता है । जहाँ राग है वहाँ हिंसा अवश्य होती है । तो रात्रि भोजन त्याग न करने में हिंसा है । उसका कारण यह बताया इस गाथा में कि चूंकि उसके रागादिक भाव विशेष हैं तभी तो वह रात दिन खा रहा है, इस कारण भावहिंसा है । ऐसा कथन होने पर शंका उपस्थित होती है, वह शंका क्या है उसे स्वयं आचार्य महाराज इस गाथा में लिख रहे हैं ।


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